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November 17, 2009

बात सच है, पर चलन में है नहीं

बात सच है, पर चलन में है नहीं
आपकी बातें सहन में हैं नहीं

बात कैसे बोल दी तुमने यहॉं
बात जो अपने जेहन में है नहीं

बात करते ही रहो हर बात पर
आपात तो अपने वतन में है नहीं

बात हमसे ऑंकडों की न करो
एक भी संख्‍या फलन में है नहीं

बात पूछेगी तुम्‍ही से जान लो
ऐसे कैसे तन, वतन में है नही

बात करने के लिए ही बोलते हैं
ज्ञान की इच्‍छा जतन में है नहीं

अब कहॉं ले जाओगे बरसात में
एक भी गागर तपन में है नहीं

बात उनकी जब सुने ऐसा लगा
बात ऐसी सब मुखन में है नहीं

बोलते हैं सभी खुल जाने पर
नाम सबका बतकहन में है नहीं

मिल गए हो आज खुलकर बात कर लो
है बात में जीवन, मरण में है नहीं

गड्ढे खोदोगे तुम्ही पहले गिरोगे
कोई नागा इस नियम में है नहीं


दिल में अपने एक सागर
तुम बसा लो
फासला धरती गगन में है नहीं