कल मैंने फिल्म 3 ईडियटस देखी । इसके पहले हाल ही में चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन पढा था ।यह उपन्यास एक फुल टाइम पास है, वैसी ही फिल्म भी है । आप कहीं भी बोर नहीं होंगे । फर्क इतना है कि किताब सच्चाई के ज्यादा करीब है । चेतन भगत अद्भुत किस्सा गो हैं । रेलवे स्टेशन पर प्रतीक्षा करते यात्रियों की तीन घंटे की समयावधि पर भी पूरा उपन्यास लिख सकते हैं ।
इसमें प्रेरणा देने की जो कोशिश की गई है, बहुत अच्छी है , कि हमारे यहॉ की शिक्षा पद्धति रट्टा आधारित है । यह बात पहले भी अनंत बार कही जा चुकी है । वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार , जातिवाद , धार्मिक उन्माद इत्यादि खत्म होने ही चाहिए , लेकिन होता नहीं है । ऐसा लगता है कि इनके बिना हमारा काम नहीं चलेगा या अपनी पहचान लुप्त हो जायेगी । हर साल नए घोटाले पिछले साल के घोटालों के रिकार्ड तोडते जाते हैं । इस क्षेत्र में क्रिकेट के खेल की तरह धडाधड कीर्तिमान बनते रहते हैं ।
फिल्म रिलीज होने के बाद विवाद भी हो लिया । लेकिन हम विवाद में काहे पडें । हमने तो जो पढा और देखा वही बता रहे हैं । वैसे भी विवाद से दोनों पक्षों को लाभ ही होने वाला है । आज समाचार में था कि दिल्ली, अहमादाबाद , सूरत , वडोदरा इत्यादि में किताब की बिक्री पचास प्रतिशत तक बढ गई है । फाइव प्वाइंट समवन बेस्ट सेलर पुस्तक रही है ।
चेतन भगत को फिल्म के क्रेडिट हिस्से में वाजिब श्रेय मिला या नहीं यह तो फाइव प्वाइंट समवन देखने वाला और किताब पढने वाला मनुष्य समझ ही जायेगा । इसमें कोई आईआईटी बुद्धि या पटकथा लेखन के कौशल की कतई आवश्यकता नहीं है । और यह भी कि सबको पहले से ही पता था कि यह फिल्म चेतन भगत के उपन्यास पर बन रही है । जिनको पता नहीं था अब पता हो गया है ।
यह बहस करना कि कितने प्रतिशत चेतन की कहानी है और कितने प्रतिशत शरमन जोशी, आर माधवन की जोड-तोड है , ज्यादा महत्व नहीं रखता । इसे इस तरह कहा जा सकता है कि कहानी का पूरा विचार दर्शन चेतन का है , भवन की नींव , पूरा ढॉंचा । बाकी फिल्म वालों ने उसमें अपने ढंग से डेकोरेशन किया है । कहानी की कुछ घटनाओं को दूसरे ढंग से होते दिखाने भर से कोई कहानी का लेखक नहीं हो जाता । उदाहरण के लिए डीन के कार्यालय से प्रश्नपत्र चुराने के लिए फिल्म में प्रोफेसर की लडकी खुद लडकों को चाबी देती है जबकि किताब में हरि यह चाबी प्रोफेसर की लडकी , जिससे उसकी दोस्ती हो गई है , के यहॉं से चुराता है ।
फिल्म और उपन्यास पर तुलनात्मक रूप से कुछ भी कहने से पहले मै यह बता दूँ कि मैंने किसी उपन्यास या कहानी पर बनी ऐसी कोई भी फिल्म या टीवी धारावाहिक नहीं देखा जो मूल कृति से बेहतर हो । शायद यह विधाओं में अंतर की वजहसे होता है । पढते समय हम कल्पना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और हमारे मन में अपनी सुविधानुसार पात्रों की छवियॉं बन जाती हैं । हमारे अनुभवों से मस्तिष्क में काल्पनिक परिवेश बन जाता है । फिर हम एक बेहतर कृति में डूबकर पढते जाते हैं । लेखक जो विचार रख्ाता है, जो संदेश देना चाहता है उसे ग्रहण करते जाते हैं । एक बेहतर रचना किसी काई लगी हुई ढलान की तरह होती है । पैर रखते ही आप फिसलना शुरू हो जाते हैं और फिर फिसलते ही जाते हैं जब तक कि ढलान खत्म नहीं हो जाती । उसी तरह एक बेहतरीन रचना की एक लाइन पढने के बाद आप पूरी किताब पढने से खुद को नहीं रोक सकते । यही उस पुस्तक के लोकप्रियता की वजह भी होती है । क्योंकि साहित्य या कला कुछ भी होने से पहले मनोरंजन है । चाहे वह
किसी भी ढंग से हो । दुखद या सुखद मन: स्थिति के अनुरूप ।
फिल्म और उपन्यास पर तुलनात्मक रूप से कुछ भी कहने से पहले मै यह बता दूँ कि मैंने किसी उपन्यास या कहानी पर बनी ऐसी कोई भी फिल्म या टीवी धारावाहिक नहीं देखा जो मूल कृति से बेहतर हो । शायद यह विधाओं में अंतर की वजहसे होता है । पढते समय हम कल्पना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और हमारे मन में अपनी सुविधानुसार पात्रों की छवियॉं बन जाती हैं । हमारे अनुभवों से मस्तिष्क में काल्पनिक परिवेश बन जाता है । फिर हम एक बेहतर कृति में डूबकर पढते जाते हैं । लेखक जो विचार रख्ाता है, जो संदेश देना चाहता है उसे ग्रहण करते जाते हैं । एक बेहतर रचना किसी काई लगी हुई ढलान की तरह होती है । पैर रखते ही आप फिसलना शुरू हो जाते हैं और फिर फिसलते ही जाते हैं जब तक कि ढलान खत्म नहीं हो जाती । उसी तरह एक बेहतरीन रचना की एक लाइन पढने के बाद आप पूरी किताब पढने से खुद को नहीं रोक सकते । यही उस पुस्तक के लोकप्रियता की वजह भी होती है । क्योंकि साहित्य या कला कुछ भी होने से पहले मनोरंजन है । चाहे वह
तो किसी पुस्तक को पढने के बाद उसके पिक्चराइज रूप को देखते समय स्वभावत: मन तुलना करने लगता है ।
तुलना इसलिए करता है क्योंकि कि हम अपने मन में पहले ही उस कहानी को पिक्चराइज कर चुके हैं । कला फिल्में इस तरह के पिक्चराइजेशन में ज्यादा सफल होती हैं ।
जहॉं तक 3 इडियटस की बात है, इस कहानी का स्रोत चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन ही है । किताब पढकर और फिल्म देखकर यह बात कोई भी आसानी से कह सकता है । उपन्यास जो संदेश देना चाहता है फिल्म भी वही कहती है , कि अपनी रुचि का काम करने से आदमी सफल होता है । नौकरी के लिए पढाई और उच्च शिक्षण संस्थान भी छात्रों में शोधपरक मनोवृत्ति विकसित करने की अपेक्षा उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने की चूहा दौड में झोंक देते हैं । शिक्षा का मकसद छात्र को यह समझने में मदद करना होना चाहिए कि वह क्या बनना चाहता है । यह भी एक बडी उपलब्धि है कि स्टूडेंट समझ सकें कि उनकी रुचि क्या है और किस क्षेत्र का चुनाव उनके लिए सही रहेगा । बच्चे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा का शिकार न हों और अपनी दिल की आवाज का अनुसरण कर सकें । तभी एक खुशहाल समाज बन सकता है । इसके लिए जरुरी है कि हर आदमी को वह करने का मौका मिल सके जिसके लिए वह पैदा हुआ है । अन्यथा एक समाज में जहॉं लोग गलत जगहों पर बैठे हुए हैं कभी अमन चैन कायम नहीं हो सकता और ना ही वहॉं किसी सृजन की कोई सम्भावना है । बस एक के बाद एक भारवाहक पीढियॉं पैदा होती रहेंगी । यही भारत की समस्या है । मेरे विचार से यह समस्या इसलिए है क्योंकि भारत जनसंख्या के बोझ से दबा हुआ एक गरीब देश है । जिसके विकास में भारी असमानताऍं हैं ।
तुलना इसलिए करता है क्योंकि कि हम अपने मन में पहले ही उस कहानी को पिक्चराइज कर चुके हैं । कला फिल्में इस तरह के पिक्चराइजेशन में ज्यादा सफल होती हैं ।
जहॉं तक 3 इडियटस की बात है, इस कहानी का स्रोत चेतन भगत का उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन ही है । किताब पढकर और फिल्म देखकर यह बात कोई भी आसानी से कह सकता है । उपन्यास जो संदेश देना चाहता है फिल्म भी वही कहती है , कि अपनी रुचि का काम करने से आदमी सफल होता है । नौकरी के लिए पढाई और उच्च शिक्षण संस्थान भी छात्रों में शोधपरक मनोवृत्ति विकसित करने की अपेक्षा उन्हें अच्छे अंक प्राप्त करने की चूहा दौड में झोंक देते हैं । शिक्षा का मकसद छात्र को यह समझने में मदद करना होना चाहिए कि वह क्या बनना चाहता है । यह भी एक बडी उपलब्धि है कि स्टूडेंट समझ सकें कि उनकी रुचि क्या है और किस क्षेत्र का चुनाव उनके लिए सही रहेगा । बच्चे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा का शिकार न हों और अपनी दिल की आवाज का अनुसरण कर सकें । तभी एक खुशहाल समाज बन सकता है । इसके लिए जरुरी है कि हर आदमी को वह करने का मौका मिल सके जिसके लिए वह पैदा हुआ है । अन्यथा एक समाज में जहॉं लोग गलत जगहों पर बैठे हुए हैं कभी अमन चैन कायम नहीं हो सकता और ना ही वहॉं किसी सृजन की कोई सम्भावना है । बस एक के बाद एक भारवाहक पीढियॉं पैदा होती रहेंगी । यही भारत की समस्या है । मेरे विचार से यह समस्या इसलिए है क्योंकि भारत जनसंख्या के बोझ से दबा हुआ एक गरीब देश है । जिसके विकास में भारी असमानताऍं हैं ।
यह संदेश उपन्यास और फिल्म दोनों में एकरूप है । इसमें छात्रों पर पाठ्यक्रम के बोझ , सिस्टम या तंत्र के प्रति उनका असंतोष और उससे निपटने का 3 ईडियट्स का तरीका किताब और फिल्म में एक ही है । उपन्यास की तुलना में फिल्म में कुछ घटनाओं को बदल दिया गया है । जैसे किसी मकान में जाने से पहले आप उसमें अपनी सुविधानुसार फेरबदल करें । उसी तरह फिल्म में घटनाओं में फेरबदल किया गया है ।
3 ईडियट्स और फाइव प्वाइंट समवन की कहानी में तुलना :
- यह इंजीनियरिंग की मैकेनिकल शाखा से स्नातक करने वाले तीन छात्रों की कहानी है । उपन्यास और फिल्म दोनों की शुरुआत रैगिंग से होती है । दोनों में छात्रो की रैगिंग होती है फिर रैंचो या रेहान उन्हें बचा लेता है । जो कि दोनों में अलग-अलग ढंग से दिखाई गई हैं ।
- कालेज के पहले दिन कक्षा में मशीन के बारे में प्रश्न किया जाना । यह दिखाना कि किस तरह शिक्षा तंत्र में बदलाव की आवश्यकता है ।
- कालेज का प्रोफेसर डीन(बोमन ईरानी) बेहद सख्त है , उसकी एक खूबसूरत लडकी है (करीना कपूर ) । प्रोफेसर एक लडका भी था जो कि आत्महत्या कर चुका होता है, लेकिन सब समझते हैं कि वह ट्रेन दुर्घटना में मरा है । यह बात केवल उसकी बहन को मालूम होती है , जिसे वह मरने से पहले एक पत्र लिखकर जाता है । प्रोफेसर को पत्र और आत्महत्या के बारे में बाद में पता चलता है ।
- कालेज के पहले दिन कक्षा में मशीन के बारे में प्रश्न किया जाना । यह दिखाना कि किस तरह शिक्षा तंत्र में बदलाव की आवश्यकता है ।
- कालेज का प्रोफेसर डीन(बोमन ईरानी) बेहद सख्त है , उसकी एक खूबसूरत लडकी है (करीना कपूर ) । प्रोफेसर एक लडका भी था जो कि आत्महत्या कर चुका होता है, लेकिन सब समझते हैं कि वह ट्रेन दुर्घटना में मरा है । यह बात केवल उसकी बहन को मालूम होती है , जिसे वह मरने से पहले एक पत्र लिखकर जाता है । प्रोफेसर को पत्र और आत्महत्या के बारे में बाद में पता चलता है ।

उसकी बेटी अपने भाई की मृत्यु का जिम्मेवार प्रोफेसर को ठहराती है । क्योंकि उसके भाई के बारबार आईआईटी प्रवेश परीक्षा में असफल होने के बाद भी प्रोफेसर उसे इंजीनयिरिंग करवाने का ही दबाव बढाता जाता है । जबकि वह कला विषय लेकर पढना चाहता है । प्रोफेसर की बेटी बहस के दौरान अंत में कहती है कि उसने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसका मर्डर हुआ है ।
- रट्टू छात्र वेंकट (किताब में) ( फिल्म में ) की भूमिका ज्यादा अहम है किताब की अपेक्षा । जिसके साथ आलोक , मित्रों से झगडा होने पर एक साल तक रहता है ।
- तीन में से एक ईडियट आलोक (राजू रस्तोगी) के परिवार का वर्णन फिल्म और किताब में एक समान है । आलोक का परिवार मुसीबतों से घिरा हुआ है । धनाभाव के कारण परिवार त्रस्त है । बहन की शादी करनी है , जिसके दहेज में लडके वाले मारुति 800 की मॉंग करते हैं । बाप को लकवा मार गया है जिसकी वजह से वह हमेशा बिस्तर पर ही पडे रहते हैं । आलोक किसी भी तरह एक जॉब चाहता है । उसका इंजीनियरिंग करने का एकमात्र यही मकसद है । यह घटना भी फिल्म और किताब में समान है कि तीनों दोस्त आलोक के घर खाना खाने जाते हैं और मटर पनीर की सब्जी खाते हैं । अंत में खीर भी । आलोक की मॉं खाने के दौरना अपनी समस्याओं का रोना रोती रहती है । वस्तुओं के दाम बताती रहती है ।
- रट्टू छात्र वेंकट (किताब में) ( फिल्म में ) की भूमिका ज्यादा अहम है किताब की अपेक्षा । जिसके साथ आलोक , मित्रों से झगडा होने पर एक साल तक रहता है ।
आलोक के माता पिता फिल्म में ज्यादा गरीब और दीन हीन दिखाए गए हैं । उपन्यास में हरि के माता पिता का जिक्र नहीं है । फिल्म में हरि के माता पिता और उसका शौक फोटोग्राफी है यह बात उपन्यास की कहानी से अलग जोडी गई है । इसी तरह करीना कपूर का रेहान से प्यार होता है जबकि उपन्यास में वह हरि से प्यार करती है । उपन्यास में तीनों दोस्तो का ग्रेड फाइव प्वाइंट समथिंग होता है जबकि फिल्म में रेहान (रैंचो) को प्रथम और बाकी दो दोस्तों आलोक और हरि को अंतिम स्थान में दिखाया गया है ।
इस तरह घटनाऍं ज्यादातर वही घटती हैं, जो उपन्यास में वर्णित हैं जैसे आलोक छत से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है , लडके डीन के कार्यालय से प्रश्न पत्र चोरी करते हैं , तीनों लडकों का डीन के घर में उसकी लडकी के कमरे में खिडकी के रास्ते चुपके से रात में जाना, कक्षा में प्रोफेसर को मशीन की परिभाषा पूछना आदि । लेकिन फिल्म में इन घटनाओं के घटित होने की वजह अलग है और इन्हें अलग ढंग से पेश किया गया है ।
फिल्म की कहानी में उपन्यास की अपेक्षा जो एक बडा परिवर्तन किया गया है वह यह कि फिल्म में दिखाया गया है कि कालेज से निकलने के बाद रणछोडदास (रेन्चो ) गायब हो जाता है और बाकी दोनों दोस्त को उसका पता नहीं चलता । पॉंच साल के बाद उन्हीं के कालेज के एक पढाकू छात्र साइलेन्सर(चतुर) का उन्हें फोन आता है जो कि अब किसी बढी कम्पनी में उच्च पद पर है कि रैन्चों का पता मिल गया है । इसके बाद फ्लैश बैक में होती हुई कहानी आगे बढती है । जबकि उपन्यास की कहानी कालेज खत्म होने और आलोक और हरि को नौकरी मिलने तथा रेहान (रेंचो) को उसी कालेज में सहायक शोधछात्र की छात्रवृत्ति मिलने के बाद खत्म हो जाती है । रेहान के पिता उसके रिसर्च से बनाए गए उत्पाद पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं । और रेहान उसके व्यावसायिक उत्पादन संबंधी उद्योग की स्थापना में लग जाता है । जो कि उसी शहर से लगे किसी गॉंव में लगाया जा रहा है ।
अंतत: 3 इडियटस एक बॉलीवुड मनोरंजक फिल्म है । जिसे देखकर पैसा डूबने का पछतावा नहीं होता । आमिर खान का अभिनय अच्छा है, जैसा कि हमेशा होता है । फिर भी फिल्म उपन्यास की अपेक्षा यथार्थ के कम करीब लगती है ।
रही बात चेतन भगत को क्रेडिट्स की तो यह कहानी चेतन भगत की है । मूल ढांचा तो उपन्यास का ही है । फिर उसमें मनचाहे फेरबदल करना फिल्म विधा के हिसाब से कोई बडी बात नहीं है । जैसे रैगिंग करने के ढंग बहुत हैं तो उसमें आपने बदलाव कर दिया थोडा सा । इससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह आपकी मूल कहानी है ।
ठीक है अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी ने इस पर मेहनत की है लेकिन किसी भी मूलकृति पर कोई भी आसानी से अपनी इच्छानुसार छेडछाड कर सकता है, इससे आप यह नहीं कह सकते कि यह कृति उसकी हो गई । मोनालिसा की प्रतिकृति बनाने से कोई लियो नार्दो द विंसी नहीं हो जाता ।
इस तरह घटनाऍं ज्यादातर वही घटती हैं, जो उपन्यास में वर्णित हैं जैसे आलोक छत से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है , लडके डीन के कार्यालय से प्रश्न पत्र चोरी करते हैं , तीनों लडकों का डीन के घर में उसकी लडकी के कमरे में खिडकी के रास्ते चुपके से रात में जाना, कक्षा में प्रोफेसर को मशीन की परिभाषा पूछना आदि । लेकिन फिल्म में इन घटनाओं के घटित होने की वजह अलग है और इन्हें अलग ढंग से पेश किया गया है ।
फिल्म की कहानी में उपन्यास की अपेक्षा जो एक बडा परिवर्तन किया गया है वह यह कि फिल्म में दिखाया गया है कि कालेज से निकलने के बाद रणछोडदास (रेन्चो ) गायब हो जाता है और बाकी दोनों दोस्त को उसका पता नहीं चलता । पॉंच साल के बाद उन्हीं के कालेज के एक पढाकू छात्र साइलेन्सर(चतुर) का उन्हें फोन आता है जो कि अब किसी बढी कम्पनी में उच्च पद पर है कि रैन्चों का पता मिल गया है । इसके बाद फ्लैश बैक में होती हुई कहानी आगे बढती है । जबकि उपन्यास की कहानी कालेज खत्म होने और आलोक और हरि को नौकरी मिलने तथा रेहान (रेंचो) को उसी कालेज में सहायक शोधछात्र की छात्रवृत्ति मिलने के बाद खत्म हो जाती है । रेहान के पिता उसके रिसर्च से बनाए गए उत्पाद पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं । और रेहान उसके व्यावसायिक उत्पादन संबंधी उद्योग की स्थापना में लग जाता है । जो कि उसी शहर से लगे किसी गॉंव में लगाया जा रहा है ।
अंतत: 3 इडियटस एक बॉलीवुड मनोरंजक फिल्म है । जिसे देखकर पैसा डूबने का पछतावा नहीं होता । आमिर खान का अभिनय अच्छा है, जैसा कि हमेशा होता है । फिर भी फिल्म उपन्यास की अपेक्षा यथार्थ के कम करीब लगती है ।
रही बात चेतन भगत को क्रेडिट्स की तो यह कहानी चेतन भगत की है । मूल ढांचा तो उपन्यास का ही है । फिर उसमें मनचाहे फेरबदल करना फिल्म विधा के हिसाब से कोई बडी बात नहीं है । जैसे रैगिंग करने के ढंग बहुत हैं तो उसमें आपने बदलाव कर दिया थोडा सा । इससे यह साबित नहीं हो जाता कि यह आपकी मूल कहानी है ।
ठीक है अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी ने इस पर मेहनत की है लेकिन किसी भी मूलकृति पर कोई भी आसानी से अपनी इच्छानुसार छेडछाड कर सकता है, इससे आप यह नहीं कह सकते कि यह कृति उसकी हो गई । मोनालिसा की प्रतिकृति बनाने से कोई लियो नार्दो द विंसी नहीं हो जाता ।
फिर कांट्रैक्ट में क्या था या उनके बीच क्या डील हुई थी । यह सब अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है ।
अंत में यदि पूछा जाय कि फिल्म देखने और उपन्यास पढने में ज्यादा मजेदार क्या है तो बेहिचक मैं यह कहूंगा कि फाइव प्वाइंट समवन के मुकाबले 3 इडियट्स बहुत कमजोर है । वजह : फिल्म हमें सिर्फ मनोरंजन देती है जबकि उपन्यास मनोरंजन से आगे भी कुछ देता है । उपन्यास का हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध है । प्रभात पेपर बैक्स प्रकाशन, नई दिल्ली से , मूल्य 95/-
चित्र : गूगल
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