
फूलों में मगरूरी रही होगी
पत्थर की भी मजबूरी रही होगी
पछता सके न लडकर भी जब
रिश्तों में बहुत दूरी रही होगी
बात की है अब तक तो क्या
दिमागी कुछ कमजोरी रही होगी
पूछा नहीं हम कहां थे अब तक
फ़िक्र ये गैर-जरूरी रही होगी
समझ आई तो क्या आई उनको
ये किस्मत ही छिछोरी रही होगी
ताके बैठे थे जिसे चातक की तरह
और चन्दा की वो चकोरी रही होगी
भूल जा मीठी बातें हकीकत में आ
सब उनकी दुनियादारी रही होगी
बुरा मानें हम क्यों किसी बात का
उनकी भी कुछ मजबूरी रही होगी

