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January 04, 2011

ब्रेक के बाद

यद्यपि ब्‍लॉगिंग कोई भारतीय क्रिकेट टीम नहीं है जिससे एक बार बाहर होने के बाद वापसी आसान न हो। ना ही ब्‍लागरी के क‍ाबिल लोगों को चुनने के लिए कोई चयन समिति बैठी हुई है। ना ही ब्‍लागिंग में योग्‍यता-अयोग्‍यता जैसी ईजाद मानवीय अवधारणा है। फिर भी एक लम्‍बे ब्रेक के बाद किसी ब्‍लॉगर के वापस आने की संभाव्‍यता क्‍या है? टंकी कंपनी को मैं इसमें शामिल नहीं कर रहा जो बाकायदा छोडने की घोषणा करके जमे रहते हैं या छोड भी देते हैं। मैं ऐसे ब्‍लॉगरों की बात कर रहा हूँ जो न तो ब्‍लॉग डिलीट करते न ही आजकल के फिल्‍म-प्रमोशन की तरह ब्‍लॉगिंग त्‍याग प्रमोशन कृत्‍य करते। बल्कि चुपचाप लिखना बंद कर देते हैं। इस पर शायद अभी तक हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में कोई शोध नहीं हुआ है (हालॉंकि हमें यह नहीं पता है कि शोध हुआ किन बातों पर है) ब्‍लॉगिंग कोई ऐसा/ऐसी रुठा/रुठी दोस्‍त नहीं है जिसके रुठने की वजह आपकी कोई अक्षम्‍य भूल हो।

इन सब भयानक बाधाओं की गैरहाजिरी के बावजूद एक लम्‍बे अंतराल तक न लिखने के बाद ब्‍लॉगिंग में वापसी आसान नहीं होती। मजे की बात है कि हम कैसा भी लिखें कोई पोस्‍ट प्रकाशित करने से रोक नहीं सकता। चाहे एक-दो लाइन लिखकर भी पोस्‍ट कर दें। फिर भी जब लिखना नहीं होता तो नहीं होता।

आज कई बहुत अच्‍छा लिखने वाले ब्‍लॉगर महीनों साल से पोस्‍ट लिखना बंद किए हुए हैं। ऐसे अनेकों नाम हैं। लिखने में गत्‍यावरोध की एक समय सीमा के बाद एक तरह से जडत्‍व का नियम काम करने लगता है। जो न लिखने की स्थिति को बनाए रखना चाहता है।

दूसरी बात जो न लिखने के लिए जिम्‍मेवार होती है वह है अपनी छवि के अनुरुप बेहतरीन पोस्‍ट न लिख पाने की समस्‍या। शुरुआत में ब्‍लॉगर के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता। वह लगातार पोस्‍ट लिखता जाता है। ज्‍यादातर के पास अंत तक भी यही हाल रहता है।

यह तो पक्‍की बात है कि कृत्‍य अपने आप में साध्‍य नहीं होता। जैसे खाना खाया जाता है पेट भरने के लिए स्‍वाद के लिए न कि खाने के लिए। ऐसे ही ब्‍लॉगिंग की भी अपनी वजह होती है। कोई भी लिखने के लिए नहीं लिखता। कुछ लोग सामाजिक कारणों से लिखने का दावा करते हैं, तो कुछ स्‍वांत: सुखाय। स्‍वांत: सुखाय में पर दुखाय वाला सुख भी आ जाता है। हालॉंकि यह कोई नहीं जानता कि वह क्‍यों लिखता है। लिखने का अभ्‍यास करने के लिए भी ब्‍लॉग लेखन किया जा सकता है।

क्‍योंकि ब्‍लॉग लेखन में लिखने वाले पर लिखने का किसी तरह का दबाव नहीं होता इसलिए औसत लिखने वाले तब तक कुछ भी लिखते रहेंगे जब तक हमें ऐसा करने में मजा आता रहेगा।

विषयगत लेखन, कविता, कहानी, लेख, व्‍यंग लिखने वालों के साथ, जिन्‍हें उन्‍हीं की तरह के कई अच्‍छा लिखने वाले लोग यह मानते हैं कि वे अच्‍छा लिखते हैं, 
ऐसे ब्‍लॉगरों को अपना मानक बनाए रखना होता है।

हम जुलाई के बाद आज अपने ब्‍लॉग पर नमूदार हुए हैं। हमारे ऊपर सनक सवार हुई अपने ब्‍लॉग में कई परिवर्तन करने की। इसलिए हमने सबसे पहले अपने ब्‍लॉग का नाम 'अनौपचारिक' से बदलकर 'ब्रेक के बाद' कर दिया। क्‍योंकि हम काफी लम्‍बे ब्रेक के बाद लिख रहे हैं। ब्‍लॉग का नाम बदलना सबसे आसान कामों में से है, सिर्फ तब जब आपको कोई नाम सूझ गया हो जिसे पहले वाले से बदला जा सके। इसके बाद खूब अच्‍छी तरह से कस्‍टमाइज की हुई टेम्‍पलेट को हटाकर ब्‍लॉगर की टेम्‍पलेट डाल दी। जिसमें कि अभी कस्‍टमाइजेशन के कई काम बाकी हैं। ब्‍लॉगर ने अब काफी सुविधा कर दी है खासकर टेम्‍पलेट के साइड बार में हेर फेर करने के लिए। यूआरएल भी बदलना चाहते थे लेकिन वह बिना अपने खुद के डोमेने में गए बहुत घाटे का काम है। और ब्‍लॉगर को छोडने का फिलहाल हमारा कोई इरादा है नहीं।

टिप्‍पणी विकल्‍प रखने और न रखने पर भी हमने सोचा। पता चला कि टिप्‍पणी विकल्‍प न रखना सही नहीं है। पुन‍िर्विचार करने की वजह यह थी कि प्रतिटिप्‍पण‍ी के लिए हम हर जगह हमेशा पहुँच नहीं पाते। यह बात ब्‍लॉगाचार के खिलाफ जाती है। दूसरी बात हम उस सामग्री पर टिप्‍पणी करना पसंद करते हैं जिस पर हम अपना कोई विचार व्‍यक्‍त कर सकें।

पर इसमें धोखे जैसी कोई बात नहीं है क्‍योकि हमने प्रतिटिप्‍पणी करने का वादा नहीं किया हुआ है। कर भी सकते हैं और नहीं भी। इसलिए हमारे ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी खुद की रिस्‍‍क पर करें।

अंत में फुरसतिया जी की बात जरुर याद आती है कि यदि आप को लगता है कि आपकी ब्‍लॉगिंग के बिना दुनिया का खाना हजम नहीं होगा तो अगली सांस आने के पहले आप ब्‍लॉगिंग करना बंद कर दें। जिसे इस बात का भान शुरु से ही होगा वह इस क्षेत्र में चिरकाल तक बना रहेगा। 

ब्‍लॉगिंग के गत्‍यावरोध को तोडने का सबसे बढिया तरीका है कि ब्‍लॉगिंग के बारे में ही पोस्‍ट लिखिए। जैसा आज हमने किया। यदि फिर भी काम न बने तो हर पोस्‍ट में बताते रहिए कि कौन क्‍या गलत कर रहा है। ऐसे में लोग भले कहने लगें कि जवानी में ही सठिया गया है या सठियाने की सही उम्र में ही सठिया गया है। पर एक आइटम पोस्‍ट तो निकल ही आया करेगी।

May 12, 2010

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सबसे ज्‍यादा पढी जाने वाली पोस्‍टों के प्रकार

हम ब्‍लॉगिंगनामा टैग के अंतर्गत ब्‍लॉगिंग से संबंधित पोस्‍टें जैसे -

ब्लॉगिन्ग के कमेन्ट किलर या टिप्पणी हन्ता ! ( यह ब्‍लागिंग के शुरुआती दिनों की पोस्‍ट है )

हिन्दी ब्लॉग्गिंग में टिप्पणी का महत्व , जॉनी....ब्लॉगिंग की भावना को समझो ! !

हिन्दी ब्लॉगिंग में चर्चा चकल्लस - प्रस्तावित चर्चाएँ


ब्‍लॉगिंग माहात्‍म्‍य - कुंडलियां , भाग- 1



इत्‍यादि लिख चुके हैं । इसी क्रम में सबसे ज्‍यादा पढी जाने वाली पोस्‍टों के प्रकार हम प्रस्‍तुत कर रहे हैं ।
ऊपर की विजेट में आप अपनी पसंद के हिसाब से राय व्‍यक्‍त कर सकते हैं । जाहिर और भी कई प्रकार की पोस्‍टें होंगी जो मेरे ध्‍यान में नहीं आ सकी हैं । मेरा मतलब वर्गीकरण से है ।

इसके लिए आपके सहयोग की आवश्‍यकता है कि किस तरह की पोस्‍टें सबसे ज्‍यादा लो‍कप्रिय होती हैं । इससे हम सभी को हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की मुख्‍य प्रवृत्ति को समझने में सहायता मिलेगी ।

***********************

वोटिंग विजेट अस्‍थाई होता है । इसलिए वही सारे विकल्‍प यहॉं लिख रहा हूँ ।


तमाशाई

टांग खिंचाई वाली

मनोरंजक

सनसनीखेज

आलोचनात्‍मक

कविता , गजल

ब्‍लॉगर द्वंद्व युद्ध

धर्म सम्‍प्रदाय ले दे वाली

तकनीकी विज्ञान

चर्चा

हास्‍यव्‍यंगात्‍मक

क्षेत्रीय लटकों झटकों से युक्‍त

भावुकतापूर्ण

शांत सौम्‍य मासूम पोस्‍टें

नारी विमर्श

चचर्ति राष्‍ट्रीय खबरें

टिप्‍पणी में मिले सुझावो से बाद में शामिल किए हुए :

ब्‍लॉगर मिलन से संबंधित पोस्‍टें

ब्‍लॉगिंग से संबंधित तटस्‍थ व वस्‍तुपरक विश्‍लेषण वाली पोस्‍टें

"बढ़िया लेखन, जो विवादों से दूर हो" (via PD)

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धन्‍यवाद ।
++++++++++++
वोटिंग का परिणाम
स्‍पष्‍ट देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें



December 10, 2009

ब्‍लॉगिंग माहात्‍म्‍य - कुंडलियां , भाग- 1

पहली बार कुण्डलियाँ लिखे हैं ! यह काका 'हाथरसी' को समर्पित है ! काका हाथरसी को स्कूली दिनों में पढ़े थे ! पता नहीं कैसे अचानक याद आ गए !

रस्‍ते में कल मिल गए, ब्‍लॉगर बगलूचंद
नमस्‍कार तो कर लिए, और बोलती बंद
और बोलती बंद, तुम अपना हाल सुनाओ
ब्‍लागिंग में क्‍या नया, लिखे हो यह बतलाओ
बगलू ब्लॉगर बिफरे, मेरा सिर मत खाओ
ब्‍लागिंग ब्‍लागिंग करों नहीं, कुछ और सुनाओ

नखरे ज्‍यादा मत करो, करो ना टाइम नष्‍ट
जल्‍दी जल्‍दी बक डालो , तुमको जो हो कष्‍ट
तुमको जो हो कष्‍ट, कि कुछ तो बोलो यारा
ब्‍लागिंग का जो भी दुख हो, कह डालो सारा
कह चालू कविराय, कि अपनी राय बनाओ
बुद्धिमान ब्‍लॉगर के, कुछ लक्षण दिखलाओ

इतना सुनकर आ गया, बगलू जी को ताव
कहने लगे जि ब्‍लागिंग का, बडा बुरा है चाव
बडा बुरा है चाव, कि मेहनत लगती जितनी
इतना पढते तो, खुल जाती किस्‍मत अपनी
कह चालू कविराय, कि तुम मारो शेखी मत
असली कारण बको, तुरंतै जल्‍दी झटपट

असली कारण कुछ नहीं, तुम भी हो घनघोर
हम तो बस सुस्‍ताय रहे, करो न एतना शोर
करो न एतना शोर, कि तुम तो अपनी देखो
ब्‍लाग पोस्‍ट लिख सके नहीं, टिपणी ही चेंपो
फिर भी तुम उकसाय रहे हो, तो कहते हैं
ब्‍लागिंग के चक्‍कर में, हम क्‍या क्‍या सहते हैं

थाली खाने की लगी, पत्‍नी जी चिल्‍लायँ
बगलू जी हां हूं करें, पर उठ के न जायँ
पर उठ के ना जायँ, मिली अब तगडी घुडकी
बगलू तुम जो उठे नहीं, हो जाए कुडकी
कह चालू कविराय, कि ऐसे भी हैं ब्‍लॉगर
लिखते हैं जो चार बजे तक, पोस्‍ट जागकर

'महिला' ब्‍लॉगिंग भी करे, रखे भी घर का ख्‍याल
दिनचर्या में बढ गया, यह अतिरिक्‍त‍ कमाल
यह अतिरिक्‍त कमाल, चाय चहिए बगलू को
कपडा, खाना, होमवर्क, भी है डबलू को
बैठक में डबलू औ डबली चहक रहे हैं
मैडम के वाणी बम, बगलू पर टपक रहे हैं

इतनी मेहनत से लिखे, जूझ जाझकर पोस्‍ट
अब हैं देखन में लगे, कै ठो आए पढने दोस्‍त
आए पढने दोस्‍त, कि सब पोस्‍टन पर जाओ
एक टिप्‍पणी दे अपनी, आमद दर्शाओ
कह चालू ब्‍लॉगर को, ब्‍लॉगर ही जानेगा
नई पोस्‍ट लिख दी, बंदे ने पहचानेगा

नए नए मुददे गुरू, कहॉं पाऍं हम रोज
दिन भर यही दिमाग में, करते रहते खोज
करते रहते खोज, लिखें ऐसे मसले पर
पढवैया भी मिलें , मिलें टिपणियॉं बम्‍पर
कह चालू कविराय, कि एक मुददा है कौंधा
बगलू बैठा है पीसी पर, मुँह को औंधा

ब्‍लॉगिंग अब करने लगे, काफी स्‍टूडेंट
मुश्‍िकल होता है उन्‍हें, टाइम मैनेजमेंट
टाइम मैनेजमेंट, पडो न इसमें ज्‍यादा
पहले अपनी पोथी तुम, पलटाओ भ्राता
कह चालू कविराय, कि टाइम बहुत मिलेगा
इस टाइम को चूका, तो फिर दिल दहलेगा

ब्‍लॉगिंग में हम क्‍या लिखें, असमंजस है आज
टिपियाना भी बंद किए, लगता है इल्‍जाम
लगता है इल्‍जाम, करें हम कैसी ब्‍लॉगिंग
कुछ भी लिखना हुआ, कि होती है गुटबाजिंग
आ गई अब टिप्‍‍पनियां भी, जैसे फेक करेंसी
लफडा हो जायेगा, हो गर चूक जरा सी

ब्‍लॉगिंग को समझो नहीं, टाइम पास मकाम
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग है बडी, जीवटता का काम
जीवटता का काम, कि मतलब को समझोगे
अभी नए बंदे हो, बातों में उलझोगे
कह चालू कविराय, हुए जो ज्‍यादा भाबुक
सह न सकोगे यहॉं पडे, शब्‍दों के चाबुक

अब तो ब्‍लॉगिंग का भया, बहुत बडा आकार
लेख, कहानी, कविता, रूपक, तकनीकी संसार
तकनीकी संसार, लिखो व्‍यंग औ' नाटक
पढते रहो नियम से, खुले अकल के फाटक
टिप्‍पणियों से तुमको हां, एक नजर मिलेगी
कैसा लिखते हो यह भी, कुछ खबर मिलेगी

हिंदी ब्‍लॉगर हो गए, हुआ न टंकी ज्ञान
ब्‍लागिंग करना आपका, व्‍यर्थ हुआ श्रीमान
व्‍यर्थ हुआ श्रीमान, कि टंकी नहीं दिखेगी
फिर भी टंकी पर चढने की, धमक मिलेगी
देखो चालू उधर कई, बलॉगर भागे हैं
बगलू टंकी से उतरो, मिन्‍नत मॉंगे हैं

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में अब मित्रों, करिए स्‍वस्‍थ विमर्श
राजनीति, विज्ञान , नारी , साहित्यिक स्‍पर्श
साहित्यिक स्‍पर्श की करिए बहस खींचकर
टीवी, मीडिया , कृषि, न्‍याय है बहुत लाभकर
कह चालू कविराय कि, एक ठो बहस छिडी है
नारी मुक्ति किधर से आए, उलझ पड़ी है

ब्‍ला‍गिंग टिपणी करते करते, हो जाए मिस्‍टेक
माफीनामा पेश करो, खोलो दिल का गेट
खोलो दिल का गेट, कि टाइम नहीं गंवाओ
दरियादिल हैं ब्‍लॉगर मित्रो, लाभ उठाओ
बगलू चालू , ब्‍लॉगिंग ब्‍लॉगिंग खेल रहे हैं
ब्‍लाग पोस्‍ट नित रोज भयंकर ठेल रहे हैं

दिल गार्डेन गार्डेन जो भया, सुनकर यह अख्‍यान
एक टिप्‍पणी छोडकर, फिर करिए प्रस्‍थान
फिर करिए प्रस्‍थान, रहें पुलकित च किलकित
एक स्‍वस्‍थ संवाद बने, ब्‍लागों में उत इत
कह चालू कविराय, कि फिर से फरमायेंगे
जब ब्‍लागिंग माहात्‍म्‍य, भाग- दो लाएंगे


धन्‍यवाद ।

October 31, 2009

लो ! हम भी एक ठो पोस्ट कबाड लिए इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी के नाम पर

इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी से एक बात तो जाहिरा तौर पर हालिया हजामत/फ़ेसिअल प्राप्त मुंह की तरह साफ़ हो गई है कि एक ब्लॉगर और कुछ बर्दाश्त करे या नहीं बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई उसे ब्लॉगिंग की तमीज सिखाने की कोशिश करता नजर आए चाहे वह ब्लॉगिंग का महारथी हो या साहित्य का उपदेशक की यहां कोई जगह नहीं है, जगह मिल सकती है लेकिन जब वह उपदेश कम चेतावनी की तरह ना दिया जाए।
ब्लॉगिंग संबंधी तकनीकी ज्ञान या ब्लॉगिंग टिप्स स्वीकार्य है । वो भी तब जब विषय की कुछ नई जानकारी मिल रही हो । बाकी, ब्लॉगपुरियों का कहना है कि विभिन्न विधाओं से आने वाले सुधारातुर लोग पहले अपनी-अपनी शकलों और घरों को साफ़ करें और वहां आधुनिक पुनर्जागरण की शुरुआत करें तो ब्लॉगिंग में तदनुसार सुधार अपने आप हो लेगा । भारत में अभी .06 प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं । और हिन्दी ब्लॉगिंग ? लेकिन यहां के अतिरिक्त सतर्क लोग इंटरनेट से होने वाली हानि का रुदन शुरु कर चुके हैं, बजाय इसके कि यह सोचें कि कैसे यह अधिक से अधिक लोगों को उपलब्ध हो सके । यही हाल हिन्दी ब्लॉगिंग का है । एक देशी कहावत है कि तालाब खुदा नहीं और मंगर (मगर) पहले ही उतराय पडे । सरकारी खर्चे पर एक ठो गोष्ठी का हो ली । लोगन की कल्पनाएं मामला फ़ि़क्स होने तक पहुंच गईं । गोष्ठी से ये तो पता चल ही गया कि मधुमक्खी के छ्त्ते में पत्थर फ़ेंकने से क्या हाल होता है ।

ब्लॉगिंग के यदि अंतिम सदस्य को देखा जाय तो यह अनगढ की मासूम अभिव्यक्ति है । इसकी शुरुआत भी यहीं से हुई थी । तो ब्लॉगिंग एक साथ अपने आदिम और विकसित-सभ्य दोनों ही रूपों में दिखाई देगी । ब्लॉगर एक ऐसा बच्चा है जो पैदा होते ही चलने और बोलने लगता है ।

हिन्दी ब्लॉगिंग अभी भी कुछ एग्रीग्रेटरों मुख्यतः ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत के सहारे चल रही है । और भी हैं लेकिन उनका न तो हम प्रयोग करते और न ही हमारा ब्लॉग उनमें पाया जाता । यदि पा भी लिया गया तो अपडेट होने की बाद, ब्लॉग पोस्ट तुरन्त नहीं दिखाता । मतलब उनकी अपनी कमियां हैं । कुछ एग्रीग्रेटर मोबाइल नं. मांगते हैं । हम मानते हैं कि यदि ये दो संकलक हट जायें तो हिन्दी ब्लॉगर की स्थिति कुंभ के मेले में बिछडे लोगों की तरह हो जायेगी ।
नए बनने वाले ब्लॉगों तक पहुंचने का तो सवाल ही नहीं उठेगा । इसी वजह से हमने अपने ब्लॉग में छोटा संकलक लगा रखा है | अभी कुछ समय पहले ब्लॉगवाणी थोडे समय के लिए बन्द हो गई थी, तो निराशा व्याप्त थी | यह बात अलग है कि हम निराशा जाहिर करने का मन बना ही रहे थे कि यह फ़िर से शुरू हो गई । आखिर आलस्य के भी कुछ फ़ायदे तो होते ही हैं । कहने का मतलब अभी भी हिन्दी ब्लॉगिंग को ब्लॉगवाणी-चिट्ठाजगत की तरह दो-चार और संकलकों की जरूरत है । और सबसे बडी जरूरत है गूगल सर्च में हिन्दी के की वर्ड्स की ।

इलाहाबाद ब्लॉगर गोष्ठी/स्म्मेलन में ब्लॉगिंग के बारे में बहुत तरह के विचार व्यक्त किए गए । जैसे ब्लॉगिंग क्या है ? यह काम लोग क्यों करते हैं ?
ब्लॉगर कहां पाया जाता है ? क्या बुर्का ओढकर ब्लॉगिंग और टिप्पणी करना उचित है ? क्या एक ब्लॉगर में, "लिखी हुई चीज" को प्रकाशित करने की वांछित तमीज पायी जाती है आने वाले समय में समाज मे यह किस तरह का और कितने ग्राम प्रभाव डाल सकती है ?
इस तरह के बहुत से मुद्दों पर पर्चे पढे गए । यह भी कि मीडिया और प्रेस पर तो पूंजीपतियों या सत्ताधारियों का कब्जा है और उनका काम तो टीआरपी उन्मुख होता है तो क्या ब्लॉगरों का लेखन भी इस बात को ध्यान में रखकर किया जाता है या किया जाना चाहिये ?

क्योंकि यह सम्मेलन काफ़ी चर्चित रहा । कहा जा रहा है कि कोई भी ब्लॉगिंग घटना इससे पहले इतनी चर्चित नहीं भई थी । इसलिये इसकी रिपोर्टिंग भी ज्यादातर \ ब्लॉगरों ने पढी । फ़िर भी हम कुछ प्रमुख लिंक यहां पर इकट्ठे कर रहे हैं । इस पोस्ट के अंत में । यह सम्मेलन उपरांत चर्चा भी विभिन्न पक्षों को समझने के लिए काफ़ी काम की है । साथ ही ब्लॉगिंग पर शोध करने वालों के लिए भी यह सहयोगी रहेगी ।

सम्मेलन के बाद एक हास्य-क्रूर-व्यंग लेख टिप्पणी प्रतियोगिता अपने आप शुरू हो गई । एक से बढकर एक विचारोत्तेजक और बुद्धिवर्धक/भ्रामक लेख और टिप्पणियां लिखी गईं । उनका प्रभाव ऐसा था कि कुंजी पटल की आवाजें तक उन लेखों और टिप्पणियों से सुनी जा सकती थीं और लेखों में कुंजीपटल और चूहे से सज्जित ब्लॉगर कुंजियों को भांति-भांति से साधते नजर आते थे । उनमें तर्कों की जगह जुमलों की प्रधानता थी । क्योंकि ब्लॉगर उसी बात की नोटिस लेता है जिसे पढने में मजा आये । टी.वी. के दर्शक की तरह । स्नायुओं को उत्तेजना मिलनी चाहिए । अरे हम मनोरंजन करने बैठे हैं कोई हरिश्चंद्र बनने नहीं ।

यह बहस सैद्धांतिक मुद्दों पर शुरू हुई और क्रमशः विकसित होती हुई व्यक्तिगत आक्षेपों को प्राप्त हुई । आदमी जब गुस्से में बोलता है तो कई ऐसी बातें प्रकट करता है जो सामान्यतः नहीं कर सकता था ।

इस वाद-विवाद में हमने एक नए शब्द टंकेषणा का प्रयोग किया । क्योंकि सारे घटनाक्रम में कुछ जगहों पर इसके अस्तित्व के चिन्ह मिले । मनुष्य में मुख्यतः दो तरह की अस्तित्वगत एषणाएं(इच्छाएं) पायी जाती हैं -जीवेषणा और मृत्येषणा । जीवन की इच्छा और मृत्यु की इच्छा । एक तीसरी तरह की एषणा होती है टंकेषणा । अर्थात टंकी पर चढने की इच्छा । यह एषणा बाल्यकाल से ही बच्चे के रूठने के रूप में देखाई देने लगती हैं । हर मानव टंकेषणा नहीं कर सकता । कुछ सौभाग्यशाली मानवश्रेष्ठ ही टंकेषणा को प्राप्त होते हैं क्योंकि उन्हें यकीन रहता है कि उन्हें टंकी से हरगिज उतार लिया जायेगा और उन्हें टंकी पर चढा देख लोग कूदना मत की गुहार मचा देंगे । ऐसे नाचीज, टंकेषणा को प्राप्त नहीं होते जिन्हें टंकारूढ देखकर लोग समझते हैं कि टंकी की मरम्मत करने गया होगा ।

रहस्यात्मक लेख नस्त्रेदम की भविष्य्वाणियों की तरह लिखे गए । उन लेखों पर समझने और न समझने वालों ने समान रूप से प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं । माहौल कुछ ऐसा हो रहा था कि कुछ भी इधर-उधर बोलना गुट विचलन/चिन्हण कर सकता था । इसलिये समझदार टिप्पणीकारों द्वारा मौन या नरो-कुंजरो की नीति अख्तियार कर ली गई थी । कुछ लोगों को यही नही समझ में आ रहा था कि आखिर सम्मेलन हो जाने से कौन सा ऐसा पहाड टूट पडा ।

ऐसे तो एक ब्लॉगर सम्मेलन इस ब्लॉगिंग मंच पर भी हो सकता है । एक दिन नियत कर लिया जाय और सभी ब्लॉगर जन उस दिन ब्लॉगिंग पर ही पोस्ट लिखें । ब्लॉगिंग पर अपने-अपने विचार व्यक्त करे । इसके लिए कई बिन्दु निर्धारित किए जा सकते हैं । एक मोटी रूपरेखा निर्धारित की जा सकती है कि इन बिन्दुओं पर लिखना है । यदि एक ही दिन सब को न पोस्ट करना हो तो दो दिन में बांटा जा सकता है । बाद में ब्लॉग विमर्श संबंधी उन सारी लिंक को एक जगह रखा जा सकता है ।

इस गोष्ठी में एक अच्छी बात यह सुनने में आयी कि हर ब्लॉगर चाहे वह गोष्ठी में बोला हो या अपने ब्लॉग पर लिखा हो उतना ही बोला/लिखा जितनी उसके पास बुद्धि का स्टॉक था । हमने भी इसी चलन को फ़ॉलो करते हुए यह पोस्ट लिख मारी ।

तो नीचे दे रहे हैं उन बातों के लिंक जिनकी बातें हम अभी कर रहे थे । जो कुछ लिंक छूट भी गए हों तो संज्ञान में आते ही यहां प्रस्तुत कर दिए जाएंगे । जो छूटे हुए लिंक पेश किए जाएंगे उसके लिए अग्रिम धन्यवाद !

क्या कहा ? अभी अन्त नहीं हुआ ? कोई बात नहीं हम आने वाली पोस्टें उनके आने पर चेंप देंगे ।

तो ये रही आद्योपान्त कहानी :

October 22, 2009
इलाहाबाद से भेजी गयी ब्लॉगर्स सूची।


22 October 2009
पड़ चुके हैं संतों के चरण प्रयाग में ...


October 23, 2009
ब्लागर समारोह का उद्घाटन और सत्यार्थ मित्र का विमोचन

२२-१०-२००९
एक चर्चा इलाहाबाद से

October 23, 2009
इलाहाबाद में ब्लॉग मंथन शुरु


२३ अक्तूबर २००९
तहाँ तहाँ ते आ दाते हैं


२३-१०-२००९
हिन्दुस्तानी एकेडमी से लाइव ब्लॉगिंग...

२३-१०-२००९
फुरसतिया प्रयागराज में परिचय देवत अपन

२३-१०-२००९
हिन्दी चिट्ठाकारी में मीनू खरे की प्रस्तुति…

२३-१०-२००९
ब्लॉगिंग – कानाफ़ूसी को सार्वजनिक करने का माध्यम है : अविनाश

२३-१०-२००९
हिंदी चिट्ठाकारी की दुनिया : सेमिनार के कुछ वक्ता

२४-१०-२००९
इलाहाबाद ब्लॉग मंथन की विस्तृत रपट…

२४-१०-२००९
लोटपोट पर सुबह -सुबह की चर्चा

लाहाबाद से गैर-रपटाना....एकदम ब्‍लागराना

२४ अक्तूबर २००९
सबसे पहले मैंने ही


२४-१०-२००९
दूसरे दिन का पहला सत्र शुरू


24 October 2009
इलाहाबाद से लौट कर :कुछ खरी कुछ खोटी और कुछ खटकती बातें !


October 25, २००९
उन दोनों के साथ इलाहाबाद मीट मे एक ही मंच पर बैठ कर वार्तालाप करने से ----- इत्यादि को कोई आपत्ति नही हुई क्यों ?



25 October 2009
ब्लागर उवाच -प्रयाग की चिट्ठाकारिता संगोष्ठी


October 2009
......और अब बची खुची भी ! चिट्ठाकारी की दुनिया की एक अर्ध दिवसीय रिपोर्ट !


इलाहाबाद...कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

२५-१०-२००९
इलाहाबादी सम्मेलन की चित्रमय चर्चा

25 October 2009
हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैर-सपाटा यानी इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन…

रविवार, २५ अक्तूबर २००९
इलाहाबाद से 'इ' गायब, भाग -1


मंगलवार, २७ अक्तूबर २००९
इलाहाबाद से 'इ' गायब - अंतिम भाग


October 26, 2009
…इलाहाबाद के कुछ लफ़्फ़ाज किस्से

October 26, 2009
इलाहबाद चिट्ठाकार संगोष्ठी: बधाईयां! शर्म तो बेच खाई, ये तो लफ़्फ़ाजियों का समय है!

अक्तूबर 26, 2009
कायलियत के कायल- कैसे कैसे घायल?!!


२७-१०-२००९
बहस
कम , चर्चे ज्यादा प्रश्न कम , पर्चे ज्यादा


October 27, 2009
चिट्ठाकारी (हिंदी?) में निहित ख़तरे…


October 28, 2009
हे भीष्म पितामह, हम ब्लॉगर नहीं, पर वहां थे…

October 29, 2009
लाहाबाद चिट्ठाकार सम्मेलन के कुछ हा हा ही ही , हाय हैलो के ऑडियो - वीडियो

अक्तूबर 29, 2009
पुल के उस पार से: इलाहाबाद दर्शन

10/30/2009
इलाहाबादी चिक्-चिक् का मतलब !

३०-१०-२००९
जिन्‍हें हमारा मुल्‍क चुभता है

October 31, 2009
.इति श्री इलाहाबाद ब्लागर संगोष्ठी कथा

०१-११-२००९

इलाहाबादी कतरनें, हिन्दी चिट्ठाकारी : एक और नई चाल?


September 11, 2009

हिन्दी ब्लॉगिंग में चर्चा चकल्लस - प्रस्तावित चर्चाएँ

पहले हम भूमिका बांधेंगे, इसके बाद मुद्दे पर आयेंगे क्योंकि हर चर्चा भूमिका की मांग करती है बिना भूमिका के चर्चा, बिना पते की चिट्ठी की तरह होती है जो श्रोता डाकिया को परेशान कर देती है

वैसे भी हमारे यहां की परम्परागत चर्चा का शिष्टाचार भी यही है कि पहले जो बात कहनी है उसका माहौल बनाया जाता है । इसी को कहते हैं भूमिका बांधना । भूमिका बांधकर ता पीछे मुद्दे की बात करने पर वह ज्यादा असरदार बन जाती है । कभी-कभी इतनी असरदार हो जाती है कि बिसर जाता है कि भूमिका बांधी किसलिये जा रही थी ।


जैसे कवि सम्मेलन में जब गम्भीर रस के कवि के बाद कोई हास्य रस का कवि आता है तो पहले वह अपनी भाव-भंगिमाओं और चुटकुलों के द्वारा हास्य रस का माहौल बनाता है । यह एक इशारा भी होता है कि वह हास्य रस का कवि है और वह जो भी सुनाये उसे हास्य रस की कविता समझा जाय । माहौल का असर यह होता है कि कविता सुनने से ज्यादा कवि को देखकर हंसी आती है । इससे श्रोताओं को इशारा भी मिल जाता है कि प्रतिक्रिया किस तरह करनी है । इस तरह माहौल मुद्दे में ऐसे घुस जाता है जैसे होमियोपैथी की मीठी गोली में खुशबूदार दवाई घुस जाती है |


ब्लॉगिंग एक चर्चा विधा है । क्योंकि इसमें प्रस्तुतीकरण अकसर चर्चा मोड में होती है । यही ब्लॉगिंग की सबसे लोकप्रिय शैली है । इसकी वजह यह भी है कि इसमें चर्चा की तरह तुरंत प्रतिक्रिया भी मिलती है, टिप्पणी के रूप में । इसलिये भी ब्लॉगिंग एक चर्चा विधा है । जैसे लोक में चर्चाएँ होती हैं । फ़िर उनमें से कुछ चर्चाओं की चर्चाएँ होती हैं ।
"आज वहां पर ऐसी चर्चा थी"
"आजकल तो आपकी भौत चर्चा है" इत्यादि ।

इसी तरह हर ब्लॉगर एक चर्चाकार है(असहमति रखने वाले अपने को शामिल न समझें) |

इसी तरह हिन्दी ब्लॉगिंग में भी चर्चाओं की कई रूपों में चर्चाएँ होती हैं । जैसे चिट्ठा चर्चा, चिट्ठी चर्चा, टिप्पणी चर्चा ,जन्मदिन चर्चा इत्यादि । हमारी जानकारी में अभी इतनी ही विशेष चर्चाएं हैं ।

चर्चा ब्लॉग देखते हुए हर ब्लॉगर के मन के किसी कोने में अपने ब्लॉग की तलाश रह्ती है । जैसे अपनी उपस्थिति दर्ज समारोह की फोटो दिखाये जाने पर हम अपनी फोटो ढूंढते रह्ते हैं । चर्चा ब्लॉग में चर्चित ब्लॉगों को पढें चाहें नहीं पर एक बार उधर झांक जरूर आते हैं कि कहीं आ ही गया हो नाम, इस बार । और हम धन्यवाद भी न दे पायें । वैसे भी चर्चाकारों के ऊपर गुटबन्दी के आरोप लगते रह्ते हैं । पर यह गलत है । क्योंकि चर्चा ब्लॉग कोई भारत का संविधान तो है नहीं कि आप उससे अवसर की समान उपलब्धता की मांग करें । संविधान कम से कम किताबी रूप में यह देता है । मिले न मिले वो बाद की बात है । फ़िर आरक्षण तो हर जगह ही होता है । अलग-अलग आधारों पर । दुनिया गोल है और कोई उससे बाहर तो है नहीं ।

लेकिन चर्चाकार इसे अन्यथा नहीं लेते क्योंकि उन्हें पता है कि यह तो सिर्फ़ एक बहाना था उनकी चर्चा करने का । बदले में वे भी असंतुष्ट भाई/बहन/मित्र की चर्चा कर देते हैं । किसी ब्लॉगर को उसकी चर्चा न होने की शिकायत हुई नहीं कि उसकी चर्चा हुई नहीं ।

इस तरह चर्चा होने और चर्चा न होने की चर्चा होने से भी चर्चा होती है ।

हिन्दी ब्लॉगिंग के प्रचार के लिये ब्लॉग चर्चा बहुत उपयोगी काम है । इससे ब्लॉगिंग में हलचल बनी रहती है ।

हिन्दी ब्लॉगिंग में अभी और तरह की चर्चाएँ चलाने की पूरी गुन्जाइश है । मैं कुछ विषय सुझा रह हूं जिन पर चर्चा ब्लॉग शुरू किए जा सकते हैं ।

&&& लफ़डा चर्चा : इसमें में एक निश्चित अवधि में जैसे एक सप्ताह या पन्द्रह दिन के दौरान ब्लॉगिंग में हुए गम्भीर किस्म के लफ़डो की चर्चा की जाय ।

)))) नोकझोंक चर्चा : इसमें हल्की फ़ुल्की नोकझोकों की चर्चा की जाय ।

???? गुट चर्चा : इसमें इस बात की चर्चा की जाय कौन ब्लोगर किस गुट में है | पहले किसमें था और भविष्य में किधर मिल सकता है |

@@@ चर्चाकर चर्चा : इसमें ब्लॉग चर्चा करने वाले ब्लोगरों की चर्चा की जाय |

/////‌‌‌ सप्ताह के अधिकतम दस टिप्पणीधारक धारक चिट्ठे : .....

**** सप्ताह की दस उम्दा ब्लॉग पोस्ट : .....


*** कविता चर्चा : सप्ताह की उम्दा कवितायें : ....

ऽऽऽऽ सप्ताह के उम्दा लेख :

++++ सप्ताह की उम्दा कहानियां :

---- सप्ताह की नकल पोस्टें :

और भी बहुत से बढिया-बढिया विषय ढूंढे जा सकते हैं । नकरात्मक विषयों पर चर्चायें न हों जैसे - सप्ताह की 10 घटिया पोस्टें ।

चर्चा के विषय में विविधता आने से बहुत से ब्लॉग चर्चाओं के दायरे में आ जायेंगे । किसी न किसी की कहीं न कहीं चर्चा हो ही जाया करेगी ।

इस तरह कुछ ब्लॉगों की चर्चा के साथ-साथ चर्चाकारों की चर्चाएं भी होती रहेंगी ।

तो कैसी लगी हमारी चर्चा !

August 12, 2009

जॉनी....ब्लॉगिंग की भावना को समझो ! !

जब से हमें फुरसतिया अड्डे पर ब्लोगिंग की मूल भावना का हिन्ट मिला है, हमें लगने लगा कि कुछ दिनों से हम इस भावना से तनिक दूर हो चले थे | चेत होते ही यह भावना हमारे अन्दर गुब्बारे में हवा की तरह समा गयी | और हमारा दिमाग ट्रेन के जनरल डिब्बा के माफिक हो गया | जिसमें सवारी विचार जबरदस्ती ठंसने लगे | जगह बनाने की हील हुज्जत करने लगे | मय साजो सामान | इसके पहले की धक्का-मुक्का की नौबत आए, हमने चूहे से हरी झंडी दिलवाई और कुंजी पट्टरी पर उँगलियों को सरपट दौडाने लगे | तब जाकर सब लोग कहीं न कहीं टिकते नजर आए | उस पर तुर्रा यह कि हमें ख़राब लिखने के फायदे भी जनवा दिए गए | यह पढ़ते ही पहली बार हमें आपने ब्लोगर होने पर गर्व का एहसास हुआ और अपने सहज ही ख़राब लिख सकने की 'ब्लॉगर क्षमता' पर हर्ष | चलो कहीं तो जगह मिली |

अरे ! यह ' ब्लॉगर क्षमता' शब्द बीच में कहाँ से घुस रहा है | पहले हम 'मूल भावना' से तो निपट लें' |

परिणाम स्वरुप इस भावना से अधिकाधिक ब्लॉगर को संक्रमित करने, इसका प्रचार करने और साथ ही इसकी खोज करने के वास्ते हम यह ब्लॉग पोस्ट पीटने बैठ गए | वजह : ब्लॉगिंग की मूल भावना से परिचित होना ब्लॉगर के लिए गैर जरूरी ही नहीं अनावश्यक भी है | जिससे न रोज रोज, कभी-कभी ही सही ब्लॉगर जन इस भावना से जरूर पीड़ित हो जाएँ और बात-बेबात पर पोस्ट दे मारने की विशेष ब्लॉगर क्षमता उनमें जागृत हो सके, जो कि एक कुशल ब्लॉगर की सबसे बड़ी विशेषता है |

अनूप जी द्वारा अपने ब्लॉग पर दी गयी विनीत जी की लिंक से हमें भान हुआ कि ब्लॉगिंग की मूल भावना सहजता और सरलता है | ज्यादा सजाने-संवारने बोले तो मेककरने से इसमें बनावटीपन आ जाता है अर्थात् स्वाभाविकता जाती रहती है | लेकिन यह बात ब्लोगिंग के प्रारम्भिक स्वरुप को देखकर कही गई है | क्योंकि शुरुआत में ब्लोगिंग डायरीनुमा और भावुकतापूर्ण थी | अब यह व्यावसायिकता तक पहुँच गई है | यही सब विधाओं के विकास में होता है | कविता और कहानियों का विकास भी कल्पना से यथार्थ की ओर होता गया | बच्चा पहले अपनी मूल भावना में रहता है | फ़िर जैसे-जैसे बड़ा होता है, मस्ती खोकर सलीकेदार बन जाता है | नफ़ा-नुकसान, दुनियादारी | सर्वाइवल या उत्तरजीविता के लिए | यह सब ब्लोगिंग पर भी लागू |

लेकिन हमारा व्यक्तिगत मत है कि ब्लोगिंग की एक ही पहली और आख़िरी मूल भावना है कि इसकी कोई मूल भावना नहीं है | हम ब्लोगिंग करते समय हमेशा इसी भावना से प्रकाशित रहते हैं | स्वतंत्रता ही इसकी गरिमा है, अराजकता ही इसका सौदर्य है | अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग | किसी प्रवृत्ति को हिट करने की कोशिश करना ब्लोगिंग की मूल भावना के ख़िलाफ़ है | यहाँ हम 'नानी के आगे ननिऔरे (ननिहाल) का हाल भी सुना सकते हैं' | क्योंकि, हे पार्थ ! ऐसा नहीं है कि ब्लोगर जन इस विषय पर तुमसे पहले नहीं लिखे हैं या तुम्हारे बाद नहीं लिखेंगे | फ़िर भी इन सब बातों की परवाह न करते हुए तुम लिखते रहो | फल की परवाह न करना वैसे भी हम भारतवासियों की मूल भावना है | इसी भावना के चलते भारत देश कुछ वर्षों में चीन को पछाड़ने वाला है |

बिना किसी प्रतिभा के पोस्ट पर पोस्ट दनदनाते रहना एक निरे ब्लोगर की क्षमता है, जीवट है | चाहे पोस्ट दो-चार लोग ही पढ़ें, पोस्ट पर पोस्ट दागते रहेंगे | अब यह 'निरा-ब्लॉगर' ख़ुद को हाईलाईट करने की कोशिश कर रहा है | लेकिन आप अभी लुप्प से जलकर बुत जाइए | शायद कभी नंबर आ जाए | बिना किसी प्रतिभा के शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया क्योंकि ब्लोगिंग का प्रतिभा से कोई लेना-देना नहीं है, वरना अनूप जी (ख़ुद उनके अनुसार) ब्लोगिंग करने की बजाय किसी अखबार या पत्रिका में फ़ुरसतिया कॉलम लिख रहे होते | लिखने से पहले जो ज्यादा सोच विचार करेगा वह चाहे जो बन जाए 'निरा ब्लोगर' नहीं बन सकता | पहले हमें लगा कि दूसरे ब्लोगरों की भावनाओं को चोट ना पहुंचाने की भावना को ब्लोगिंग की एक प्रमुख भावना के रूप में पेश करें | लेकिन बाद में हमने अपना यह विचार निरस्त कर दिया | क्योंकि यह बात ख़ुद ब्लोगिंग की मूल भावना के खिलाफ हो जाती |

एक बार अभिनेता राजकुमार के यहाँ एक नेर्देशक महोदय विज्ञापन में काम करने का ऑफ़र लेकर गए | अपने "जानी" राजकुमार ने साफ़ इंकार कर दिया - "जॉनी हम राजकुमार हैं | तुम्हारी कंपनी के सेल्समैन नहीं" | लेकिन नेर्देशक अपनी जिद पर अडा रहा | कुछ देर तक तो राजकुमार जी ने उसे समझाने कि कोशिश की | लेकिन जब वह फ़िर भी नहीं माना तो राजकुमार ने उसे कुछ देर तक घूर कर देखा, फ़िर अपने अंदाज में बोले - "जॉनी ...हमारी बात समझो |" इतना सुनते ही वह चुपचाप अपना सा मुंह लेकर खिसक लिया |

ब्लॉगिंग के ब्लॉगर की जय हो ! भावों के सागर की जय हो ! ब्लोगिंग के लफडे की जय हो ! प्रेम सिक्त झगडे की जय हो !

"जॉनी....ब्लॉगिंग की भावना को समझो ! ! "

July 07, 2009

हिन्दी ब्लॉग्गिंग में टिप्पणी का महत्व

ब्लॉगिंग की विधा जाने के बाद कमेंट या टिप्पणी शब्द अचानक बहुत हिट हो गया है और इन्टरनेट पर, खासकर हिन्दी ब्लॉगिंग में इसका महत्व बहुत अधिक बढ गया है कमेन्ट के विविध रूपों को देखते हुए यदि किसी के मन में यह दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न हो जाए कि हिन्दी ब्लॉगिंग के में टिप्पणी की क्या भूमिका है तो मैं कहना चाहता हूं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में टिप्पणी का महत्व बहुआयामी है | कृपया गौर करें :

टिप्पणी राम-राम है, नमस्कार है
कभी पैलगी तो कभी प्रणाम है
नये चिट्ठों से शिष्टाचार है
कभी परिचय और सत्कार है
'हम भी हैं' की गुहार है
कभी हेलो हाय तो कभी, बाय-बाय है
आदाब है, सत्श्री अकाल है
जिसको मिले वो बिना रुपये के मालामाल है
वरना चिट्ठा कंगाल है
यह बातों का प्रपन्च बनाती है
हिन्दी ब्लॉगिंग को टंच बनाती है
महंतों को सन्त बनाती है
माहौल को जीवंत बनाती है
यह ब्लॉगर का दर्पण भी है
टिप्पक(टिप्प्णीकार)का प्रेमार्पण भी है
कभी-कभी यह तर्पण भी है
पूरी तरह समर्पण भी है |
कभी यह गंभीर विमर्श है
कभी विनोदी परामर्श है
कभी यह नकाबपोश है
तब फैलाती आक्रोश है
यह ब्लोगर को मुद्दे देती है
कभी इक्के-दुक्के
कभी चौके-छक्के देती है
कौन नहीं इस पर फ़िदा है
यह एक लिमिटेड विधा है
इससे ज्यादा क्या कहें कि
यह ब्लोगिंग की जान है
क्योंकि बिना इसके
कोई हिन्दी चिट्ठा नहीं बन सका
महान है |
-जय चिट्ठाकर्म (हैप्पी ब्लॉग्गिंग)

कुछ लोग टिप्पणी को कमतर नजरों से देखते हैं और वे इसे सिर्फ़ ब्लॉगर की खुशामद या 'लाइन मारने' की वस्तु समझते हैं इसमें 'जड चेतन गुण दोषमयकी तरह सच्चाई है भी और नहीं भी क्योंकि 'लाइन मारना' निहायत ही शाकाहारी कर्म है | जब तक कि वह 'लाइन काटने' में बदल जाए इसका सीधा सा अर्थ होता है "प्रभावित करने की कोशिश करना" और यह मनुष्य की एक कुदरती कमजोरी है।

यदि कोई ब्लॉग्गिंग को खुशामद कहने वालों के ब्लॉग पर इस तरह की कमेन्ट करे - "एकदम बकवास", "ये सब पहले कहीं पढा हुआ लगता है", "यदि आप लिखना बन्द कर दें तो हिन्दी भाषा पर एहसान होगा" तो इसे कोई भी पसन्द नहीं करेगा और यह एक तरह से ब्लॉगर से सम्बंध बिगाडने जैसा होगा लेकिन रास्ता भारत के आम बजट की तरह दो अतियों के बीच होता है
कमेन्ट ब्लॉगिंग को गति देते हैं यह ब्लॉगर और पाठक के बीच एक संवाद है साझा ब्लॉगों में यह एक तरह से परिचर्चा की तरह फ़ैलता है इस मुद्दे पर अलग से एक ब्लॉग पोस्ट लिखा जाएगा |

यद्यपि ऐसे ब्लॉगरों का अस्तित्व काल्पनिक ही होगा जो टिप्पणी ना चाहते हों बहरहाल हमारा प्रमुख उद्देश्य सिर्फ़ ब्लॉगिंग में टिप्पणी के महत्व को उभारकर सामने लाना है और कुछ नहीं इसीलिये कोई कुछ का कुछ ना समझे | यदि कोई ऐसा समझना चाहता है तो इसके लिये वह स्वयं जिम्मेवार होगा हमारी यह बात पूर्णतः काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वस्तु या घटना से कोई पास-पास का नाता भी नहीं है यह बात अलग है कि ज्यादा टिप्पणी पाने वाले ब्लॉगर उस दुकानदार की तरह हो जाते हैं जिसकी दुकान पर भीड ज्यादा रहने के कारण वह टुटपुन्जिये ग्राहकों की तरफ़ देखकर मुस्कुराना जरूरी नहीं समझता, यह उसकी मजबूरी भी है, क्योंकि ऐसा करने पर एक परमानेंट स्माइली मुद्रा अख्तियार करनी पड़ेगी | चाहे कोई ब्लॉग पोस्ट पर सिर्फ़ 'बढिया' या 'बहुत अच्छा' या 'लगे रहो' जैसे कमेन्ट भी कर रहा है तो भी वह वहां पर अपना समय और श्रम लगा रहा है आपको लिखने की वजह दे रहा है यदि आप सोचते हैं कि उसकी नीयत अपना लिंक देने की थी तो भी कुछ गलत नहीं है मैं हिन्दी के कई महत्व्पूर्ण चिट्ठों से कमेन्ट की वजह से परिचित हुआ बडका ब्लोग्गरों के द्वारा की गई टिप्पणी से बेनामी (अनामी) ब्लोग्गर उसी तरह प्रसन्न होते हैं जैसे अप्रसिद्ध लेखक किसी बड़े साहित्यकार की प्रशंसा से गदगद होते हैं |

इन सब दलीलों से प्रतीत होता है कि हिन्दी ब्लोगिंग में टिप्पणी एक पुन्न-कम-समझदारी का काम है | कहने की जरूरत नहीं की नेक काम करने से नेकनीयती बढ़ती है |

और अंत में :
बापू बोले अगर कोई टिप्पणी करे तो टेंशन मत लो, उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करते रहो | बोले तो फुल विनम्रता के साथ | एक दिन उसका ह्रदय परिवर्तित होगा फ़िर वो सिर्फ़ तुम्हारा ब्लॉग ही नहीं पढेगा, बल्कि उस पर टिप्पणी भी करेगा |