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February 14, 2015

वेलेंटाइन डे - कृष्‍ण के बहाने

कृष्‍ण कन्‍हैया भारत भूमि पर प्रेम के इजहार के इस वेलेंटाइन दिन को देखकर मुस्‍कुरा रहे थे। रुक्‍मणी ने सोचा कि लगता है इन्‍हें अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं। कुहनी मारते हुए बोलीं, "क्‍या बात है जी बहुत मुस्‍कुरा रहे हो?" लगता है तुम्‍हें अपनी राधा और गोपियों के साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आ रहे हैं। ये बेचारे तो साल में एक दिन का इंतजार करते हैं। प्रेम का बाकायदा इजहार और अपनी हैसियत के अनुसार मैनेज करने के लिए। तुमने तो हद कर रखी थी रोज ही रास रचाते रहते थे और वो भी कोई एक नहीं पूरी गॉव की गोपियों के साथ। मैंने सुन रखा है राधा नाम की तुम्‍हारी कोई खास थी। 

रुक्‍मणी की बात सुनकर कृष्‍ण हँस पडे। बोले रुक्‍मे ! मैं चाहे वेलेंटाइन के रूप में आऊं या कृष्‍ण के रूप में या राधा या मीरा के रूप में मैं किसी भी रूप में आ सकता हूँ प्रेम की हवा फैलाने। आज जब साजिश करके मेरे प्रेम के संदेश को बिल्‍कुल हवाई और अलौकिक कर दिया था, इस देश में तो मैं वेलेंटाइन जी के बहाने घुस आया हूँ, अधिक सांसारिक होकर। वैसे भी इस भारत देश की आदत हो गई है सेकंड हैंड चीजें इस्‍तेमाल करने की। यहॉं लाख दहाड मारकर चिल्‍लाते रहो कोई सुनेगा नहीं एक बार विदेशी समर्थन कर दें तो समझ लो कि हो गया काम ।

May 19, 2009

प्यार या जुकाम

प्यार जुकाम जैसा होता है क्योंकि दोनों ही मर्जों में निम्नलिखित समान लक्षण देखे जाते हैं :

* दोनों ही मर्जों से पीडित व्यक्ति का कोई इलाज नहीं है ।

* मर्ज से पीडित व्यक्ति ठीक दिखते हैं लेकिन होते नहीं ।

*दोनों ही तरह के मर्जों की रोकथाम के लिये टीकाकरण या बरती जाने वाली सावधानियों जैसे कोई पूर्व उपाय कारगर नहीं हैं ।

* यद्यपि दोनों ही मर्जों का प्रकोप कम उम्र लोगों को पर ज्यादा होता है, फ़िर भी यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को अपनी चपेट में ले सकता है ।

* दोनों ही प्रकार के रोगों से पीडित व्यक्ति बीमारी से मरते नहीं । यदि ऐसा सुनने में आता भी है तो भी वह बीमारी का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं होता ।

* दोनों ही बीमारियां सन्क्रामक हैं । रोगी के दोस्त, परिवार और शिक्षक इससे प्रभावित हो सकते हैं ।

* रोग की चरम अवस्था में नाक और आँखों पानी बहना शुरु हो जाता है और मस्तिष्क काम करना लगभग बन्द कर देता है ।

* प्राकृतिक और घरेलू उपचार इन रोगों में ज्यादा फ़ायदेमन्द होते हैं । उदाहरणार्थ प्यार के मामले में प्यारी/प्यारे वस्तु की उपस्थिति और जुकाम में बाम वगैरह ।

* दोनों ही तरह रोगों के ज्वर एक निश्चित अवधि के बाद उतर जाते हैं एवम पीडित पूर्णतः सामान्य होकर अपने काम-धन्धे में जूझ जाते हैं ।

* दोनों ही बहुत सामान्य बीमारियां हैं और संसार भर में पायी जाती हैं ।

* प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्यतः कभी न कभी इन बीमारियों की चपेट में अवश्य आता है ।

* जुकाम सैकडों तरह के विषाणुओं की वजह से होता है, इसीलिये इसका इलाज नहीं खोजा जा सका इसी तरहप्यार भी हार्मोनल रसायनों, वंशानुगत विशेषताओं से लेकर वातावरण तक से प्रभावित होता है |

* जिन मित्रॊं को गलतफ़हमी हो कि जुकाम के कई इलाज बाजार में आ गये हैं, तो उनकी बात भी इतनी ही दुरुस्त है कि यदि आप दवाइयां लेते हैं तो जुकाम ७ दिन में ठीक हो जाता है और नहीं लेते तो एक सप्ताह में ।

April 22, 2009

नेता के टाइप - रेडीमेड, मेड और थोपित

शेक्सपिअर का कथन है कि कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ लोग अपने कर्म से महान होते हैं और कुछ लोगों पर महानता थोप दी जाती है ।

ऐसे ही भारतीय राजनीति में नेता भी 3 तरह के होते हैं । यद्यपि मैनें सुन रखा है कि आजादी के बाद देश में कोई नेता ही नहीं पैदा हुआ । लेकिन मुझे इस बात पर जरा भी यकीन नहीं है । इतने सारे नेता क्या आसमान से टपके हैं ।

जन्म से नेता - ऐसे नेताओं की संख्या दिनोंदिन बढती जा रही है। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, राजनैतिक पार्टियां अपने अन्दर राजवंशों की तरह बर्ताव करने लगी हैं । पहले युवराज या राजकुमारी शिक्षा ग्रहण कर आने के बाद उत्तराधिकारी घोषित कर दिये जाते थे । ऐसे ही अब राजनीतिक पार्टी के आकाओं के सुपुत्र-सुपुत्रियों का भी भविष्य में पार्टी की बागडोर पकडना सुनिश्चित होता है । पार्टी पर शासन करने के लिये राजशाही खून जरूरी है। जिन्दगी भर पार्टी के लिये मरने खपने वाले वरिश्ठ नेता और कार्यकर्ता उनकी सेवा में लग जाते हैं । यह सोचकर की राजा तो राजवन्श का ही होगा वफ़ादार बने रहते हैं । जन्म से नेता होने के लिये राजपुत्र होना जरूरी नहीं है, बल्कि राजवन्श से किसी न किसी तरह की रिश्तेदारी पैदाइशी नेता बनने की आवश्यक योग्यतायें हैं।

दूसरे तरह के नेता वे होते हैं जो पार्टी कार्यकर्ता से शुरु होकर क्रमशः ऊपर कि तरफ़ सरकते हैं । राजनीति का वह दौर अब समाप्त हो चुका है, जिसमें राष्ट्रीय पार्टियों में भी गरीब घर से आने वाले प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गये थे । अभी तो फ़िलहाल ऐसी घटना घटने की कोई सम्भावना नहीं दिखती ।
घिस-घिसकर ऊपर जाने वाले नेता अधबीचे तक पहुंचते-पहुंचते समाप्त हो जाते हैं । ऐसे नेताओं का कद हमेशा जन्मना नेताओं से दोयम रहता है। बहुत जोर मारा तो अलग पार्टी बनाकर उसकी अगुआई करते हुए पुरानी पर्टी के नेताओं के सिद्धांत को कायम रखते हैं । या कोई सस्ते हथकन्डे अपनाकर एक दिन में राष्ट्रीय पहचान बना लेते हैं ।

तीसरे तरह के नेता वे होते हैं जिन पर नेतापन थोपा जाता है । इनको कम्पनी के ब्रान्ड अम्बेसडर समझिये । जैसे कोई कार बेचनी है तो किसी मॉडल को उसकी बगल में खडा कर दो । इस तरह के व्यक्ति वे होते हैं जिन्हे "सितारे" कहा जाता है, दूर से अच्छी लगने वाली मनोरंजक वस्तुयें । फ़िल्मी सितारे, मॉडल, क्रिकेट के खिलाडी, बडे-बडे उद्योगपति होते हैं । राजनैतिक दल इनकी लोकप्रियता को भीड इकट्ठी करने के लिये इस्तेमाल करते हैं । इस तरह की नेतागिरी लोकप्रियता की जमा पूंजी को राजनीति में इन्वेस्ट करने की होशियार कोशिश है । प्रायोजित नेता राजनीति में अपने पुराने धन्धे की वजह से ही जाने जाते हैं । यदि काम से रिटायर होकर आते हैं, तो ग्लैमर की एक दुनिया से निकलकर दूसरे में प्रवेश हुआ और एकाध बार सांसद वगैरह हो गये तो पैसा वसूल । यदि अभी काम कर रहे हैं (यद्यपि उधर भी मन्दी चल रही होगी या लोग रिटायर्मेन्ट की मांग करने लगे होंगे इसीलिये इधर रुख किये हैं ) तो चुनाव के बाद फ़िर अपने सूटिंग व्गैरह में व्यस्त हो जाना है | भारतीय मानस चमत्कारों से चौंधियाना चाहता है | दिमाग से कम भावुकता से ज्यादा काम लेता है, नहीं तो ऐन चुनाव के वक्त आकर पार्टी का सदस्य बनकर चुनाव क्षेत्र में आने वालों और उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने की जुर्रत कराने वालों को जनता को रगेद देना चाहिए | चाहे वह किसी भी पार्टी का हो |

April 17, 2009

विकसित होने के बगल प्रभाव(साइड इफेक्ट) : सन्दर्भ भारत देश

हर अच्छाई के साथ एक बुराई जुड़ी होती है, जैसे खाना खाने के साथ संडास जाना जुडा है | इत्यादि | इस बात को संक्षेप में कहने के लिए जो सबसे प्रचलित और उपयुक्त शब्द है, वह है "साइड इफेक्ट" अर्थात बगल प्रभाव | ज्यादातर हर्बल दवाओं में लिखा रहता है - 'कोई साइड इफेक्ट नहीं' |

इस दुनिया में हर चीज का बगल प्रभाव होता है, इस विषय में एक फ़िल्म भी बन चुकी है - 'प्यार के साइड इफेक्ट' , जो 14 फरबरी के दिन सबसे ज्यादा होते हैं | इस दिन प्यार के बगल प्रभाव कभी कभी इतने प्रबल हो जाते हैं कि अगल बगल से डंडे पड़ने के रूप में सामने आते हैं और मुख्य प्रभाव कि तरह लगते हैं, जैसे किसी किसी फ़िल्म में बगल हीरो मुख्य हीरो को दबा देता है | लेकिन यहाँ मेरा मुख्य विषय न तो 14 फरबरी है न ही प्यार मोहब्बत जो मुख्य विषय है वह आगे चलने पर मिलेगा | ये तो केवल छोटे-छोटे कुछ बगल विषय हैं |

बगल प्रभाव शब्द से ही स्पष्ट होता है कि इसके पहले कोई मुख्य प्रभाव होता है, जिसके लिए कोई प्रयास किया जाता है| लेकिन यह बगल प्रभाव चाय कि पत्ती के पैकेट के साथ मिलने वाले कप या सोने के सिक्के कि तरह फ्री गिफ्ट नहीं है, बल्कि यह बिना बुलाये मेहमान या उस अनचाहे गर्भ कि तरह होता है जो ब्रह्मानंद सहोदरम कि चाह में गले पड़ जाता है |

न्यूटन के अति प्रसिद्द नियम के अनुसार हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिकिया होती है, लेकिन उन्होंने किसी बगल क्रिया या प्रभाव का उल्लेख नहीं किया है , शायद वह प्रतिक्रिया दो भागों में विभाजित हो जाती होगी - मुख्य क्रिया और बगल क्रिया |

मेरा विषय भारत देश के विकसित हो जाने पर पड़ने वाले बगल प्रभाव के बारे में चर्चा करना है |

हमारे प्यारे भारत देश में एक वैज्ञानिक राष्ट्रपति हुआ करते थे | उन्होंने पहले मिसाइलें वगैरह बनाई, फ़िर संयोग से राष्ट्रपति बन गए | लोग उन्हें मिसाइल मैन भी कहते हैं | पूर्व राष्ट्रपति महोदय का नाम है - ए.पी.जे. अब्दुल कलाम | राष्ट्रपति काल में उन्होंने एक अभियान सा छेड़ रखा था की भारत देश को सन फलां-फलां मतलब 2020 तक विकसित देश बना देना है | इसके लिए उन्होंने बाकायदा योजना बना रखी थी | उस समय राष्ट्रपति थे सो सबको उनके अभियान का पता चलता था | अखबार, टीवी इत्यादी में आते रहते थे | इधर सेवानिवृत्त होने के बाद दिखाई नहीं पड़ते (अखबार, टी वी आदि में)

अब कलाम साहब ठहरे वैज्ञानिक बुद्धि के आदमी उन्होंने जैसे मिसाइल वगैरह विकसित की वैसे ही सोचा की देश को भी विकसित कर देंगे,लेकिन देश कोई मिसाइल की तरह जड़ पदार्थ तो है नहीं की जैसी चाहें आप उसके साथ मनमानी कर लेंगे | देश बनता है देशवासियों से और देशवासी होते हैं - इन्सान अथवा मनुष्य नामक जीव | वह भी भारत जैसे दुनिया के सबसे महान लोकतंत्र के |

तो मैं बात कर रहा था, विकसित होने के खतरों की| इसके पहले की आप मुझे कुछ का कुछ समझे और मुझे कहना पड़े "कि मेरा यह मतलब नहीं था" मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं देश के विकसित होने के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूँ और मेरी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाए | मैं तो भारतीय लोकतंत्र का एक जिम्मेवार नागरिक होने के नाते सिर्फ़ आपका ध्यान उन बगल प्रभावों (साइड इफेक्ट्स) कि और दिलाना चाहता हूँ जो विकसित हो जाने के बाद भारत देश के ऊपर तारी हो सकते हैं |

विकसित देशों के कुछ मोटे-मोटे लक्षण जो मैंने सुन रखे हैं, उनमें से कुछ यूँ हैं कि विकसित देशों में जीवन स्तर ऊंचा होता है, प्रति व्यक्ति आय बहुत ज्यादा होती हैं, स्वाथ्य और शिक्षा पर खर्च बहुत ज्यादा होता है, आधारभूत ढांचा मजबूत होता है, इत्यादि |

दुनिया में जो भी विकसित देश हैं उनमें राजनीतिक दल 3-4 से ज्यादा नहीं हैं | मुख्यतया 2 या 3 राजनीतिक दल ही हैं | हमारे यहां भी शायद 8-10 दर्जन ही होंगे एकाध दर्जन ज्यादा भी हो गए तो कौन सा गजब हो जायेगा 1अरब का देश है | सबको फलने फूलने दीजिये | देश यदि विकसित हो गया तो इन 4 दर्जन राजनीतिक दलों के 4 हजार दर्जन नेताओं का क्या होगा (डाटा में सुधार कर सकते हैं ) | इन सबको बेरोजगार कराने का इरादा है क्या ? वैसे भारत देश में बेरोज़गारी कम है ? जो आप और बेरोजगारी बढ़ाना चाहते हैं | यह बात अलग है कि बेरोज़गारी भारत देश में कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती | मुद्दे कि बात से मुझे याद आया कि विकसित देशों के चुनावी मुद्दे भी अलग टाइप के होते हैं, जैसे शिक्षा, शोध, रोजगार, स्वास्थ्य, पर्यारण इत्यादि | देश को विकसित करके आप हमारे प्यारे (? ) नेताओं से मुद्दे भी छीन लीजियेगा | यहाँ तो ये सब नहीं चलेगा न भाई ! ये भी कोई मुद्दे हैं जी शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण | भारत देश में धर्म, जाति, आरक्षण, भाषा विवाद आदि आदि मुद्दे बनते हैं और मुद्दे कम पड़ें तो एक-दो भड़काऊ वक्तव्य दे दीजिये या इतिहास का कोई गदा मुर्दा उखाड़ लीजिये और उसे जीवित कर दीजिये या कोई काल्पनिक संकट पैदा कर दीजिये | आप छा गए अखबारों और टीवी में |

बाढ़ -सूखे वगैरह भी कोई मुद्दे हैं, वो तो यहाँ हर साल आते हैं और जाते हैं | कम से कम उसी बहाने कुछ फंड तो आ जाता है नहीं तो चुनाव कैसे लडेंगे और चुनाव नहीं लड़े तो लोकतंत्र को खतरा ! भारत देश के नेता को बद्बुक समझाते हैं का ! की आपके विकसित होने के चक्कर में अपने मुद्दे और ख़ुद को गवां दे | वैज्ञानिकों के साथ यही दिक्कत है एक सुर पकड़ लेते हैं, अरे कुछ समझिये साहब |


सिर्फ़ नेता की ही बात होती तो चलो मान भी लेते | आप क्या समझते हैं की आम आदमी क्या कम झंझट में पड़ेगा ?
अरे हमको पहले तैयार तो होने दीजिये | देखिये अभी हमको अभ्यास नहीं है | जब तक पुलिस वाला चौराहे पर डंडा लेकर नहीं खड़ा होता हमारे हाथ पैर ब्रेक ही नहीं लगाते तो इसमें हमारी क्या गलती है | लाल हरी बत्ती अपनी जगह लगी है लगी रहे | हमारे लिए तो पुलिस का डंडा ही सबसे बड़ा सिग्नल है | आप कहते हैं की विकसित देश में लोग लाल बत्ती पर रुक जाते हैं, चाहे कोई ट्रैफिक न हो और न कोई पुलिस वाला खड़ा हो | यह भी सुनाने में आया हैं की विकसित देशों में लोग इधर-उधर थूकते नहीं, रेलगाडी और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा नहीं फेकते | देखिये हमें तो ये सब बातें सोचकर ही सकरेत होने लगता है | इन सब बातों पर हमे यकीन तो नहीं होता कि किसी देश में ऐसा भी होता होगा और वह भी तब जब लोग कहते हैं कि वहां गैर पढ़े-लिखे भी इन सब बातों को जानते और मानते हैं, क्योंकि यहाँ तो जो अनपढ़ हैं वो कह देते हैं कि हम क्या जाने (अपना घर साफ़ रखना बखूबी जानते हैं) हम तो बिना पढ़े लिखे अज्ञानी हैं | और पढों लिखों को यह कहते भी सुना है कि यह तो हमारे कोर्स में नहीं था |

मित्रों, हमारे भारत देश के विकसित होने के अनन्त खतरे हैं, जिनमें से मैंने सिर्फ़ कुछ का ही उल्लेख किया है | सबसे बड़ा खतरा हमारे भारत देश कि संस्कृत और सभ्यता को है, जिसे लोग इतनी छुई-मुई समझते हैं कि पहनने -ओढ़ने और उठाने-बैठने से नष्ट होने लगती है | हमारी लम्बी गुलामी का कारण भीं यही सोच थी |

हम सोचेंगे, विचारेंगे आराम से हमे विकसित होने दीजिये | होंगे तो होंगे, नहीं तो देखेंगे | ऐसा आन्दोलन जैसा चलाकर उतावलापन मत दिखलाइये | शुभ काम हम सबसे देरी से करते हैं | आप मिसाइल वगैरह विकसित कीजिये, चाँद पर घूमिये हमे कोई आपत्ति नहीं है | हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के घोर लोकतांत्रिक नागरिक हैं, आप हमें ऐसे बहला-फुसला नहीं सकते |

हम सिर्फ़ उन्ही बातों में विकसित देशों की नक़ल करते हैं जिन्हें करना आसान हो और जिन्हें करने से हम विकसित न कहाने लगे, नहीं तो हम हम कहाँ रह जायेंगे भाई, अपनी पहचान कायम रखना जरूरी हैं न |

पोस्ट कुछ ज्यादा ही विकसित होता जा रहा हैं, इससे पहले कि कोई बुरा मान जाए , मैं बंद |

सूचना : इस लेख के कोई बगल प्रभाव नहीं हैं |

March 10, 2009

भारतीय रेल : साइड मिडिल बर्थ के मास्टर माईंड और जनरल डिब्बे में हठ योग

अभी हाल ही में मैंने भारतीय रेलवे नई-नई आविष्कृत साइड मिडिल के ऊपर वाली बर्थ अर्थात साइड अपर बर्थ में यात्रा की | अपनी आरक्षित बर्थ ढूँढते हुए जब मैं अपर बर्थ नं 48 पर पहुँच तो वहां पहले से ही भाई लोग विराजे हुए थे, मेरे अपनी सीट होने की बात कहने पर उन्होंने लापरवाही से बताया की बर्थ नं चेंज हुए हैं | चल टिकेटनिरीक्षक (टीटी) को ढूंढकर पूछने पर उसने हिसाब लगाकर बताया की बर्थ नं 54 हो गई है | जाकर देखा तो साइड मिडिल के ऊपर वाली बर्थ, साइड अपर थी | बर्थ में सवार होने से पहले मैंने अपना सामान रखने के लिए सीट के नीचे जगह के लिए देखा, लेकिन वहां पहले से ही हाउस फुल था | एक मित्र साइड मिडिल में दार्शनिक भावः से छत की तरफ़ हुए देखते हुए पड़े थे | थोडी सी झिकझिक और साइड मिडिल के मास्टर माईंड को कोसने के बाद एक बैग नीचे और एक बर्थ पर जमाया | बर्थ पर सवार होने के बाद उन दिनों को याद किया जब साइड अपर और लोअर बर्थ के बीच में मिडिल बर्थ नहीं होती थी | यह किस्सा अब केवल बच्चों को बताकर चकित करने के लिए रह गया है | हाल ये है की अब साइड अपर 1 फुट और अपर हो गई है और उसकी जगह पर साइड मिडिल बर्थ का अतिक्रमण द्वारा आविर्भाव हुआ है |

रेलवे प्रबंधन के जिन महानुभाव ने यह लालबुझक्कड़ी सुझाव दिया है उन्हें मैं साइड मिडिल बर्थ में यात्रा करने का बुलौआ देता हूँ | एक बार यात्रा करके देखें | तब उन्हें पता चलेगा की उन्होंने क्या किया है | कभी तो हकीकत से रूबरू होना चाहिए | टिकेट किराया मेरी तरफ से मुफ्त | अव्वल तो वह साइड मिडिल में घुस ही नहीं पायेंगे क्योंकि इसमें तो घुसने के लिए भी सर्कस वाली लचक चाहिएयदि किसी तरह घुस भी गए तो निकलने में फिसलने का रिस्क बराबर है |

पहले भी साइड अपर बर्थ का हाल यह था की "पैर फैलाओ तो दीवार से सर लगता है " मुझे यकीन है कि यहपंक्ति शायर ने साइड अपर बर्थ में बैठकर लिखी होगी | अब एक लाइन और जुड़ गई है "सर उठाओ तो से दीवारछत लगती है" | |अब वे दिन भूल जाइए जब पालथी जमाते हुए सीधे बैठकर, इत्मीनान से घर से लाई हुई पूडीसब्जी खाते थे | इसके बात दार्शनिक भाव से थोडी देर इधर-उधर मुआयना करते थे |

(बगल वाली अपर बर्थ में एक भारी तोंदवाला आदमी हर 5 सेकंड में उठाकर डकार मार रहा है, ऐसा वह 2 मिनट तक करता है इसके बाद 5 मिनट का नॉन-कोमेर्सिअल ब्रेक लेता है)

यह सिर्फ़ किस्मत की बात है की आपको साइड मिली औरऔर आप साइड इफेक्ट में गए | इसलिए आप तो अपनेसह-यात्रियों से ईर्ष्या से भरिये और ही रेलवे के चालूमैनेजमेंट को कोसिये | बस इतना शुक्र मनाइए की आपकोगठिया वात (arthritis) नहीं है एवं आपका वजन कम है (यदिऐसा हो तो ) और चुपचाप हठयोग साधे रहिये | यदि हठयोगके बारे में जानकारी हो तो सीज़न में जनरल बोगी में यात्राकरिए, वहां आपको सीधे व्यावहारिक शिक्षा मिलेगी | रामदेवजी से बहुत पहले से भारतीय रेलवे में हठयोग की मुद्राओं केप्रयोग बिना प्रचारित किए हुए चुपचाप चलते रहे हैं |

(सामान्य ज्ञान के लिए बता दूँ की रामदेव जी जो आसन करवाते हैं, वे सारे आसन हठयोग के आसन हैं | उनका महर्षि पतंजलि के योग विज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं है, पतंजलि ने कोई आसन प्रेसक्राइब किया था

जनरल डिब्बे में आपको हर तरह के आसन साधे हुए लोग मिल जायेंगे | शवासन से लेकर शीर्षासन तक | सिर्फ़ आसन ही नहीं प्राणायाम भी | यदि बचपन में दोस्तों के साथ साँस रोकने का खेल खेला हो या नदीतालाब में गोताखोरी की हो तो कभी जनरल बोगी के गेट में ठसने की कोशिश मत करियेगा | सिर्फ़अनुलोम-विलोम काम नहीं आएगा | कुम्भक और रेचन का दीर्घकालीन अभ्यास अनिवार्य वांछित योग्यता है

एक बार इसी तरह का दुस्साहस करके मैं गेट के अन्दर धंस गया | इसके बाद मेरे पैर को जमीन मिल रहीथी, सर को आसमान दिख रहा था | बस हठयोग की अभ्यास की वजह से अंगूठे के बल पर खड़ा रहा औरकुम्भक (साँस रोकना) की वजह से जीवित निकल आया और आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ |

| ) |
रेल प्रबंधन के दिमाग का कोई मुकाबला नहीं | अमेरिका वालों को पता नहीं, वे इतने बड़े संकट से जूझ रहे हैं, कोई उन्हें साइड मिडिल के मास्टर माइंड से सलाह लेने की सलाह क्यों नहीं देता | फ़िर देखिये कैसे बिना किसी खास कवायद के लाभ भी हो जायेगा, सुविधा भी बढ़ जायेगी, नई गाडियाँ भी चल जायेंगी | अमीर भी खुश, गरीब भी खुश, जनता भी खुश जनार्दन भी खुश | भारतीय रेलवे में सिर्फ़ सुपर फास्ट नाम भर रख देने से ट्रेन सुपर फास्ट हो जाती हैं, लेकिन पहुँचने में समय उतना ही लेती हैं जितना पहले लगता था | अब कोई क्या करे जब ट्रैक ही सुपर फास्ट वाला तो इसमे कोई कर सकता है | यह सब तो जनता की भलाई के लिए ही किया जाता है | ट्रेनों का नाम सुपर फास्ट रख देते हैं, तत्काल आरक्षण में सीटें बढ़ा देते हैं | प्रतीक्षा सूची वालों को गलियारे में सुलाते हैं और इधर तत्काल में सैकडों सीटें खाली रखते हैं | साइड अपर और साइड लोअर के बीच में साइड मिडिल बर्थ घुसेड देते हैं | लेकिन क्या हुआ किराया तो कम कर देते हैं |

अभी भी जनरल बोगियों की पर्याप्त कमी है, उसमें लोग भेड़ बकरियों की तरह चलते हैं, हठयोग की मुद्राएँ साधेहुए | एक बार मैंने चप्पल ढूढने के लिए सीट से नीचे सिर घुसेड़ा तो वहां दो आदमी शवासन में पड़े मिले | हिलाने पर पता चला कि निद्रासन में हैं | इस नई खोज पर मुझे आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई | गर्मी लगती है तोएसी में बैठिये | कौन कहता है कि जनरल में मरने जाइए | अरे रोटी नहीं है तो ब्रेड खाइए |

इस तरह भारतीय रेल हठयोग एवं प्राणायाम का व्यवहारिक विद्यालय है | जरूरत केवल इसके अहमियत कोपहचानने कि है |

नोट : चाय एवं इसके फार्मूले का जिक्र कर पाने के लिए खेद है |

चर्चा है की साइड मिडिल बर्थ 1 महीने में हट जायेगी | आमीन |

February 18, 2009

निक्कर की मार और चड्ढीया इजहार - रंग दे गुलाबी ..

हात्मा गाँधी अर्थात बापू के कई योगदानों में से एक 'लगे रहो मुन्ना भाई' फ़िल्म भी है, इसमें सत्याग्रह के प्रयोगों को आजमाया गया है | फ़िल्म के प्रभाव से कई छोटे-मोटे कैम्पेन चले थे, लेकिन उन्हें किसी ने ज्यादा भाव नहीं दिया | इस बार के गुलाबी चड्डी आन्दोलन ने मुन्ना भाई फिल्म को सार्थक और बापू के प्रयोग को एक बार फ़िर नवीन सन्दर्भ में सत्यापित किया |

चड्डी की अहमियत का पता सबको है, क्योंकि यही वह अन्तिम वस्तु है जो इन्सान को नंगा होने से बचाती है | लंगोट चड्डी का अग्रज / अग्रजा है (जो भी ठीक समझें चुने) क्योंकि कहावतें लंगोट पर मिलती हैं,चड्डी पर नहीं, जैसे - लंगोटिया यार, लंगोट का पक्का, लंगोट ढीली होना, लंगोट बांधना, भागते भूत की लंगोटी सही, एक ही लंगोटी में बाप और पूत आदि | भागते भूत की चड्डी सही कोई नहीं कहता क्योंकि भूत सिर्फ़ लंगोट बांधता था | अब जाकर चड्डी के दिन फिरे हैं लंगोट तिथिबाह्य हो चुकी है | हम लँगोट से वाया जांघिया होते हुए हाफ चड्डी तक पहुंच चुके हैं | फ़िर भी लंगोटिया यार का महत्त्व कम नहीं हुआ है, ऐसा आदमी मिलाना मिलना मुश्किल है जिसका कभी कोई लंगोटिया यार रहा हो लंगोटिया यार मतलब उस समय की दोस्ती जब हम लँगोट में होते थे |

चड्डीया इजहार तो फिल्मों, विज्ञापनों समुद्रतटों पर बहुत समय से प्रचलन में है, लेकिन मानव शरीर से आजाद करके चड्डी का इजहार करना और उपहार देना अपने आप में एक अनोखी घटना है | आंकडों से पता चलता है कि लगभग 3000 चड्डीयां पार्सल की जा चुकी हैं | अभी - अभी मैंने एक वेबसाइट पर देखा कि लगभग 35,000 लोग इसमें शामिल हो चुके हैं | गुलाबी रंग प्रेम और कोमलता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है, पहले प्रेम पत्रों को गुलाबी लिफाफों में भरकर भेजा जाता था | गुलाबी चड्डी आन्दोलनकारियों ने पार्सलों में गुलाबी चड्डी भेजकर पुराने प्रेम पत्र वाले दिनों की याद ताजा कर दी है | मोटी बुद्धि से तुलना करें तो पार्सल को यदि लिफाफा समझें तो "चड्डी" प्रेम पत्र हुई | इस प्रेम पत्र पर दिल, चुम्बन की मुहर, दिल चीरता हुआ तीर, दो चार प्रभावी शब्द के रूप में प्रेम का इजहार किया रहता है | यह इस भावना का इजहार है कि उन्हें "प्यार पे गुस्सा आता है और हमें गुस्से पर प्यार आता है |"

हिंसा के विरुद्ध विशुद्ध अहिंसक आन्दोलन | चड्डी आन्दोलनकारियों कि तरफ़ से इसका अर्थ यही है कि गुस्से और नफ़रत से भरे हुए लोगों ढाई आखर के साक्षर बनो| अभी तुम्हारी मानसिकता चड्डी से बाहर नहीं आई है और तुम सिर्फ़ प्यार का चड्डी संस्करण ही समझ सकते हो इसलिए कम से कम यहीं से शुरू करो | नफ़रत का निक्कर उतारकर प्रेम कि पिंक चड्डी धारण करो जिससे लोगबाग गा सकें - "जगह-जगह बात चली है पता चला है, चड्डी पकड़कर फूल खड़ा है, फूल खड़ा है|"

गुलाबी चड्डी गिरोह ने अपने आन्दोलन के नियमों को उदार बनाते हुए यह भी कहा है कि यदि पिंक चड्डी हो तो किसी भी रंग की भेज सकते हैं, क्योंकि सब लोग सब समय तो पिंक चड्डी पहनते नहीं और इसलिए नई खरीद कर ही दिए होंगे | अब यदि आप प्राप्तकर्ता को होने वाले आर्थिक लाभ का आकलन करेंगे तो ईर्ष्या होने लगेगी कि हमें क्यों चड्डी भेजी गई | यदि एक चड्डी 50 रुपये कि भी माने तो कम से कम 3000 चड्डी के हिसाब से मामला1,50,000 रुपये पर गिरता है, अब चाहें तो उन्हें बेचकर रूपया बना लें या चाहें तो पार्टी सेवक भी प्रयोग कर सकते हैं, किसी को पता भी नहीं चलेगा कि कैम्पेन वाली पहने हैं | भविष्य में शायद तक और भी वस्तुएं मिलें |

इन चड्डियों को रिसीव करने वालों ने प्रतिक्रिया दी है कि ऐसे चड्डी फेकने वाले किसी अच्छी सोसाइटी या आभिजात्य परिवारों से नहीं हो सकते | उसके जवाब में सवाल किया जा सकता है कि महिलाओं को सरेआम पीटने वालों कि पृष्ठभूमि क्या हो सकती है ? दूसरा तर्क है कि कश्मीर में जो महिलाओं के साथ चरमपंथी गुट ज्यादतियां करते हैं उन्हें चड्डी भेजने कि हिम्मत क्यों नहीं दिखाते तो उसका संभावित जवाब है कि इन सज्जनों कि गिनती अभी तक उन गुटों में नहीं है , सिर्फ़ इसीलिये| और फ़िर आप भी तो वहां जोर आजमाइश करने नहीं जाते |पब चलने वालों को क्यों नहीं पकड़ते |

क्या इन बहादुरों ने कभी भ्रष्ट अधिकारियों, माफिया या असामाजिक तत्वों के खिलाफ कोई देशव्यापी मुहिम छेडी है ? किसी गरीब लाचार और मजबूर को हक़ दिलाने के लिए लड़ाई की है ? इनकी सृजनात्मक उपलब्धि क्या है ?

आज भारत को किस चीज की जरूरत है ?

देश में
26 % लोग यानी २३ करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे गुजर कर रहे हैं |
अब गरीबी रेखा की परिभाषा पर भी गौर कीजिये | भारत सरकार ने गरीबी रेखा की परिभाषा दी ही की
540 रुपये महीने से कम की आमदनी | आकडों को देखने से पता चलता है की स्थिति कितनी भयावह है |
देश में २३ करोड़ लोग आज भी 25 रुपये रोज से भी कम पर गुजारा कर रहे हैं| यह एक कटु सत्य है - पेट प्राथमिक है, बाकी सब दोयम | गरीबी सारी सामाजिक बुराइयों की जड़ है | मूलभूत सुविधाओं का अभाव जीवन को बोझिल और संवेदनहीन बना देता है | ये तो हुए गरीबी रेखा से नीचे | इनसे दुगुनी संख्या उनकी है, जिन्हें हम गरीबी रेखा से ऊपर कहते हैं | उनकी आय सिर्फ़ इतनी है कि अपने बच्चों को कभी कभी वह सब्जी खिला सकें जो सबसे सस्ती हो , फल और दूध का तो नाम ही मत लीजिये |

निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग की हालत महगाई ने खस्ता की हुई है | जिन्हें एक- दो रुपयों के लिए किच किच करनी पड़ती |

अब बचे खाए पिए अघाये जीव (हम तो चाहते हैं की सारे हिंदुस्तान के लोग इसी हैसियत के हो जाएँ) | वो पब में जायेंगे, क्लब में जायेंगे उनके लडके बच्चे ऐश करेंगे | आख़िर आदमी रूपया कमाता किसलिए है | करने दीजिये | उससे किसी को कोई प्रॉब्लम नहीं | लेकिन उनकी संख्या कितनी है |

पबों-क्लबों में जाने वाले लोगों की संख्या कितनी है
| मान लीजिये मुश्किल से कुछ हजार | उसी के पीछे सारी ऊर्जा ख़त्म की जा रही है | भारत जैसे देश में इस तरह के मुद्दों पर सस्ती लोकप्रियता बनाना पाप जैसा है |

भारत की सभ्यता और संस्कृति किसी डंडे के जोर से नहीं बची हुई है | न ही किन्ही ठेकेदारों के कारण | वह स्वतः स्फूर्त ढंग से शरीर में आत्मा की तरह व्याप्त है | भारतीय संस्कृति का कपडों-लत्तों या पबों क्लबों से कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, यदि बिगड़ता तो यह कब की ख़त्म हो चुकी होती | यह अपनी अनंत समयोजिता के साथ अक्षुण है |
भारत की संस्कृति इसके महान मानवीय मूल्यों में है | पबों में जाने वाली महिलाओं को पीटने वाले अपने लड़कों बच्चों को वहां जाने से रोक पायेंगे ? न तो आप टेक्नोलॉजी कि त्वरित विकास को रोक सकते, न ही संस्कृतियों के संकरण को और न ही सामाजिक बदलाव को |

यदि कोई चीज ग़लत लगती है, तो उसकी बुराइयों को उजागर कीजिये | जन जागरूकता फैलाइए | यदि आपकी बात में दम होगा तो लोग समर्थन करेंगे, सोचेंगे | लेकिन यह तो सरासर गुंडागर्दी है की आप किसी को जबरदस्ती वह नहीं करने देंगे जो आप सोचते हैं कि ग़लत है | फ़िर आप में और तालिबानों में फर्क कहाँ है ?

जिस भारत देश की संस्कृति में नारी को देवी और जगत जननी जगदम्बा की संज्ञा दी गई है, उसे उसी संस्कृति की रक्षा करने का दावा करने वाले, नारी को सरेआम पीट रहे हैं | और वो भी किस चीज के नाम पर? जिसका अपनी संस्कृति से कुछ लेना-नहीं है | यह यौन पहरेदारी वाली मानसिकता केवल मध्य युग कि देन है | वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में सेक्स स्वस्थ और स्वीकृत था | सेक्स को लेकर कोई विकृति नहीं थी | यदि यकीन न हो तो पुराण पढ़ लीजिये | कामसूत्र पढ़ लीजिये |

यह तो एक इन्टरनेट कैम्पेन चला और यह कृत्य राष्ट्रीय आलोचना का विषय बना | वरना यहाँ तो रोज पता नहीं कितनी महिलाओं पर कभी तेजाब पड़ता है, कभी बिरादरी के द्वारा सरेआम नग्न किया जाता है, प्रेम के नाम पर तेजाब डाला जाता है, कभी दहेज़ के नाम पर और कभी कुल मर्यादा के नाम पर|

किसी ने कहा है कि - "किसी देश और आदमी के चरित्र का पता इस बात से चलता है कि वह अपने देश कि महिलाओं और बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं|"