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June 16, 2010

बीते कुछ दिनों से लिए गए नोट्स

बादल हैं। धूप-छॉंह चल रही है। सुबह ज्‍यादा थे अब सघनता कम हो गई है । धूप निकल रही है । चार-पॉंच दिन की उमस भरी तेज गर्मी के बाद कल सुबह बारिश हो गई थी । तब से बादल छाए हुए हैं । शायद वे आसमान, चिलमिलाती धूप को सौंपकर फिर कुछ दिनों के लिए चले जाऍं ।

शीर्षक का नाम यही रखा। पाठकों को आकर्षित करने के लिए उत्‍सुकता जगाने वाला शीर्षक मुझे ठीक नहीं लगा। यह धोखा है। जैसे आम का लालच देकर कच्‍ची इमली थमा देना या प्रीति भोज का निमंत्रण देकर सिर्फ चाय पिलाकर विदा कर देना। बढिया पैकिंग में घटिया माल की तरह या लोकल माल में ब्रांडेड चिट की तरह। इस पोस्‍ट को शुरू करते-करते एक और पोस्‍ट कुलबुलाने लगी । सराहना या प्रशंसा के बारे में लिखने को। उसको अभी दिमाग में सेव कर लिए हैं। जो वाइरसों से बच गई तो रूप लेगी।

May 28, 2010

लिखते-लिखते हमें कुत्‍ते की पूँछ क्‍यों याद आ जाया करती है

यह जो आप पढ रहे हैं यह लाइन सबसे अंत में लिखी गई है पहले हमें लगा इसे कोई श्रृंखला जैसा कोई नाम दे दें । फिर उसी चीज के एक दो तीन पढते पढते होने वाली ऊब के याद आने की वजह से एक शीर्षक दे दिया ।

शीर्षक पर न जाऍं क्‍योंकि आपको पता ही है कि शीर्षक और पोस्‍ट का संबंध होना ब्‍लॉगिंग के फैशन के खिलाफ है
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अब वह पढें जो हमने शुरु में लिखा :

सुबह-सुबह कोयल इसलिए नहीं कूक रही थी कि वह मुझे या आपको देखकर प्रसन्‍न हो रही थी। इसलिए भी नहीं कि वह पीछे के ब्‍लॉक में शराबी पति के ऊपर चीख-चीख कर चीखने, बर्तन फेंकने और चीख कर ही गाने वाली महिला को चिढा रही थी । किसी को कोयल का कूकना अच्‍छा लगे या खराब यह कोयल की समस्‍या नहीं है । कोयल आलसी नहीं है कि उसे तभी कोई काम करने की सूझे जब उस काम को करने की समय और सुविधा न हो । और ज‍ब समय और सुविधा हो तब वह आराम करे । कोयला का कूकना सुनना और उस पर सोचना किसी के लिए एक बकवास काम भी हो सकता है । क्‍योंकि इससे जीवन की कोई समस्‍या हल नहीं होती । फिर भी बकवास करने वालों, बकवास को बकवास समझने वालों या सौंदर्यबोध नाम की किसी चीज के होने का हवाला देने वालों को कोयल यह भी नहीं कहेगी कि वह इन्‍हें कौओं के घोंसले का तिनका भी नहीं समझती ।

April 15, 2010

अपने विचारों के कंफेसन चेंबर में खड़े होकर अपना मुल्यांकन करिए ...

मित्रों ! प्रस्‍तुत है भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव रामजी अम्‍बेडकर की जयंती पर फेसबुक पर हुआ एक वार्तालाप ।

बातचीत की शुरुआत हुई फेसबुक पर लवली जी के इस स्‍टेटस से :
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यह पोस्ट पढ़िए

उसने भिखारी से आठ आने का आटा खरीदा था | पास पड़ोस

http://sharadakokas.blogspot.com/2010/04/blog-post_14.html

फिर अपने विचारों के कंफेसन चेंबर में खड़े होकर अपना मुल्यांकन करिए -

मैंने किया,
मुझे अपेक्षित परिणाम नही मिले...शायद कहीं कोर - कसर बाकि है ।

फेसबुकिया मित्रों की टिप्‍पणियॉं :

You and Prashant Priyadarshi like this.
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Aradhana Chaturvedi :
पढ़ा और टिप्पणी भी की. देख लेना मेरी टिप्पणी.
Yesterday at 11:40am
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Lovely Goswami :
मैंने देखा है आराधना ..ऐसा नही की मैंने कभी यह सब माना है या दलित मित्रों को अलग समझती हूँ ..छुवाछुत मानती हूँ ..पर कहीं कुछ बात तो है ..जो मुझे अब भी अधूरी लगती है ..पता नही कहाँ
Yesterday at 11:46am
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Aradhana Chaturvedi :
मैं भी ये मानती हूँ और मैंने अभी दो दिन पहले अपनी दोस्त के सामने स्वीकार किया है कि लाख हमारे पालन-पोषण में सावधानी बरती गई हो, लाख हमने कभी भी अपने मित्रों से समानता का व्यवहार किया हो, पर कोई बात है जो खटकती है. इसमें दोष हमारी सामाजिक व्यवस्था का है, जो न हमें भूलने देता है कि हम सवर्ण हैं और न उन्हें कि वे दलित हैं और हम समाज में ही तो रहते हैं.
Yesterday at 11:53am
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Lovely Goswami :
हाँ मुझे खेद है हमारी सामाजिक व्यवस्था के लिए ...जो दोषी न होते हुए भी अपराध बोध कम नही होने देती
Yesterday at 11:58am
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Aradhana Chaturvedi :
यही बात है. हम अपने पूर्वजों के द्वारा किये गये अपराधों के तले खुद को दबा हुआ सा महसूस करते हैं.
Yesterday at 12:01pm
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Anjule Maurya :
क्या कहूँ बहुत गहरे तक चोट करने वाली पोस्ट है ये...हकीकत यही है की हम अपनी सामाजिक मानसिकता से अभी भी नहीं उबार पाए हैं...इस पोस्ट का लिंक देने के लिए आपको शुक्रिया....
Yesterday at 3:00pm
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Arkjesh Kumar :
हॉं अपना पूरा नाम न बताना असभ्यता है । बचपन में या बाद में भी जब मैं किसी को अपना नाम बताता था तो पूरा नाम बताने के लिए कहा जाता था । या पूछा जाता है "आगे " । न बताने का, जिद की हद तक आग्रह नहीं था , लेकिन जानने वाले की व्याकुलता देखने के लिए मैं यह करता था ।

कोर कसर तो महसूस होगी ही , जब तक नामों के साथ प्राचीन ऋष्रि मुनियों या वीर योद्धाओं की गौरव गाथाऍं सरनेम के रूप में टंकी रहेंगी । अच्छा तो लगता ही है जब हमारी जाति एक बुद्धिमान या वीर या धनिक वर्ग के रूप में पहचानी जाती है । लेकिन जिनके पास यह नहीं है लगाने के लिए वे क्या करें । इसलिए लाख निष्पक्ष वैचारिकता या मार्र्कसवादी चिंतन के बावजूद यह नामों के साथ जुडे हुए महान आभासी पश्चलग्न, कोर कसर बाकी ही रखते हैं । और यदि इस कडीशनिंग से बाहर आने के लिए हम वास्तव में प्रयत्नशील हैं तो इसकी शुरुआत हम इस बात से क्यों नहीं कर सकते कि जहॉं , कुछ जरूरी दस्तावेजों को छोडकर , वैधानिक बाध्यता न हो वहॉं सरनेम न लगायें ।

कौन है जो ईमानदारी से कहेगा तो यह नहीं कहेगा कि अपने नाम के साथ लगा 1 ,2 ,3 , 4 ..वेदी या इसी तरह के सरनेम उसे फीलगुड नहीं कराते ।

हम मुफ्त की महानता भी ओढे रहना चाहते हैं और दलित मित्र को गले भी लगाना चाहते हैं । लेकिन दोनो बातें एकसाथ सम्भव नहीं है ।

अम्बेडकर उन कुछ नेताओं में से एक हैं , जिनके प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है । जीवन भर उन्होंने जिस सामाजिक प्रताडना को सहा है और सवर्णों नेताओं के तिरस्कार और साजिशों का शिकार हुए हैं , वैसा कोई और नहीं हुआ ।

यह भी सही है कि भारतीय समाज विज्ञान की और स्त्रियों और दलितों के उत्थान की जो समझ और उसे लागू करवाने की ईमानदारी अम्बेडकर के पास थी वैसी किसी और भारतीय नेता में नहीं थी । दुर्भाग्यवश वे राजनीति का शिकार हुए ।

शरद जी का संस्मरण पढा । एक गरीब दलित भिखारी से आटा खरीद सकता है , लेकिन गरीब ब्राह्मण को इसकी जरूरत नहीं है , उसे गॉवों में अब भी आराम से भीख मिल जाती है । अस्तु ।
Yesterday at 11:37pm ·
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Aradhana Chaturvedi :
अर्कजेश, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. मेरे पिताजी ने अपने नाम के साथ इसीलिये कभी सरनेम नहीं लगाया और मैं भी न लगाती. मैं बचपन में जिस स्कूल में पढ़ी हूँ, उसमें सबके नाम के साथ भारतीय जोड़ा जाता था, ताकि बच्चों की जाति धर्म का पता न चले. पर जब मैं दूसरे स्कूल में गई तो मुझे सरनेम लगाना पड़ा...मैंने ब्लॉगजगत् में भी अपना नाम बदलने की कोशिश की थी, पर पहचान का संकट आ गया. अब मैं सरनेम इस कारण लगाती हूँ कि ये मेरे माँ-बाप की निशानी है, जो कि अब इस दुनिया में नहीं हैं. मेरा नाम मेरे व्यक्तित्व के साथ जुड़ गया है, मेरी पहचान है. इसलिये सरनेम लगाना पड़ता है. मुझे अच्छा नहीं लगता...पर ऐसी ही मज़बूरी बहुत लोगों के साथ है...मैंने पहले से ही तय कर लिया है कि मैं अपने बच्चों के नाम के आगे जातिबोधक सरनेम नहीं लगाने दूँगी...चाहे इसके लिये मुझे होने वाले पति से लड़ाई करनी पड़े.
21 hours ago
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Prashant Priyadarshi :
पिताजी ने बिहार में होनेवाले जातिवाद को पहचानकर खुद ही हम बच्चों के नाम में सरनेम नहीं लगाये.. अब नाम बताने पर कोई पूछता है आगे? हम पलट कर बोलते हैं "आगे क्या, बस इतना ही.."
सोचता हूँ कि ऐसे वर्ग से आता हूँ जो सम्माननीय माना गया है, सो उनका 'आगे' पूछना बुरा नहीं लगता है.. अगर किसी और वर्ग से होता तो भी क्या इतने आराम से ही पलट कर जवाब दे पाता?
21 hours ago
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Aradhana Chaturvedi :
हाँ, मैंने देखा है कि बिहार के कुछ इन्टेलेक्चुअल लोग सरनेम नहीं लगाते...मुझे अच्छा लगता है. लेकिन प्रशान्त, ब्राह्मण वहाँ पर भी सरनेम ज़रूर लगाते हैं खासकर मैथिल ब्राह्मण...और बड़े गर्व से अपने पूर्वजों के बारे में बताते हैं. उन्हें अपने सो काल्ड "मैथिल ब्राह्मण कल्चर" पर बड़ा अहंकार होता है. हालांकि मिथिला संस्कृति के मामले में बहुत आगे है, पर ये सब ब्राह्मणों की देन थोड़े ही है. मधुबनी पेंटिंग क्या ब्राह्मण बनाते हैं...?
मेरा एक दोस्त है मैथिल ब्राह्मण...पूरी तरह सामन्तवादी, सम्भ्रान्तवादी मानसिकता है उसकी...
और ये भी सही है कि हम जाति पूछे जाने पर उतना अपमानित नहीं महसूस करते जितना कि वे जिनके लिये जाति पूछी जाती है...कुछ दिन पहले मेरी दोस्त ने अपनी छोटी चचेरी बहन के बारे में बताया था कि एक दिन स्कूल से आकर वो चुप-चुप थी. बहुत देर बाद उसने अपने बड़े भाई से पूछा "भैया, क्या हमलोग चमार हैं" मेरी दोस्त ने ये बात हँसकर बताई थी, पर मेरी आँखों में आँसू आ गये थे...मैं सुन नहीं पा रही थी , तो उस छोटी सी बच्ची ने कैसे झेली होगी ये बात...मेरे मन ये बात कील जैसी गड़ गई है...
21 hours ago
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Prashant Priyadarshi :
आपसे सहमत हूँ.. एक करीब के मित्र का उदाहरण मेरे ठीक सामने है.. मैथिल ब्राह्मण होते हुए भी उसे नाम में कोई सरनेम नहीं है.. मगर कहीं भी उसे अपना नाम बताने को कहा जाता है तो अंत में 'झा' जोड़ना नहीं भूलता है..
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Lovely Goswami:
मैं तो नही लगाती हूँ सरनेम ..यहाँ फेसबुक में मेरे नाम पर सर्च करने पर किसी और की लिस्टिंग दिखा रहा था ..वह भी जैसे वह खाता जाली हो ..इसलिए यहाँ लगाया ...वरना "कुमारी " सहज सा लगता है |
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Sanjay Grover :
पोस्ट तो अभी नहीं पढ़ी पर अर्कजेश ने हमेशा की तरह खुलकर और तार्किक विचार रखे हैं। प्रशांत ने भी बहुत विवेकपूर्ण बातें कहीं। नीयत आराधनाजी और लवली जी की भी द्वेषपूर्ण बिलकुल नहीं लगती। मगर हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि आज भी दलितों और हमारी सामाजिक स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर है। क्या हम खैरलांजी जैसा एक भी उदाहरण बता सकते हैं जो सवर्ण स्त्री के साथ हुआ हो। जबकि दलित स्त्रियों के साथ ऐसा होने की महीनें में एक-दो खबरें आज भीं पढ़ने को मिल जाती हैं।
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आप क्‍या सोचते हैं इस विषय में ?

January 11, 2010

संबंध - खुशियों की चाबी खुद की जेब में रखें

"मुझे याद आता है कि जब मैं एक छोटी सी लडकी थी , मेरी मॉं हमारे लिए नाश्ता और रात का खाना बनाया करती थी एक दिन की घटना मुझे खासतौर पर याद आती है जब मॉं ने एक पहाड जैसे दिन में कठोर थकाने वाला श्रम करने के बाद घर आकर हमारे लिए रात का खाना बनाया था कई वर्षों पहले की उस शाम को मेरी मॉं ने मेरे पिता के सामने खाने के लिए सब्जी , सलाद और जली हुई रोटियां परोसी थीं मैं इंतजार कर रही थी कि इस बात पर क्या कोई ध्यान दे रहा है, कि रोटियॉं जली हुई हैं लेकिन मेरे पिताजी अपने भोजन के लिए थाली के सामने बैठकर, खाने के लिए रोटी उठाते हुए मॉं को देखकर मुस्कुराये और मुझसे पूछने लगे कि आज मैंने स्कूल में क्या किया मुझे याद नहीं कि मैंने उस रात पापा से क्या कहा लेकिन पापा का जली हुई रोटी पर चटनी फैलाकर रोटी के कौर खाना मुझे अभी तक याद है

उस शाम खाना खाकर उठने के बाद मैंने मॉं को जली हुई रोटियों के लिए पापा से क्षमा मॉंगते हुए सुना । इस पर उन्‍होंने जो कहा वह मैं कभी नहीं भूल सकती - "प्रिय मुझे जली हुई रोटियॉं पसंद हैं "

दूसरे दिन मैंने जब पापा को रात में गुड नाइट बोलने गई और मैंने उनसे प्रश्‍न किया कि क्‍या आपको जली हुई रोटियाँ खाना सचमुच अच्‍छा लगता है ?

उन्‍होंने मुझे बाहों में भर लिया और कहने लगे "मेरी लाडली ! तुम्‍हारी मॉं आज पूरा दिन कडी मेहनत करने के बाद यकीनन काफी थकी हुई थीं । और एक जली हुई रोटी की ओर ध्‍यान देने की अपेक्षा किसी का दिल न दुखाना अधिक महत्‍वपूर्ण है । तुमको पता है बेटी ! यह दुनिया अपूर्ण वस्‍तुओं और अपूर्ण मनुष्‍यों से भरी पडी है । बल्कि यह अपूर्णताओं से ही बनी है ।"

मैं कोई बहुत अच्‍छी गृहिणी नही हूँ लेकिन वर्षों के अनुभव से मैंने सीखा है कि एक दूसरे के दोषों को स्‍वीकार करना और भिन्‍नताओं का आनंद लेना ही एक स्‍वस्‍थ और टिकाऊ संबंध का आधार है । जिससे कि एक जली हुई रोटी संबंधों के टूटने की वजह न बने । इस बात को हम किसी भी संबंध पति-प‍त्‍नी, माता-पिता दोस्‍त या रिश्‍तेदार पर लागू कर सकते हैं , क्‍योंकि एक दूसरे को समझना ही रिश्‍तों का मूल आधार होता है ।"

"कृपया अपनी खुशियों की चाबी , दूसरों की नहीं खुद की जेब में रखें । peace

यह एक दोस्‍त के द्वारा अग्रेषित की गई ईमेल का अँग्रेजी से हिन्‍दी अनुवाद है । मुझे अच्‍छी लगी इसलिए साझा किया ।

यह पोस्‍ट आपको उपदेशात्‍मक लगी या अच्‍छी लगी ?tepuktangan