ब्लॉगर बगलूचंद आराम की मुद्रा में बैठकर , नहीं, बल्कि पसरकर इंटरनेट लोक में घुसे ही थे , ऐसे जैसे कोई दिनभर के कामों से फुरसत पाकर शाम को अपने दोस्तों की महफिल - अड्डे में निठल्ले मूड में बैठा हो । महफिल जमने ही वाली थी । जाल के कुछ पन्ने खुल गए थे और कुछ खुल रहे थे । बगलूचंद आज कई दिनों बाद ब्लागों पर इधर उधर अगंभीर नजर मारने की कोशिश कर रहे थे । तभी उन्हें कहीं आस पडोस में हवन से उठने वाली गंध जैसी गंध महसूस हुई । पहले तो उन्हें अच्छा लगा लेकिन जब गंध तेज होती गई , तब उन्होंने अपने पास एक अदद सोचने वाला दिमाग होने का फायदा उठाया और सोचा कि हो न हो आज कोई व्रत उपवास का दिन होगा, पडोस में पूजा या कथा वगैरह हुई होगी । इसीलिए हवन किया जा रहा है । ऐसा सोच ही रहे थे कि उनके दरवाजे पर दस्तक हुई । उन्होंने फिर सोचा कि लो कोई प्रसाद लेकर भी आ गया । लेकिन दरवाजा पूरा खुलने से पहले ही नीचे के फ्लोर पर रहने वाली पडोसन भाभी जी का चेहरा बाद में दिखा और आवाज पहले सुनाई दी कि आपकी किचेन की खिडकी से धुँआ निकल रहा है - लगता है कुछ जल रहा है ..
इतना सुनते ही बगलूचंद को नैनो सेकंड से भी कम समय में घटना के उस रहस्य का बोध हो गया - जिसे वे हवन से उत्पनन समझ रहे थे ।
"जल ही रहा है" नामक पंक्तियॉं उनके मानस पटल पर बिजली की कौंध की तरह दिखाई पडीं , जो उन्हें आधे सेकंड के लिए निर्विचार अवस्था में पहुँचाने के लिए काफी था । प्रकृतिस्थ होते ही रसोईघर की तरफ भागने की निरर्थक और अनिवार्य जल्दी दिखाई गई । निरर्थक इसलिए क्योंकि उन्हें पूर्व के अनुभव से ज्ञात था कि अब जो होना था हो चुका । जो खोना था खो चुका । और अनिवार्य इसलिए कि सामग्री भस्स्मीभूत होने के बाद भी अग्नि जल ही रही होगी । रसोईघर में धुँए की वजह से दृश्यता केवल एक हाथ तक की रह गई थी । लेकिन स्थान से परिचित होने की वजह से वे जल्द ही घटनास्थल पर पहुँचने में कामयाब हो गए ।
करीब जाकर देखने पर सिर्फ पतीली की पेंदी हवन की लकडी की तरह सुलगती हुई लाल पाई गई । शेष कक्ष केवल गर्म और तीखे गंध युक्त कोहरे से आच्छादित भर था । कोहरा भी नियमों की मर्यादा का ख्याल रखते हुए कमरे से बाहर जाने का रास्ता खोज रहा था । पतीली के ऊपर कोयेले की पतली काली मलाई की फटी हुई पर्त हिल रही थी । और पतीली के नीचे करोडों वर्षों की प्राकृतिक एवं हाल ही की मानवीय प्रक्रिया के बाद बना निर्धूम्र जीवाश्म ईंधन निर्विकार भाव से जले ही चला जा रहा था , इस बात की चिंता किए बिना कि इस पृथ्वी के गर्भ में उसकी सीमित मात्रा ही उपलब्ध है ।
खेल तो समय का ही है .... इन अर्थों में कि पतीली अग्नि के ऊपर कितनी देर तक अवस्थित रहती है ।
बाकी, कहने को चाहे कोई कुछ भी कहता रहे है ।
इतना सुनते ही बगलूचंद को नैनो सेकंड से भी कम समय में घटना के उस रहस्य का बोध हो गया - जिसे वे हवन से उत्पनन समझ रहे थे ।
"जल ही रहा है" नामक पंक्तियॉं उनके मानस पटल पर बिजली की कौंध की तरह दिखाई पडीं , जो उन्हें आधे सेकंड के लिए निर्विचार अवस्था में पहुँचाने के लिए काफी था । प्रकृतिस्थ होते ही रसोईघर की तरफ भागने की निरर्थक और अनिवार्य जल्दी दिखाई गई । निरर्थक इसलिए क्योंकि उन्हें पूर्व के अनुभव से ज्ञात था कि अब जो होना था हो चुका । जो खोना था खो चुका । और अनिवार्य इसलिए कि सामग्री भस्स्मीभूत होने के बाद भी अग्नि जल ही रही होगी । रसोईघर में धुँए की वजह से दृश्यता केवल एक हाथ तक की रह गई थी । लेकिन स्थान से परिचित होने की वजह से वे जल्द ही घटनास्थल पर पहुँचने में कामयाब हो गए ।
करीब जाकर देखने पर सिर्फ पतीली की पेंदी हवन की लकडी की तरह सुलगती हुई लाल पाई गई । शेष कक्ष केवल गर्म और तीखे गंध युक्त कोहरे से आच्छादित भर था । कोहरा भी नियमों की मर्यादा का ख्याल रखते हुए कमरे से बाहर जाने का रास्ता खोज रहा था । पतीली के ऊपर कोयेले की पतली काली मलाई की फटी हुई पर्त हिल रही थी । और पतीली के नीचे करोडों वर्षों की प्राकृतिक एवं हाल ही की मानवीय प्रक्रिया के बाद बना निर्धूम्र जीवाश्म ईंधन निर्विकार भाव से जले ही चला जा रहा था , इस बात की चिंता किए बिना कि इस पृथ्वी के गर्भ में उसकी सीमित मात्रा ही उपलब्ध है ।
अप्रायोगिक निष्कर्ष यह पाया गया कि दूध में दो रंगों की मलाई पडती है । सफेद और काली । अंतर सिर्फ इतना है कि सफेद वाली मलाई के नीचे दूध भी होता है । काली मलाई के नीचे दूध की जगह सिर्फ दूध का धूम्र पाया जाता है ।
खेल तो समय का ही है .... इन अर्थों में कि पतीली अग्नि के ऊपर कितनी देर तक अवस्थित रहती है ।
बाकी, कहने को चाहे कोई कुछ भी कहता रहे है ।

