December 30, 2009

रस्म-ए-ब्‍लॉगिंग भी है - नया साल भी है !

एक साल पूरा होने संबंधित कुछ ब्‍लॉग पोस्‍टों को देखकर याद आया कि हमने भी पिछले वर्ष दिसंबर महीने से ही हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग शुरु की थी । पिछली पोस्‍ट की पिछली पोस्‍ट में हमने इसका जिक्र भी किया था । इस पेशकश के साथ कि इस पोस्‍ट की साइज को नियंत्रित करने के लिए हम ब्‍लॉगरी के साल पुजने की गप्‍प किसी अगली पोस्‍ट में देंगे । निश्चित रूप से वह अगली पोस्‍ट यही है । senyum

इस पोस्‍ट के बहाने कुछ भूली बिसरी लिंक भी रख देंगे और भूलती हुई बातों को कभी जरूरत पडने पर देखने के लिए जमा देंगे । वरना एक साल में हमने कौन सा ऐसा तीर मार लिया है, जिसका जिक्र करके गौरवान्वित हुआ जाय । ब्‍लॉगिंग का यही फायदा है कि बिना तीर मारे भी हम तीरंदाजी करते रह सकते हैं । जैसे हर बच्‍चा अपने घर का हीरो होता है, वैसे ही ब्‍लागर का ब्‍लॉग उसके लिए प्रिय होता है ।

हॉलांकि हमारे प्रोफाइल में ‘सिन्‍स सितंबर 2008’ पाया जायेगा | लेकिन हिन्‍दी में ब्‍लॉग लिखना हमने दिसंबर महीने से ही शुरू किया था । सितंबर में केवल ब्‍लॉग का शिला(Sign up) न्‍यास हुआ था । उस समय हमें यही नहीं पता था कि हिन्‍दी में भी ब्‍लॉगिंग की जाती है । इंटरनेट पर सबसे पहले हमने ऑरकुट पर ट्रांसलिट्रेशन से हिन्‍दी लिखी । फिर हिन्‍दी ब्‍लॉग खोजने पर गूगल सान्‍ता ने चिटठाजगत और ब्‍लागवाणी से परिचय कराया । बडा आश्‍चर्य हुआ देखकर कि हिन्‍दी में तो हजारों ब्‍लॉग हैं और हमे पता ही नहीं । हम अपनी हिन्‍दी की पहली पोस्‍ट उसे मानते हैं जिस पर हिन्‍दी ब्‍लागरों की स्‍वागत टिप्‍पणियॉं हैं । यह नए वर्ष की कविता है – नया वर्ष मंगलमय हो ! इस कविता को नव वर्ष की शुभकामना के तौर पर इस पोस्‍ट के अंत में भी दे रहे हैं । शुभकामनाऍं कभी पुरानी नहीं पडतीं | समय जैसा भी हो मनुष्‍य उम्‍मीद रखना चाहता है और शुभकामानाऍं देना चाहता है । क्‍योंकि मनुष्‍य कल्‍पना कर सकता है और चीजों को बेहतर करना चाहता है ।

इसके पहले भी हमने कुछेक पोस्‍ट लिखी थीं | लेकिन वह ऐसी ही थीं कि 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' । क्‍योंकि ब्‍लॉग संकलकों ब्‍लॉगवाणी और चिटठाजगत से परिचय नहीं हुआ था । वजह, हमें किसी भी एग्रीग्रेटर की जानकारी नहीं थी । तो पहले के ग्रामीण रिवाज के अनुसार जिस दिन बच्‍चा स्‍कूल में दाखिला लेता था, वही उसकी जन्‍म तारीख होती थी | हमारे ब्‍लॉग का भी आगाज उस दिन से माना जायेगा जिस दिन हमारी पोस्‍ट पर हिन्‍दी ब्‍लॉगरगणों ने टिप्‍पणियॉं दी थीं । इसी रिवाज के अनुसार गॉंव के उन छात्र/छात्राओं की जन्‍म तारीख ज्‍यादातर एक जुलाई होती थी । जिनके अभिभावक पढे लिखे नहीं होते थे । कई बार तो पढे लिखे लोग भी तारीख याद रखने का कष्‍ट नहीं उठाते थे । क्‍योंकि ऐसे अभिभावकों को यह तो याद रहता था कि जन्‍म पुन्‍न्‍मासी को हुआ कि अमावस को लेकिन अँग्रेजी महीने की तारीख याद नहीं रखते थे । तो मास्‍टरजी या तो 1 जुलाई या फिर स्‍वविवेक से 30-31 विकल्‍पों में से कोई एक डेट ऑफ बर्थ चुन लेते थे ।

हमारी ब्‍लॉगिंग की शुरुआत अर्न फार ब्‍लॉग साइट से हुई थी । इस साइट जानकारी हमें साइट की एक मेम्‍बर के मेल से हुई थी जो कि शायद इबीबो से उसे मिली होगी । हमारे लिए यह ब्‍लॉगिंग का ऑफर था, वह भी पहला ।

यह वह समय था जब ओलंपिक खेल चल रहे थे ! हमने वहॉं अपनी पहली पोस् लिखी !
“Triumph is mirage struggle is realty” ! यह एक लघु पोस्ट थी |

एक और मासूम पोस्‍ट जो हमने अर्न4ब्लॉग‍ पर लिखी थी, उस ब्लॉग पर चर्चित हुई थी ; "Sisters and Brothers - Who is not innocent in the den of फोक्स" मासूम इसलिए कि साल भर बाद साल भर पहले कि लिखी पोस्टें मासूम लगाने लगाती हैं !

हम नौसिखिया थे और अंग्रेजी में हमारा हाथ तंग था / है गूगल ट्रांसलिटरेशन की जानकारी के बाद हिन्दी में पोस् देने लगे फिर गूगल से खोजते हिन्दी ब्लॉगिंग का मिलना ऐसे ही था जैसे विदेश में कोई अपने देश का आदमी मिल जाय अपने शहर में मिलने पर उससे हम भले बोलते पर विदेश में मिलने पर लगता है जैसे कोई परम आत्मीय मिल गया हो हॉलॉंकि अर्न करने लायक प्वाइंट पूरे होने से पहले ही हम वहॉं से टर्न फॉर ब्लॉगस्पाट हो गए थे फिर भी हमने कई महीने वहॉं जमकर ब्लॉगिंग की वहॉं ब्लॉग पोस् करने और पोस् पर कमेंट करने के भी अंक मिलते थे पहले तो हमने अँग्रेजी में पोस् लिखे फिर जैसे ही हमें गूगल ट्रांसलिटरेशन का इल्हाम हुआ हम तुरंत हिन्दी मोड में गए

ब्‍लॉगर में आते ही अर्न फॉर ब्‍लॉग छूट गई । शुरू शुरू में यहॉ भी हमने अँग्रेजी में ट्राई किया । लेकिन जैसे ही हिन्‍दी बिरादरी का पता चला हम भी अपनी आवाज में चिल्‍लाने लगे । तदनंतर इस ब्‍लॉग को हमने हिन्‍दी ब्‍लॉग बना दिया और अपनी अदर्शनीय अँग्रेजी वाली जो भी 2-3 पोस्‍टें थीं , चुपचाप वैसे ही डिलीट कर दीं जैसे कोई बच्‍चा अपने काट-पीट किए हुई नोटबुक के पन्‍ने सफाई से फाड देता है ।

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में प्रवेश करने पर हमारी दूसरी पोस्‍ट थी - लो हम भी आ गए नए साल के साथ । हॉलांकि हमारी सक्रियता 4-5 महीने के बाद हुई क्‍योंकि शुरू शुरू में हम ज्‍यादा ब्‍लॉग नहीं पढते थे ।

नव वर्ष पर मैं अपने सभी ब्‍लॉगर साथियों को हार्दिक शुभकामनाऍं प्रेषित करता हूँ । साथ ही ब्‍लॉग पर आने, पढने और अपनी अमूल्‍य टिप्‍पणी देकर मेरा उत्‍साहवर्धन करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ।

मैं अपने उन सभी ब्‍लॉगर मित्रों को धन्‍यवाद देता हूँ जो बार-बार आकर मेरे ब्‍लॉग के पाठक और टिप्‍पणीकार बने|

नए वर्ष में ब्लॉगिंग के लिए यही शुभकामना है कि हम गैर जरूरी बहसों में उलझें और व्यक्तिगत आक्षेपों से बचें यदि व्यक्तिगत आक्षेप हों भी तो कम से कम सामान् शिष्टचार के दायरे में ऐसा होने पर बहस प्रयोजनहीन और तू-तू, मैं-मैं या देख लेने के स्तर तक पहुँच जाती है हम ब्लॉगरों को कम से कम भारतीय राजनीति की अपेक्षा उच् नैतिक स्तर बरकरार रखना चाहिए क्योंकि कोई भी 'शब्' उससे संबंधित व्यक्तियों के आचरण से निम् या महान बन सकता है जैसे नेता एक समय में बहुत ही सम्मानित और गौरवपूर्ण शब् था सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित् को हमने नेताजी का संबोधन ही दे दिया लेकिन आज नेता शब् में कोई महानता नहीं मालूम पडती है बल्कि एक गाली जैसा लगता है हर ब्लॉगर यह बात महसूस कर सकता है कि नहीं ? ‘ब्लॉगरशब् को हम क्या छवि और विश्वसनीयता देते हैं यह आज के ब्लॉगर पर निर्भर करता है कम से कम कोई भी ब्लॉगर अपने समाज के प्रति गैर जिम्मेवार तो नहीं ही कहलाना चाहेगा अपने न्यूनतम स्तर पर गंदगी करना भी सफाई रखना माना जाता है


तो प्रस्‍तुत है नए वर्ष की मंगलकामनाओं से ओतप्रात यह कविता जो इस ब्‍लॉग पर मेरी पहली ब्‍लॉग पोस्‍ट भी है ।

नव वर्ष कि प्रभात रश्मियाँ, बीते कल के तम को लीलें,
सदिच्छाओं के सुयोग , से सबका जीवन सुखमय हो,

बीते वर्षों से कुछ सीखें , अपने में कुछ करें सुधार,
अन्दर का अँधियारा , भागे अंतरतम के शिव की जय हो,

शान्ति और सद्भाव बढे अब, प्रेम और विश्वास बढे अब
ईर्ष्या-द्वेषों के घन छाँट जाएँ, नव युग का वो सूर्य उदय हो

प्रगति की अंधी भाग दौड़ में कहाँ जा रहें हैं हम सोचें,
उन्नति अवनति की परिभाषा अच्छा हो जो पहले तय हो,

जात पांत के फेर न पड़कर इंसानों से प्यार करें हम,
सब के सुख में अपना सुख हो ऐसा अपना विश्व प्रेम हो !

नव वर्ष मंगलमय हो !
celebratecelebratecelebrate
rosrosrosmalusenyumstaradacall

December 27, 2009

बीतता हुआ वर्ष !

समय की एक इकाई 'वर्ष' !
महसूस होता है
सशरीर पूरी पूर्णता में
जब, बीतना शुरू होता है उसका
आखिरी महीना
और महीने का आखिरी दिन |
अनायास ही मन
लगाता है
हिसाब पूरे साल का
साल के आखिरी दिन
साल में हैं महीने
और वह भी पूरे बारह
महीने भी दिखाई पड़ते हैं
विदा के समय
महीने के आख़िरी दिन
पूरी प्रगाढ़ता से अपनी
उपस्थिति दर्ज कराते हुए
कुछ कुछ जीवन के आखिरी
दिनों की तरह
बीतते है थोड़ा धीरे
गुड बाई कहते हुए
समय के तीन स्पस्ट विभाजन
हमारी सुविधा के लिए
दिन महीने वर्ष और पूरा जीवन
प्रारम्भ, उत्कर्ष और अंत
इनकी लघुतम इकाई क्षण , पल या निमिष,
जो महसू करते ही
खो जाती हैं
और
रखती हैं अस्तित्व
लगभग नहीं होने की तरह
हम बनाते हैं एक
काल्पनिक जोड़
और कहते हैं उसे
समय
अपनी सुविधा के लिए

समय की एक ईकाई 'दिन'
सुबह का सूरज
प्रवेश करता है
छितिज से
असीम उर्जा लिए हुए
अनंत प्राणों में उडेलने को
बीतता हुआ समय बीत जाता है, ऐसे
जैसे भर जाते हैं
बही खातों के पन्ने ,
जैसे चुक जाती हैं
कैलेंडर की तारीखें
फ़िर से लिखने के लिए नए पन्नो पर
पुराने हिसाब
थोड़े फेर बदल के साथ
साल भर पुराने दोस्त से पल भर में
जुदाई है
बीतता हुआ वर्ष !

December 25, 2009

क्रिसमस की बधाई - Merry Christmas

पहले क्रिसमस की बधाई दे दें, इसके बाद अपनी ब्‍लॉगिंग के एक साल पूरा होने की गप्‍पालॉजी शुरु करें । ईशु का जन्‍म हमारे समय के हिसाब वर्ष‍, दिन और तारीखों की गिनती से जुडा हुआ है । आज ईसवी संवत ही अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयोग में है ।

तो लीजिए आप सभी को क्रिसमस अर्थात क्राइस्‍ट अर्थात एक एक ऐसे व्‍यक्ति के जन्‍म दिन की बधाई जिसने कहा था कि यदि कोई तुम्‍हारे एक गाल पर थप्‍पड मारे तो अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो (दूसरे गाल पर भी पडने के बाद क्‍या करना है इसका जिक्र नहीं है क्‍योंकि तीसरा गाल तो होता नहीं । इसलिए दूसरा झापड खाने के बाद स्‍वविवेक से काम लिया जाय) । doa


कोई यदि तुम्हारी कमीज माँगे तो उसे अपनी कोट भी उतारकर दे दो क्‍योंकि हो सकता है कि वह संकोचवश कोट मांग रहा हो और यदि कोई तुम्‍हे एक कोस तक सिर पर वजन रखकर पहुंचाने के लिए कहे तो तुम उसे दो कोस तक छोडकर आओ (यदि वह दो कोस तक जाने चाहे तो) ! यह बात दीगर है कि ऐसे व्यक्ति के अनुयायी लोग दो विश्‍व युद्ध लड चुके हैं और एक क्रूसेड (धर्म युद्ध) इस्‍लाम वालों के साथ जिनके धर्म का मतलब ही है शांति |

मनुष्य कितना पाखंडी है ! क्राइस्‍ट, मोहम्मद, बुद्ध, नानक, महावीर, राम , जरथुस्‍त्र एक तरफ और इंसान का अंधापन एक तरफ |

ईसामसीह ने कहा था कि अपने पडोसी को प्यार करो जो बात कहने को रह गई थी वह यह कि अपने पडोसी को प्यार करो चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का अमीर या गरीब हो प्यार करने से उनका मतलब यह था कि हम जिसे प्यार करते हैं उसे दुक्ख नहीं देना चाहते जब दुक्ख देना नहीं चाहेंगे तो दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे और जब दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे तो दुक्ख का मार्केट मंदा पड के ठंडा पड जायेगा यही मूल संदेश सभी बुद्ध पुरुषों का था धर्म और विज्ञान दोनों अलग-अलग तरीके से तकलीफ कम करने की कोशिश करते हैं बाकी हानि लाभ क्या हुआ यह भी एक मुददे का विषय है

अब ऐसा लग रहा है कि हमारी ब्लोगिंग के एक साल पूरा होने संबंधित चर्चा करने पर यह पोस्ट कॉफी दीर्घकाय हो जायेगी और हम नहीं चाहते कि ब्‍लॉगर मित्र हमारी पोस्ट को बीच में ही छोडकर प्रस्थान कर जायें या आधा ऊपर आधा नीचे तीव्र वाचन करके निकल लें क्योंकि इंटरनेट पर समय की सबसे कमी यदि किसी को है तो वह हिंदी ब्‍लॉगर को है सलिए ब्लॉंगिंग का साल पूरा होने की चर्चा को अगली पोस्ट में रखते हैं

December 17, 2009

काल्पनिक दोस्त को एक काल्पनिक पत्र

अप्रिय ,
नाराज दोस्त , gatai

मैं चाहता हूँ कि बनावटी भाषा का प्रयोग न करुं और तुम्हें याद करुं । इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं । यदि तुम्हे लगे कि इस पत्र में कोई बात झूठ है या पूरा पत्र ही काल्पनिक है या मैं यह सब तुम्हे
‍‍‍ ‍‍चिढाने के लिए लिख रहा हूं तो तुम ऐसा मानने के लिए स्वतंत्र हो ।

मुझे पता होता कि तुम बात करना बंद कर दोगे तो मैं तुम्हे इतनी आत्मीयता से कभी नहीं गरियाता, बल्कि और ज्यादा आत्मीयता से यह काम करता । यद्यपि तुम नॉनवेज हो फिर भी मैंने तुम्हे सिर्फ वेज गालियॉं दीं । शायद इसीलिए तुम खफा हो गए हो , आगे से इस बात का ख्याल रखूँगा ।

जब से तुमने मुझसे बात करना बंद किया है । मैंने बहुत सुकून महसूस किया है, इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ ।
तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे और अब बहुत अच्छे नाराज दोस्त हो । उम्मीद है कि हम अपनी दोस्ती को भूले बिसरे गीत की तरह कभी याद करेंगे । इसके लिए जरूरी है कि तुम इस बात को भूले - बिसरे बनने तक धैर्य धारण करो !

मेरे मन में तुम्हारे लिए वही प्रेम है जो पहले था । बल्कि तुम्हारे दूर चले जाने की वजह और ज्यादा इजाफा हो गया है । मेरी वजह से तुम्हे जो तकलीफ हुई (?) उसकी भरपाई में माफी मॉंगने के अतिरिक्त और किया भी क्या जासकता है । तो मैं तुमसे बकायदा माफी मॉगता हूँ । यदि अभी तुम्हारे पास माफी का स्टॉक न हो तो जब हो, तब देदेना । यदि सप्लाई जल्दी चाहिए तो मेरे पास काफी स्टॉक पडा हुआ है , ले लेना । फिर मुझे दे देना ।

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मुझे कोई जल्दी नहीं है । मुझे यकीन नहीं होता कि तुम मुझसे नाराज हो जाओगे । यदि वाकई में नाराज हो तब तो कोई बात नहीं । यदि नहीं हो और बात करने का मन करता है और बात नहीं करते तो फिर मुझे कुछ दिन की झूठी ख़ुशी देकर आदत खराब करने से कोई फायदा नहीं । खैर जो भी हो दिल साफ होना चाहिए । दिमाग तो तुम्हारा पहले से साफ है ही । ईश्वर को भी एक वही चीज मिली थी साफ करने को । खैर जो है सो है । किया भी क्या जासकता है । विश्वास है कि आदत के अनुसार तुम्हे जल्दी सदबुद्धि नहीं आयेगी ।
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आशा है तुम कुशल और कुढे हुए होगे । साथ ही अपनी हद में आने वालों को अपनी दोस्ती का शिकार बनाते रहोगे दवाइयां समय से लेते रहा करो । समय से दवाइयॉं लेते खाते रहना ही तुम्हारी बीमारी को नियंत्रण में रखने काएकमात्र उपाय है । यद्यपि तुम इसे बीमारी मानने को तैयार नहीं हो । लेकिन यह बीमारी ही ऐसी है कि इसमें अगला अपने को बीमार नहीं समझता ।

आशा है स्थिति में जल्दी ही सुधार होगा । यदि कभी झटका उपचार की जरूरत पडे तो मुझे याद कर लेना ।

तुम्हारी दोस्ती का भूतपूर्व शिकार
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पुनश्च: इसी पत्र से एक ब्लॉग पोस्ट बना रहा हूँ । तुम्हे धन्यवाद । कृपया अन्यथा ले लेना । यद्यपि तुम ब्लॉगिंगनहीं करते फिर भी किसी विघ्नसंतोषी के भडकाने से पोस्ट को पढ भी लिया तो उचित मात्र में बुरा मान सकते हो ।मुझे कोई नहीं है ।


babai

December 10, 2009

ब्‍लॉगिंग माहात्‍म्‍य - कुंडलियां , भाग- 1

पहली बार कुण्डलियाँ लिखे हैं ! यह काका 'हाथरसी' को समर्पित है ! काका हाथरसी को स्कूली दिनों में पढ़े थे ! पता नहीं कैसे अचानक याद आ गए !

रस्‍ते में कल मिल गए, ब्‍लॉगर बगलूचंद
नमस्‍कार तो कर लिए, और बोलती बंद
और बोलती बंद, तुम अपना हाल सुनाओ
ब्‍लागिंग में क्‍या नया, लिखे हो यह बतलाओ
बगलू ब्लॉगर बिफरे, मेरा सिर मत खाओ
ब्‍लागिंग ब्‍लागिंग करों नहीं, कुछ और सुनाओ

नखरे ज्‍यादा मत करो, करो ना टाइम नष्‍ट
जल्‍दी जल्‍दी बक डालो , तुमको जो हो कष्‍ट
तुमको जो हो कष्‍ट, कि कुछ तो बोलो यारा
ब्‍लागिंग का जो भी दुख हो, कह डालो सारा
कह चालू कविराय, कि अपनी राय बनाओ
बुद्धिमान ब्‍लॉगर के, कुछ लक्षण दिखलाओ

इतना सुनकर आ गया, बगलू जी को ताव
कहने लगे जि ब्‍लागिंग का, बडा बुरा है चाव
बडा बुरा है चाव, कि मेहनत लगती जितनी
इतना पढते तो, खुल जाती किस्‍मत अपनी
कह चालू कविराय, कि तुम मारो शेखी मत
असली कारण बको, तुरंतै जल्‍दी झटपट

असली कारण कुछ नहीं, तुम भी हो घनघोर
हम तो बस सुस्‍ताय रहे, करो न एतना शोर
करो न एतना शोर, कि तुम तो अपनी देखो
ब्‍लाग पोस्‍ट लिख सके नहीं, टिपणी ही चेंपो
फिर भी तुम उकसाय रहे हो, तो कहते हैं
ब्‍लागिंग के चक्‍कर में, हम क्‍या क्‍या सहते हैं

थाली खाने की लगी, पत्‍नी जी चिल्‍लायँ
बगलू जी हां हूं करें, पर उठ के न जायँ
पर उठ के ना जायँ, मिली अब तगडी घुडकी
बगलू तुम जो उठे नहीं, हो जाए कुडकी
कह चालू कविराय, कि ऐसे भी हैं ब्‍लॉगर
लिखते हैं जो चार बजे तक, पोस्‍ट जागकर

'महिला' ब्‍लॉगिंग भी करे, रखे भी घर का ख्‍याल
दिनचर्या में बढ गया, यह अतिरिक्‍त‍ कमाल
यह अतिरिक्‍त कमाल, चाय चहिए बगलू को
कपडा, खाना, होमवर्क, भी है डबलू को
बैठक में डबलू औ डबली चहक रहे हैं
मैडम के वाणी बम, बगलू पर टपक रहे हैं

इतनी मेहनत से लिखे, जूझ जाझकर पोस्‍ट
अब हैं देखन में लगे, कै ठो आए पढने दोस्‍त
आए पढने दोस्‍त, कि सब पोस्‍टन पर जाओ
एक टिप्‍पणी दे अपनी, आमद दर्शाओ
कह चालू ब्‍लॉगर को, ब्‍लॉगर ही जानेगा
नई पोस्‍ट लिख दी, बंदे ने पहचानेगा

नए नए मुददे गुरू, कहॉं पाऍं हम रोज
दिन भर यही दिमाग में, करते रहते खोज
करते रहते खोज, लिखें ऐसे मसले पर
पढवैया भी मिलें , मिलें टिपणियॉं बम्‍पर
कह चालू कविराय, कि एक मुददा है कौंधा
बगलू बैठा है पीसी पर, मुँह को औंधा

ब्‍लॉगिंग अब करने लगे, काफी स्‍टूडेंट
मुश्‍िकल होता है उन्‍हें, टाइम मैनेजमेंट
टाइम मैनेजमेंट, पडो न इसमें ज्‍यादा
पहले अपनी पोथी तुम, पलटाओ भ्राता
कह चालू कविराय, कि टाइम बहुत मिलेगा
इस टाइम को चूका, तो फिर दिल दहलेगा

ब्‍लॉगिंग में हम क्‍या लिखें, असमंजस है आज
टिपियाना भी बंद किए, लगता है इल्‍जाम
लगता है इल्‍जाम, करें हम कैसी ब्‍लॉगिंग
कुछ भी लिखना हुआ, कि होती है गुटबाजिंग
आ गई अब टिप्‍‍पनियां भी, जैसे फेक करेंसी
लफडा हो जायेगा, हो गर चूक जरा सी

ब्‍लॉगिंग को समझो नहीं, टाइम पास मकाम
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग है बडी, जीवटता का काम
जीवटता का काम, कि मतलब को समझोगे
अभी नए बंदे हो, बातों में उलझोगे
कह चालू कविराय, हुए जो ज्‍यादा भाबुक
सह न सकोगे यहॉं पडे, शब्‍दों के चाबुक

अब तो ब्‍लॉगिंग का भया, बहुत बडा आकार
लेख, कहानी, कविता, रूपक, तकनीकी संसार
तकनीकी संसार, लिखो व्‍यंग औ' नाटक
पढते रहो नियम से, खुले अकल के फाटक
टिप्‍पणियों से तुमको हां, एक नजर मिलेगी
कैसा लिखते हो यह भी, कुछ खबर मिलेगी

हिंदी ब्‍लॉगर हो गए, हुआ न टंकी ज्ञान
ब्‍लागिंग करना आपका, व्‍यर्थ हुआ श्रीमान
व्‍यर्थ हुआ श्रीमान, कि टंकी नहीं दिखेगी
फिर भी टंकी पर चढने की, धमक मिलेगी
देखो चालू उधर कई, बलॉगर भागे हैं
बगलू टंकी से उतरो, मिन्‍नत मॉंगे हैं

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में अब मित्रों, करिए स्‍वस्‍थ विमर्श
राजनीति, विज्ञान , नारी , साहित्यिक स्‍पर्श
साहित्यिक स्‍पर्श की करिए बहस खींचकर
टीवी, मीडिया , कृषि, न्‍याय है बहुत लाभकर
कह चालू कविराय कि, एक ठो बहस छिडी है
नारी मुक्ति किधर से आए, उलझ पड़ी है

ब्‍ला‍गिंग टिपणी करते करते, हो जाए मिस्‍टेक
माफीनामा पेश करो, खोलो दिल का गेट
खोलो दिल का गेट, कि टाइम नहीं गंवाओ
दरियादिल हैं ब्‍लॉगर मित्रो, लाभ उठाओ
बगलू चालू , ब्‍लॉगिंग ब्‍लॉगिंग खेल रहे हैं
ब्‍लाग पोस्‍ट नित रोज भयंकर ठेल रहे हैं

दिल गार्डेन गार्डेन जो भया, सुनकर यह अख्‍यान
एक टिप्‍पणी छोडकर, फिर करिए प्रस्‍थान
फिर करिए प्रस्‍थान, रहें पुलकित च किलकित
एक स्‍वस्‍थ संवाद बने, ब्‍लागों में उत इत
कह चालू कविराय, कि फिर से फरमायेंगे
जब ब्‍लागिंग माहात्‍म्‍य, भाग- दो लाएंगे


धन्‍यवाद ।

December 09, 2009

आदमी एक संवेदनशील प्राणी है .... खुद के लिए

कुछ लिखना चाहा कुछ लिख नहीं पाया । कुछ अधूरा सा लिखा कुछ पूरा नही हुआ । कोई टिप्पणी नहीं की किसी ब्लॉग पर । ब्लाग पढे बस ।
‍नई पोस्ट का आना जरूरी है । कुछ नहीं तो पुरानी पोस्ट हटाने के लिए ही । नई पोस्ट के लिए मुददा चाहिए , कोई बहाना चाहिए । हो सकता है नई पोस्ट किसी संवेदना या दिमाग में किसी का कौंध का परिणाम हो । या किसी घटना का या कोई प्रतिक्रिया या फिर आवेशित बैटरी के धन ऋण से जोडने पर धारा प्रवाह जैसा । दिमाग चार्ज है और दोनों हाथ की बोर्ड से जुड गए करेंट बहने लगी और एक ब्लाग पोस्ट रूपी बल्ब जल गया । दिमाग एक घर है तो कोई आयेगा कभी बुलाने पर और कभी अनायास । कोई नहीं तो चूहे, बिल्ली, ‍‍‍‍‍‍‍ ‍मकडी, पक्षी, चींटी, डाकिया, अखबारवाला या दूधवाला ही । जैसे भी आए स्वागत तो करना ही पडेगा और आनेवाला भी अपना प्रयोजन पूरा करने की कोशिश करेगा । नहीं है तो ढूंढ लें बना लें । खबरों की कमी क्या है । किसीभी खबर को पकड के खींचा जा सकता है । या मन में कोई दुख या विषाद हो तो उसका भी उपयोग किया जा सकताहै । कविता की जा सकती है । अच्छा रसोइया कम सामग्री में भी खाने वालों को उंगली चटवा देता है ।
हिंदी ब्लॉगिंग की संवेदनशीलता बढ गई है और नीलिमा जी के अनुसार "सेंस ऑफ ह्यूमर गडबडा गया है " जब कुछ करने का मन ही है तो कोई भी वजह बनाई जा सकती है । हम (मैं)
‍ ‍कोई उद्देश्यपूर्ण ब्लॉगिंग तो कर नहीं रहे बस लिखे जा रहे हैं । कुछ भी कभी भी । जब तक बिना किसी उददेश्य के जीना गैरकानूनी नहीं है, तब कोई चिंता की बात नहीं । तो आज बिना मुददे के लिखने का मन है तो लिखेंगे रोकता कौन है । शायद यह डर कि टिप्पणियॉं नहीं ‍‍मिलेंगी । मित्रों को पसंद नहीं आएँगी । पाठक बिना मन के वाह-वाह करेंगे या आकर चले जायेंगे या आयेंगे ही नहीं । अच्छा ही है कम से कम अपेक्षाऍं नहीं होंगी तो कल यह सुनने का डर नहीं रहेगा कि हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी । पर लिखना तो जरूरी है । कुछ करेंगे नहीं तो पता नहीं चलेगा कि हम भी हैं । ब्लॉगर बन गए हैं हम । बताते हैं कि हम ब्लॉगर हैं । ब्लॉग पोस्ट लिखते हैं । सोचते हैं कि यदि ब्लागिंग न होती तो इतना सब जो लिखा जा रहा है किस रुप में निकलता । यह छपास कहॉं निकलती । शायद कुछ अखबार और पत्रिकाओं में छपतीं और ज्यादातर कहीं नहीं। या फिर डायरियों में । स्वांत: सुखाय लिख रहे हैं । लेकिन सुख कहॉ है । यह स्वांत: सुखाय धीरे धीरे परान्त: सुखाय बन जाता है । शुरुआत ज्यादातर चीजों की स्वांत: सुखाय ही होती है । खेलते खेलते आदमी गंभीर हो जाता है । जीवन मरण का प्रश्न बन जाता है जो कभी स्वांत: सुखाय होता था । कविता भी शुरू शुरू में स्वांत: सुखाय होती है । फिर हम अपनी संवेदनाओं का उपयोग करने लगते हैं । अपनी कुंठाओं और विषाद को ‍‍ गिनागिनाकर ‍‍‍ चपोटे रहते हैं । फिर वह सब बाहर निकलता है, किसी न किसी रूप में । अलंकृत सजा धजा, कभी कुरूप । पढ़कर राहत मिलती है । फिर उसे रचना वगैरह कहा जाता है । अपना ही लिखा हुआ लगता है कि यह सब मेरे दिमाग में कैसे आ गया या इतना अच्छा मैंने कैसे लिखा । एक मन:स्थिति होती है ।
इस तरह लिखने का नुकसान यह है कि कभी किसी बात पर मेरे खिलाफ मेरे ही बात को उद्धृत किया जा सकता ।

खैर जो भी हो, यह जरूर है कि आदमी एक संवेदनशील प्राणी है .............खुद के लिए ।

December 06, 2009

याद करते नहीं फिर भी चीखने लगती हैं कुछ तारीखें जैस 6 दिसंबर

समय के साथ त्रासदी दिवस बढते जा रहे हैं, देश में । अभी 26/11, 3/12, और आज 6 दिसबंर । वैसे तो रोज ही त्रा‍सदियॉं होती हैं, रोजमर्रा के जीवन में दुर्घटनाऍं , आपराधिक गतिविधियाँ, आतंकवादी घटनाएँ । लेकिन जब समाज के सफोदपोश लोग , देश के नेतृत्‍वकर्ता अपने ही लोगों को नफरत के नरक में झोंकने के लिए जिम्‍मेदार होते हैं तो तकलीफ के साथ निराशा का भाव भी गहरा हो जाता हैं । यह ऐसे घाव हैं मानवता के सीने में जो याद आते ही, टीसने लगते हैं । इनका परिणाम होता है । नफरत की एक लम्‍बी श्रृंखला के रूप में । षडयंत्र , बदला , हत्‍या , जघन्‍य हत्‍याकांड ।

ये घाव आदमी खुद बनाता है, अपने घिनौने स्‍वार्थों को पूरा करने के लिए । जो परिस्थितियॉ पैदा की गईं थी 6 दिसंबर को उसके लिये प्रत्‍यक्षत: भाजपा के साथ उस समय सत्‍ता में रही कांग्रेस पार्टी समान रूप से जिम्‍मेदार थी । अपने लचर नेतृत्‍व की वजह से । उस समय हम स्‍कूल में पढते थे । गाँव कस्‍बों में इस घटना की वीडियो रिकार्डिग दिखाई जा रही थी । मस्जिद पर चढते हुए , भागते हुए , डंडे और गोलियॉं खाते हुए लोग । मरते हुए लोगों को देखकर मुझे बहुत बुरा लगा । मुझे नफरत हो गई धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों से । एक तरफ ढांचा गिर रहा था एक तरफ लोग गोलियों और लाठियों से लथपथ हो रहे थे । कहीं किसी मंच से भाषणबाजी भी हो रही थी ।

लोग वर्तमान की जगह अतीत को सुधारना चाहते हैं । वह भी सडे हुए अतीत को । एक ऐसे अतीत को जो हाथ लगाते ही भुरभुरा कर गिरने लगता है । हम कविता लिखते हैं । बहस करते हैं । पक्ष विपक्ष में दलीले देते हैं । और किया भी क्‍या जा सकता है । समय आने पर फिर से वही सब कुछ दोहराया जाता है । यदि जनता को इतना जागरुक किया जा सके कि वह धर्म जाति के नाम पर मरने-मारने को उकसाने वालों के बहकावे में न आवे तभी यह सब रुक सकता है । यह काम जनता के स्‍तर पर ही हो सकता है । क्‍योंकि जिन ठेकेदारों का अस्त्त्वि ही नफरत की जमीन पर टिका हो वह तो ऐसी आत्‍मघाती पहल करने से रहे ।

सवाल उठता है कि क्‍या ऐसी घटनाओं को याद किया जाना चाहिए । लेकिन याद नहीं करते फिर भी चीखने लगती हैं, कुछ तारीखें । इन घटनाओं को किस तरह याद किया जाता है । मातम पुरसी के रूप में या अपने - अपने हित में प्रयोग करने के‍ लिए । जो भी हो कम से कम अफसोस तो जाहिर कर ही दें आज । हालॉंकि अब तो अफसोस जाहिर करते हुए भी रस्‍मअदायगी का पाखंड सा मालूम होता है ।

कौन देगा हिसाब उन बच्‍चों को
जिनका बचपन अनाथ हो गया
जो मरहूम हो गए बाप के प्‍यार से
उन औरतों को जिनके लिए
बदल गए मायने जिंदगी के
एक नफरत के मिशन में
क्‍या इतिहास उनकी कुछ मदद करेगा
इंसान और भगवान
दोनों दब गए मलबे के ढेर में
और उस पर उग आए
कुछ और विष वृक्ष
जो बना रहे हैं
फिर फिर मलबों का ढेर
पूर देश में ।
या वे लोग जो इस्‍तेमाल करते हैं
आदमी को इंसानियत के खिलाफ
घिनौना बना डालते हैं धर्म के नाम को
अपने निहित स्‍वार्थों के लिए
मारा जाता हैं बेकसूर आदमी हर बार
और बच निकलते हैं विष वृक्ष
लहराते हरियाते रहते हैं शान से
छिपाए हुए विषों के बीज
अपने ठूँठ में ,
फिर से रोपने के लिए , किसी मानसून में |
नफरत की फसल काटने के लिए ।

इस विषय से कुछ और संबंधित पोस्‍ट जो मैंने देखे :

इसके लिये भी भूमिका लिखूँ.....? शरद कोकास जी की एक मर्मस्‍पर्शी कविता ।
चौराहा अयोध्‍या का दर्द खुद अयोध्‍या नगरी की जुबानी ।
6 दिसंबर काल या द्रोहकाल
6 दिसंबर
देहाती


December 02, 2009

एड्स : एक नई सुबह की ओर !

रात्रि का अंतिम पहर बीत रहा था रात और पूरे कमरे में अंधकार का एकछत्र राज् कायम था जीरो वाट का छोटा सा लाल बल् अपनी पूरी ताकत से कमरे को रोशन करने का प्रयास कर रहा था छत पर लगे हुए पंखे की पंखियॉं अपनी परिधि में लगातार अनगिनत चक्कर लगाती हुई, अपने नीचे सोते हुए एना और उसके पति को इस निविड अंधकार में ख़ामोशी से देख रही थीं गहन निद्रा के इस क्षण में एना के कानों में एक फुसफुसाहट की आवाज सुनाई पडी एना को बहुत आश्चर्य हुआ और उसने इस आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश की लेकिन यह एक रहस् था

"मम्‍मी... मम्‍मी क्‍या हुआ, चौंक गईं ? मैं तुम्‍हार साथ और तुम्‍हारे पास हूँ मम्‍मी । वास्‍तव में मैं तुम्‍हारे शरीर का ही एक हिस्‍सा हूँ ।"

एना के आसपास कहीं एक बच्‍ची की आवाज गूँजी । एना आश्‍चर्यचकित थी , उसने अपने चारों ओर किसी की मौजूदगी को देखने की कोशिश की । लेकिन उसका संदेह और चिंता और बढ गई क्‍योंकि यह आवाज उसकी जानी पहचानी आवाजों में किसी से मेल नहीं खाती थी । कौतुक को बढाते हुए वह आवाज एक बार फिर से एनी के कानों में तरंगित हुई ।

"हेलो मम्‍मी, मैं एमिली हूँ ।"

"मैं एमिली नाम से किसी को भी नहीं जानती और फिर तुम मुझे मम्‍मी कैसे कह रही हो ।" एना ने हकलाते हुए पूछा ।

"हॉं, मैं तुम्‍हारी बेटी हूँ ।"।

"बेटी?"

"हॉं, मैं तुम्‍हारे गर्भ में पल रही भ्रूण हूँ ।" एमिला ने बहुत ही कोमल आवाज में बताया ।

"अच्‍छा, अच्‍छा हॉं" एना की बढी हुई धडकनें सामान्‍य हो गईं और वह अपने आप पर लौटती हुई सी लगी ।
"आखिर तुम मुझे संसार में क्‍यों नहीं लाना चाहती हो और मुझे सूरज के उज्‍जवल प्रकाश को देखने से क्‍यों वंचित करना चाहती हो ?"

"यह एक राज है मेरी प्रिय एमिली और यह एक बहुत ही तकलीफदेह निर्णय.....।" एनी ने सिसकते हुए कहा ।

"मम्‍मी, मत रोइये । आप सिर्फ मुझसे बात कीजिए और मेरे सवालों का जवाब दीजिए । मुझे यकीन है कि इससे आपको काफी राहत मिलेगी ।" एमिली ने अपनी मॉं को सांत्‍वना देने का प्रयास किया ।


"हॉं, एमिली..., मैं नहीं चाहती कि इस कलंक के जाहिर होने के बाद दुनिया तुम्‍हारा उपहास करे और तुम्‍हे घृणा की दृष्टि से देखे ।"

"कैसा कलंक?"

"ओह एमिली तुम सवाल करना बंद नहीं कर सकती हो ?" एनी ने खीजते हुए कहा ।

"मम्‍मी, तुम मुझे सवाल पूछने से मना कर रही हो । ठीक है । लेकिन मम्‍मी, जरा मेरे बारे में भी सोचिए । यह मेरे लिए जीवन और मृत्‍यु का प्रश्‍न है और आप मुझे चुप रहने के लिए बोल रही हो । इस दुनिया में आने से पहले ही तुम मुझे मेरे प्रश्‍न पूछने के मूलभूत अधिकार से वंचित कर देना चाहती हो । तुम्‍ही बताओ क्‍या यह उचित है, मम्‍मी ?" एमिली ने पूछा ।

"ओह, एमिली कभी-कभी चुप रहना ही बेहतर होता है"

"लेकिन क्‍या ऐसे समय में जब मैं तुम्‍हारे गर्भपात करवाने के फैसले की वजह से हमेशा के लिए मिट जाने वाली हूँ , चुप रह सकती हूँ ? बोलो मम्‍मी...., क्‍या मैं चुप रह सकती हूँ ?" एनी ने परेशानी और उत्‍तेजना से कहा ।

"मेरी प्रिय एमिली सुनो। मैं तुम्‍हे तुम्‍हारे जीवन के बारे में कुछ बताने जा रही हूँ । अपने जीवन को बचाने के लिए केवल तुम ही यह लडाई नहीं लड रही हो , बल्कि हम (मैं और तुम्‍हारे पिता) भी अपने जीवन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । क्‍योंकि मृत्‍यु का डरावना काला साया हमारे ऊपर '‍डेमोक्‍लीज की तलवार ' की तरह लटक रहा है ।

"तुम भी मम्‍मी ? क्‍यों , क्‍या हुआ ?

"एमिली, ओह, एमिली मैं यह सब तुम्‍हारे साथ कैसे साझा करुँ । लेकिन जब मौत सामने है तो मैं चुप भी तो नहीं रह सकती । मैं तुम्‍हे वह सब बाते बताऊँगी जो हमारे साथ जुडी हुए इस क्रूर जाल और सामाजिक कलंक से संबंधित हैं । "

"आपको क्‍या हुआ मॉं ?" मैं आपकी बातें समझ नहीं पा रही हूँ । आप मौत से क्‍यों जूझ रही हैं । "

"देखो, एमिली । मैं और तुम्‍हारे पापा दोनों ही इस आसन्‍न मृत्‍यु के लिए जिम्‍मेदार हैं । मैं तुम्‍हारे पापा से छह महीने पहले एक डिस्‍कोथेक में मिली । धीरे-धीरे हमारे बीच नजदीकियॉं बढती गईं । हम दोनों एक-दूसरे से मिलते रहे और मिलने का यह सिलसिला आगे बढता गया । वक्‍त गुजरने के साथ हमने शारीरिक संबंध भी बनाए ।"

"हुँ ... , तो क्‍या हुआ ?"

"बाद में हमने शादी कर ली , इस तरह हमने जीवन में एक नई शुरुआत की । हमें एक दूसरे पर विश्‍वास था और हम एक-दूसरे की खुशियों और गम के साझीदार बने । जीवन दाम्‍पत्‍य के प्‍यार और हँसी-खुशी के हल्‍के फुल्‍के क्षणों के साथ सहजता से बीत रहा था । हम खूब आनंदपूर्वक साथ साथ रहे और हमारे प्‍यार के परिणाम स्‍वरूप जब तुम मेरे गर्भ में आयीं तो हमें पता भी नहीं चला । लेकिन गर्भ के भीतर इस तरह के क्रियाकलाप ज्‍यादा दिन छिपे नहीं रह सकते । तुम्‍हारे आने का पता मुझे चला और फिर तुम्‍हारे पापा को यह बात मालूम हुई । हमने तुम्‍हारी उपस्थिति को सुन‍िश्चित करने के लिए परीक्षण करवाया ।"

"दिलचस्‍प"

"लेकिन यह ठीक ही कहा गया है कि खुशियॉं स्‍थाई नहीं होतीं "सुख पल दो चार, फिर हाहाकार" और ईश्‍वर खुशियॉं छीनने की ताक में हमेशा रहता है । हमारी खुशियों का महल शायद बहुत ही कमजोर नींव पर रखा गया था जो कि नाइनपिन के खेल की तरह बिखर गया"

"इस बीच क्‍या हुआ ?"

"एक बार तुम्‍हारे पापा के ऑफिस के एक कर्मचारी की दुर्घटना हो गई । उस व्‍यक्ति को दुर्घटना में गंभीर चोटें आयीं और उसके शरीर से काफी खून बह गया । उसे तुरंत खून देने की जरूरत थी और ऑफिस के किसी भी व्‍यक्ति का रक्‍त समूह दुर्घनाग्रस्‍त व्‍यक्ति के रक्‍त समूह से मेल नहीं खा रहा था । यहॉं तक कि रक्‍त बैंक में भी उस रक्‍त समूह का रक्‍त नहीं था, क्‍योंकि उस व्‍यक्ति का रक्‍त समूह बहुत ही दुर्लभ प्रकार का था । लेकिन जब तुम्‍हारे पापा को खून की जरूरत के बारे में पता चला तो वह खून देने के लिए राजी हो गए । पीडित व्‍यक्ति को रक्‍त देने से पहले उनके रक्‍त के कई अनिवार्य परीक्षण किए गए । यह एक खेद और कलंक का विषय था कि उनका रक्‍त एलिसा टेस्‍ट में असफल रहा । इस खुलासे को सुनकर वह बिखर गए और साथ ही हमारे जीवन की नई शुरुआत भी ।

"कैसे मम्‍मी ?"

"उनका रक्‍त परीक्षण पाजिटिव होने का मतलब था कि वह एक घातक वायरस के वाहक बन चुके हैं । इस बात का डर था कि मुझे और तुम्‍हे भी इस वायरस का संक्रमण हो गया हो । मेरा परीक्षण भी पॉजिटिव निकला और प्रिय एनी तुम भी इस वाइरस से संक्रमित हो चुकी थी । हे भगवान ! काश हमने तुम्‍हारे बारे में न सोचा होता । और इस तरह एड्स के खिलाफ एक असफल लडाई की शुरुआत हुई । हमें पता था कि हम इस विपत्ति से सफलतापूर्वक बाहर नहीं आ सकते हैं लेकिन फिर भी हमें इसके खिलाफ युद्ध जारी रखने के अलावा कोई चारा नहीं था "

"अच्‍छा" एमिली ने कहा ।

"और अब जब हम खुद ही मृत्‍यु के साथ जीवन जी रहे हैं और उसी के साथ शयन कर रहे है तो यह हमारे लिए उचित नहीं था कि हम तुम्‍हे इस दुनिया में लाकर एक भयावह मौत मरने के लिए छोड दें । "

"आप क्‍या सोचती हैं कि वाइरस का संक्रमण आपको पापा से हुआ या यह पहले से आपके शरीर में निष्क्रिय रूप में मौजूद था ।"।

"मतलब"

"हॉं, मम्‍मी" जब आप मुझे सारी बाते बता रही हैं तो आपको अपने डिस्‍काथेक के जीवन के बारे में भी मुझसे कुछ नहीं छुपाना चाहिए । मुझे पता है कि लोग डिस्‍कोथेक में अपना समय बिताने के लिए जाते हैं और ड्रग्‍स के जहरीले प्रभाव में नाचते और डोलते हैं ।" एमिली न‍े कहा ।

"हॉं मैं एक ड्रग्‍स लेने वाले समूह की सदस्‍य थी । हम अकसर डिस्‍काथेक के बंद हो जाने पर इकट्ठे होते थे और ड्रग्‍स के इंजेक्‍शन लिया करते थे । कभी कभी हम झूमा भी करते थे क्‍योंकि ड्रग्‍स का प्रभाव ही ऐसा होता है जो सबको सिर से पॉंव तक झूमने पर मजबूर कर देता है । "

"अच्‍छा, मैं समझी ।"

"हॉं एम्‍मी, मैं तुम्‍हारे पिता के प्‍यार की बारिश की बौछारों से पूरी तरह भीग चुकी थी । मैंने ड्रग्‍स से अरुचि दिखाना शुरु कर दिया । लेकिन यदि एक बार तुम ड्रग्‍स के कीचड में गिर गई तो और और ड्रग्‍स लेने की चाह हमेशा इंसान को इस कीचड में धंसते रहने पर मजबूर करती रहती है । इसलिए मैं एक पुनर्वास केन्‍द्र में शामिल हुई और बहुत सी कठिनाइयों के बाद मैं ड्रग्‍स की कालकोठरी से मुक्ति पा सकी ।" एना ने बताया ।

"बहुत अच्‍छा मम्‍मी, लेकिन ...." एमिली कहते कहते रुक गई ।

"क्‍या बात है एमिली .... क्‍या तुम कुछ और पूछना चाहती हो ?"

"हॉं... मम्‍मी । तुमने बताया था कि पापा को एड्स था , लेकिन क्‍या तुमने उनसे पूछा कि वह इस घातक सिंड्रोम से की गिरफत में कैसे आए?"

"तुम कहना क्‍या चाहती हो, एमिली?"

"मुझे काफी हद तक यकीन है कि पापा को एड्स का यह वाइरस तुमसे मिला है क्‍योंकि तुम आईवीडीयू (Intra-veinous Drug Users.) थीं”

"नहीं, मैं एडस के विषाणु की वाहक नहीं थी बल्कि मुझे यह बीमारी तुम्‍हारे पिता से मिली है" एना ने विश्‍वास पूर्वक कहा ।

"क्‍या शादी के पहले आपने जॉंच करवायी थी ?" एमिली ने पूछा ।

"नहीं मुझे इसकी कोई आवश्‍यकता नहीं थी ।"

"अच्‍छा, मैं समझी" एमिली ने एक गहरी सॉंस ली और कहना जारी रखा । "लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं कि यह बीमारी आपको पापा से ही मिली?"

"क्‍योंकि मेरे आने से पहले तुम्‍हारे पापा की जीवन शैली बहुत ही लापरवाह किस्‍म की थी । वह अपनी कामवासना की आग बुझाने के लिए अकसर चकला घरों में जाया करते थे । वह असुरक्षित यौन संबंधों का स्‍वतंत्रतापूर्वक आनंद ले रहे थे । और यह आदत तुम्‍हारे पिता के दैनिक जीवन का हिस्‍सा बन चुकी थी"

"मतलब मिलने के बाद आप दोनो ने अपनी पिछली जिंदगी से वापस लौटने की कोशिश की? लेकिन दुर्भाग्‍य से संबंध इतनी गहरी जडें जमा चुका था कि कहा जा सकता है कि उस वक्‍त तक अमेजन से बहुत सा पानी बह चुका था , है न ?

"हॉं प्रिय, तब तक बहुत देर हो चुकी थी । लेकिन यह समय अब एक दूसरे को दोष देने का नहीं है, बल्‍क‍ि साथ-साथ प्रकाश की दिशा में बढने का है । दुर्भाग्‍य से आगे सिर्फ अँधेरी सुरंग का वृहद विस्‍तार दिखाई पडता है, जिसमें मृत्‍यु का शैतान हमारी ओर बढता चला आ रहा है । दुख की बात यह है कि उस अंधेरी सुरंग के दूसरे छोर पर कोई भी प्रकाश पुंज नहीं दिखता ।" एना ने सिसकते हुए कहा ।

अब वहॉं पर एक खामाशी छाई हुई थी क्‍योंकि एमिला ने इस बार बातचीत को आगे बढाने के लिए कोई भी प्रश्‍न नहीं किया ।

"एमिला.... एमिला सो गई क्‍या मेरी बच्‍ची ?"

"नहीं नहीं मम्‍मी , मैं गहरी सोच में डूब गई थी" उसने उत्‍तर दिया ।

"हमारी मृत्‍यु तक तो बात ठीक थी लेकिन हम तुमसे प्‍यार करने की वजह से ही तुम्‍हे दिन के प्रकाश में लाकर मौत के मुँह में नहीं डाल सकते । यही वजह है कि हम तुम्‍हारा गर्भपात करवाने जा रहे हैं ।"

"दया ... मेरी मॉं, दया ! मैं जानती हूँ कि अँधेरे ने तुम्‍हारे जीवन का सारा प्रकाश ग्रस लिया है । लेकिन मैं तुमसे अनुरोध करती हूँ कि तुम मेरे जीवन को गर्भ में समाप्‍त करने का अपराध मत करो । मेरा पालन-पोषण करों, मुझे प्‍यार करो, मुझे दुलार करो , लेकिन भगवान के लिए मुझे मृत्‍यु का आशीर्वाद मत दो" एमिली ने सिसकते हुए कहा ।

"मत रो मेरी बच्‍ची, मत रो । लेकिन अंतत: यदि तुम्‍हारे शरीर में घातक विषाणु की पहचान हो जाती है , जो कि अभी हमें नहीं मालूम है तो तुम्‍हे एक डरावनी कलंकित जिंदगी जीनी पडेगी, यह हमें पसंद नहीं है । इसीलिए हमने तुम्‍हे जन्‍म से पहले समाप्‍त करने का कठोर निर्णय किया है । "

"फिर से विचार करो मॉं यह निर्णय लेने से पहले दो बार और सोचो । मैं तुमसे फिर से अनुरोध करती हूँ कि तुम मुझे इस बीमारी और मृत्‍यु के संसार में आने दो । एक टिमटिमाता हुआ प्रकाश पूरे कमरे के अंधकार को भगा देता है । जन्‍म के बाद मैं इस बीमारी के प्रति जागरुकता फैलाने का काम करुंगी । मैं लोगों को इस बीमारी और मृत्‍यु के साथ जीवन जीने वालों की कहानी सुनाऊंगी । मैं इस बीमारी से लडने के लिए एक आंदोलन शुरू करूंगी । चिकित्‍सा विज्ञान इस बीमारी को समाप्‍त करने के लिए दिन रात काम कर रहा है । कौन जानता है कल मेरे और मेरे जैसे अनगिनत लागों के लिए कोई उपचार और जीवन हो । सफलता की चिंता किए बिना मैं इस क्षेत्र में कार्य कर रहे संगठनों के साथ काम करुंगी । "

"बहुत खूब, एमिली । तुमने मेरी ऑंखें खोल दीं । जो होगा देख जाएगा , अब मैं यह सुनिश्चित करुंगी कि तुम इस दुनिया में आओ और अपना जीवन एड्स के क्षेत्र में एक मिशनरी बनकर सेवा करते हुए व्‍यतीत करो । "

"कृपया मुझे माफ कर दो मेरी बच्‍ची , मुझे माफ कर दो । तुमने मुझे एक घृणित अपराध करने से बचाया है ।"

"zzzz...मुझे नींद आ रही है मॉं , क्‍योंकि तुम भी ऊंघ रही हो । इसलिए शुभरात्रि मम्‍मी , सोने के लिए अभी भी काफी रात बाकी है ।"

"मेरा आशीर्वाद तुम्‍हारे साथ है , मेरी प्रिय एमिली । ईश्‍वर तुम्‍हे अपने स्‍वार्थी लोगों की सेवा करने का साहस और सहनशीलता दे ।"

"आज हम एक शुरुआत कर सकते हैं और ब्‍लागरों की एकता ने इस शुरुआत को गति दी है । वेब की दुनिया में जाओ मम्‍मी और एडस के बारे में और बहुत सी जानकारी प्राप्‍त करो । "

"कैसे मेरी बच्‍ची ?"

"कोई भी सर्च इंजिन खोलो और AIDS टाइप करो अथवा http://unite.blogcatalog.com पर जाओ। आपको वहॉं बहुत सारी संबंधित लिंक मिलेंगी । "

"अच्‍छा ! तुम तो हमसे अधिक जागरुक जान पडती हो । बहुत खूब मेरी बच्‍ची"

"अच्‍छा तो अब मैं अगली रात को इसी जगह पर इसी समय मिलूँगी । अगली मुलाकात तक के लिए बाय बाय । अपने स्‍वास्‍थ्‍य का ख्‍याल रखो और अपनी कामेच्‍छाओं को नियंत्रण में रखो । ड्रग्‍स को 'ना' बोलो । खुशियों का सुरक्षित होकर आनंद लो । रक्‍त का परीक्षण कराओ और रक्‍त के किसी भी आदान-प्रदान में नई सुई का प्रयोग करो । आओ आज हम साथ-साथ एक नई शुरुआत करें , हॉं एक नई शुरुआत । एक ऐसी शुरुआत जिसका एक अंत भी है , एक अंत ! मुस्‍कुराहट और दिन के बहुत से उजाले के साथ ।

आमीन ! !

यह कहानी मेरे एक ऑनलाइन मित्र सुदाम पाणिग्रही, जो कि अंग्रेजी में अपने ब्‍लॉग Share and smile पर लिखते हैं, के द्वारा एड्स दिवस पर अँग्रेजी में लिखी गई कहानी AIDS: Towards A New Morning का हिन्‍दी अनुवाद है । अनुवाद और अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने की इजाजत देने के लिए सुदाम को धन्‍यवाद ।

नैनोरिमो द्वारा नवंबर में आयोजित राष्‍ट्रीय उपन्‍यास लेखन माह (नेशनल नॉवेल राइटिंग मंथ ) प्रतियोगिता में सुदाम पाणिग्रही अपने उपन्‍यास ड्राई ओएसिस (Dry Oasis) में तीस दिनों में 61,431 शब्‍द लिखकर विजेता का खिताब हासिल किया । उनके इस उपन्‍यास का एक अध्‍याय आप यहॉं पढ सकते हैं ।

इस उपलब्धि के लिए उन्‍हें बधाई और शुभकामनाऍं ।

November 23, 2009

सचिन, 26/11, स्काई लैब और माया

इन दिनों सचिन का बयान, की उन्‍हें मराठी होने पर गर्व है , लेकिल मुम्‍बई पूरे भारत की है काफी चर्चित रहा । आज शिवसेना के एक और सांसद का बयान आने से मामला फिर से रिफ्रेश हो गया है । इसमें सांसद ने कहा है कि सचिन ने मराठीवासियों के लिए कुछ नहीं किया है जबकि गावस्‍कर ने कई मराठी खिलाडियों को टेस्‍ट टीम में जगह दिलाई थी । इस बयान में कहा गया है कि उन्‍होंने काम्‍बली का भी साथ नहीं दिया ।

अब सचिन को मैदान के अंदर और बाहर दोनों जगह बल्‍लेबाजी करनी है । उनकी एक-एक हरकत बहुत महत्‍वपूर्ण होती है । सचिन का यह पहला सार्वजनिक बयान कहा जा सकता है । बिल्‍कुल उसी अंदाज जिसमें उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत की थी । पहली ही सीरीज में अब्‍दुल कादिर जैसे अनुभवी स्पिनर का कैरियर तबाह कर दिया था । सचिन की लोकप्रियता एक महान खिलाडी के साथ साथ एक भद्रपुरुष के रुप में है इसीलिए वे भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लाडले हैं । एक महान प्रतिभा का भद्र पुरुष होना बहुत अपीलक होता है ।

माओवादियों और नक्‍सलवादियों का आतंक तो जारी है ही । मुंबई के बमविस्‍फोटों 26/11 की बरषी भी आ पहुँची है । इसमें सरकार को चाहिए की वह मुंबई विस्‍फोटों से सबक लेकर साल भर में किए गए सुरक्षा उपायों की समीक्षा करे | इसके लिए छदूम अभ्‍यास भी किए जाने चाहिए । वरना उनकी कुशलता पर चौंकने और अपनी खामियों पर हाय-हाय करने के अलावा और कुछ करते नहीं बनता । मीडिया को भी सुरक्षा सुधारों पर बहस छेडनी चाहिए ।

इसके अलावा दिसम्‍बर 2012 में दुनिया भी खत्‍म होने वाली है । यह मैं नहीं कह रहा हूँ । बल्कि पिछले कई दिनों से मीडिया, समाचार पत्रों और ब्‍लॉगों में इस बाबत सम्‍भावनाऍं व्‍यक्‍त करने वाले प्रमाण दिए जा रहे हैं । जिधर रुख करो उधर ही एकाध पोस्‍ट दिख जाती है । कुछ नया होने की उत्‍तेजना लिए हुए ।

इस मामले में माया सभ्‍यता का नाम सबसे ज्‍यादा लिया जाता है । भला हो इस खबर का कि हमें दुनिया की एक और सभ्‍यता का नाम जानने का अवसर मिला । हो सकता है माया वालों को 2012 तक ही गिनती आती रही हो । या कुछ और वजह भी हो सकती है ।

हमें टेंशन दुनिया खत्‍म होने की नहीं है, यदि वह पूरी खत्‍म हो जाये तो । "आप मरे जग परलय" । जब सबै खत्‍म हो जायेगा तो काहे की फिकिर । बेचैनी तब होती है, जब परिस्थिति स्‍काई लैब वाली पैदा हो जाती है । हमें तो स्‍काई लैब गिरने की याद नहीं है । लेकिन हमने अपने बडे दोस्‍तों और बुजुर्गों से सुना था कि एक समय स्‍काई लैब नामक कोई पहाड अन्तरिक्ष से टूट कर पृथ्‍वी पर गिरने वाला था । वह अं‍तरिक्ष में लटकी हुई अमेरिका की एक प्रयोगशाला थी । जब उसका दिन पूरा हो गया और वह आसमान से जमीन पर आने लगी तो अमेरिका वालों ने कहा कि वह कहीं भी गिर सकती है । वैसे तो उसकी हवा में ही स्‍वाहा हो जाने की संभावना थी पर मान लो कुछ बचकर पृथ्‍वी से टकरा गई तो सत्‍यानाश ही समझो । इस धोखे में कई लोगों ने खूब पैसा खर्च करके ऐश किया था कि कहीं इधर ही आ गिरी तो सब धरा का धरा रह जायेगा पैसा वगैरह । ये बात अलग है कि बाद में ऐसे लोग स्‍काई लैब के प्रशांत महासागर में गिरने पर अफसोस करते पाये गए । क्‍योंकि कंगाल भी हो गए थे और परलय भी नहीं हुआ । अब खायें क्‍या | हमारे एकदोस्‍त के बडे भाई ने अपने बगीचे के सारे अनार तोडकर मोहल्‍ले में बँटवा दिए थे । बाद में पिताश्री के पैरों के चर्म मेडल प्राप्‍त किए , अपनी दूर‍दर्शिता के इनाम के तौर पर ।

हमारे स्‍कूल में एक लडके का नाम स्‍काई लैब था । वह उसी दिन पैदा हुआ था जिस दिन स्‍काई लैब गिरा | इसलिए उसके पिता ने उसे स्‍काई लैब करार दिया । बाद में मैट्रिक पहुँचते पहुँचते उसने अपने नाम के आगे तूफान भी जोड लिया था । स्‍काई लैब 'तूफान' । मेरा दोस्‍त नहीं था, जूनियर था लेकिन वह सिर्फ अपने नाम की वजह से जाना जाता था । पहली बार उसका नाम सुनकर लोग समझते कि मजाक कर रहा है । खासकर पूरा नाम स्‍काई लैब तूफान पढकर । अब पता नहीं स्‍काई लैब कहॉं होगा ।

बहरहाल हम 2012 जैसी खबरों को सनसनीखेज और मनोरंजन से ज्‍यादा तरजीह नहीं देते । क्‍योंकि जिस चीज में आदमी कुछ कर ही नहीं सकता उसमें फालतू की मगजमारी काहे । बल्कि पर्यावरण संबंधी मुददों को इस तरह के प्रचार की ज्‍यादा जरूरत है । मुझे तो लगता है कि पृथ्‍वी को ऐसे अचानक तो खत्‍म हो नहीं जायेगी । हॉं, यदि प्रमुख राष्‍ट्रों की सरकारें जल्‍द ही पर्यावरण से संबंधित समझौतों पर हस्‍ताक्षर करके अमल करना शुरू नहीं करतीं तो जरूर है कि आने वाले समय में हमें गंभीर प्राकृतिक संकटों का सामना करना पडेगा |

November 22, 2009

भाषा में छिपे हुए भाव

बडा कौतूहल होता है
देखकर
जब प्‍यार और नफरत
उपेक्षा और अपनत्‍व
अस्‍वीकार और सहानभूति की भाषा
बेजुबान पशु पक्षी और अबोध नवजात
भी समझ जाते हैं ,
तत्‍क्षण |
वे भी,
जिनका भाषा और सभ्‍यता से
कोई सरोकार नहीं होता |
वे भी,
जिन्‍हें इनकी आदत पड गई है
सदियों से या कुछ ही वर्षों से,
अपमान और अस्‍वीकार सहन करने की |
जिन्‍हें लोग समझते हैं,
वे स्‍वीकार कर चुके हैं
अपने अस्तित्‍व पर थोपा हुआ ओछापन ,
नहीं !
वे सब जानते हैं
समझते हैं , शब्‍दों में
सवारी करते हुए
भावों के दर्प को
और अचेतन ढूँढता रहता है
एक इंसान
जो देख सके उन्‍हें
अतीत की हीनताओं से मुक्‍त |
करते हुए आज के पुरुषार्थ का सम्‍मान
माई बाप की रट लगाने वाला
गॉंव का पुसुआ भी और
साब साब कहने वाला शहर का
चाय वाला भी |

एक प्रेमी-प्रेमिका के बीच
शब्‍द वही रहते हैं फिर भी
समय के साथ उनके मायने बदल जाते हैं
ये सब
पता नहीं कैसे
पढ लेते हैं
भाषाओं के चेहरे
बिना अक्षर ज्ञान के !
यांत्रिकता और आत्‍मीयता को
पहचानते हैं
दुधमुँहे बच्‍चे , पालतू पशु भी
शब्‍द तो जैसे शरीर होते हैं और
भाव उनकी चेतना |
कैसे संप्रेषित हो जाते हैं
तरह तरह के भाव एक ही शब्‍द से
प्रत्‍येक 'हाय' या नमस्‍कार
अलग अर्थ देता है
यहँ तक की
लिखे हुए शब्‍द भी
बता देत हैं अपना मूड
कितने गुस्‍से या प्‍यार से
ईमानदारी या बेईमानी से
लिखा गया है उन्‍हें
क्‍योंकि निकलने वाले शब्‍द
मात्र शब्‍द नहीं होते
बल्कि
पूरा ब्‍लूप्रिंट लिए होते हैं
वक्‍ता की भावनाओं का
वरना क्यों, एक ही गाली
कभी तिरस्कार की तरह और कभी
आत्‍मीयता के प्रमाण पत्र की तरह लगती |

November 17, 2009

बात सच है, पर चलन में है नहीं

बात सच है, पर चलन में है नहीं
आपकी बातें सहन में हैं नहीं

बात कैसे बोल दी तुमने यहॉं
बात जो अपने जेहन में है नहीं

बात करते ही रहो हर बात पर
आपात तो अपने वतन में है नहीं

बात हमसे ऑंकडों की न करो
एक भी संख्‍या फलन में है नहीं

बात पूछेगी तुम्‍ही से जान लो
ऐसे कैसे तन, वतन में है नही

बात करने के लिए ही बोलते हैं
ज्ञान की इच्‍छा जतन में है नहीं

अब कहॉं ले जाओगे बरसात में
एक भी गागर तपन में है नहीं

बात उनकी जब सुने ऐसा लगा
बात ऐसी सब मुखन में है नहीं

बोलते हैं सभी खुल जाने पर
नाम सबका बतकहन में है नहीं

मिल गए हो आज खुलकर बात कर लो
है बात में जीवन, मरण में है नहीं

गड्ढे खोदोगे तुम्ही पहले गिरोगे
कोई नागा इस नियम में है नहीं


दिल में अपने एक सागर
तुम बसा लो
फासला धरती गगन में है नहीं


November 14, 2009

इन बच्चों का दिवस कब आयेगा भारत देश में

क्या हवाई मुद्दों पर लड़ने वालों को कुछ शर्म आएगी ?













चित्र : गूगल और ईमेल से प्राप्त