जबसे दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा का 2011 से वैकल्पिक होने की ख़बर आयी है नौवीं कक्षा के छात्र बहुत खुश नजर आ रहे हैं | अगले शिक्षा सत्र से हाई स्कूल की परीक्षा वैकल्पिक हो जायेगी । यह निर्णय शिक्षा नीति में किये जाने वाले एक बडे परिवर्तन की दिश में पहला कदम है ।इस तरह छात्र-छात्राओं और अभिभावकों को एक बार ही बोर्ड परीक्षा के तनाव से गुजरना पडेगा । इस नियम से सबसे अधिक खुशी हुई छात्र/छात्रों को और राहत उनके अभिभावकों को मिली । 10 वीं बोर्ड परीक्षा के नाम से साल भर पहले से चलने वाले कोचिंग क्लासेस बन्द हो जायेंगे, जो बोर्ड परीक्षा की तैयारी की एक मोटी फ़ीस वसूलते थे । कहीं-कहीं एक ही बार में पूरे साल भर की फ़ीस वसूल कर ली जाती है और कहीं यह दो या तीन किश्तों में ली जाती है ।
इस निर्णय से नुकसान यह हो सकता है कि छात्र उतनी गम्भीरता से पढाई नहीं करेंगे जितनी कि वे बोर्ड परीक्षा होने पर करते थे ।

अब प्रश्न उठता है कि छात्रों द्वारा 11 वीं कक्षा विषय के चुनाव किस आधार पर किये जायेंगे । अभी तक दसवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर छात्र विषयों का चुनाव करते हैं । सबसे अच्छे अंक प्राप्त करने वाले छात्र गणित, विज्ञान, कामर्स जैसे विषय लेकर आगे बढते हैं । स्थान कम होने पर अंकों के आधार पर प्रावीण्यता सूची भी बनाई जाती है ।
लेकिन दसवीं बोर्ड की परीक्षा समाप्त होने पर अगली में विषय चयन का आधार क्या होगा ? क्या हमारे देश में इतनी पर्याप्त संख्या में विद्यालय और उनमें रिक्तियां हैं कि हर छात्र को बिना छंटनी प्रक्रिया से गुजरे उसका मनचाहा विषय पढने को मिल सके । या फ़िर यह निर्णय उस योजना का पहल कदम है जिसमें 11 वीं कक्षा के विषय चयन में गणित और जीवविग्यान को साथ-साथ अनिवार्य करने की योजना है । विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के लिये उच्च गणित और जीवविज्ञान अनिवार्य कर दिया जायेगा । रसायन और भौतिकी तो दोनों के साथ अभी भी है ही ।
क्या बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक न ला पाना वास्तविक समस्या है ? नहीं वास्तविक समस्या उच्च में प्रवेश के लिये पर्याप्त स्थान न होने की है । इस गला काट प्रतियोगिता में दशमलव के बाद के कुछ अंक चयन के परिणाम को निर्धारित करते हैं । अच्छे अंक क्यों चाहिये ? जाहिर है अपना मनचाहा विषय लेकर आगे की कक्षा में प्रवेश के लिये । लेकिन क्या बोर्ड की परीक्षा को समाप्त कर देने से इस समस्या का हल हो जायेगा ।
सबसे बडी जरूरत उच्च शिक्षा में और अधिक स्तरीय संस्थान स्थापित किये जाने की है । जिनकी कमी की वजह से यहां प्रवेश न पा सकने वाले छात्रों की बडी संख्या अमेरिका, आस्ट्रेलिआ और रसिया भागती है या फ़िर पत्राचार पाठ्यक्रम से काम चलाती है । यह भी प्रतिभा पलायन का एक कारण है ।
तो जब तक छात्र/छात्राओं की संख्या के अनुपात में पर्याप्त सीटें नहीं होंगीं परीक्षा का हौवा तो बना ही रहेगा । मूल्यांकन चाहे ग्रेड के आधार पर हो या प्रतिशत के आधार पर ।
इसीलिये कहा जाता है कि भारतीय युवा वर्ग डाक्टर, इन्जीनिअर, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक इत्यादि बनने के लिये मजबूर होता है । बहुत कम ऐसे लोग होंगे जिन्होंने प्राप्त अंकों के दबाव से स्वतन्त्र अपना कैरियर चुना होगा । जाहिर है ऐसे में जिसे जो होना चाहिये वह नहीं हो पाता । और कैरियर का मतलब रोजी-रोटी हो जाता है न कि वह कार्य जो हम अपनी पसन्द से करना चाहते हैं ।
हमारे शिक्षाविदों के लिये यह एक चुनौती भरा कार्य है कि अब वह ऐसी शिक्षाप्रणाली विकसित करें की दिशा में कार्य करे जो एक छात्र/छात्रा को उनकी पसन्द को विकसित कर उसी को अपना कैरियर बनाने के लिए तैयार कर सके |
अन्ततः शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के अन्दर छिपी श्रेष्ठतम प्रतिभा को उभारना ही है । यह स्वयम की खोज है ।
मैने यहां कुछ बातें लिखीं हैं । कृपया इस विषय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करें जिससे यह समझने में सहयोग मिल सके कि अधिकांश मित्र इस बारे में किस तरह के विचार रखते हैं । यदि आपकी टिप्पणी के माध्यम से पर्याप्त सहयोग मिला तो अगली पोस्ट नाम सहित उन सारे विचारों को एक साथ रखा जायेगा ।
धन्यवाद !