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February 14, 2015

वेलेंटाइन डे - कृष्‍ण के बहाने

कृष्‍ण कन्‍हैया भारत भूमि पर प्रेम के इजहार के इस वेलेंटाइन दिन को देखकर मुस्‍कुरा रहे थे। रुक्‍मणी ने सोचा कि लगता है इन्‍हें अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं। कुहनी मारते हुए बोलीं, "क्‍या बात है जी बहुत मुस्‍कुरा रहे हो?" लगता है तुम्‍हें अपनी राधा और गोपियों के साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आ रहे हैं। ये बेचारे तो साल में एक दिन का इंतजार करते हैं। प्रेम का बाकायदा इजहार और अपनी हैसियत के अनुसार मैनेज करने के लिए। तुमने तो हद कर रखी थी रोज ही रास रचाते रहते थे और वो भी कोई एक नहीं पूरी गॉव की गोपियों के साथ। मैंने सुन रखा है राधा नाम की तुम्‍हारी कोई खास थी। 

रुक्‍मणी की बात सुनकर कृष्‍ण हँस पडे। बोले रुक्‍मे ! मैं चाहे वेलेंटाइन के रूप में आऊं या कृष्‍ण के रूप में या राधा या मीरा के रूप में मैं किसी भी रूप में आ सकता हूँ प्रेम की हवा फैलाने। आज जब साजिश करके मेरे प्रेम के संदेश को बिल्‍कुल हवाई और अलौकिक कर दिया था, इस देश में तो मैं वेलेंटाइन जी के बहाने घुस आया हूँ, अधिक सांसारिक होकर। वैसे भी इस भारत देश की आदत हो गई है सेकंड हैंड चीजें इस्‍तेमाल करने की। यहॉं लाख दहाड मारकर चिल्‍लाते रहो कोई सुनेगा नहीं एक बार विदेशी समर्थन कर दें तो समझ लो कि हो गया काम ।

October 17, 2009

छोटा सा दीपक है बडा पैगाम है !



क्यों सूरज की राह तकें
चंदा से क्यों भरमायें
अन्धकार को क्यों कोसें
हम इक दीप जलायें ।

दीपक हमें सिखाता चलना
घटाटोप अंधियारे में
दीपक एक दिलासा भी है
जीवन दुख के गलियारे में,
खुद के दीपक बन जायें

छोटा सा दीपक है
बडा पैगाम है
रोशनी के लिये जलना ही
दीपक का काम है

मृण्मय के दीपक औ
तृण्मय की बाती में
चिन्मय की ज्योति
प्रज्वलित हो जाये,
कण-कण जगमगाये

प्रीति की थाली में
चांदी सी खुशियां हों
दीजिये सबको
मोती सी दुआएं,
फ़ुलझडियों बिखर जायें


साथ ही,
पिछले साल दीपावली पर तेज बम के धमाकों से उस दिन तहेदिल से मुझे अफ़सोस हुआ था जब मेरी साल भर की बिटिया, कान फ़ोडू बम के धमाकों से सहम सहमकर रोने लगती थी । देर रात तक कई बार सोते हुए से घबराकर बैठ जाती थी । खुशियों को मातम में तब्दील करने का तरीका आदमी से बेहतर कौन जानता है ? अफ़सोस होता है ऐसे अन्धेपन को देखकर । तेज पटाखों से पर्यावरण को नुकसान और आतिशबाजी के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं के बावजूद , प्रशासन इस दिशा में कोई
ठोस नियम नहीं बनाता ना ही उस पर कार्रवाई की जाती । ऐसे लोग त्योहारों के दुश्मन हैं क्योंकि वे गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करके त्योहारों की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न चिन्ह खडा करते हैं ।

इसीलिये कहते हैं शायर :
तुम शौक से मनाओं जश्ने बहार यारों
इस रोशनी में लेकिन कुछ घर भी जल रहे हैं

चिराग ऐसा जलाओ कि बेमिसाल रहे
किसी का घर न जले ये ख्याल रहे

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दीप जलते रहें, जगमगाते रहें
हम आपको, आप हमें याद आते रहें

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ !