मास्टर हों त दुई जन खांय |लडिका हों ननिअऊरे जांय |
इ कोई सरकारी आदेश नहीं है जो शिक्षक दिवस पर लागू किया जानेवाला है | ये तो हमने 20-25 साल पहले अपने बड़ों को कहते सुना था | यह दीगर है कि मतलब हमें बहुत बाद में समझ में आया | वैसे ही जैसे स्कूल में घोटी हुई कई बातें बहुत बाद में किन्हीं-किन्ही मौकों पर समझ में आती रहीं | मतलब से हमें क्या मतलब | हम तो चार बड़े आदमी को जो कहते सुन लिए, उसी को आगे बढाते रहते हैं |
पर इतना जरूर है कि इन पंक्तियों के कहे जाने से अब तक मास्टरों ने लाखों दिन में करोड़ों पीरिअड ले डाले होंगे | और उनकी आय दो जन को खिला पाने वाले वेतन से छठवें वेतन आयोग तक पहुँच गयी हैं | तो क्या ये पंक्तियाँ तिथिबाह्या (outdated) हो चुकी हैं | पता नहीं |
पर इतना तय है कि राज्य सरकारों द्वारा अनुबंध पर रखे गए संविदा शिक्षको , शिक्षा कर्मियों , निजी विद्यालयों में पढाने वाले शिक्षकों और केन्द्रीय-नवोदय तथा राज्य सरकार के नियमित वेतन पाने वाले शिक्षकों की तुलना की जाय तो फर्क सीधे-सीधे इंडिया और भारत का दिखाई पङता है | एक तरफ़ मोटी पगार पाने वाले नियमित शिक्षक हैं तो उन्ही के सात तीन हजार पाने वाले उनके सहकर्मी भी | एक तरफ़ पूंजीपति निजी स्कूल के मालिकान हैं तो कभी-कभी दैनिक मजदूरी से भी कम पर काम कराने वाले उनके टीचर |
"शिक्षक राष्ट्र का निर्माता है" |
अपने स्कूली दिनों में इस विषय पर सभी ने लेख लिखें होंगे और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं में पक्ष या विपक्ष में बोला होगा | अरे बोला नहीं तो सुना तो होगा ही | हम भी कहते हैं कि निर्माता है | लेकिन भी निर्माता भी कई तरह के होते हैं | इ शिक्षक निर्माता काहे हुआ निर्देशक नहीं हो सकता था ? खैर निर्माता हो चाहे निर्देशक हमें तो फिलिम देखने से मतलब है | टिकिट लिए हैं तो पैसा तो वसूल ही करना हैं | चाहे ससुर पिक्चर कितनी ही बोरिंग क्यों न हो |
गाँव के प्राथमिक विद्यालय में एक निरीक्षक महोदय पहुंचे | उन्होंने बच्चों से प्रश्न किया -"नर्मदा नदी कहाँ से निकलती हैं ? तो बच्चों ने बताया की इलाहाबाद से | निरीक्षक गरम हो गया मास्टर के ऊपर | बोला तुम यही पढाते हो ? ये बच्चे लोगों को क्या गलत-सलत सिखाते हो | नर्मदा को इलाहबाद से निकालते हो ? मास्टर साहब बोले ऐसा है साहब की तोहरे इ पन्द्रह सौ रुपित्ती में नर्मदा अमरकंटक से न निकलिहैं | तो मतलब मास्टरी तबका में भी सामाजवाद लाने के जरूरत है | नहीं तो पता नहीं कौन निर्माता कहाँ से क्या निकलवा दे |
कहते हैं कि पहले जब पेन कापी नहीं था, तब भी भारत देश में शिक्षा का बड़ा जोर था | अब इस बड़े जोर समूह में कितने लोग पढ़ते थे | ये बात मत उठाइएगा नहीं झगडा हो जाएगा | बस ये समझ लीजिये की अपना देश पहले से ही 'गुरु' था | वो भी कोई आऊं-बाऊं नहीं विश्व गुरु | ये सब हमें अपने गुरूजी लोगों से पता चला था | हमारे गुरूजी को उनके गुरूजी से और उनके गुरूजी को उनके गुरूजी से | इस तरह चढ़ते चढ़ते हम वैदिक काल तक पहुँच जायेंगे |
बस वही आगे बढ़ा रहे हैं | इस तरह सदियों से ज्ञान रट्टा पद्धति के द्वारा हमारे देश में एक गुरु से दूसरे गुरु तक सफर करता रहा | जस का तस | स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि ज्यों का त्यों घोट लेते थे | जरा भी इधर उधर हुआ कि अयोग्य घोषित | एकदम से फेल हो गए | पूरक का कौनो नियम नहीं था | जो भी नतीजे या भतीजे निकालें वो सब पिछलों से मेल खाने चाहिए वरना शास्त्र द्रोही |
नुकसान ये हुआ कि पूरी शिक्षा पद्धति में रट्टा घुस गया | और सारी गुरुई के बावजूद ज्ञान माने सूचना हो गया | स्थिति को मद्देनजर रखते हुए देश के महारथियों ने मैकाले को गरियाने के साथ-साथ पचास साल में कई कमीशन बिठा डाले | लेकिन रट्टा हर जगह घुसा रहा और शिक्षाविदों के अचेतन में मैकाले भी |
नतीजा विद्यार्थियों के पीठ के ऊपर किताबों का बोझ बढ़ता रहा | सब कुछ लाद कर चलना है | पीछे का ज्ञान भी और अभी का ज्ञान भी | 8-10 किलो का बस्ता लादकर चलते हैं | इतना वजन तो हमारे समय में भी नही लादा जाता था | लगता है कि कुली गिरी की अभी से प्रैक्टिस करवाई जा रही है | अब बस्ता 10 किलो है, तो बस्ता फेंक कर सीधे टूशन के तरफ़ तो भागना ही पड़ेगा | पहले के बच्चे स्कूल के बाद खेल के मैदान में ही दिखाते थे | वो बात अलग है कि ओलुम्पिक में पदक नहीं ला पाये |
यदि आपको रट्टा प्रतिपादक विचार जरा ओवर लग रहा हो तो बताइए कि यह क्यों कहा जाता है कि "रट्टाफिकेशन इस दा बेस्ट प्रिपरेशन फॉर दा एक्सामिनेशन" |
बस वही आगे बढ़ा रहे हैं | इस तरह सदियों से ज्ञान रट्टा पद्धति के द्वारा हमारे देश में एक गुरु से दूसरे गुरु तक सफर करता रहा | जस का तस | स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि ज्यों का त्यों घोट लेते थे | जरा भी इधर उधर हुआ कि अयोग्य घोषित | एकदम से फेल हो गए | पूरक का कौनो नियम नहीं था | जो भी नतीजे या भतीजे निकालें वो सब पिछलों से मेल खाने चाहिए वरना शास्त्र द्रोही |
नुकसान ये हुआ कि पूरी शिक्षा पद्धति में रट्टा घुस गया | और सारी गुरुई के बावजूद ज्ञान माने सूचना हो गया | स्थिति को मद्देनजर रखते हुए देश के महारथियों ने मैकाले को गरियाने के साथ-साथ पचास साल में कई कमीशन बिठा डाले | लेकिन रट्टा हर जगह घुसा रहा और शिक्षाविदों के अचेतन में मैकाले भी |
नतीजा विद्यार्थियों के पीठ के ऊपर किताबों का बोझ बढ़ता रहा | सब कुछ लाद कर चलना है | पीछे का ज्ञान भी और अभी का ज्ञान भी | 8-10 किलो का बस्ता लादकर चलते हैं | इतना वजन तो हमारे समय में भी नही लादा जाता था | लगता है कि कुली गिरी की अभी से प्रैक्टिस करवाई जा रही है | अब बस्ता 10 किलो है, तो बस्ता फेंक कर सीधे टूशन के तरफ़ तो भागना ही पड़ेगा | पहले के बच्चे स्कूल के बाद खेल के मैदान में ही दिखाते थे | वो बात अलग है कि ओलुम्पिक में पदक नहीं ला पाये |
यदि आपको रट्टा प्रतिपादक विचार जरा ओवर लग रहा हो तो बताइए कि यह क्यों कहा जाता है कि "रट्टाफिकेशन इस दा बेस्ट प्रिपरेशन फॉर दा एक्सामिनेशन" |
मास्टर भी क्या करें !
विद्यावार्धिनी की कृपा के महत्व से कौन परचित नहीं है | बिना गुरु की छडी प्रसाद से विद्या लाभ नहीं होता | मास्टर जी को भी ऐसे ही हुआ था | ऐसे ही बच्चों को भी करवाएंगे | इस मुगालते में मत रहिएगा कि हम पुराणी बात कर रहे हैं | आज भी ऐसी घटनाओं से अखबार खाली नहीं हैं कि फलां मास्टर/मास्टरनी ने किसी शिष्य/शिष्या प्रसाद को इतना गुरु प्रसाद दे दिया कि वह अचेत हो गया या उसका अंग-भंग हो गया | बहुत से पुराने लोग इस कृपा प्रसाद को नबर्दाश्त कर पाने के कारण अनपढ़ रह गये थे |
कई शिक्षक इसलिए दुखी अवस्था में पाये जाते हैं कि अब विद्यार्थी शिक्षकों का उतना सम्मान नहीं करते | वजह वही कि एक परम्परापूजक शिक्षक अपने को शिक्षक नहीं गुरु समझता है | गुरुडम |
शिक्षक समझता है कि वह विद्यार्थियों को सिखाने के लिए तैनात किया गया है | उस पर श्रद्धा भाव रखा जाय |
"श्रद्धावान लभते ज्ञानं|"
विद्यावार्धिनी की कृपा के महत्व से कौन परचित नहीं है | बिना गुरु की छडी प्रसाद से विद्या लाभ नहीं होता | मास्टर जी को भी ऐसे ही हुआ था | ऐसे ही बच्चों को भी करवाएंगे | इस मुगालते में मत रहिएगा कि हम पुराणी बात कर रहे हैं | आज भी ऐसी घटनाओं से अखबार खाली नहीं हैं कि फलां मास्टर/मास्टरनी ने किसी शिष्य/शिष्या प्रसाद को इतना गुरु प्रसाद दे दिया कि वह अचेत हो गया या उसका अंग-भंग हो गया | बहुत से पुराने लोग इस कृपा प्रसाद को नबर्दाश्त कर पाने के कारण अनपढ़ रह गये थे |
कई शिक्षक इसलिए दुखी अवस्था में पाये जाते हैं कि अब विद्यार्थी शिक्षकों का उतना सम्मान नहीं करते | वजह वही कि एक परम्परापूजक शिक्षक अपने को शिक्षक नहीं गुरु समझता है | गुरुडम |
शिक्षक समझता है कि वह विद्यार्थियों को सिखाने के लिए तैनात किया गया है | उस पर श्रद्धा भाव रखा जाय |
"श्रद्धावान लभते ज्ञानं|"
जब तक शिक्षक को यह बोध नहीं होगा कि उसका काम "कुछ सिखाना नहीं बल्कि सीखने की 'प्रक्रिया' में मददगार बनना है" तब तक उसका दुःख कम होने वाला नहीं है |
जैसे सुकरात कहता था कि मेरा काम धाय(दाई) का है | जैसे दाई बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया में सिर्फ़ मददगार होती है | वह बच्चे को उत्पन्न नहीं करती | ठीक उसी तरह शिक्षक को भी बच्चे कि प्रतिभा को उभारना होता है जो कि उसके अन्दर पहले से ही छुपी हुई होती है | कितने शिक्षक इस बात को ध्यान में रखकर शिक्षा कर्म करते हैं |
यह आज के समय की विकट मांग है कि हमारे देश की शिक्षा कि पूरी प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है | यह एक शुभ संकेत है कि इस दिशा में कुछ साहसिक कदम उठाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं | और हम अपने वर्तमान मानवा संसाधन विकास मंत्री से कुछ सकारात्मक सुधारों कि आशा रखते हैं |
जैसे सुकरात कहता था कि मेरा काम धाय(दाई) का है | जैसे दाई बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया में सिर्फ़ मददगार होती है | वह बच्चे को उत्पन्न नहीं करती | ठीक उसी तरह शिक्षक को भी बच्चे कि प्रतिभा को उभारना होता है जो कि उसके अन्दर पहले से ही छुपी हुई होती है | कितने शिक्षक इस बात को ध्यान में रखकर शिक्षा कर्म करते हैं |
यह आज के समय की विकट मांग है कि हमारे देश की शिक्षा कि पूरी प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है | यह एक शुभ संकेत है कि इस दिशा में कुछ साहसिक कदम उठाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं | और हम अपने वर्तमान मानवा संसाधन विकास मंत्री से कुछ सकारात्मक सुधारों कि आशा रखते हैं |
लिखने के लिए अभी हमारे दिमाग में बहुत चीजें कुलबुला रहीं हैं | लेकिन अभी हम स्वामी विवेकानंद की एक बात से बात ख़त्म करते हैं | विवेकानंद ने अपने किसी व्याख्यान में फटकारते हुए कहा था -
"तुम क्या समझते हो ?
पश्चिम की गरिमा उनके कपडों और फैशन में है ? उनकी गगनचुम्बी इमारतों और आलिशान जीवन शैली में है ?
नहीं
"पश्चिम (अमेरिका भी) का प्राण उसके विश्वविद्यालयों में है | अमेरिका के चंद विशवविद्यालय उसकी आत्मा हैं | उसकी शक्ति हैं | जहाँ रोज विज्ञान जन्म लेता है | रोज इस दुनिया के रहस्यों से परदा उठाने वाले शोधों के परिणाम आते हैं |" अमेरिका के चार विश्वविद्यालय नष्ट कर दो अमेरिका पंगु हो जाएगा |
ये विवेकानंद के उद्गार हैं |
नहीं
"पश्चिम (अमेरिका भी) का प्राण उसके विश्वविद्यालयों में है | अमेरिका के चंद विशवविद्यालय उसकी आत्मा हैं | उसकी शक्ति हैं | जहाँ रोज विज्ञान जन्म लेता है | रोज इस दुनिया के रहस्यों से परदा उठाने वाले शोधों के परिणाम आते हैं |" अमेरिका के चार विश्वविद्यालय नष्ट कर दो अमेरिका पंगु हो जाएगा |
ये विवेकानंद के उद्गार हैं |
लेकिन ये सब मनोरंजन के लिए हैं | इनको सिरिअसली लेकर टेंशन नहीं लेने का |
पढ़ते पढ़ते फट जाएँ बस्ते
पढ़ाई यूँ ही चलती रहे |
जीरो मिले या वन
बदलेंगे न हम
टीचर चाहे बदलते रहें |
Education in Bharat: Resuscitation is the need of the Hour