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November 04, 2009

फ़ूल में भी मगरूरी रही होगी


फूलों में मगरूरी रही होगी
पत्थर की भी मजबूरी रही होगी

पछता सके
लडकर भी जब
रिश्तों में बहुत दूरी रही होगी

बात की है अब तक तो क्या
दिमागी कुछ कमजोरी रही होगी

पूछा नहीं हम कहां थे अब तक
फ़िक्र ये गैर-जरूरी रही होगी

समझ आई तो क्या आई उनको
ये किस्मत ही छिछोरी रही होगी

ताके बैठे थे जिसे चातक की तरह
और चन्दा की वो चकोरी रही होगी

भूल जा मीठी बातें हकीकत में
सब उनकी दुनियादारी रही होगी

बुरा मानें हम क्यों किसी बात का
उनकी भी कुछ मजबूरी रही होगी

October 24, 2009

आदमी की फ़ितरतें बदली नहीं हैं देखिए


कौन है जो कह सके कर ली तरक्की देखिए
आदमी की फ़ितरतें बदली नहीं हैं देखिए

राम रहमान दोनों हैं बहुत अमनो पसन्द
जिक्र-ए-मजहब हो कहीं, उनकी शराफ़त देखिए

स्वर्ण कंगूरे कलश तो देखिए ही, साथ में

नंगे
पुजारी और अधनंगे भिखारी देखिए


उम्रभर लडते रहे जिसकी रिहाइश के लिये
वह पलायन कर गया है देखिए ना देखिए

हमने जादू खूब देखे हैं महल में राह में
फ़िर भी पापी पेट ही मुद्दा रहा था देखिए

तुमने राखें और ताबीजें निकाली हैं बहुत
होरीअब भी मर रहा है कर्ज से ही देखिए

चल रहा है आज ही रफ़्ता-रफ़्ता नौनिहाल
पास ही रखिए अभी अपनी सिखावन देखिए

क्या हुआ आती नहीं बारह खडी भी बहरफ़
एक बच्चा मिल गया मेरी लियाकत देखिए

दोष मत देना उसे जो तुझसे आगे है बहुत
देखना है कुछ अगर अपनी जहालत देखिये

कारवां है अम्न का तू हमको कायर न समझ
कोई चालें न चलेंगी विघटनों की देखिए

ढूंढते हो क्यों यहां शेरे बब्बर नस्ल तुम
अब जमीं पे रह गये खालिस बगीचे देखिए

चौंकिये न देखकर खेल उनका राह में
काम पहले कर चुके हैं सर्कसों में देखिये

बुलबुले की जात हैं इनसे बच न पाओगे
फ़ट पडॆ हैं आज इधर कल उधर देखिये

ओट करके देखिये या सामने से देखिये
देखिये तो देखिये जी प्यार ही से देखिए

खैर मकदम कीजिए या गालियां ही दीजिए
दिल से मेरे सिर्फ़ निकलेंगी दुआएं देखिए

हों सुबह की बहर में या दोपहर में बेबहर
हम तो अपनी बात ऐसे ही कहेंगे देखिए


October 08, 2009

तेरा होना सदा है कविता सा....

फिर तुम्हारा ख़याल आने लगा
दिल कोई गीत गुनगुनाने लगा

एक बहुत खूब शायरी पढकर
क्यों मैं शायर से मिलने जाने लगा

कितने नाजुक हैं ये नये रिश्ते
देखकर फूल भी लजाने लगा

अब तो बातों में भी है खामोशी
शायद अपना पडाव आने लगा

तेरा होना सदा है कविता सा
मैं तो अपनी गजल छिपाने लगा

जो मुझे एक पल में कहना था
उनको कहने में भी ज़माना लगा

जिक्र की राह अब हुई आसां
खौफ बन्दा खुदा से खाने लगा

या तो उलझो ही आज, या हंस दो
नाप-तौल अब तो मन उबाने लगा

उनकी बातों का कैसा शिकवा अब
उनका गुस्सा ही जब रिझाने लगा