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January 11, 2010

संबंध - खुशियों की चाबी खुद की जेब में रखें

"मुझे याद आता है कि जब मैं एक छोटी सी लडकी थी , मेरी मॉं हमारे लिए नाश्ता और रात का खाना बनाया करती थी एक दिन की घटना मुझे खासतौर पर याद आती है जब मॉं ने एक पहाड जैसे दिन में कठोर थकाने वाला श्रम करने के बाद घर आकर हमारे लिए रात का खाना बनाया था कई वर्षों पहले की उस शाम को मेरी मॉं ने मेरे पिता के सामने खाने के लिए सब्जी , सलाद और जली हुई रोटियां परोसी थीं मैं इंतजार कर रही थी कि इस बात पर क्या कोई ध्यान दे रहा है, कि रोटियॉं जली हुई हैं लेकिन मेरे पिताजी अपने भोजन के लिए थाली के सामने बैठकर, खाने के लिए रोटी उठाते हुए मॉं को देखकर मुस्कुराये और मुझसे पूछने लगे कि आज मैंने स्कूल में क्या किया मुझे याद नहीं कि मैंने उस रात पापा से क्या कहा लेकिन पापा का जली हुई रोटी पर चटनी फैलाकर रोटी के कौर खाना मुझे अभी तक याद है

उस शाम खाना खाकर उठने के बाद मैंने मॉं को जली हुई रोटियों के लिए पापा से क्षमा मॉंगते हुए सुना । इस पर उन्‍होंने जो कहा वह मैं कभी नहीं भूल सकती - "प्रिय मुझे जली हुई रोटियॉं पसंद हैं "

दूसरे दिन मैंने जब पापा को रात में गुड नाइट बोलने गई और मैंने उनसे प्रश्‍न किया कि क्‍या आपको जली हुई रोटियाँ खाना सचमुच अच्‍छा लगता है ?

उन्‍होंने मुझे बाहों में भर लिया और कहने लगे "मेरी लाडली ! तुम्‍हारी मॉं आज पूरा दिन कडी मेहनत करने के बाद यकीनन काफी थकी हुई थीं । और एक जली हुई रोटी की ओर ध्‍यान देने की अपेक्षा किसी का दिल न दुखाना अधिक महत्‍वपूर्ण है । तुमको पता है बेटी ! यह दुनिया अपूर्ण वस्‍तुओं और अपूर्ण मनुष्‍यों से भरी पडी है । बल्कि यह अपूर्णताओं से ही बनी है ।"

मैं कोई बहुत अच्‍छी गृहिणी नही हूँ लेकिन वर्षों के अनुभव से मैंने सीखा है कि एक दूसरे के दोषों को स्‍वीकार करना और भिन्‍नताओं का आनंद लेना ही एक स्‍वस्‍थ और टिकाऊ संबंध का आधार है । जिससे कि एक जली हुई रोटी संबंधों के टूटने की वजह न बने । इस बात को हम किसी भी संबंध पति-प‍त्‍नी, माता-पिता दोस्‍त या रिश्‍तेदार पर लागू कर सकते हैं , क्‍योंकि एक दूसरे को समझना ही रिश्‍तों का मूल आधार होता है ।"

"कृपया अपनी खुशियों की चाबी , दूसरों की नहीं खुद की जेब में रखें । peace

यह एक दोस्‍त के द्वारा अग्रेषित की गई ईमेल का अँग्रेजी से हिन्‍दी अनुवाद है । मुझे अच्‍छी लगी इसलिए साझा किया ।

यह पोस्‍ट आपको उपदेशात्‍मक लगी या अच्‍छी लगी ?tepuktangan

December 30, 2009

रस्म-ए-ब्‍लॉगिंग भी है - नया साल भी है !

एक साल पूरा होने संबंधित कुछ ब्‍लॉग पोस्‍टों को देखकर याद आया कि हमने भी पिछले वर्ष दिसंबर महीने से ही हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग शुरु की थी । पिछली पोस्‍ट की पिछली पोस्‍ट में हमने इसका जिक्र भी किया था । इस पेशकश के साथ कि इस पोस्‍ट की साइज को नियंत्रित करने के लिए हम ब्‍लॉगरी के साल पुजने की गप्‍प किसी अगली पोस्‍ट में देंगे । निश्चित रूप से वह अगली पोस्‍ट यही है । senyum

इस पोस्‍ट के बहाने कुछ भूली बिसरी लिंक भी रख देंगे और भूलती हुई बातों को कभी जरूरत पडने पर देखने के लिए जमा देंगे । वरना एक साल में हमने कौन सा ऐसा तीर मार लिया है, जिसका जिक्र करके गौरवान्वित हुआ जाय । ब्‍लॉगिंग का यही फायदा है कि बिना तीर मारे भी हम तीरंदाजी करते रह सकते हैं । जैसे हर बच्‍चा अपने घर का हीरो होता है, वैसे ही ब्‍लागर का ब्‍लॉग उसके लिए प्रिय होता है ।

हॉलांकि हमारे प्रोफाइल में ‘सिन्‍स सितंबर 2008’ पाया जायेगा | लेकिन हिन्‍दी में ब्‍लॉग लिखना हमने दिसंबर महीने से ही शुरू किया था । सितंबर में केवल ब्‍लॉग का शिला(Sign up) न्‍यास हुआ था । उस समय हमें यही नहीं पता था कि हिन्‍दी में भी ब्‍लॉगिंग की जाती है । इंटरनेट पर सबसे पहले हमने ऑरकुट पर ट्रांसलिट्रेशन से हिन्‍दी लिखी । फिर हिन्‍दी ब्‍लॉग खोजने पर गूगल सान्‍ता ने चिटठाजगत और ब्‍लागवाणी से परिचय कराया । बडा आश्‍चर्य हुआ देखकर कि हिन्‍दी में तो हजारों ब्‍लॉग हैं और हमे पता ही नहीं । हम अपनी हिन्‍दी की पहली पोस्‍ट उसे मानते हैं जिस पर हिन्‍दी ब्‍लागरों की स्‍वागत टिप्‍पणियॉं हैं । यह नए वर्ष की कविता है – नया वर्ष मंगलमय हो ! इस कविता को नव वर्ष की शुभकामना के तौर पर इस पोस्‍ट के अंत में भी दे रहे हैं । शुभकामनाऍं कभी पुरानी नहीं पडतीं | समय जैसा भी हो मनुष्‍य उम्‍मीद रखना चाहता है और शुभकामानाऍं देना चाहता है । क्‍योंकि मनुष्‍य कल्‍पना कर सकता है और चीजों को बेहतर करना चाहता है ।

इसके पहले भी हमने कुछेक पोस्‍ट लिखी थीं | लेकिन वह ऐसी ही थीं कि 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' । क्‍योंकि ब्‍लॉग संकलकों ब्‍लॉगवाणी और चिटठाजगत से परिचय नहीं हुआ था । वजह, हमें किसी भी एग्रीग्रेटर की जानकारी नहीं थी । तो पहले के ग्रामीण रिवाज के अनुसार जिस दिन बच्‍चा स्‍कूल में दाखिला लेता था, वही उसकी जन्‍म तारीख होती थी | हमारे ब्‍लॉग का भी आगाज उस दिन से माना जायेगा जिस दिन हमारी पोस्‍ट पर हिन्‍दी ब्‍लॉगरगणों ने टिप्‍पणियॉं दी थीं । इसी रिवाज के अनुसार गॉंव के उन छात्र/छात्राओं की जन्‍म तारीख ज्‍यादातर एक जुलाई होती थी । जिनके अभिभावक पढे लिखे नहीं होते थे । कई बार तो पढे लिखे लोग भी तारीख याद रखने का कष्‍ट नहीं उठाते थे । क्‍योंकि ऐसे अभिभावकों को यह तो याद रहता था कि जन्‍म पुन्‍न्‍मासी को हुआ कि अमावस को लेकिन अँग्रेजी महीने की तारीख याद नहीं रखते थे । तो मास्‍टरजी या तो 1 जुलाई या फिर स्‍वविवेक से 30-31 विकल्‍पों में से कोई एक डेट ऑफ बर्थ चुन लेते थे ।

हमारी ब्‍लॉगिंग की शुरुआत अर्न फार ब्‍लॉग साइट से हुई थी । इस साइट जानकारी हमें साइट की एक मेम्‍बर के मेल से हुई थी जो कि शायद इबीबो से उसे मिली होगी । हमारे लिए यह ब्‍लॉगिंग का ऑफर था, वह भी पहला ।

यह वह समय था जब ओलंपिक खेल चल रहे थे ! हमने वहॉं अपनी पहली पोस् लिखी !
“Triumph is mirage struggle is realty” ! यह एक लघु पोस्ट थी |

एक और मासूम पोस्‍ट जो हमने अर्न4ब्लॉग‍ पर लिखी थी, उस ब्लॉग पर चर्चित हुई थी ; "Sisters and Brothers - Who is not innocent in the den of फोक्स" मासूम इसलिए कि साल भर बाद साल भर पहले कि लिखी पोस्टें मासूम लगाने लगाती हैं !

हम नौसिखिया थे और अंग्रेजी में हमारा हाथ तंग था / है गूगल ट्रांसलिटरेशन की जानकारी के बाद हिन्दी में पोस् देने लगे फिर गूगल से खोजते हिन्दी ब्लॉगिंग का मिलना ऐसे ही था जैसे विदेश में कोई अपने देश का आदमी मिल जाय अपने शहर में मिलने पर उससे हम भले बोलते पर विदेश में मिलने पर लगता है जैसे कोई परम आत्मीय मिल गया हो हॉलॉंकि अर्न करने लायक प्वाइंट पूरे होने से पहले ही हम वहॉं से टर्न फॉर ब्लॉगस्पाट हो गए थे फिर भी हमने कई महीने वहॉं जमकर ब्लॉगिंग की वहॉं ब्लॉग पोस् करने और पोस् पर कमेंट करने के भी अंक मिलते थे पहले तो हमने अँग्रेजी में पोस् लिखे फिर जैसे ही हमें गूगल ट्रांसलिटरेशन का इल्हाम हुआ हम तुरंत हिन्दी मोड में गए

ब्‍लॉगर में आते ही अर्न फॉर ब्‍लॉग छूट गई । शुरू शुरू में यहॉ भी हमने अँग्रेजी में ट्राई किया । लेकिन जैसे ही हिन्‍दी बिरादरी का पता चला हम भी अपनी आवाज में चिल्‍लाने लगे । तदनंतर इस ब्‍लॉग को हमने हिन्‍दी ब्‍लॉग बना दिया और अपनी अदर्शनीय अँग्रेजी वाली जो भी 2-3 पोस्‍टें थीं , चुपचाप वैसे ही डिलीट कर दीं जैसे कोई बच्‍चा अपने काट-पीट किए हुई नोटबुक के पन्‍ने सफाई से फाड देता है ।

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में प्रवेश करने पर हमारी दूसरी पोस्‍ट थी - लो हम भी आ गए नए साल के साथ । हॉलांकि हमारी सक्रियता 4-5 महीने के बाद हुई क्‍योंकि शुरू शुरू में हम ज्‍यादा ब्‍लॉग नहीं पढते थे ।

नव वर्ष पर मैं अपने सभी ब्‍लॉगर साथियों को हार्दिक शुभकामनाऍं प्रेषित करता हूँ । साथ ही ब्‍लॉग पर आने, पढने और अपनी अमूल्‍य टिप्‍पणी देकर मेरा उत्‍साहवर्धन करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ।

मैं अपने उन सभी ब्‍लॉगर मित्रों को धन्‍यवाद देता हूँ जो बार-बार आकर मेरे ब्‍लॉग के पाठक और टिप्‍पणीकार बने|

नए वर्ष में ब्लॉगिंग के लिए यही शुभकामना है कि हम गैर जरूरी बहसों में उलझें और व्यक्तिगत आक्षेपों से बचें यदि व्यक्तिगत आक्षेप हों भी तो कम से कम सामान् शिष्टचार के दायरे में ऐसा होने पर बहस प्रयोजनहीन और तू-तू, मैं-मैं या देख लेने के स्तर तक पहुँच जाती है हम ब्लॉगरों को कम से कम भारतीय राजनीति की अपेक्षा उच् नैतिक स्तर बरकरार रखना चाहिए क्योंकि कोई भी 'शब्' उससे संबंधित व्यक्तियों के आचरण से निम् या महान बन सकता है जैसे नेता एक समय में बहुत ही सम्मानित और गौरवपूर्ण शब् था सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित् को हमने नेताजी का संबोधन ही दे दिया लेकिन आज नेता शब् में कोई महानता नहीं मालूम पडती है बल्कि एक गाली जैसा लगता है हर ब्लॉगर यह बात महसूस कर सकता है कि नहीं ? ‘ब्लॉगरशब् को हम क्या छवि और विश्वसनीयता देते हैं यह आज के ब्लॉगर पर निर्भर करता है कम से कम कोई भी ब्लॉगर अपने समाज के प्रति गैर जिम्मेवार तो नहीं ही कहलाना चाहेगा अपने न्यूनतम स्तर पर गंदगी करना भी सफाई रखना माना जाता है


तो प्रस्‍तुत है नए वर्ष की मंगलकामनाओं से ओतप्रात यह कविता जो इस ब्‍लॉग पर मेरी पहली ब्‍लॉग पोस्‍ट भी है ।

नव वर्ष कि प्रभात रश्मियाँ, बीते कल के तम को लीलें,
सदिच्छाओं के सुयोग , से सबका जीवन सुखमय हो,

बीते वर्षों से कुछ सीखें , अपने में कुछ करें सुधार,
अन्दर का अँधियारा , भागे अंतरतम के शिव की जय हो,

शान्ति और सद्भाव बढे अब, प्रेम और विश्वास बढे अब
ईर्ष्या-द्वेषों के घन छाँट जाएँ, नव युग का वो सूर्य उदय हो

प्रगति की अंधी भाग दौड़ में कहाँ जा रहें हैं हम सोचें,
उन्नति अवनति की परिभाषा अच्छा हो जो पहले तय हो,

जात पांत के फेर न पड़कर इंसानों से प्यार करें हम,
सब के सुख में अपना सुख हो ऐसा अपना विश्व प्रेम हो !

नव वर्ष मंगलमय हो !
celebratecelebratecelebrate
rosrosrosmalusenyumstaradacall

October 20, 2009

पावर की प्रॉब्लम

पावर है तो सब कुछ है पावर नहीं है तो सब कुछ भी कुछ ना होने के बराबर है । पावर के शाब्दिक अर्थ तो बहुत हैं पर अर्थ जो ध्वनित होता है एक ही है - ताकत, शक्ति ।

इस ताकत को प्राण या जान भी कहा गया है । जिसे अभी भी विग्यान को समझना बाकी है ।
जब पावर माने बिजली होता है तो वह बिजलीधारी जीवों की आत्मा है । सब बिजली और बैटरी से चलने वाले उपकरण बिजली चालित जीव हैं । बिना बिजली के ये सब निर्जीव हैं । पावर नहीं होने पर आदमी सीधे आदिम युग में पहुंच जाता है । मनुष्य की सभ्यता का विकास शक्ति और उसको अपने ढंग से उपयोग में लाने का विकास है ।
जैसे आदमी ऊर्जा को शक्ति में बदलकर उपयोग में लाना सीख गया । विकास होता गया । बिजली वाली पावर के संकट का सामना तो हम कर ही रहे हैं ।

समाज के सारे विमर्श पॉवर के विमर्श हैं ।
स्त्री-पुरुष, शासक-शासित, नौकर-मालिक, अमीर-गरीब, अफ़सर-मातहत में मुख्य अन्तर पॉवर का ही है ।
कई उन्नत सभ्यतायें पॉवर हीन होने की वजह से नष्ट हो गईं ।
पावर शारीरिक भी होता है और मानसिक भी । लेकिन जो भी हो पॉवर अन्ततः निर्णायक होता है ।
धर्म और ईश्वर से भक्त या श्र्द्धालु का "प्रेम" वस्तुतः ताकत के प्रति प्रेम है ।
यह बहस और विवाद की बात हो सकती है ।
क्या कोई शक्तिविहीन ईश्वर को प्रेम करना पसन्द करेगा ? तुलसीदास जी ने तो कह ही दिया है की "भय बिन होय न प्रीत" ।

धर्म का विकास ही वास्तव में ताकत के तुष्टीकरण के रूप में हुआ है ।

ताकत ही ऊंच-नीच का भेद पैदा करता है । श्रेष्ठ हमेशा ताकतवर होता है या उसके अन्दर किसी न किसी रूप में शक्तिशाली होने का भाव होता है ।
और इस विषमता का संग्यान भी ताकत के द्वारा ही लिया जाता है ।

प्रेम, नैतिकता और मानवता पॉवर को दरकिनार करके व्यवहार करने की शिक्षा देते हैं । यहां भी शक्ति ही है पर यह सृजनात्मक शक्ति है ।

इस तरह शक्ति के दो विरोधी रूप सतत कार्यरत रह्ते हैं । परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक ।

एक - सृजन , दो - विनाश ।

कहा जाता है कि आदमी की असली पहचान तब होती है जब वह पॉवर में होता है । इसी को दूसरे ढंग से कहा जाता है की जब वह सत्ता में होता है ।
शक्ति एक विरेचक भी है जो आदमी की छिपी हुई कामनाओं को तुरन्त बाहर ला देती है । दीन-हीन अवस्था में आदमी सेफ़-मोड में रहता है ।
अपने गुस्से वगैरह को औकात में रखे हुए । पॉवर में आते ही उसका व्यवहार एकदम से बदल जाता है । इसका उल्टा भी होता है ।
मतलब पॉवर के जाने से भी व्यवहार उतना ही जल्दी उलटता है । यह कहा जा सकता है की ताकत इन्सान के व्यवहार को भी निर्धारित करती है ।
अच्छा आदमी वही कहा जाता है जो ताकत में होने पर भी उसका एहसास ना कराये । यदि आप बन्दूक रखे हैं तो दिखाइये मत ।
अगले को यदि आपकी ताकत का पता नहीं चलेगा तो वह डरेगा क्यों । ताकत को नियंत्रित कर पाना ही असली ताकत है । यही ताकत विकास और सृजन करती है ।

ताकत प्रेम की तरह स्वयं अपने आप में उपयोगी नहीं है, बल्कि इसका महत्व इसका उपयोग कर लेने में है । कहने का मतलब यह आपको आनंदित नहीं करेगी यदि आप इसका उपयोग ना करें । इसीलिये ताकतवर आदमी या तो भगवान बन जायेगा या शैतान बन जायेगा । अर्थात किसी न किसी रूप में ताकत को विसर्जित करेगा ।

शक्तिहीन हो जाने पर सूर्य , तारे यहां तक की आकाश गंगा भी शून्य़ में विलीन होने लगती हैं ।
इस लेख के अन्त तक पहुंचते पहुंचते ऐसा लग रहा है कि जिस तरह वैयक्तिक चेतना मनुष्य के रूप में शक्ति को मनचाहे ढंग से प्रयोग करने के क्रम में पहिए के आविष्कार से शुरू करके सूक्ष्म उपकरणों से गुजरते हुए स्वचालित कृत्रिम बुद्धि तक विकास करती जाती है , ठीक उसी तरह समष्टि चेतना भी एक कोशिकीय जीव से लेकर पादप और जीव जगत में विकास करते हुए मनुष्य के अति उन्नत मस्तिष्क तक पहुंचती है ।

और अन्ततः व्यष्टि चेतना के द्वारा निर्मित स्वचालित कृत्रिम बुद्धि अपने उच्चतम शिखर पर मानवीय बुद्धि से अंशतः समायोजित होकर मशीनी मानव
का निर्माण करती है ।

September 24, 2009

क्लासिकल गप्पी

क्लासिकल गप्पी जब बोलना शुरू करता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई भारी दरवाजा धीरे से खुल गया हो ।

हर क्लासिकल वस्तु की तरह क्लासिकल गप्पी भी एक दुर्लभ घटना है । इस तेजी और यूज ऐन्ड थ्रो के जमाने में वैसे भी अब क्लासिकल या कालजयी रचनाओं की संख्या कम होती जा रही है । उसी तरह बतियाने की शैली भी बदलती जा रही हैं । यह समय का प्रभाव है ।

कोई भी छोटी से छोटी या बडी से बडी चीज "समय" की एक "घटना" है क्योंकि वह अपने समय का पूरा प्रभाव लिये हुए होती है । जैसे पुराने लोगों से मिलिये वे हर चीज को बडे विस्तार से बतायेंगे । शॉर्ट कट में उन्हें विश्वास नहीं । यदि आप उनसे पूछेंगे की कहां गये थे आप, तो वे आपको पूरा विवरण देंगे । कैसे गये, क्यों गये, रास्ते में कौन-कौन मिला, मिलने वालों का विवरण इत्यादि भी मिल सकता है । यह ढंग सूचना क्रांति से पहले पैदा हुई पीढी में ज्यादा प्रचलित था | लेकिन अभी भी दुर्लभ प्रजाति के रूप में ऐसे लोग पाये जाते हैं |

बात करने के ढंग के आधार मनुष्य को कई वर्गों में बांटा जा सकता है । जैसे कम बोलने वाले, ज्यादा बोलने वाले, बहुत ज्यादा बोलने वाले, औसत बोलने वाले । सबकी अपनी अपनी विशेषता होती है , लेकिन मैं यहां बात क्लासिकल गप्पी की कर रहा हूं । क्लासिकल गप्पी कभी उपदेशात्मक नहीं होता । वह घटनाओं के प्रति बिल्कुल तटस्थ रहता है । सभी क्लासिकल गप्पी जन्मजात किस्सागो होते हैं । उन्हें प्रयास करके या पूर्व योजना से नहीं बोलना होता । बस एक बार किताब खुली कि उपन्यास की तरह कल्पना और यथार्थ का घाल-मेल उत्पाद आपके सामने प्रस्तुत । हां, क्लासिकल गप्पी की बातें उपन्यास की तरह ही होती हैं । उपन्यास में एक मुख्य कहानी के साथ-साथ कई सहायक कहानियां चलती रहती हैं जैसे पेड का एक मुख्य तना और उसकी शाखायें । ठीक उसी तरह क्लासिकल गप्पी का भी एक मुख्य विषय होता है, जिसकी वजह से उसने बोलना शुरू किया था । आपने पूछा कि क्या हाल चाल है तो वह सीधे नहीं कह देगा कि अच्छा या बुरा है । उसकी तो नौबत ही नहीं आयेगी क्योंकि शायद ही कभी कोई क्लासिकल गप्पी के क्लाइमेक्स तक रुक पाता हो । क्लासिकल गप्पी का जीवन घटना प्रधान होता है . साधारण आदमी बड़े-बड़े काम कर लेगा, दूर-दूर की यात्राएं कर लेगा लेकिन उसके जीवन में मुश्किल से तीस मार खां बताने लायक घटना घटेगी . क्लास्सिकल गप्पी बाजार भी गया तो कुछ न कुछ विशेष घट जाएगा . जैसे यदि मेरा क्लासिकल गप्पी दोस्त कॉलेज गया तो उसको या तो कोई विदेशी पर्यटक रास्ता पूछने वाला मिल जाएगा या तो कोई बेल स्मार्ट लड़की टकरा जायेगी । फ़िर शुरू हो गयी कहानी । हम तो समझ रहे हैं लेकिन अगला पूरे गंभीरता से सुन रहा है । उनके हर यात्रा में एक बेल स्मार्ट लड़की और कुछ खलनायक होते हैं ।जब वे कुछ लोगों के बीच में बोलते थे तो हम इन्तजार करते थे कि अब कोई बेल स्मार्ट आने वाली है । एक बार उन्होंने हम जैसे कुछ मित्रों से कहा कि वे एक उपन्यास लिख रहे हैं । उसकी कहानी का सारांश भी उन्होंने बताया । कहानी हम लोगों को बहुत पसंद आयी । तब तक हम ने दिलीप कुमार और राजकुमार की सौदागर फ़िल्म नहीं देखी थी । कुछ दिनों के बाद जब हमने वह पिक्चर देखी तो उनकी बताई हुए कहानी की याद आ गयी । जब उपन्यास के बारे में पूछा गया तो भाई ने बताया कि उनकी मम्मी ने धोखे से उसे रद्दी वाले को बेच दिया । अब कोई क्या कहे ।

क्लासिकल गप्पी कभी जल्दी में नहीं बोलता । इत्मीनान से अपनी बात कहता है । ना ही चार लोगों की महफ़िल में बीच बीच में उचक उचक कर बोलता रहता है । लेकिन एक बार बोलना शुरू कर दिया तो अगले को बोलने की संधि नहीं देता । उसकी बात में ऐसे कोई प्वॉइट भी नहीं रहते की कोई बीच में तर्क कर सके । क्योंकि उसकी बात चाहिये के अन्दाज में कभी नहीं होती ।

क्लसिकल गप्पी की याददाश्त बहुत तेज होती है । जीवन की हर छोटी बडी घटना उसे बकायदा याद रह्ती हैं । तेज याददाश्त की सबसे बडी वजह उन्ही घटनाओं को बार-बार दुहराते रहना भी है । एक ही बात को अलग-अलग ढंग से कई लोगों को बता चुके होते हैं । सुनने वाले को आश्चर्य होता है की इन्हें कितना याद रहता है ।

क्लासिकल गप्पी नये और पुराने परिचितों को समान रूप से शिकार बनाता है ।
क्लासिकल इसीलिये कहा गया है कि शिकार को पता नहीं चल पाता कि वह शिकार बन चुका है । हम क्लासिकल नहीं हैं इसीलिये बन्द करते हैं ।

August 09, 2009

भारत छोडो आन्दोलन : अगस्त क्रांति

जब मैं भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आन्दोलन भारत छोडो आन्दोलन के विषय में विचार करता हूँ तो मुझे बडा आशचर्य होता है, क्योंकि जिस भारत छोडो आन्दोलन या अगस्त क्रांति को भारतीय स्वतन्त्रता की अन्तिम महान लड़ाई कहा जाता है, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव इस हद तक हिलाकर रख दी थी कि अंततः वह उखड गयी, उसके शुरुआत का विरोध उस समय के लगभग सभी प्रमुख संगठनों ने किया था | यहाँ तक कि कांग्रेस भी धर्म संकट में थी और उसे मजबूरन गांधी जी कि इच्छा शक्ति के आगे झुककर 7 अगस्त 1942 को मुंबई के 'ग्वालिया टैंक' मैदान में, 'अखिल भारतीय कांग्रेस आन्दोलन' के दौरान हुई बैठक में गांधीजी के ऐतिहासिक 'भारत छोडो' आन्दोलन के प्रस्ताव को थोड़े-बहुत संशोधनों के बाद 8 अगस्त 1942 को स्वीकार कर लिया |

गाँधी जी ने कांग्रेस को अपने प्रस्ताव को स्वीकार करने की स्थिति में चुनौती देते हुए कहा - "मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खडा कर दूँगा |"

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की वर्धा बैठक में गांधीजी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला कि भारत में संवैधानिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है, जब अंग्रेज भारत से चले जाएँ |

जवाहर लाल नेहरू ने कहा - " हम आग से खेलने जा रहे हैं | हम दुधारी तलवार का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टे हमारे ऊपर भी पड़ सकती है |"

स्पष्ट है कि अगस्त 1942 के भारत छोडो आन्दोलन के मास्टर माइंड महात्मा गांधी थे | वही एक व्यक्ति थे जिनके मन में आन्दोलन शुरू करने के प्रति कोई संदेह नहीं था | बेझिझक | निस्संकोच | उन्होंने ही अगस्त क्रान्ति की मशाल में आग जलाई थी |

भारती राजनैतिक-धार्मिक संगठन उस समय भी भयानक रूप से बँटे हुए थे | अपने निहित स्वार्थों की वजह से उनमें असुरक्शा की भावना घर की हुई थी | वे अंग्रेजों के जाने से पहले सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते थे |

"अंग्रेज तो चले जायेंगे लेकिन हमें क्या मिलेगा" ठीक वही सोच विद्यमान थी जो १८५७ के विद्रोह और उससे पहले भारतीय सामंतों की थी | यहाँ मैं जानबूझकर सामंत शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ, क्योंकि सभी भारतीय राजे-राजवाडे अंग्रेजों के सामंत ही थे | 1857 से पहले कंपनी को और उसके बाद बितानिया हुकूमत को कर देकर प्रजा का शोषण करके अपनी विलासिता का साधन जुटाने वाले सामंत | भारतीय सामंत राजाओं की सोच वैसी ही थी जैसी वर्तमान राजनैतिक नेताओं की है - "हमारा राज (कुर्सी) बना रहे, बाकी सब चलता है | हमारा अस्तित्व सिर्फ़ कुर्सी में है|"

7 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक में हुए सम्मेंलन में गांधी जी ने लगभग 70 मिनट तक भाषण किया, उन्होंने कहा कि "मैं आपको एक मन्त्र देता हूँ - "करो या मरो" | बस इस बात का ध्यान रहे कि आन्दोलन गुप्त एवं हिंसात्मक न हो |

9 अगस्त को सुबह तड़के में ही कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिए गए | जनता ने स्वयं ही अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाले, सभाएँ कीं | स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आन्दोलन था जो नेतृत्व विहीनता के बाद भी उत्कर्ष पर पहुंचा | मुम्बई, अहमदाबाद एवं जमशेदपुर में मजदूरों ने संयुक्त रूप से विशाल हड़ताल की | संयुक्त प्रांत में बलिया एवं बस्ती, मुम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर एवं भार में कुछ भागों में भारत छोडो आन्दोलन के समय अस्थायी सरकार की स्थापना कर दी गईयूँ तो यह आन्दोलन सारे देश कमोबेश फ़ैल गया था लेकिन लेकिन सर्वाधिक प्रभावित क्शेत्र थे बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश , मद्रास एवं मुम्बई |

जय प्रकाश नारायण , राम मनोहर लोहिया एवं अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया | गांधीजी को पूना के आगा खान महल में तथा कांग्रेस कार्यकारिणी के एनी सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया | कांग्रेस को ब्रिटिश सरकार ने असंवैधानिक संस्था घोषित कर इसकी सम्पति जब्त कर ली और साथ में जुलूसों को प्रतिबंधित कर दिया | सरकार ने जब आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक लाठी एवं बन्दूक से दमन किया तो आन्दोलन हिंसात्मक हो गया |

तत्कालीन भारतीय राजनीतिक दलों में साम्यवादी दल ने इस आन्दोलन की आलोचना की | मुस्लिम लीग ने भी भारत छोडो आन्दोलन की आलोचना करते हुए कहा कि "आन्दोलन का लक्ष्य भारतीय स्वतन्त्रता नहीं, वरण भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना है, इस कारण यह आन्दोलन मुसलमानों के लिए घातक है | इस तरह मुस्लिम लीग अंग्रेजों की स्वामिभक्त बनी रही और हर तरह से उनकी सहायता की |
यही रवैया कट्टर हिंदूवादी संगठन "हिन्दू महासभा" एवं अकाली आन्दोलन का भी था | इन्होने इस आन्दोलन की आलोचना की | कांग्रेस के उदारवादियों को भी यह आन्दोलन रास नहीं आया | सर तेजबहादुर सप्र ने इस प्रस्ताव को 'अविचारित तथा असामाजिक' बताया | अम्बेडकर ने इसे 'अनुत्तार्दायित्व्पूर्ण और पागलपन भरा कार्य' बताया |

यह आन्दोलन भारत को स्वतन्त्रता तो नहीं दिला पाया , किन्तु इसके दूरगामी परिणाम निर्णायक हुए | इसीलिये इसे "भारत की स्वाधीनता के लिए किया जाने वाला अन्तिम महान प्रयास" कहा गया | इस आन्दोलन ने विश्व के देशों को भारतीय जनमानस के साथ खड़ा कर दिया |

इस तरह गाँधी जी ने अपनी दूरदृष्टि का परिचय देते हुए तमाम आतंरिक गतिरोधों और विरोधों के बावजूद इस महान आन्दोलन को वास्तविक किया | क्योंकि महात्मा गाँधी को अंग्रेजों की मक्कारी और अपने देश के राजनैतिक धार्मिक संगठनों की पद लोलुपता का एहसास हो गया था | उन्हें डर था कि कहीं ये संगठन स्वार्थ लोलुपता के चलते, स्वतन्त्रता की मांग को विलंबित न कर दें या कौन जानता है कि लालच में आकर अंग्रेजों से अलग-अलग खतरनाक समझौते ही कर लें | उधर द्वितीय विश युद्ध भी अपने चरम पर था | जर्मनी और जापान पूरी दुनिया को अचंभित किए हुए थे | गाधी जी नहीं चाहते थे कि भारत एक गुलामी से मुक्त होकर दूसरी गुलामी की जंजीर पहन ले अर्थात देश नाजियों की हाथ पड़ जाए |

जो भी हो 'भारत छोडो आन्दोलन' या 'अगस्त क्रांति ' महात्मा गाँधी के द्वारा लाई हुई आंधी थी, जिसने सारे अवारोधों को उखाड़ फेंका था | एक ऐसी आंधी जिसके साथ सबको चलना ही पडा था खुशी से या मजबूरन और जो इसके साथ न उड़ पाये वे सुरक्षित पनाहगाहों में छिपे हुए थे |

अगस्त क्रांति के परवानों को कोटि - कोटि नमन |

July 22, 2009

कट्टरता

कट्टरता एक बंद कमरे की तरह होती है, जिसमें कोई दरवाजा खिड़की या रोशनदान नहीं होता स्वाभाविक है कि ऐसे कमरे में सिर्फ़ घुटन होगी और सृजन का कोई भी बीज वहां अंकुरित नही हो सकता कट्टरता का मतलब होता है कि सिर्फ़ यही विचार सही है और बाकी सब ग़लत - "तुम मेरे शत्रु हो क्योंकि तुम मुझसे भिन्न मत रखते हो"
"मैं तुम्हे बर्दास्त नही कर सकता क्योंकि तुम्हारे ढंग मुझसे भिन्न हैं"
यह कट्टरता का मूल स्वर है इस तरह कट्टरता सोच विचार, संदेह और विमर्श के सभी रास्ते बंद कर देती है कट्टर दिमाग कभी सृजनात्मक नही हो सकता यह कहा जा सकता है कि कट्टर व्यक्ति कूप मंडूक के समान होता है

यह एक विरोधाभास है कि अपने सैद्धांतिक रूप में कट्टरता स्वयं की भी दुश्मन अर्थात आत्मघाती है, क्योंकि "यह दूसरे को बर्दास्त न कर सकने कि प्रवृत्ति है" |

कट्टरता के कई प्रमुख ठिकाने हैं, जिनमें धर्म सबसे महत्वपूर्ण है सबको पता है कि धार्मिक और जातीय कट्टरता के कारण मनुष्य को कितनी यातना सहनी पड़ी है वर्तमान कि घटनाओं को देखकर मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि हम आगे जा रहे हैं या पीछे जा रहें हैं |

कट्टरता एक आदिम प्रवृत्ति है आज विज्ञान के उत्तर आधुनिक काल में इसकी कोई आवश्यकता नही है |

आज के युवाओं और किशोरों का यह कर्त्तव्य है कि सहिष्णुता और भाईचारे के विचारों को अधिक से अधिक प्रचारित करें हम इस पृथ्वी पर अकेले जीवित नहीं रह सकते, हमें साथ साथ ही रहना होगा

हमें इतिहास से सबक लेना होगा और अपने तथाकथित बुद्धिमानो (जिनके प्रेम के सिद्धांत का परिणाम घृणा के अलावा और कुछ नही हुआ) के उपदेशों पर आँख खोलनी होगी
कट्टरता को रुढिवादिता भी कहते हैं, पोंगापंथ और कठमुल्लापन इससे मिलते जुलते शब्द हैं लेकिन यहाँ मैं एक विशेष बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ की कट्टरता पर किसी विशेष विचार का पेटेंट नहीं है मेरा मतलब धर्मं या भगवान को न मानने वाले अर्थात जो अपने को नास्तिक कहते हैं, जो अपने को अडवांस या अग्रिम मानते हैं, भी उतने ही कट्टर हो सकते हैं जितने की धर्मभीरु और पुरातनपंथी |

मेरे विचार से, किसी एक मत को सबके लिए स्थापित करने की सोच ऐसे ही है जैसे सबको एक ही नाप के कपडे या जूते पहनाने की कोशिश करना जो की हास्यास्पद और तकलीफदेह है विविधता को समस्या मानना और उसे ख़त्म करने की कोशिश करना, दुनिया को उबाऊ बनाने की कवायद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है |

लकीर के फकीर दो तरह के होते हैं - कुछ नए लोग जो सभी पुराने को कूड़ा मानते हैं, दूसरे वे पुराने जो कुछ नया (खासकर विचार) देखकर आक्रामक हो जाते हैं दोनों तरह की सोच खतरनाक है और समाज के लिए घातक है |

कट्टरता की सबसे बड़ी खराबी यह है कि इसमें समय के साथ अपडेट होते रहने की प्रवृत्ति और क्षमता का नितांत अभाव होता है | यदि युवा यह सीख सकें कि कोई भी विचार अन्तिम नहीं है, क्योंकि बेहतरी की गुंजाईश हमेशा रहती है तो हम समाज को अधिक समझदार और उदार बना सकते हैं एवं सतत विकासोन्मुख बने रह सकते हैं |

July 17, 2009

साहित्य, कला, आलोचक, आलोचना इत्यादि और लेंस |

चलिये आज आलोचक की ही आलोचना कर डालते हैंदूसरों का छिद्रान्वेषण कराने वाले के छिलके उतारना चाहिए | दिखाने वाले को ही देख लेते हैं ।

जैसे साहित्य या कला समाज को देखने के लिये सूक्ष्मदर्शी का काम करती है, वैसे ही आलोचक-समालोचक साहित्य-कला का सूक्ष्मदर्शी है | आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है कि साहित्य समाज का दर्पण है । बिल्कुल है लेकिन यह सभी घरों में पाया जाने वाला कोई आम दर्पण नहीं है, जिसमें आपका चेहरा ज्यों का त्यों दिखता है । यह दर्पण कैसा भी हो सकता है, रचनाकार जैसा चाहे आपके लिये दर्पण बना दे । जिसमें चीजें आडी, तिरछी, लम्बी, नाटी, मोटी, भोंडी, विकॄत कुछ भी दिख सकती हैं । यही काम भी है कलाकाओं या रचनाकारों का । यथार्थ को प्रकाशित करने के लिये कल्पना का सहारा लेना । चीजों को बडा करके दिखाना, जिससे हम वह भी देख सकें, जिसे हम सामान्यतः नहीं देख पाते ।

इसीलिये कला को 'लार्जर दैन लाइफ़' कहा गया है । सूक्षमदर्शी लेन्सों का संय़ोजन ही तो है । लेन्स जितने शक्तिशाली होंगे, उतना ही बरीक से बारीक चीजों को दिखा सकेंगे ।

साहित्य और कला से गुजरकर हम वह भी देख और सुन पाते हैं, जो हम अपने व्यवहारिक जीवन में ख्याल में नहीं आतीं बल्कि यहां तक कह सकते हैं कि होते हुए भी दिखाई नहीं देतीं । अर्थात साहित्य और कला हमारी अनुभूति की तीव्रता को बढ़ा देती हैं

इस तरह यथार्थ को प्रकाशित करने के लिये कल्पना का सहारा लेना पडता है । साहित्य-कला हमारी आंखों में उंगली डाल कर दिखा देते हैं , कि यह है ।

उदाहरण के लिये पालक और धनिया खेतों में लगी हुई हमने पहले भी कई बार देखी थीं, लेकिन जब हमने कविता "लह लह पालक, मह मह धनिया पढी" तो उसके बाद धनिया की महक और पालक की लहलाहाहट और बढ गई । ऐसा ही सभी चीजों में समझना चाहिये । कला और साहित्य हमारा ध्यान उन चीजों की ओर आकॄष्ट कराते हैं, जिन्हें हम रोज देखते हैं , फ़िर भी नहीं देख पाते । जैसे 'रूपहला धुंआ' पढने के पहले जल प्रपात सिर्फ़ चचाई का कूंडा था भर जो कि , अपने शहर के बीस-पच्चीस किलोमीटर पर है । पाठ्यपुस्तक में एक पाठ 'रुपहला धुआं' जिसमें चचाई का वर्णन है, पढने के बाद जब देखा तो और भी अद्भुत लगा ।

ये तो हुआ साहित्य । जो समाज का चरित्र दिखाता है । फ़िर साहित्य में ही साहित्य की माप तौल करने के लिये ही आलोचक होता है ।

आलोचक-समालोचक गुण-दोष की परख करता है । किसी रचना को हल्का या वजनी कर सकता है । आलोचक को तटस्थ रूप से अपनी बात रखने का प्रयास करना चाहिये । किंतु उसके भी अपने पूर्वाग्रह और झुकाव होते हैं । पसन्द-नापासन्द होती है । चाहे या अन्चाहे अच्छे या बुरे इरादे हो सकते हैं । वैसे साहित्य का मापदंड लोकप्रियता भी होती है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इसे रेटिंग कहते हैं ।

आलोचक-समालोचक गुण और दोष दोनों की परख करता है ।आलोचक को तटस्थ होना चाहिये । किन्तु आलोचक के अपने पूर्वाग्रह और झुकाव होते हैं । पसंद-नापसंद होती है । चाहे या अनचाहे अच्छे या दूषित इरादे हो सकते हैं ।

पाठक को सबसे ज्यादा सावधान और सजग रहने की जरूरत होती है, किसी रचना की आलोचना पढते समय । किसी की निंदा सुनते समय भी । पाठक के लिये सबसे बढकर निजी पसंद या नापसंद होती है ।

कभी-कभी थोड़ी सी बात कहने के लिए बहुत बड़ी भूमिका बांधनी पड़ती है | मैंने भी यहां पर यही किया |
किसी रचना को उसकी प्रसिद्धि या लेखक के प्रभाव में आकर नहीं पढना चाहिये । इस तरह का नजरिया रखने से अप्रसिद्ध रचनाओं को भी महत्व देते हुए, गम्भीरता से पढकर उनका आकलन कर सकते हैं ।

बडे आलोचकों द्वारा लेखन बनाए और मिटाए जाते हैं । रचनाओं को महत्व्पूर्ण और महत्वहीन बनाया जाता है । उन्हें क्रम में ऊपर और नीचे रखा जाता है | आलोचक प्रवृत्तियों का माहौल बनाते हैं | उन्हें चलन में ला सकते हैं, चलन से बाहर कर सकते हैं |

असफ़ल प्रेमी प्रेम के महाकाव्य लिखते हैं, असफ़ल खिलाडी अकसर अच्छे कोच साबित होते हैं । अब इसे आप जीवन की विडम्बना कहिये या क्षतिपूर्ति , उबाऊ या असफल लेखक अकसर बड़े आलोचक बन जाते हैं |

तो जब भी आलोचनात्मक रचनाएँ पढें तो अपनी दिमाग का पैराशूट जरूर खोले रखें |

May 14, 2009

नमस्ते !

यूँ तो नमस्ते या नमस्कार आज एक औपचारिक अभिवादन मात्र रह गया है, किन्तु यह एक शब्द पूरे भारतीय संस्कृत और दर्शन का सारतत्व समेटे हुए है । जब इस शब्द पर गहराई से विचार करते हैं, तो हमारा मन उन मनीषियों की आध्यात्मिक ऊंचाई और जीवन के प्रति उनकी अकूत समझ पर श्रद्धा से भर जाता है।

नमस्ते और नमस्ते करने की मुद्रा ठेठ भारतीय है । नमस्ते पर सारे भारतीय मत-मतान्तर वैदिक और अवैदिक, नास्तिक और आस्तिक, आर्य और द्रविड उसी प्रकार सहमत हैं जैसे समस्त भारतीय चिन्तन कर्म के सिद्धांत , पुनर्जन्म और ॐ पर सहमत हैं । चार्वाक को छोडकर ।

नमस्ते शब्द और नमस्ते करने की मुद्रा अद्भुत है । आइये इसके आध्यात्मिक पक्ष को समझने कि कोशिश करें ।

भारतीय धार्मिक परम्परा मूल धारा भक्ति की रही है । ध्यान और योग परम्परा की भी अपनी सत्ता थी, लेकिन वह केवल कुछ विशिष्ट वर्ग जैसे साधु-सन्यासियों तक ही सीमित थी । लोक मानस में भक्ति ही लोकप्रिय थी । आज भी है |

भक्ति में भाव ही प्रधान होता है । भाव का स्थल ह्रदय को माना जाता है। हालाँकि आधुनिक चिकित्सा शास्त्र मस्तिष्क को ही सारे ज्ञानात्मक अनुभव का केन्द्र मानता है, लेकिन यहां ह्रदय भाव का प्रतीक है ।

नमस्ते शब्द का यदि हम विश्लेषण करें तो इसका अर्थ इस तरह है :

नम = झुकना या नमन करना ।
अस = मैं ।
ते = तुम

अतः नमस्ते का शाब्दिक अर्थ हुआ कि मैं तुम्हारे सामने झुकता हूं या मैं तुम्हे नमन करता हूं ।

नमस्ते की मुद्रा इस विश्वास को प्रदर्शित करती है की प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय में दिव्याग्नि होती है जो कि ह्रदय चक्र में स्थित होती है ।

नमस्ते की आदर्श मुद्रा में हम दोनों हाथ जोडकर ह्रदय चक्र पर रखते हैं और सिर झुकाते हैं । यही प्रार्थना की मुद्रा भी है । यह क्रिया दोनों हाथॊं को जोडकर, हाथों को दोनों भौहों के मध्य(जहां त्रितीय नेत्र अवस्थित माना गया है) रखकर सिर झुकाते हुए और दोनों हाथ ह्रदय के पास लाते हुए भी की जा सकती है । यह बहुत ही गहन आदर प्रदर्शित करने का एक रूप है ।

नमस्ते की क्रिया ऐसी है की उसकी मुद्रा में ही नमस्ते का भाव छुपा हुआ है, इस तरह नमस्ते शब्द ना भी बोला जाये तो भी नमस्ते हो जाती है ।

एक तरह से नमस्ते व्यक्ति में छुपे हुए परमात्मा के प्रति भावाभिव्यक्ति है ।

नमस्ते करना ह्रदय से जुडने का प्रतीक है । नमस्ते विभिन्न व्यक्तियों के ऊर्जात्मक रूप से जुड़ने की विधि है | हमारे अहंकार का केन्द्र मस्तिष्क या मन है । जो व्यस्टि को समष्टि से अलग करता है । इस तरह नमस्ते अहंकार से मुक्त होकर ह्रदय से जुडने का आमन्त्रण है।

इसलिए नमस्ते कराने के फायदे ही फायदे हैं, लोक व्यवहार में भी और स्वयं से जुड़ने के लिए भी | इसलिए नमस्ते करते रहिये कोई प्रत्युतर में नमस्ते करे या नहीं |

नमस्ते !
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