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September 18, 2009

भारत में शिक्षा - 10 तथ्य

प्रस्तुत है भारत में शिक्षा से सम्बंधित कुछ संक्षिप्त और महत्वपूर्ण तथ्य :

1. भारत में 26 करोड़ 80 लाख निरक्षर लोग रहते हैं, जो लिखने, पढ़ने में बिल्कुल असमर्थ हैं | यह विश्व की कुलनिरक्षर जनसंख्या का तीसरा हिस्सा है |

2. भारत शिक्षा के ऊपर अपने सकल घरेलू उत्पाद (डीजीपी) उत्पाद का केवल 3.3प्रतिशत ही खर्च करता है, जबकि विकसित देश इसकी तुलना में 5.8 प्रतिशत खर्च करते हैं |

3. भारत के अधिकतर राज्यों में शिक्षा के कुल बजट का 95 प्रतिशत शिक्षकों के वेतन पर खर्च होता है, जबकि विद्यालय और अध्ययन सामग्री पर कभी-कभी 1 प्रतिशत से भी कम राशि खर्च होती है |

4 . विद्यालय जाने वाली 4 लड़कियों में से सिर्फ़ 1 ही दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी कर पाती है | बाकी 3 बीच में ही पढाई छोड़ देती हैं |


5. भारत में महिलायें औसतन 1.8 वर्ष की विद्यालयीन शिक्षा पातीं हैं |

6. सन् 2004 में स्कूल में भर्ती होने वाले 3 करोड़ 20 लाख बच्चों में से आधे भी 8 साल तक विद्यालय नहीं गए |

7. भारत में 1 करोड़ 30 लाख बालश्रमिक हैं | जिनके जीवन की कहानी उसी दिन लिख गयी थी जब वे पैदा हुए थे |

8. अनुशासन में कमी, अव्यवस्था और बदतर परिस्थितियों का आलम यह है कि 4 में से 1 अर्थात 25 प्रतिशत शिक्षक हमेशा कक्षा से अनुपस्थित रहते हैं |

9. भारत में कक्षाओं का औसत आकार 40 विद्यार्थी प्रति कक्षा है | जबकि बिहार और उत्तर भारत में औसत एक कक्षा में 83 छात्र/छात्रा तक पहुंचता है |

10. भारत के 75 प्रतिशत विद्यालयों में कई कक्षाओं के लिए सिर्फ़ एक ही शिक्षक होता है |

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दसवीं की बोर्ड परीक्षा का 2011 से वैकल्पिक किया जाना शिक्षा प्राणाली में परिवर्तन का प्रस्थान बिन्दु है ? मास्टर हों त दुई जन खांय ...से कोचिंग गुरुओं तक

Education in Bharat: Resuscitation is the need of the Hour

September 09, 2009

दसवीं की बोर्ड परीक्षा का 2011 से वैकल्पिक किया जाना शिक्षा प्राणाली में परिवर्तन का प्रस्थान बिन्दु है ?

जबसे दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा का 2011 से वैकल्पिक होने की ख़बर आयी है नौवीं कक्षा के छात्र बहुत खुश नजर रहे हैं | अगले शिक्षा सत्र से हाई स्कूल की परीक्षा वैकल्पिक हो जायेगी यह निर्णय शिक्षा नीति में किये जाने वाले एक बडे परिवर्तन की दिश में पहला कदम है

इस तरह छात्र-छात्राओं और अभिभावकों को एक बार ही बोर्ड परीक्षा के तनाव से गुजरना पडेगा इस नियम से सबसे अधिक खुशी हुई छात्र/छात्रों को और राहत उनके अभिभावकों को मिली 10 वीं बोर्ड परीक्षा के नाम से साल भर पहले से चलने वाले कोचिंग क्लासेस बन्द हो जायेंगे, जो बोर्ड परीक्षा की तैयारी की एक मोटी फ़ीस वसूलते थे कहीं-कहीं एक ही बार में पूरे साल भर की फ़ीस वसूल कर ली जाती है और कहीं यह दो या तीन किश्तों में ली जाती है

इस निर्णय से नुकसान यह हो सकता है कि छात्र उतनी गम्भीरता से पढाई नहीं करेंगे जितनी कि वे बोर्ड परीक्षा होने पर करते थे

अब प्रश्न उठता है कि छात्रों द्वारा 11 वीं कक्षा विषय के चुनाव किस आधार पर किये जायेंगे अभी तक दसवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर छात्र विषयों का चुनाव करते हैं सबसे अच्छे अंक प्राप्त करने वाले छात्र गणित, विज्ञान, कामर्स जैसे विषय लेकर आगे बढते हैं स्थान कम होने पर अंकों के आधार पर प्रावीण्यता सूची भी बनाई जाती है
लेकिन दसवीं बोर्ड की परीक्षा समाप्त होने पर अगली में विषय चयन का आधार क्या होगा ? क्या हमारे देश में इतनी पर्याप्त संख्या में विद्यालय और उनमें रिक्तियां हैं कि हर छात्र को बिना छंटनी प्रक्रिया से गुजरे उसका मनचाहा विषय पढने को मिल सके या फ़िर यह निर्णय उस योजना का पहल कदम है जिसमें 11 वीं कक्षा के विषय चयन में गणित और जीवविग्यान को साथ-साथ अनिवार्य करने की योजना है विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के लिये उच्च गणित और जीवविज्ञान अनिवार्य कर दिया जायेगा रसायन और भौतिकी तो दोनों के साथ अभी भी है ही

क्या बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक ला पाना वास्तविक समस्या है ? नहीं वास्तविक समस्या उच्च में प्रवेश के लिये पर्याप्त स्थान होने की है इस गला काट प्रतियोगिता में दशमलव के बाद के कुछ अंक चयन के परिणाम को निर्धारित करते हैं अच्छे अंक क्यों चाहिये ? जाहिर है अपना मनचाहा विषय लेकर आगे की कक्षा में प्रवेश के लिये लेकिन क्या बोर्ड की परीक्षा को समाप्त कर देने से इस समस्या का हल हो जायेगा

सबसे बडी जरूरत उच्च शिक्षा में और अधिक स्तरीय संस्थान स्थापित किये जाने की है जिनकी कमी की वजह से यहां प्रवेश पा सकने वाले छात्रों की बडी संख्या अमेरिका, आस्ट्रेलिआ और रसिया भागती है या फ़िर पत्राचार पाठ्यक्रम से काम चलाती है यह भी प्रतिभा पलायन का एक कारण है

तो जब तक छात्र/छात्राओं की संख्या के अनुपात में पर्याप्त सीटें नहीं होंगीं परीक्षा का हौवा तो बना ही रहेगा मूल्यांकन चाहे ग्रेड के आधार पर हो या प्रतिशत के आधार पर

इसीलिये कहा जाता है कि भारतीय युवा वर्ग डाक्टर, इन्जीनिअर, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक इत्यादि बनने के लिये मजबूर होता है बहुत कम ऐसे लोग होंगे जिन्होंने प्राप्त अंकों के दबाव से स्वतन्त्र अपना कैरियर चुना होगा जाहिर है ऐसे में जिसे जो होना चाहिये वह नहीं हो पाता और कैरियर का मतलब रोजी-रोटी हो जाता है कि वह कार्य जो हम अपनी पसन्द से करना चाहते हैं

हमारे शिक्षाविदों के लिये यह एक चुनौती भरा कार्य है कि अब वह ऐसी शिक्षाप्रणाली विकसित करें की दिशा में कार्य करे जो एक छात्र/छात्रा को उनकी पसन्द को विकसित कर उसी को अपना कैरियर बनाने के लिए तैयार कर सके |
अन्ततः शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के अन्दर छिपी श्रेष्ठतम प्रतिभा को उभारना ही है यह स्वयम की खोज है

मैने यहां कुछ बातें लिखीं हैं कृपया इस विषय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करें जिससे यह समझने में सहयोग मिल सके कि अधिकांश मित्र इस बारे में किस तरह के विचार रखते हैं यदि आपकी टिप्पणी के माध्यम से पर्याप्त सहयोग मिला तो अगली पोस्ट नाम सहित उन सारे विचारों को एक साथ रखा जायेगा
धन्यवाद
!

September 05, 2009

मास्टर हों त दुई जन खांय ...से कोचिंग गुरुओं तक

मास्टर हों दुई जन खांय |
लडिका हों ननिअऊरे जांय |

कोई सरकारी आदेश नहीं है जो शिक्षक दिवस पर लागू किया जानेवाला है | ये तो हमने 20-25 साल पहले अपने बड़ों को कहते सुना था | यह दीगर है कि मतलब हमें बहुत बाद में समझ में आया | वैसे ही जैसे स्कूल में घोटी हुई कई बातें बहुत बाद में किन्हीं-किन्ही मौकों पर समझ में आती रहीं | मतलब से हमें क्या मतलब | हम तो चार बड़े आदमी को जो कहते सुन लिए, उसी को आगे बढाते रहते हैं |

पर इतना जरूर है कि इन पंक्तियों के कहे जाने से अब तक मास्टरों ने लाखों दिन में करोड़ों पीरिअड ले डाले होंगे | और उनकी आय दो जन को खिला पाने वाले वेतन से छठवें वेतन आयोग तक पहुँच गयी हैं | तो क्या ये पंक्तियाँ तिथिबाह्या (outdated) हो चुकी हैं | पता नहीं |

पर इतना तय है कि राज्य सरकारों द्वारा अनुबंध पर रखे गए संविदा शिक्षको , शिक्षा कर्मियों , निजी विद्यालयों में पढाने वाले शिक्षकों और केन्द्रीय-नवोदय तथा राज्य सरकार के नियमित वेतन पाने वाले शिक्षकों की तुलना की जाय तो फर्क सीधे-सीधे इंडिया और भारत का दिखाई पङता है | एक तरफ़ मोटी पगार पाने वाले नियमित शिक्षक हैं तो उन्ही के सात तीन हजार पाने वाले उनके सहकर्मी भी | एक तरफ़ पूंजीपति निजी स्कूल के मालिकान हैं तो कभी-कभी दैनिक मजदूरी से भी कम पर काम कराने वाले उनके टीचर |

"शिक्षक राष्ट्र का निर्माता है" |

अपने स्कूली दिनों में इस विषय पर सभी ने लेख लिखें होंगे और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं में पक्ष या विपक्ष में बोला होगा | अरे बोला नहीं तो सुना तो होगा ही | हम भी कहते हैं कि निर्माता है | लेकिन भी निर्माता भी कई तरह के होते हैं | इ शिक्षक निर्माता काहे हुआ निर्देशक नहीं हो सकता था ? खैर निर्माता हो चाहे निर्देशक हमें तो फिलिम देखने से मतलब है | टिकिट लिए हैं तो पैसा तो वसूल ही करना हैं | चाहे ससुर पिक्चर कितनी ही बोरिंग क्यों न हो |

गाँव के प्राथमिक विद्यालय में एक निरीक्षक महोदय पहुंचे | उन्होंने बच्चों से प्रश्न किया -"नर्मदा नदी कहाँ से निकलती हैं ? तो बच्चों ने बताया की इलाहाबाद से | निरीक्षक गरम हो गया मास्टर के ऊपर | बोला तुम यही पढाते हो ? ये बच्चे लोगों को क्या गलत-सलत सिखाते हो | नर्मदा को इलाहबाद से निकालते हो ? मास्टर साहब बोले ऐसा है साहब की तोहरे इ पन्द्रह सौ रुपित्ती में नर्मदा अमरकंटक से न निकलिहैं | तो मतलब मास्टरी तबका में भी सामाजवाद लाने के जरूरत है | नहीं तो पता नहीं कौन निर्माता कहाँ से क्या निकलवा दे |

कहते हैं कि पहले जब पेन कापी नहीं था, तब भी भारत देश में शिक्षा का बड़ा जोर था | अब इस बड़े जोर समूह में कितने लोग पढ़ते थे | ये बात मत उठाइएगा नहीं झगडा हो जाएगा | बस ये समझ लीजिये की अपना देश पहले से ही 'गुरु' था | वो भी कोई आऊं-बाऊं नहीं विश्व गुरु | ये सब हमें अपने गुरूजी लोगों से पता चला था | हमारे गुरूजी को उनके गुरूजी से और उनके गुरूजी को उनके गुरूजी से | इस तरह चढ़ते चढ़ते हम वैदिक काल तक पहुँच जायेंगे |
बस वही आगे बढ़ा रहे हैं | इस तरह सदियों से ज्ञान रट्टा पद्धति के द्वारा हमारे देश में एक गुरु से दूसरे गुरु तक सफर करता रहा | जस का तस | स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि ज्यों का त्यों घोट लेते थे | जरा भी इधर उधर हुआ कि अयोग्य घोषित | एकदम से फेल हो गए | पूरक का कौनो नियम नहीं था | जो भी नतीजे या भतीजे निकालें वो सब पिछलों से मेल खाने चाहिए वरना शास्त्र द्रोही |

नुकसान ये हुआ कि पूरी शिक्षा पद्धति में रट्टा घुस गया | और सारी गुरुई के बावजूद ज्ञान माने सूचना हो गया | स्थिति को मद्देनजर रखते हुए देश के महारथियों ने मैकाले को गरियाने के साथ-साथ पचास साल में कई कमीशन बिठा डाले | लेकिन रट्टा हर जगह घुसा रहा और शिक्षाविदों के अचेतन में मैकाले भी |
नतीजा विद्यार्थियों के पीठ के ऊपर किताबों का बोझ बढ़ता रहा | सब कुछ लाद कर चलना है | पीछे का ज्ञान भी और अभी का ज्ञान भी | 8-10 किलो का बस्ता लादकर चलते हैं | इतना वजन तो हमारे समय में भी नही लादा जाता था | लगता है कि कुली गिरी की अभी से प्रैक्टिस करवाई जा रही है | अब बस्ता 10 किलो है, तो बस्ता फेंक कर सीधे टूशन के तरफ़ तो भागना ही पड़ेगा | पहले के बच्चे स्कूल के बाद खेल के मैदान में ही दिखाते थे | वो बात अलग है कि ओलुम्पिक में पदक नहीं ला पाये |

यदि आपको रट्टा प्रतिपादक विचार जरा ओवर लग रहा हो तो बताइए कि यह क्यों कहा जाता है कि "रट्टाफिकेशन इस दा बेस्ट प्रिपरेशन फॉर दा एक्सामिनेशन" |

मास्टर भी क्या करें !
विद्यावार्धिनी की कृपा के महत्व से कौन परचित नहीं है | बिना गुरु की छडी प्रसाद से विद्या लाभ नहीं होता | मास्टर जी को भी ऐसे ही हुआ था | ऐसे ही बच्चों को भी करवाएंगे | इस मुगालते में मत रहिएगा कि हम पुराणी बात कर रहे हैं | आज भी ऐसी घटनाओं से अखबार खाली नहीं हैं कि फलां मास्टर/मास्टरनी ने किसी शिष्य/शिष्या प्रसाद को इतना गुरु प्रसाद दे दिया कि वह अचेत हो गया या उसका अंग-भंग हो गया | बहुत से पुराने लोग इस कृपा प्रसाद को नबर्दाश्त कर पाने के कारण अनपढ़ रह गये थे |

कई शिक्षक इसलिए दुखी अवस्था में पाये जाते हैं कि अब विद्यार्थी शिक्षकों का उतना सम्मान नहीं करते | वजह वही कि एक परम्परापूजक शिक्षक अपने को शिक्षक नहीं गुरु समझता है | गुरुडम |
शिक्षक समझता है कि वह विद्यार्थियों को सिखाने के लिए तैनात किया गया है | उस पर श्रद्धा भाव रखा जाय |
"श्रद्धावान लभते ज्ञानं|"

जब तक शिक्षक को यह बोध नहीं होगा कि उसका काम "कुछ सिखाना नहीं बल्कि सीखने की 'प्रक्रिया' में मददगार बनना है" तब तक उसका दुःख कम होने वाला नहीं है |

जैसे सुकरात कहता था कि मेरा काम धाय(दाई) का है | जैसे दाई बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया में सिर्फ़ मददगार होती है | वह बच्चे को उत्पन्न नहीं करती | ठीक उसी तरह शिक्षक को भी बच्चे कि प्रतिभा को उभारना होता है जो कि उसके अन्दर पहले से ही छुपी हुई होती है | कितने शिक्षक इस बात को ध्यान में रखकर शिक्षा कर्म करते हैं |
यह आज के समय की विकट मांग है कि हमारे देश की शिक्षा कि पूरी प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है | यह एक शुभ संकेत है कि इस दिशा में कुछ साहसिक कदम उठाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं | और हम अपने वर्तमान मानवा संसाधन विकास मंत्री से कुछ सकारात्मक सुधारों कि आशा रखते हैं |

लिखने के लिए अभी हमारे दिमाग में बहुत चीजें कुलबुला रहीं हैं | लेकिन अभी हम स्वामी विवेकानंद की एक बात से बात ख़त्म करते हैं | विवेकानंद ने अपने किसी व्याख्यान में फटकारते हुए कहा था -

"तुम क्या समझते हो ?

पश्चिम की गरिमा उनके कपडों और फैशन में है ? उनकी गगनचुम्बी इमारतों और आलिशान जीवन शैली में है ?
नहीं
"पश्चिम (अमेरिका भी) का प्राण उसके विश्वविद्यालयों में है | अमेरिका के चंद विशवविद्यालय उसकी आत्मा हैं | उसकी शक्ति हैं | जहाँ रोज विज्ञान जन्म लेता है | रोज इस दुनिया के रहस्यों से परदा उठाने वाले शोधों के परिणाम आते हैं |" अमेरिका के चार विश्वविद्यालय नष्ट कर दो अमेरिका पंगु हो जाएगा |
ये विवेकानंद के उद्गार हैं |

लेकिन ये सब मनोरंजन के लिए हैं | इनको सिरिअसली लेकर टेंशन नहीं लेने का |

पढ़ते पढ़ते फट जाएँ बस्ते
पढ़ाई यूँ ही चलती रहे |
जीरो मिले या वन
बदलेंगे न हम
टीचर चाहे बदलते रहें |

Education in Bharat: Resuscitation is the need of the Hour