यह सब मैं भगत सिंह और उनके साथियों के संबंध में कह रहा हूँ। उन्हे मारने का केवल एक ही तरीका था, उनकी मूर्तियॉं बनवा दो, उनकी पूजा करनी शुरु कर दो। हमारे देश में मानवतावादियों समतावादियों को खत्म करने का एक बहुत ही नायाब तरीका बहुत प्राचीन समय से निकाला हुआ है। जिसके विचारों से इत्तफाक न रखते हुए भी आप उससे लड़ न सको उसकी पूजा शुरु कर दो। उसे महान घोषित करो। लेकिन कभी भी उसके विचारों की बात मत करो। उसने क्या कहा था इससे कोई मतलब ही नहीं बल्कि अपनी बात उसके मुँह से कहलवाओ। उसके श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अपना एजेंडा पेश करो। जब साध्वी प्राची महात्मा गांधी के विरोध में और भगत सिंह के पक्ष में बोलती हैं तब उन्हें पता नहीं होता कि वह क्या कह रही हैं। वह कभी नहीं कहतीं कि भगत सिंह ने मैं नास्तिक क्यों हूँ नामक लेख लिखा था। साध्वी प्राची जैसे लोगों को लगता है कि भगत सिंह उन्हीं की तरह एक राष्ट्रवादी थे।
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March 23, 2015
January 03, 2010
3 ईडियट्स बनाम फाइव प्वाइंट समवन
कल मैंने फिल्म 3 ईडियटस देखी । इसके पहले हाल ही में चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन पढा था ।यह उपन्यास एक फुल टाइम पास है, वैसी ही फिल्म भी है । आप कहीं भी बोर नहीं होंगे । फर्क इतना है कि किताब सच्चाई के ज्यादा करीब है । चेतन भगत अद्भुत किस्सा गो हैं । रेलवे स्टेशन पर प्रतीक्षा करते यात्रियों की तीन घंटे की समयावधि पर भी पूरा उपन्यास लिख सकते हैं ।
इसमें प्रेरणा देने की जो कोशिश की गई है, बहुत अच्छी है , कि हमारे यहॉ की शिक्षा पद्धति रट्टा आधारित है । यह बात पहले भी अनंत बार कही जा चुकी है । वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार , जातिवाद , धार्मिक उन्माद इत्यादि खत्म होने ही चाहिए , लेकिन होता नहीं है । ऐसा लगता है कि इनके बिना हमारा काम नहीं चलेगा या अपनी पहचान लुप्त हो जायेगी । हर साल नए घोटाले पिछले साल के घोटालों के रिकार्ड तोडते जाते हैं । इस क्षेत्र में क्रिकेट के खेल की तरह धडाधड कीर्तिमान बनते रहते हैं ।
फिल्म रिलीज होने के बाद विवाद भी हो लिया । लेकिन हम विवाद में काहे पडें । हमने तो जो पढा और देखा वही बता रहे हैं । वैसे भी विवाद से दोनों पक्षों को लाभ ही होने वाला है । आज समाचार में था कि दिल्ली, अहमादाबाद , सूरत , वडोदरा इत्यादि में किताब की बिक्री पचास प्रतिशत तक बढ गई है । फाइव प्वाइंट समवन बेस्ट सेलर पुस्तक रही है ।
चेतन भगत को फिल्म के क्रेडिट हिस्से में वाजिब श्रेय मिला या नहीं यह तो फाइव प्वाइंट समवन देखने वाला और किताब पढने वाला मनुष्य समझ ही जायेगा । इसमें कोई आईआईटी बुद्धि या पटकथा लेखन के कौशल की कतई आवश्यकता नहीं है । और यह भी कि सबको पहले से ही पता था कि यह फिल्म चेतन भगत के उपन्यास पर बन रही है । जिनको पता नहीं था अब पता हो गया है ।
यह बहस करना कि कितने प्रतिशत चेतन की कहानी है और कितने प्रतिशत शरमन जोशी, आर माधवन की जोड-तोड है , ज्यादा महत्व नहीं रखता । इसे इस तरह कहा जा सकता है कि कहानी का पूरा विचार दर्शन चेतन का है , भवन की नींव , पूरा ढॉंचा । बाकी फिल्म वालों ने उसमें अपने ढंग से डेकोरेशन किया है । कहानी की कुछ घटनाओं को दूसरे ढंग से होते दिखाने भर से कोई कहानी का लेखक नहीं हो जाता । उदाहरण के लिए डीन के कार्यालय से प्रश्नपत्र चुराने के लिए फिल्म में प्रोफेसर की लडकी खुद लडकों को चाबी देती है जबकि किताब में हरि यह चाबी प्रोफेसर की लडकी , जिससे उसकी दोस्ती हो गई है , के यहॉं से चुराता है ।
फिल्म और उपन्यास पर तुलनात्मक रूप से कुछ भी कहने से पहले मै यह बता दूँ कि मैंने किसी उपन्यास या कहानी पर बनी ऐसी कोई भी फिल्म या टीवी धारावाहिक नहीं देखा जो मूल कृति से बेहतर हो । शायद यह विधाओं में अंतर की वजहसे होता है । पढते समय हम कल्पना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और हमारे मन में अपनी सुविधानुसार पात्रों की छवियॉं बन जाती हैं । हमारे अनुभवों से मस्तिष्क में काल्पनिक परिवेश बन जाता है । फिर हम एक बेहतर कृति में डूबकर पढते जाते हैं । लेखक जो विचार रख्ाता है, जो संदेश देना चाहता है उसे ग्रहण करते जाते हैं । एक बेहतर रचना किसी काई लगी हुई ढलान की तरह होती है । पैर रखते ही आप फिसलना शुरू हो जाते हैं और फिर फिसलते ही जाते हैं जब तक कि ढलान खत्म नहीं हो जाती । उसी तरह एक बेहतरीन रचना की एक लाइन पढने के बाद आप पूरी किताब पढने से खुद को नहीं रोक सकते । यही उस पुस्तक के लोकप्रियता की वजह भी होती है । क्योंकि साहित्य या कला कुछ भी होने से पहले मनोरंजन है । चाहे वह
किसी भी ढंग से हो । दुखद या सुखद मन: स्थिति के अनुरूप ।
फिल्म और उपन्यास पर तुलनात्मक रूप से कुछ भी कहने से पहले मै यह बता दूँ कि मैंने किसी उपन्यास या कहानी पर बनी ऐसी कोई भी फिल्म या टीवी धारावाहिक नहीं देखा जो मूल कृति से बेहतर हो । शायद यह विधाओं में अंतर की वजहसे होता है । पढते समय हम कल्पना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और हमारे मन में अपनी सुविधानुसार पात्रों की छवियॉं बन जाती हैं । हमारे अनुभवों से मस्तिष्क में काल्पनिक परिवेश बन जाता है । फिर हम एक बेहतर कृति में डूबकर पढते जाते हैं । लेखक जो विचार रख्ाता है, जो संदेश देना चाहता है उसे ग्रहण करते जाते हैं । एक बेहतर रचना किसी काई लगी हुई ढलान की तरह होती है । पैर रखते ही आप फिसलना शुरू हो जाते हैं और फिर फिसलते ही जाते हैं जब तक कि ढलान खत्म नहीं हो जाती । उसी तरह एक बेहतरीन रचना की एक लाइन पढने के बाद आप पूरी किताब पढने से खुद को नहीं रोक सकते । यही उस पुस्तक के लोकप्रियता की वजह भी होती है । क्योंकि साहित्य या कला कुछ भी होने से पहले मनोरंजन है । चाहे वह
तो किसी पुस्तक को पढने के बाद उसके पिक्चराइज रूप को देखते समय स्वभावत: मन तुलना करने लगता है ।
तुलना इसलिए करता है क्योंकि कि हम अपने मन में पहले ही उस कहानी को पिक्चराइज कर चुके हैं । कला फिल्में इस तरह के पिक्चराइजेशन में ज्यादा सफल होती हैं ।
जहॉं तक 3 इडियटस की बात है, इस कहानी का स्रोत चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन ही है । किताब पढकर और फिल्म देखकर यह बात कोई भी आसानी से कह सकता है । उपन्यास जो संदेश देना चाहता है फिल्म भी वही कहती है , कि अपनी रुचि का काम करने से आदमी सफल होता है । नौकरी के लिए पढाई और उच्च शिक्षण संस्थान भी छात्रों में शोधपरक मनोवृत्ति विकसित करने की अपेक्षा उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने की चूहा दौड में झोंक देते हैं । शिक्षा का मकसद छात्र को यह समझने में मदद करना होना चाहिए कि वह क्या बनना चाहता है । यह भी एक बडी उपलब्धि है कि स्टूडेंट समझ सकें कि उनकी रुचि क्या है और किस क्षेत्र का चुनाव उनके लिए सही रहेगा । बच्चे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा का शिकार न हों और अपनी दिल की आवाज का अनुसरण कर सकें । तभी एक खुशहाल समाज बन सकता है । इसके लिए जरुरी है कि हर आदमी को वह करने का मौका मिल सके जिसके लिए वह पैदा हुआ है । अन्यथा एक समाज में जहॉं लोग गलत जगहों पर बैठे हुए हैं कभी अमन चैन कायम नहीं हो सकता और ना ही वहॉं किसी सृजन की कोई सम्भावना है । बस एक के बाद एक भारवाहक पीढियॉं पैदा होती रहेंगी । यही भारत की समस्या है । मेरे विचार से यह समस्या इसलिए है क्योंकि भारत जनसंख्या के बोझ से दबा हुआ एक गरीब देश है । जिसके विकास में भारी असमानताऍं हैं ।
तुलना इसलिए करता है क्योंकि कि हम अपने मन में पहले ही उस कहानी को पिक्चराइज कर चुके हैं । कला फिल्में इस तरह के पिक्चराइजेशन में ज्यादा सफल होती हैं ।
जहॉं तक 3 इडियटस की बात है, इस कहानी का स्रोत चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन ही है । किताब पढकर और फिल्म देखकर यह बात कोई भी आसानी से कह सकता है । उपन्यास जो संदेश देना चाहता है फिल्म भी वही कहती है , कि अपनी रुचि का काम करने से आदमी सफल होता है । नौकरी के लिए पढाई और उच्च शिक्षण संस्थान भी छात्रों में शोधपरक मनोवृत्ति विकसित करने की अपेक्षा उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने की चूहा दौड में झोंक देते हैं । शिक्षा का मकसद छात्र को यह समझने में मदद करना होना चाहिए कि वह क्या बनना चाहता है । यह भी एक बडी उपलब्धि है कि स्टूडेंट समझ सकें कि उनकी रुचि क्या है और किस क्षेत्र का चुनाव उनके लिए सही रहेगा । बच्चे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा का शिकार न हों और अपनी दिल की आवाज का अनुसरण कर सकें । तभी एक खुशहाल समाज बन सकता है । इसके लिए जरुरी है कि हर आदमी को वह करने का मौका मिल सके जिसके लिए वह पैदा हुआ है । अन्यथा एक समाज में जहॉं लोग गलत जगहों पर बैठे हुए हैं कभी अमन चैन कायम नहीं हो सकता और ना ही वहॉं किसी सृजन की कोई सम्भावना है । बस एक के बाद एक भारवाहक पीढियॉं पैदा होती रहेंगी । यही भारत की समस्या है । मेरे विचार से यह समस्या इसलिए है क्योंकि भारत जनसंख्या के बोझ से दबा हुआ एक गरीब देश है । जिसके विकास में भारी असमानताऍं हैं ।
यह संदेश उपन्यास और फिल्म दोनों में एकरूप है । इसमें छात्रों पर पाठ्यक्रम के बोझ , सिस्टम या तंत्र के प्रति उनका असंतोष और उससे निपटने का 3 ईडियट्स का तरीका किताब और फिल्म में एक ही है । उपन्यास की तुलना में फिल्म में कुछ घटनाओं को बदल दिया गया है । जैसे किसी मकान में जाने से पहले आप उसमें अपनी सुविधानुसार फेरबदल करें । उसी तरह फिल्म में घटनाओं में फेरबदल किया गया है ।
3 ईडियट्स और फाइव प्वाइंट समवन की कहानी में तुलना :
- यह इंजीनियरिंग की मैकेनिकल शाखा से स्नातक करने वाले तीन छात्रों की कहानी है । उपन्यास और फिल्म दोनों की शुरुआत रैगिंग से होती है । दोनों में छात्रो की रैगिंग होती है फिर रैंचो या रेहान उन्हें बचा लेता है । जो कि दोनों में अलग-अलग ढंग से दिखाई गई हैं ।
- कालेज के पहले दिन कक्षा में मशीन के बारे में प्रश्न किया जाना । यह दिखाना कि किस तरह शिक्षा तंत्र में बदलाव की आवश्यकता है ।
- कालेज का प्रोफेसर डीन(बोमन ईरानी) बेहद सख्त है , उसकी एक खूबसूरत लडकी है (करीना कपूर ) । प्रोफेसर एक लडका भी था जो कि आत्महत्या कर चुका होता है, लेकिन सब समझते हैं कि वह ट्रेन दुर्घटना में मरा है । यह बात केवल उसकी बहन को मालूम होती है , जिसे वह मरने से पहले एक पत्र लिखकर जाता है । प्रोफेसर को पत्र और आत्महत्या के बारे में बाद में पता चलता है ।
- कालेज के पहले दिन कक्षा में मशीन के बारे में प्रश्न किया जाना । यह दिखाना कि किस तरह शिक्षा तंत्र में बदलाव की आवश्यकता है ।
- कालेज का प्रोफेसर डीन(बोमन ईरानी) बेहद सख्त है , उसकी एक खूबसूरत लडकी है (करीना कपूर ) । प्रोफेसर एक लडका भी था जो कि आत्महत्या कर चुका होता है, लेकिन सब समझते हैं कि वह ट्रेन दुर्घटना में मरा है । यह बात केवल उसकी बहन को मालूम होती है , जिसे वह मरने से पहले एक पत्र लिखकर जाता है । प्रोफेसर को पत्र और आत्महत्या के बारे में बाद में पता चलता है ।

उसकी बेटी अपने भाई की मृत्यु का जिम्मेवार प्रोफेसर को ठहराती है । क्योंकि उसके भाई के बारबार आईआईटी प्रवेश परीक्षा में असफल होने के बाद भी प्रोफेसर उसे इंजीनयिरिंग करवाने का ही दबाव बढाता जाता है । जबकि वह कला विषय लेकर पढना चाहता है । प्रोफेसर की बेटी बहस के दौरान अंत में कहती है कि उसने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसका मर्डर हुआ है ।
- रट्टू छात्र वेंकट (किताब में) ( फिल्म में ) की भूमिका ज्यादा अहम है किताब की अपेक्षा । जिसके साथ आलोक , मित्रों से झगडा होने पर एक साल तक रहता है ।
- तीन में से एक ईडियट आलोक (राजू रस्तोगी) के परिवार का वर्णन फिल्म और किताब में एक समान है । आलोक का परिवार मुसीबतों से घिरा हुआ है । धनाभाव के कारण परिवार त्रस्त है । बहन की शादी करनी है , जिसके दहेज में लडके वाले मारुति 800 की मॉंग करते हैं । बाप को लकवा मार गया है जिसकी वजह से वह हमेशा बिस्तर पर ही पडे रहते हैं । आलोक किसी भी तरह एक जॉब चाहता है । उसका इंजीनियरिंग करने का एकमात्र यही मकसद है । यह घटना भी फिल्म और किताब में समान है कि तीनों दोस्त आलोक के घर खाना खाने जाते हैं और मटर पनीर की सब्जी खाते हैं । अंत में खीर भी । आलोक की मॉं खाने के दौरना अपनी समस्याओं का रोना रोती रहती है । वस्तुओं के दाम बताती रहती है ।
- रट्टू छात्र वेंकट (किताब में) ( फिल्म में ) की भूमिका ज्यादा अहम है किताब की अपेक्षा । जिसके साथ आलोक , मित्रों से झगडा होने पर एक साल तक रहता है ।
आलोक के माता पिता फिल्म में ज्यादा गरीब और दीन हीन दिखाए गए हैं । उपन्यास में हरि के माता पिता का जिक्र नहीं है । फिल्म में हरि के माता पिता और उसका शौक फोटोग्राफी है यह बात उपन्यास की कहानी से अलग जोडी गई है । इसी तरह करीना कपूर का रेहान से प्यार होता है जबकि उपन्यास में वह हरि से प्यार करती है । उपन्यास में तीनों दोस्तो का ग्रेड फाइव प्वाइंट समथिंग होता है जबकि फिल्म में रेहान (रैंचो) को प्रथम और बाकी दो दोस्तों आलोक और हरि को अंतिम स्थान में दिखाया गया है ।
इस तरह घटनाऍं ज्यादातर वही घटती हैं, जो उपन्यास में वर्णित हैं जैसे आलोक छत से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है , लडके डीन के कार्यालय से प्रश्न पत्र चोरी करते हैं , तीनों लडकों का डीन के घर में उसकी लडकी के कमरे में खिडकी के रास्ते चुपके से रात में जाना, कक्षा में प्रोफेसर को मशीन की परिभाषा पूछना आदि । लेकिन फिल्म में इन घटनाओं के घटित होने की वजह अलग है और इन्हें अलग ढंग से पेश किया गया है ।
फिल्म की कहानी में उपन्यास की अपेक्षा जो एक बडा परिवर्तन किया गया है वह यह कि फिल्म में दिखाया गया है कि कालेज से निकलने के बाद रणछोडदास (रेन्चो ) गायब हो जाता है और बाकी दोनों दोस्त को उसका पता नहीं चलता । पॉंच साल के बाद उन्हीं के कालेज के एक पढाकू छात्र साइलेन्सर(चतुर) का उन्हें फोन आता है जो कि अब किसी बढी कम्पनी में उच्च पद पर है कि रैन्चों का पता मिल गया है । इसके बाद फ्लैश बैक में होती हुई कहानी आगे बढती है । जबकि उपन्यास की कहानी कालेज खत्म होने और आलोक और हरि को नौकरी मिलने तथा रेहान (रेंचो) को उसी कालेज में सहायक शोधछात्र की छात्रवृत्ति मिलने के बाद खत्म हो जाती है । रेहान के पिता उसके रिसर्च से बनाए गए उत्पाद पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं । और रेहान उसके व्यावसायिक उत्पादन संबंधी उद्योग की स्थापना में लग जाता है । जो कि उसी शहर से लगे किसी गॉंव में लगाया जा रहा है ।
अंतत: 3 इडियटस एक बॉलीवुड मनोरंजक फिल्म है । जिसे देखकर पैसा डूबने का पछतावा नहीं होता । आमिर खान का अभिनय अच्छा है, जैसा कि हमेशा होता है । फिर भी फिल्म उपन्यास की अपेक्षा यथार्थ के कम करीब लगती है ।
रही बात चेतन भगत को क्रेडिट्स की तो यह कहानी चेतन भगत की है । मूल ढांचा तो उपन्यास का ही है । फिर उसमें मनचाहे फेरबदल करना फिल्म विधा के हिसाब से कोई बडी बात नहीं है । जैसे रैगिंग करने के ढंग बहुत हैं तो उसमें आपने बदलाव कर दिया थोडा सा । इससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह आपकी मूल कहानी है ।
ठीक है अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी ने इस पर मेहनत की है लेकिन किसी भी मूलकृति पर कोई भी आसानी से अपनी इच्छानुसार छेडछाड कर सकता है, इससे आप यह नहीं कह सकते कि यह कृति उसकी हो गई । मोनालिसा की प्रतिकृति बनाने से कोई लियो नार्दो द विंसी नहीं हो जाता ।
इस तरह घटनाऍं ज्यादातर वही घटती हैं, जो उपन्यास में वर्णित हैं जैसे आलोक छत से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है , लडके डीन के कार्यालय से प्रश्न पत्र चोरी करते हैं , तीनों लडकों का डीन के घर में उसकी लडकी के कमरे में खिडकी के रास्ते चुपके से रात में जाना, कक्षा में प्रोफेसर को मशीन की परिभाषा पूछना आदि । लेकिन फिल्म में इन घटनाओं के घटित होने की वजह अलग है और इन्हें अलग ढंग से पेश किया गया है ।
फिल्म की कहानी में उपन्यास की अपेक्षा जो एक बडा परिवर्तन किया गया है वह यह कि फिल्म में दिखाया गया है कि कालेज से निकलने के बाद रणछोडदास (रेन्चो ) गायब हो जाता है और बाकी दोनों दोस्त को उसका पता नहीं चलता । पॉंच साल के बाद उन्हीं के कालेज के एक पढाकू छात्र साइलेन्सर(चतुर) का उन्हें फोन आता है जो कि अब किसी बढी कम्पनी में उच्च पद पर है कि रैन्चों का पता मिल गया है । इसके बाद फ्लैश बैक में होती हुई कहानी आगे बढती है । जबकि उपन्यास की कहानी कालेज खत्म होने और आलोक और हरि को नौकरी मिलने तथा रेहान (रेंचो) को उसी कालेज में सहायक शोधछात्र की छात्रवृत्ति मिलने के बाद खत्म हो जाती है । रेहान के पिता उसके रिसर्च से बनाए गए उत्पाद पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं । और रेहान उसके व्यावसायिक उत्पादन संबंधी उद्योग की स्थापना में लग जाता है । जो कि उसी शहर से लगे किसी गॉंव में लगाया जा रहा है ।
अंतत: 3 इडियटस एक बॉलीवुड मनोरंजक फिल्म है । जिसे देखकर पैसा डूबने का पछतावा नहीं होता । आमिर खान का अभिनय अच्छा है, जैसा कि हमेशा होता है । फिर भी फिल्म उपन्यास की अपेक्षा यथार्थ के कम करीब लगती है ।
रही बात चेतन भगत को क्रेडिट्स की तो यह कहानी चेतन भगत की है । मूल ढांचा तो उपन्यास का ही है । फिर उसमें मनचाहे फेरबदल करना फिल्म विधा के हिसाब से कोई बडी बात नहीं है । जैसे रैगिंग करने के ढंग बहुत हैं तो उसमें आपने बदलाव कर दिया थोडा सा । इससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह आपकी मूल कहानी है ।
ठीक है अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी ने इस पर मेहनत की है लेकिन किसी भी मूलकृति पर कोई भी आसानी से अपनी इच्छानुसार छेडछाड कर सकता है, इससे आप यह नहीं कह सकते कि यह कृति उसकी हो गई । मोनालिसा की प्रतिकृति बनाने से कोई लियो नार्दो द विंसी नहीं हो जाता ।
फिर कांट्रैक्ट में क्या था या उनके बीच क्या डील हुई थी । यह सब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है ।
अंत में यदि पूछा जाय कि फिल्म देखने और उपन्यास पढने में ज्यादा मजेदार क्या है तो बेहिचक मैं यह कहूंगा कि फाइव प्वाइंट समवन के मुकाबले 3 इडियट्स बहुत कमजोर है । वजह : फिल्म हमें सिर्फ मनोरंजन देती है जबकि उपन्यास मनोरंजन से आगे भी कुछ देता है । उपन्यास का हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध है । प्रभात पेपर बैक्स प्रकाशन, नई दिल्ली से , मूल्य 95/-
चित्र : गूगल
चित्र : गूगल
November 23, 2009
सचिन, 26/11, स्काई लैब और माया
इन दिनों सचिन का बयान, की उन्हें मराठी होने पर गर्व है , लेकिल मुम्बई पूरे भारत की है काफी चर्चित रहा । आज शिवसेना के एक और सांसद का बयान आने से मामला फिर से रिफ्रेश हो गया है । इसमें सांसद ने कहा है कि सचिन ने मराठीवासियों के लिए कुछ नहीं किया है जबकि गावस्कर ने कई मराठी खिलाडियों को टेस्ट टीम में जगह दिलाई थी । इस बयान में कहा गया है कि उन्होंने काम्बली का भी साथ नहीं दिया ।अब सचिन को मैदान के अंदर और बाहर दोनों जगह बल्लेबाजी करनी है । उनकी एक-एक हरकत बहुत महत्वपूर्ण होती है । सचिन का यह पहला सार्वजनिक बयान कहा जा सकता है । बिल्कुल उसी अंदाज जिसमें उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत की थी । पहली ही सीरीज में अब्दुल कादिर जैसे अनुभवी स्पिनर का कैरियर तबाह कर दिया था । सचिन की लोकप्रियता एक महान खिलाडी के साथ साथ एक भद्रपुरुष के रुप में है इसीलिए वे भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लाडले हैं । एक महान प्रतिभा का भद्र पुरुष होना बहुत अपीलक होता है ।
माओवादियों और नक्सलवादियों का आतंक तो जारी है ही । मुंबई के बमविस्फोटों 26/11 की बरषी भी आ पहुँची है । इसमें सरकार को चाहिए की वह मुंबई विस्फोटों से सबक लेकर साल भर में किए गए सुरक्षा उपायों की समीक्षा करे | इसके लिए छदूम अभ्यास भी किए जाने चाहिए । वरना उनकी कुशलता पर चौंकने और अपनी खामियों पर हाय-हाय करने के अलावा और कुछ करते नहीं बनता । मीडिया को भी सुरक्षा सुधारों पर बहस छेडनी चाहिए ।
इसके अलावा दिसम्बर 2012 में दुनिया भी खत्म होने वाली है । यह मैं नहीं कह रहा हूँ । बल्कि पिछले कई दिनों से मीडिया, समाचार पत्रों और ब्लॉगों में इस बाबत सम्भावनाऍं व्यक्त करने वाले प्रमाण दिए जा रहे हैं । जिधर रुख करो उधर ही एकाध पोस्ट दिख जाती है । कुछ नया होने की उत्तेजना लिए हुए ।
इस मामले में माया सभ्यता का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है । भला हो इस खबर का कि हमें दुनिया की एक और सभ्यता का नाम जानने का अवसर मिला । हो सकता है माया वालों को 2012 तक ही गिनती आती रही हो । या कुछ और वजह भी हो सकती है ।

हमें टेंशन दुनिया खत्म होने की नहीं है, यदि वह पूरी खत्म हो जाये तो । "आप मरे जग परलय" । जब सबै खत्म हो जायेगा तो काहे की फिकिर । बेचैनी तब होती है, जब परिस्थिति स्काई लैब वाली पैदा हो जाती है । हमें तो स्काई लैब गिरने की याद नहीं है । लेकिन हमने अपने बडे दोस्तों और बुजुर्गों से सुना था कि एक समय स्काई लैब नामक कोई पहाड अन्तरिक्ष से टूट कर पृथ्वी पर गिरने वाला था । वह अंतरिक्ष में लटकी हुई अमेरिका की एक प्रयोगशाला थी । जब उसका दिन पूरा हो गया और वह आसमान से जमीन पर आने लगी तो अमेरिका वालों ने कहा कि वह कहीं भी गिर सकती है । वैसे तो उसकी हवा में ही स्वाहा हो जाने की संभावना थी पर मान लो कुछ बचकर पृथ्वी से टकरा गई तो सत्यानाश ही समझो । इस धोखे में कई लोगों ने खूब पैसा खर्च करके ऐश किया था कि कहीं इधर ही आ गिरी तो सब धरा का धरा रह जायेगा पैसा वगैरह । ये बात अलग है कि बाद में ऐसे लोग स्काई लैब के प्रशांत महासागर में गिरने पर अफसोस करते पाये गए । क्योंकि कंगाल भी हो गए थे और परलय भी नहीं हुआ । अब खायें क्या | हमारे एकदोस्त के बडे भाई ने अपने बगीचे के सारे अनार तोडकर मोहल्ले में बँटवा दिए थे । बाद में पिताश्री के पैरों के चर्म मेडल प्राप्त किए , अपनी दूरदर्शिता के इनाम के तौर पर ।
हमारे स्कूल में एक लडके का नाम स्काई लैब था । वह उसी दिन पैदा हुआ था जिस दिन स्काई लैब गिरा | इसलिए उसके पिता ने उसे स्काई लैब करार दिया । बाद में मैट्रिक पहुँचते पहुँचते उसने अपने नाम के आगे तूफान भी जोड लिया था । स्काई लैब 'तूफान' । मेरा दोस्त नहीं था, जूनियर था लेकिन वह सिर्फ अपने नाम की वजह से जाना जाता था । पहली बार उसका नाम सुनकर लोग समझते कि मजाक कर रहा है । खासकर पूरा नाम स्काई लैब तूफान पढकर । अब पता नहीं स्काई लैब कहॉं होगा ।
बहरहाल हम 2012 जैसी खबरों को सनसनीखेज और मनोरंजन से ज्यादा तरजीह नहीं देते । क्योंकि जिस चीज में आदमी कुछ कर ही नहीं सकता उसमें फालतू की मगजमारी काहे । बल्कि पर्यावरण संबंधी मुददों को इस तरह के प्रचार की ज्यादा जरूरत है । मुझे तो लगता है कि पृथ्वी को ऐसे अचानक तो खत्म हो नहीं जायेगी । हॉं, यदि प्रमुख राष्ट्रों की सरकारें जल्द ही पर्यावरण से संबंधित समझौतों पर हस्ताक्षर करके अमल करना शुरू नहीं करतीं तो जरूर है कि आने वाले समय में हमें गंभीर प्राकृतिक संकटों का सामना करना पडेगा |
August 17, 2009
शाहरुख बनाम सुरक्षा
बालीवुड के प्यारे बड़बोले अभिनेता शाहरुख खान की अमेरिकी हवाई अड्डे पर जांच हो ली| वो भी पूरे 66 मिनट तक | भाई जान बुरा मान गए | छनछनाने लगे | अब सोचिये इतने बड़े अभिनेता का समय कितना कीमती होता है | 66 मिनट में लाखों का नुकसान हो गया, उसकी भरपाई कौन करेगा | पहले तो हमने दो घंटे सुना था, पर यह आंकडा हम बीबीसी के हवाले से दे रहे हैं | जब 'बादशाह' की ऐसी बेज्जती हुई तो अपने यहाँ की मीडिया यहाँ तक कि कुछ नेतागण भी गुस्से में भावुक हो गए |
क्रिकेट खिलाड़ी और बोलीवुड खिलाड़ी हिन्दुस्तानी मीडिया के लिए विशेष 'ख़बर तत्व' हैं क्योंकि ये दोनों तत्व भारतीयों के लिए विशेष 'भावुकता तत्व' हैं | इन्हें जनता भगवान की तरह पूजने लगती है | चने के झाड़ की एकदम लास्ट वाली फुन्नी में चढाकर बैठाती है | जिससे झाड़ थोड़ा भी इधर-उधर हिले-डुले तो इनकी हरकतें नजर आयें | किंग खान को गुस्से में ध्यान नहीं रह गया होगा की वे अमेरिका में हैं | बहुत जल्दी में थे | कार्यक्रम के लिए देर हो रही थी | ऐसे में देश प्रेम की भावना तुंरत जागृत हो जाती है | जनता की भी और जनार्दन की भी | फलतः दोनों ही अपमान मोड में चले जाते हैं |
"ऐसा मेरे साथ भी हुआ है। अब तो जिस तरह वे हमारी जाँच करते हैं उसी तरह हमें भी अमरीकियों की जाँच करनी चाहिए."
- अम्बिका सोनी | (मतलब कई अभी तक इज्जत मर्यादा लिए चुप बैठे हैं )
तो आप जांच करवाइए न, किसी भारतीय को कोई आपत्ति नहीं है | यही तो आपकी मजबूरी है कि आप इतनी कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकते | आप अक्षरधाम और संसद पर हमलों के बाद भी 26/11 झेलने के लिए तैयार रहते हैं | लेकिन धृष्ट अमेरिका दूध के जले की तरह छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है | क्योंकि उसके सामने दो ही विकल्प हैं या तो आतंकी हमले का खतरा ले या कड़ी जांच करे | वह भारत देश से कोई सबक नहीं लेना चाहता | वो कहता है कि हम 19/11 को दुहराना नहीं चाहते | कौन समझाए, समझता ही नहीं |
शाहरुख़ के बोलीवुड दोस्त (?) सल्लू मियां इसकी पुष्टि करते हैं |
"अमरीका में जाँच के कड़े प्रावधान हैं. तभी तो 9/11 के बाद कोई चरमपंथी घटना नहीं हुई. ये तो सबके साथ होता है. इसे तूल नहीं देना चाहिए|"
- सलमान ख़ान
भारत देश वर्तमान में वीआइपी संस्कृति का देश है | हम वीआईपी को जांच से मुक्त रखते हैं | वे (बड़े बड़े नौकरशाह , नेता तथा उनके साथ चलने वाले सेवक) विशेष हैं और प्रजा के लिए बनाये गए कानून से मजबूर नहीं हैं | वह नियम और कानून से ऊपर हैं | क़ानून तो बिना पहुँच वालों के लिए है | कोई सिक्योरिटी वाला उनके और उनके साथ चल रहे कुनबे को जांच की दृष्टि नहीं देख सकता, बस एक बार बताने की जरूरत है की हम 'फलां जी के ढिका' हैं | फ़िर किसकी हिम्मत है, की कोई कर्मचारी उन्हें नियम के दायरे में ला सके या लाइन में खड़ा कर सके | चाहे अस्पताल हो या स्कूल, ट्रेन हो या सड़क ट्रैफिक या हवाई अड्डा हर जगह उनके लिए कानून अप्रदत्त अलिखित सुविधाएं हैं | यदि किसी साहसी कर्मचारी ने उन्हें इस तरह के दुरुपयोग से वंचित करने की कोशिश की तो वह ख़ास ख़बर बनती है | जैसे कोई अजूबा हो गया हो | इस बात का सबसे ज्यादा फायदा अपराधी तत्व और आतंकवादी उठाते हैं |
यहाँ किरण बेदी को वरिष्ठता के बावजूद वह पद नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है, क्योंकि वह किसी को क़ानून अप्रदत्त सुविधाएं न देने के लिए बदनाम हैं | यह एक अव्यवहारिक आचरण है | सबको अपनी नौकरी और बाल-बच्चों से प्यार है | वे नियम और क़ानून से ऊपर हैं, इससे हमारे देश की जी हुजूरी संस्कृति का अपमान होता है | वीआईपी मतलब जांच प्रूफ़ | यदि जांच होती भी है तो घोटाले के बाद और घोटाला की जांच 'परिणाम प्रूफ़' होती है | सांसद लोग विदेश भ्रमण के बहने कबूतरबाजी ही कर डालें | यहाँ सब चलता है |
इन सब तुच्छ बातों पर महान देश के महान नागरिक ध्यान नहीं देते | इन मुद्दों की बात करना तक देशप्रेम में कमी के लक्षण हैं | हम अमेरिका और यूरोप से उनकी क़ानून के प्रति प्रतिबद्धता और सम्मान नहीं सीखते | केवल उन्हें गरियाकर खुश होते रहते हैं |
इसके पहले अमेरिका में पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा और अभी हाल ही में 'मिसाइल मैन' और पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम की (प्रोटोकाल का उल्लंघन करते हुए) भारत में ही जाँच हो गई, तो सिर्फ़ ख़बर बनी | कलाम साहब सीधे-सादे वैज्ञानिक तबियत के आदमी | इसे सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा मानकर नजरंदाज कर दिया |
शाहरूख जी ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कहा कि "खान" लगा होने की वजह से उन्हें परेशान किया गया | शिकागो जाते समय उन्हें नेवार्क हवाई अड्डे पर रोका गया और पूछताछ की गई। यह एक गैरजिम्मेदाराना बयान है | घटना को एक विशेष समुदाय से जोड़ने की कोशिश | सहानुभूति हासिल करने के लिए |
"स्टार क्रिकेटर हरभजनसिंह का इस मामले में कुछ और ही मानना है। भज्जी ने कहा कि शाहरुख के साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ है। इस मामले को उन्होंने नियमित प्रक्रिया करार दिया। हरभजन ने कहा कि वे कई बार इन जांच प्रक्रिया से गुजरे हैं, इसमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता।"
"उन्होंने कहा कि वे प्रत्येक की जाँच करते हैं। यहाँ तक कई बार मुझे भी गहन जाँच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह नियमित प्रक्रिया है। हालाँकि एसआरके नामी हस्ती हैं और उनका सम्मान होना चाहिए |"
"किंग खान ने कहा कि इस समय मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं कभी अमेरिकी धरती पर कदम नहीं रखूँ, लेकिन यहाँ मौजूद मेरे लाखों प्रशंसक मुझे यहाँ देखना चाहेंगे, इसलिए मैं यहाँ आता रहूँगा।"
बहुत बढ़िया ! बोलते रहिये |
कुछ नादान लोग कहते हैं कि शाहरुख़ एक फ़िल्म अभिनेता ही हैं न | जांच हो भी गई तो इतनी हाय-हाय क्यों | वहां के अधिकारी तो केवल नियमित जांच ही कर रहे थे | दुःख की बात है कि ज्यादातर ब्लोगर भी शाहरुख़ और सरकार की भावना को नहीं समझ रहे हैं |
मेरे ऑनलाइन मित्र 'सुदाम पाणिग्राही' जो gramaar पर लिखते हैं, को यह समाचार याद दिलाने के लिए धन्यवाद् !
क्रिकेट खिलाड़ी और बोलीवुड खिलाड़ी हिन्दुस्तानी मीडिया के लिए विशेष 'ख़बर तत्व' हैं क्योंकि ये दोनों तत्व भारतीयों के लिए विशेष 'भावुकता तत्व' हैं | इन्हें जनता भगवान की तरह पूजने लगती है | चने के झाड़ की एकदम लास्ट वाली फुन्नी में चढाकर बैठाती है | जिससे झाड़ थोड़ा भी इधर-उधर हिले-डुले तो इनकी हरकतें नजर आयें | किंग खान को गुस्से में ध्यान नहीं रह गया होगा की वे अमेरिका में हैं | बहुत जल्दी में थे | कार्यक्रम के लिए देर हो रही थी | ऐसे में देश प्रेम की भावना तुंरत जागृत हो जाती है | जनता की भी और जनार्दन की भी | फलतः दोनों ही अपमान मोड में चले जाते हैं |
"ऐसा मेरे साथ भी हुआ है। अब तो जिस तरह वे हमारी जाँच करते हैं उसी तरह हमें भी अमरीकियों की जाँच करनी चाहिए."
- अम्बिका सोनी | (मतलब कई अभी तक इज्जत मर्यादा लिए चुप बैठे हैं )
तो आप जांच करवाइए न, किसी भारतीय को कोई आपत्ति नहीं है | यही तो आपकी मजबूरी है कि आप इतनी कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकते | आप अक्षरधाम और संसद पर हमलों के बाद भी 26/11 झेलने के लिए तैयार रहते हैं | लेकिन धृष्ट अमेरिका दूध के जले की तरह छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है | क्योंकि उसके सामने दो ही विकल्प हैं या तो आतंकी हमले का खतरा ले या कड़ी जांच करे | वह भारत देश से कोई सबक नहीं लेना चाहता | वो कहता है कि हम 19/11 को दुहराना नहीं चाहते | कौन समझाए, समझता ही नहीं |
शाहरुख़ के बोलीवुड दोस्त (?) सल्लू मियां इसकी पुष्टि करते हैं |
"अमरीका में जाँच के कड़े प्रावधान हैं. तभी तो 9/11 के बाद कोई चरमपंथी घटना नहीं हुई. ये तो सबके साथ होता है. इसे तूल नहीं देना चाहिए|"
- सलमान ख़ान
भारत देश वर्तमान में वीआइपी संस्कृति का देश है | हम वीआईपी को जांच से मुक्त रखते हैं | वे (बड़े बड़े नौकरशाह , नेता तथा उनके साथ चलने वाले सेवक) विशेष हैं और प्रजा के लिए बनाये गए कानून से मजबूर नहीं हैं | वह नियम और कानून से ऊपर हैं | क़ानून तो बिना पहुँच वालों के लिए है | कोई सिक्योरिटी वाला उनके और उनके साथ चल रहे कुनबे को जांच की दृष्टि नहीं देख सकता, बस एक बार बताने की जरूरत है की हम 'फलां जी के ढिका' हैं | फ़िर किसकी हिम्मत है, की कोई कर्मचारी उन्हें नियम के दायरे में ला सके या लाइन में खड़ा कर सके | चाहे अस्पताल हो या स्कूल, ट्रेन हो या सड़क ट्रैफिक या हवाई अड्डा हर जगह उनके लिए कानून अप्रदत्त अलिखित सुविधाएं हैं | यदि किसी साहसी कर्मचारी ने उन्हें इस तरह के दुरुपयोग से वंचित करने की कोशिश की तो वह ख़ास ख़बर बनती है | जैसे कोई अजूबा हो गया हो | इस बात का सबसे ज्यादा फायदा अपराधी तत्व और आतंकवादी उठाते हैं |
यहाँ किरण बेदी को वरिष्ठता के बावजूद वह पद नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है, क्योंकि वह किसी को क़ानून अप्रदत्त सुविधाएं न देने के लिए बदनाम हैं | यह एक अव्यवहारिक आचरण है | सबको अपनी नौकरी और बाल-बच्चों से प्यार है | वे नियम और क़ानून से ऊपर हैं, इससे हमारे देश की जी हुजूरी संस्कृति का अपमान होता है | वीआईपी मतलब जांच प्रूफ़ | यदि जांच होती भी है तो घोटाले के बाद और घोटाला की जांच 'परिणाम प्रूफ़' होती है | सांसद लोग विदेश भ्रमण के बहने कबूतरबाजी ही कर डालें | यहाँ सब चलता है |
इन सब तुच्छ बातों पर महान देश के महान नागरिक ध्यान नहीं देते | इन मुद्दों की बात करना तक देशप्रेम में कमी के लक्षण हैं | हम अमेरिका और यूरोप से उनकी क़ानून के प्रति प्रतिबद्धता और सम्मान नहीं सीखते | केवल उन्हें गरियाकर खुश होते रहते हैं |
इसके पहले अमेरिका में पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा और अभी हाल ही में 'मिसाइल मैन' और पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम की (प्रोटोकाल का उल्लंघन करते हुए) भारत में ही जाँच हो गई, तो सिर्फ़ ख़बर बनी | कलाम साहब सीधे-सादे वैज्ञानिक तबियत के आदमी | इसे सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा मानकर नजरंदाज कर दिया |
शाहरूख जी ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कहा कि "खान" लगा होने की वजह से उन्हें परेशान किया गया | शिकागो जाते समय उन्हें नेवार्क हवाई अड्डे पर रोका गया और पूछताछ की गई। यह एक गैरजिम्मेदाराना बयान है | घटना को एक विशेष समुदाय से जोड़ने की कोशिश | सहानुभूति हासिल करने के लिए |
"स्टार क्रिकेटर हरभजनसिंह का इस मामले में कुछ और ही मानना है। भज्जी ने कहा कि शाहरुख के साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ है। इस मामले को उन्होंने नियमित प्रक्रिया करार दिया। हरभजन ने कहा कि वे कई बार इन जांच प्रक्रिया से गुजरे हैं, इसमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता।"
"उन्होंने कहा कि वे प्रत्येक की जाँच करते हैं। यहाँ तक कई बार मुझे भी गहन जाँच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह नियमित प्रक्रिया है। हालाँकि एसआरके नामी हस्ती हैं और उनका सम्मान होना चाहिए |"
"किंग खान ने कहा कि इस समय मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं कभी अमेरिकी धरती पर कदम नहीं रखूँ, लेकिन यहाँ मौजूद मेरे लाखों प्रशंसक मुझे यहाँ देखना चाहेंगे, इसलिए मैं यहाँ आता रहूँगा।"
बहुत बढ़िया ! बोलते रहिये |
कुछ नादान लोग कहते हैं कि शाहरुख़ एक फ़िल्म अभिनेता ही हैं न | जांच हो भी गई तो इतनी हाय-हाय क्यों | वहां के अधिकारी तो केवल नियमित जांच ही कर रहे थे | दुःख की बात है कि ज्यादातर ब्लोगर भी शाहरुख़ और सरकार की भावना को नहीं समझ रहे हैं |
मेरे ऑनलाइन मित्र 'सुदाम पाणिग्राही' जो gramaar पर लिखते हैं, को यह समाचार याद दिलाने के लिए धन्यवाद् !
June 22, 2009
इन्फ़्लुएन्जा H1N1 वाइरस की जांच : इस तरह भी होती है |
"क्या आपको जुकाम, बुखार या खांसी है?" "नहीं"
"ठीक है आप जा सकते हैं"
कुल मिलाकर यही लब्बोलुआब था स्वाइन फ़्लू के परीक्षण का | अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर, अमेरिका से आये हुए विमान यात्रियों का ।
मैं एक गांव के बहुत सम्मानीय झोला छाप डाक्टर को जानता हूं । उनके इलाज का तरीका बहुत ही लोकतांत्रिक है । पहले वो मरीज से पूछते हैं - "सुई लगा दूं?" यदि मरीज कहता है कि लगा दीजिये, तो पूछते हैं कि एक लगाऊं या दोनों लगा दूं । इसके बाद मरीज की सहमति से सुई लगा देते हैं । दो सुई उनका ब्रह्मास्त्र है। इसके बाद भी ठीक नहीं हुए तो सीधे जिला अस्पताल में भर्ती हो जाइये । उन्होंने डाक्टरी कैसे सीखी यह एक रहस्य है |
ऐसी परिस्थिति में जब देश में स्वाइन फ़्लू के अब तक 50 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 5 मामले भारत में ही (Human to Human) संक्रमण के हैं । इसलिये यह कोई मजाक का वक्त नहीं है । हम मजाक कर भी नहीं रहे । यदि ऐसा कुछ लगता है तो इसकी जिम्मेवारी चाहे जिसकी हो हमारी नहीं है । हम तो केवल सच्चाई बयान कर रहे हैं ।
यद्यपि यह कोई खबरी ब्लॉग नहीं है क्योंकि हम ना कोई खबर देते हैं ना ही किसी की खबर लेते हैं । फ़िर भी खास खबर है (२० जून को टाइम्स ओफ़ इन्डिया के पेज 4 पर छपी खबर के अनुसार) कि सरदार पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा अमेरिका से आने वाले विमान यात्रियों के "स्वाइन फ़्लू" के परीक्षण का विवरण कुछ इस प्रकार है ।
हेमाली पटेल (नाम परिवर्तित) ने जो कि एक छात्रा हैं, ने बताया कि अमेरिका से दो अंतर्राष्ट्रीय विमान के बहुत ही कम समयांतराल में एक के बाद एक पहुंच गये । इसकी वजह से वहां पूरी तरह अफ़रा-तफ़री मची हुई थी । इस भऊसे के माहौल में उन्हें दो तरह के फ़ॉर्म भरने को दिये गये । एक इमाइग्रेशॅन फ़ॉर्म और दूसरा मेडिकल फ़ॉर्म । मेडिकल फ़ॉर्म में व्यक्तिगत विवरण के अलावा अपना चिकित्सकीय इतिहास भी लिखना था ।
स्वास्थ्य और कल्याण विभाग के अधिकारियॊं ने उनसे पिछले एक वर्ष के दौरान यात्रा किये गये स्थानों के नाम पूछे । और यह भी कि क्या वे खाँसी, बुखार या जुकाम से पीडित थे या नहीं । हेमाली ने बताया कि मैनें नकारात्मक उत्तर दिया और अधिकारियों ने मुझे तुरन्त ही जाने की अनुमति दे दी ।
जिस स्थान पर विमान यात्रियों को जांच के लिये रोका गया था, वह जगह 300 यात्रियों के लिये बहुत ही छोटी थी ।
पेशे से डॉक्टर एक विमान यात्री ने बताया कि सबसे अच्छी व्यवस्था दुबई एअरपोर्ट पर थी जहां थेर्मोस्कैनिंग की सुविधा उपलब्ध थी । विमान यात्री डॉक्टर ने बताया,
यह पता चलने पर कि मैं पेशे से डॉक्टर हूं, चिकित्सकदलने मेरे परिवार की जांच करने का भी कष्ट भी नहीं उठाया ।
इसके अलावा हवाई अड्डॆ के अधिकारियों ने बताया कि मॉस्क केवल चिकित्सा दल को उपलब्ध कराया गया था । हवाई स्टॉफ़ बिना मॉस्क के ही काम कर रहा था । कुछ दिन पहले एअर पोर्ट के स्टॉफ़ को मॉस्क पहनने के निर्देश दिये गये थे, लेकिन कोई भी इसका पालन करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था ।
सन 1918-19 में स्पैनिश फ़्लू महामारी से लगभग 40 लाख लोगों की मौत हुई थी । यह वाइरस बार-बार अपना जीन बदलने के लिये बदनाम है । चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ’एन्टिजेनिक शिफ्ट’ कहते हैं | यह मार्च के महीने में शुरू हुई थी और साल के अन्त में इसकी दूसरी घातक लहर आई थी । विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी एक बार हमला करने के बाद जब दुबारा लौटकर आती है तो इसका प्रभाव ज्यादा घातक होता है ।
यह सिर्फ़ एक उदाहरण था कि भारत जैसे विकासशील देश कैसे महामारियों के सोफ़्ट टारगेट होते हैं । ऐसे देशों की चिकित्सा या सुरक्षा प्रणाली कुछ इस तरह की होती है कि जब चीजें नियन्त्रण से बाहर होने लगती है तभी जागते हैं । अभी फ़िलहाल धन्यवाद केवल गरमी को दिया जा सकता है जिसकी वजह से वाइरस H1N1 ने भयावह रूप अभी तक नहीं लिया है, क्योंकि ठण्ड जलवायु इसके लिए ज्यादा अनुकूल होती है | लेकिन इस तरह से ज्यादा दिन तक नहीं बचा जा सकता क्योंकि मानसून आने वाला है और उसके बाद ठंडी का मौसम भी ।
प्रकृति सरकारी तन्त्र को चेतावनी देकर तैयारी का काफ़ी समय दे चुकी है । अब यह सरकार के ऊपर है कि वह बीमारी को फैलाने से रोकने के लिए अपने तंत्र का कितना उपयोग कर पाती है |
नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह हाल सिर्फ़ अहमदाबाद एअरपोर्ट का ही नहीं है ,बल्कि देश भर में हवाई अड्डों में जांच की लगभग यही स्थिति है ।
यह घटना सिर्फ़ एक उदाहरण भर है | बाकी हम उम्मीद करते हैं की जांच की स्थिति अब पहले से बेहतर हुई होगी |
"ठीक है आप जा सकते हैं"
कुल मिलाकर यही लब्बोलुआब था स्वाइन फ़्लू के परीक्षण का | अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर, अमेरिका से आये हुए विमान यात्रियों का ।
मैं एक गांव के बहुत सम्मानीय झोला छाप डाक्टर को जानता हूं । उनके इलाज का तरीका बहुत ही लोकतांत्रिक है । पहले वो मरीज से पूछते हैं - "सुई लगा दूं?" यदि मरीज कहता है कि लगा दीजिये, तो पूछते हैं कि एक लगाऊं या दोनों लगा दूं । इसके बाद मरीज की सहमति से सुई लगा देते हैं । दो सुई उनका ब्रह्मास्त्र है। इसके बाद भी ठीक नहीं हुए तो सीधे जिला अस्पताल में भर्ती हो जाइये । उन्होंने डाक्टरी कैसे सीखी यह एक रहस्य है |
ऐसी परिस्थिति में जब देश में स्वाइन फ़्लू के अब तक 50 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 5 मामले भारत में ही (Human to Human) संक्रमण के हैं । इसलिये यह कोई मजाक का वक्त नहीं है । हम मजाक कर भी नहीं रहे । यदि ऐसा कुछ लगता है तो इसकी जिम्मेवारी चाहे जिसकी हो हमारी नहीं है । हम तो केवल सच्चाई बयान कर रहे हैं ।

यद्यपि यह कोई खबरी ब्लॉग नहीं है क्योंकि हम ना कोई खबर देते हैं ना ही किसी की खबर लेते हैं । फ़िर भी खास खबर है (२० जून को टाइम्स ओफ़ इन्डिया के पेज 4 पर छपी खबर के अनुसार) कि सरदार पटेल अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा अमेरिका से आने वाले विमान यात्रियों के "स्वाइन फ़्लू" के परीक्षण का विवरण कुछ इस प्रकार है ।
हेमाली पटेल (नाम परिवर्तित) ने जो कि एक छात्रा हैं, ने बताया कि अमेरिका से दो अंतर्राष्ट्रीय विमान के बहुत ही कम समयांतराल में एक के बाद एक पहुंच गये । इसकी वजह से वहां पूरी तरह अफ़रा-तफ़री मची हुई थी । इस भऊसे के माहौल में उन्हें दो तरह के फ़ॉर्म भरने को दिये गये । एक इमाइग्रेशॅन फ़ॉर्म और दूसरा मेडिकल फ़ॉर्म । मेडिकल फ़ॉर्म में व्यक्तिगत विवरण के अलावा अपना चिकित्सकीय इतिहास भी लिखना था ।
स्वास्थ्य और कल्याण विभाग के अधिकारियॊं ने उनसे पिछले एक वर्ष के दौरान यात्रा किये गये स्थानों के नाम पूछे । और यह भी कि क्या वे खाँसी, बुखार या जुकाम से पीडित थे या नहीं । हेमाली ने बताया कि मैनें नकारात्मक उत्तर दिया और अधिकारियों ने मुझे तुरन्त ही जाने की अनुमति दे दी ।
जिस स्थान पर विमान यात्रियों को जांच के लिये रोका गया था, वह जगह 300 यात्रियों के लिये बहुत ही छोटी थी ।
पेशे से डॉक्टर एक विमान यात्री ने बताया कि सबसे अच्छी व्यवस्था दुबई एअरपोर्ट पर थी जहां थेर्मोस्कैनिंग की सुविधा उपलब्ध थी । विमान यात्री डॉक्टर ने बताया,
यह पता चलने पर कि मैं पेशे से डॉक्टर हूं, चिकित्सकदलने मेरे परिवार की जांच करने का भी कष्ट भी नहीं उठाया ।इसके अलावा हवाई अड्डॆ के अधिकारियों ने बताया कि मॉस्क केवल चिकित्सा दल को उपलब्ध कराया गया था । हवाई स्टॉफ़ बिना मॉस्क के ही काम कर रहा था । कुछ दिन पहले एअर पोर्ट के स्टॉफ़ को मॉस्क पहनने के निर्देश दिये गये थे, लेकिन कोई भी इसका पालन करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था ।
सन 1918-19 में स्पैनिश फ़्लू महामारी से लगभग 40 लाख लोगों की मौत हुई थी । यह वाइरस बार-बार अपना जीन बदलने के लिये बदनाम है । चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ’एन्टिजेनिक शिफ्ट’ कहते हैं | यह मार्च के महीने में शुरू हुई थी और साल के अन्त में इसकी दूसरी घातक लहर आई थी । विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी एक बार हमला करने के बाद जब दुबारा लौटकर आती है तो इसका प्रभाव ज्यादा घातक होता है ।
यह सिर्फ़ एक उदाहरण था कि भारत जैसे विकासशील देश कैसे महामारियों के सोफ़्ट टारगेट होते हैं । ऐसे देशों की चिकित्सा या सुरक्षा प्रणाली कुछ इस तरह की होती है कि जब चीजें नियन्त्रण से बाहर होने लगती है तभी जागते हैं । अभी फ़िलहाल धन्यवाद केवल गरमी को दिया जा सकता है जिसकी वजह से वाइरस H1N1 ने भयावह रूप अभी तक नहीं लिया है, क्योंकि ठण्ड जलवायु इसके लिए ज्यादा अनुकूल होती है | लेकिन इस तरह से ज्यादा दिन तक नहीं बचा जा सकता क्योंकि मानसून आने वाला है और उसके बाद ठंडी का मौसम भी ।

प्रकृति सरकारी तन्त्र को चेतावनी देकर तैयारी का काफ़ी समय दे चुकी है । अब यह सरकार के ऊपर है कि वह बीमारी को फैलाने से रोकने के लिए अपने तंत्र का कितना उपयोग कर पाती है |
नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह हाल सिर्फ़ अहमदाबाद एअरपोर्ट का ही नहीं है ,बल्कि देश भर में हवाई अड्डों में जांच की लगभग यही स्थिति है ।
यह घटना सिर्फ़ एक उदाहरण भर है | बाकी हम उम्मीद करते हैं की जांच की स्थिति अब पहले से बेहतर हुई होगी |
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