यह सब मैं भगत सिंह और उनके साथियों के संबंध में कह रहा हूँ। उन्हे मारने का केवल एक ही तरीका था, उनकी मूर्तियॉं बनवा दो, उनकी पूजा करनी शुरु कर दो। हमारे देश में मानवतावादियों समतावादियों को खत्म करने का एक बहुत ही नायाब तरीका बहुत प्राचीन समय से निकाला हुआ है। जिसके विचारों से इत्तफाक न रखते हुए भी आप उससे लड़ न सको उसकी पूजा शुरु कर दो। उसे महान घोषित करो। लेकिन कभी भी उसके विचारों की बात मत करो। उसने क्या कहा था इससे कोई मतलब ही नहीं बल्कि अपनी बात उसके मुँह से कहलवाओ। उसके श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अपना एजेंडा पेश करो। जब साध्वी प्राची महात्मा गांधी के विरोध में और भगत सिंह के पक्ष में बोलती हैं तब उन्हें पता नहीं होता कि वह क्या कह रही हैं। वह कभी नहीं कहतीं कि भगत सिंह ने मैं नास्तिक क्यों हूँ नामक लेख लिखा था। साध्वी प्राची जैसे लोगों को लगता है कि भगत सिंह उन्हीं की तरह एक राष्ट्रवादी थे।
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March 23, 2015
February 14, 2011
फिर वही दिल(न) लाया हूँ
आज एक रि-पीट करने का मन है।
ब्लॉगिंग की भाषा में जिसे रिठेल कहा जाता है। यदि ब्लॉगिंग में पहली बार पोस्ट प्रकाशित करने के कृत्य को पोस्ट पीटना कहा जाए तो दुबारा उसी पोस्ट को उसी ब्लॉग पर प्रकाशित करने पर उसे रि-पीट कहा जा सकता है। इस तरह यह शब्द हिंदी और अँग्रेजी दोनों में समझने पर सही अर्थ प्रदान करता है। उसी प्रकार ठेल और रिठेल शब्द का प्रयोग भी तदनुसार ब्लॉगर जन करते हुए पाए जाते हैं। ज्यादातर बलॉगर पोस्ट ठेलते हैं। जैसे किसी नदी में कुछ ठेल दो। ठेल दिए गंगा जी में। पहुँच गई पोस्ट इंटरनेट के महासागर में। अंतर बस इतना है कि इधर रिठेल भी कर सकते हैं। नदी में किसी चीज की सिर्फ ठेल हो सकती है, रिठेल नहीं। यहॉं ठेल करने से रिठेल करने में सुविधा रहती है।
ब्लॉगिंग की भाषा में जिसे रिठेल कहा जाता है। यदि ब्लॉगिंग में पहली बार पोस्ट प्रकाशित करने के कृत्य को पोस्ट पीटना कहा जाए तो दुबारा उसी पोस्ट को उसी ब्लॉग पर प्रकाशित करने पर उसे रि-पीट कहा जा सकता है। इस तरह यह शब्द हिंदी और अँग्रेजी दोनों में समझने पर सही अर्थ प्रदान करता है। उसी प्रकार ठेल और रिठेल शब्द का प्रयोग भी तदनुसार ब्लॉगर जन करते हुए पाए जाते हैं। ज्यादातर बलॉगर पोस्ट ठेलते हैं। जैसे किसी नदी में कुछ ठेल दो। ठेल दिए गंगा जी में। पहुँच गई पोस्ट इंटरनेट के महासागर में। अंतर बस इतना है कि इधर रिठेल भी कर सकते हैं। नदी में किसी चीज की सिर्फ ठेल हो सकती है, रिठेल नहीं। यहॉं ठेल करने से रिठेल करने में सुविधा रहती है।
May 09, 2010
'मदर्स डे' का हल्ला
आज 'मदर्स डे' का हल्ला है । यह हल्ला हमें तब दिखाई पडा जब हम अपनी आदत के मुताबिक सुबह देर से सोकर जगे । अखबार में, एफएम रेडियो में, फिर जब इंटरनेट पर बैठे तो फेसबुक में ब्लॉग्स में, हर तरफ मदर्स डे से संबंधित बातें दिखाई पडीं । इससे हमें पक्का यकीन हो गया कि आज 'मदर्स डे' अर्थात अपनी अपनी मम्मी के प्रति भावुक होने , स्मरण करने और सबसे ऊपर इन बातों को प्रदिर्शित करने का दिन है । तो हमने सोचा कि क्यों न इसका फायदा उठाते हुए ब्लॉग पर एक ब्लॉग पोस्ट का इजाफा किया जाए । साथ ही अपने अमूल्य विचारों से हिन्दी ब्लॉग जगत को लाभान्वित किया जाए । यदि कोई मित्र लाभान्वित महसूस न करें तो एक टिप्पणी छोड दें । हम प्रतिटिप्पणी करके लाभानिवत करके ही मानेंगे ।
मदर्स डे के बारे में और अधिक जानकारी के लिए हमने गूगल जी से अनुरोध किया तो उन्होंने
सर्वप्रथम विकीपीडिया कोष में जाने की सलाह दी । वहॉं पर बताया गया है कि "
The modern Mother's Day is celebrated on various days in many parts of the world, most commonly in May, though also celebrated in March in some countries, as a day to honour mothers and motherhood. In the UK and Ireland it follows the old traditions of Mothering Sunday, celebrated in March.
Father's Day is a corresponding day honoring fathers. It was thought up in 1910 by Sonora Smart Dodd, after listening to a Mother's Day sermon.[1] "
इन्होंने फादर्स डे के बारे में भी जानकारी दी है । हर डे का एक दिन होता है । लेकिन आज मदर्स डे इसलिए उसी की बात की जायेगी ।
हालॉंकि हमें प्रायाजित डे वगैरह मनाये जाने में कोई रुचि नहीं है । खासकर जब यह डे रिश्तों से संबंधित हों । पर्यावरण दिवस , जनसंख्या दिवस या मद्य निषेध दिवस वगैरह वगैरह से इन विषयों से संबंधित जागरुकता फैलायी जाती है । उसी तरह रिश्तों के महत्व को बताने के लिए अलग अलग डे निकाले गए हैं । तो हालात यहॉं तक आ पहुँचे हैं कि मदर्स डे भी मनाना पड रहा है । जिससे लोग मॉं के महत्व और उसके द्वारा परिवार और समाज के प्रति योगदानों से परिचित हों । सही हो या गलत लेकिन मुझे व्यक्तिगत रूप से यह सब बहुत औपचारिक और बनावटी लगता है । या शायद यह सोच मेरी गॉंव , कस्बों वाली पृष्ठभूमि और वहॉं पायी जाने वाली हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूलों के प्रोडक्ट होने की वजह से हो । मॉं बाप भाई बहन को आप जितना भी प्यार करो लेकिन सीधे सीधे प्रेम प्रदर्शित करने वाले वाक्य नहीं बोले जा सकते भले ही कोई
अमेरिका में ही दस साल बिताकर आ रहा हो । आने वाली पीढी बोलेगी। अपनी अपनी सोच है । और हमारी सोच यह है कि इन सब रिश्तों की भावुकताओं को बाजारवादी ताकतें कैश कर रही हैं । एक एसएमएस पैक । कहने का मन करता है कि सब पैसों की चोचलेबाजी है । विडबंना यह है कि जो लोग स्त्रियों को औकात में रहने की नसीहत देते रहते हैं , वे भी मां का बहुत महिमामंडन करते रहते हैं । आधुनिक समय में एक और प्रवृत्ति पश्चिमी देशों में धीरे धीरे फैल रही है । इसके तहत औरतों को मॉं बनने में कोई फायदा नजर नहीं आता सिवाय झंझट के । इसलिए अब उधर की महिलाऍं बच्चे पैदा करने में ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखा रही हैं । जापान की जनसंख्या कम होती जा रही है , इसलिए वहॉं की सरकार ने बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन योजना शुरू की है ।
मुझे तो मदर्स डे मनाना मॉं के प्रति औपचारिक होने जैसा लगता है । वैसे भी यह अवधारणा पश्चिम की है , क्योंकि वहॉं के लोगों को मदर्स डे के मार्फत मदर्स को याद करना पडता है । खैर जो भी हो भारतीय लोगों में अभी भी मॉं के प्रति बेहद भावुकता दिखती है । व्यवहारिक धरातल पर सच्चा प्रेम करने वाली औलादें मॉं की परवाह और देखभाल के लिए एक दूसरे का मुँह नहीं ताकतीं ।
हमने मॉं के प्रेम से संबंधित जो सबसे प्रभावित करने वाली कहानी पढी थी , उसका सारांश हमें आज भी याद है । लेखक का नाम याद नहीं है और यह भी याद नहीं कि कब और कहॉं पढी थी ।
कहानी यूं थी कि एक मॉं का लाडला बेटा अपनी माशूका से बहुत ज्यादा प्यार करता था , जब उसने अपनी माशूका के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो उसकी माशूका ने एक शर्त रखी कि वह उससे शादी तभी कर सकती है जब उसका प्रेमी अपनी मॉं का दिल निकालकर लाए और उसके सामने प्रस्तुत करे । लडका प्रेम में इतना पागल था कि वह अपनी प्रे़मिका के लिए कुछ भी कर सकता था । वह भागा अपने घर की तरफ पहुचते ही मॉं की हत्या की और उसका दिल निकाल कर हाथ में लेकर दौडता हुआ अपनी प्रेमिका को भेंट देने के लिए उल्टे पॉव लौट पडा । हटबडाहट मे रास्ते में एक पत्थर से पैर टकरा जाने की वजह से वह लडखडाकर गिर पडा । तभी मॉं के दिल से आवाज आई - "बेटा तुझे कहीं चोट तो नहीं लगी" ! यह होता है मॉं का दिल इसीलिए कहा
गया है कि Mothers are all slightly insane. - J. D. Salinger
दुनिया में 'प्रेम' के बाद 'मॉं' ही ऐसा शब्द है , जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय है । ऐसा हमने कहीं पढा था ।
February 14, 2010
कृष्ण की धरती पर वेलेंटाइन आए
कृष्ण कन्हैया अपनी भारत भूमि पर प्रेम के इजहार के इस वेलेंटाइन दिन को देखकर मुस्कुरा रहे थे । कृष्ण की आदत है मुस्कुराने की मुस्कुराते ही रहते हैं । रुक्मणी ने सोचा कि लगता है इन्हें अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं । कुहनी मारते हुए बोलीं कि क्या बात है जी, बहुत मुस्कुरा रहे हो ? लगता है तुम्हें अपनी राधा और गोपियों के साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आ रहे हैं । ये बेचारे तो साल में एक दिन का इंतजार करते हैं । प्रेम का बाकायदा इजहार और अपनी हैसियत के अनुसार मैनेज करने के लिए । तुमने तो हद कर रखी थी रोज ही रास रचाते रहते थे और वो भी कोई एक नहीं पूरी गॉव की गोपियों के साथ । कुछ काम धाम तो था नहीं तुम्हारे पास । निठल्ले घूमते थे । यशोदा मैया ने खासा बिगाड रखा था तुम्हें । और मैंने सुन रखा है राधा नाम की तुम्हारी कोई खास थी ।रुक्मणी की बात सुनकर कृष्ण इस बार ठहाका मारकर हँस पडे । बोले रुक्मे ! मैं चाहे वेलेंटाइन के रूप में आऊं या कृष्ण के रूप में या राधा या मीरा के रूप में मैं किसी भी रूप में आ सकता हूँ प्रेम की हवा फैलाने । आज जब साजिश करके मेरे प्रेम के संदेश को बिल्कुल हवाई और अलौकिक कर दिया था, इस देश में तो मैं वेलेंटाइन जी के बहाने घुस आया हूँ , अधिक सांसारिक होकर । वैसे भी इस भारत देश की आदत हो गई है सेकंड हैंड चीजें इस्तेमाल करने की । यहॉं लाख दहाड मारकर चिल्लाते रहो कोई सुनेगा नहीं एक बार विदेशी समर्थन कर दें तो समझ लो कि हो गया काम । विवेकानंद से लेकर गॉधी से होते हुए ओशो तक यह बात बार बार दोहरायी जाती रही ।
रुक्मणी ने कहा - "मुझे लगता है कि आप ठीक कह रहे हैं । क्योंकि इन आशिकों के रंग ढंग भी कुछ आप जैसे ही
लगते हैं ।"
इस बार कृष्ण चौंक गए बोले कि मैं समझा नहीं तुम क्या कहना चाहती हो । रुक्मणी बोलीं कि "जैसे आपने प्रेम तो राधा से किया था लेकिन उसे प्रेम तक ही रहने दिया । शादी तक आते आते आपके प्रेम का भूत उतर गया और यह नेक काम आप राधा जैसी ग्वालिन से न करके पूरी दुनियादारी का परिचय देते हुए हम जैसी राजे-महाराजे की लडकियों से किया । "
"मैं मजबूर था रुक्में ..." कृष्ण ने बेबसी जाहिर करते हुए कहा ।
"और आपकी यह बेबसी आज भी कायम है इस समाज में । हर वर्ष वेलेंटाइन डे चकाचौध की तरह आता है । महानगरों बडे शहरों और टीवी चैनलों मे कौंध की तरह छाता है । रात में पी हुई मदिरा की तरह सुबह हल्के सिरदर्द के साथ उतर जाता है । दूसरी तरफ प्रेम करने वालों युवाओं को पंचायतों द्वारा सरेआम फांसी , आगजनी या पीटपीटकर मौत के घाट उतार दिया जाता है।"
यह सुनकर कृष्ण को इस तरह की कई घटनाएँ याद आ गईं । मन में यह सोचकर उन्हें राहत महसूस हुई कि अच्छा हुआ कि मैं पहले ही यह सब करके फुर्सत हो लिया हूँ । नहीं तो आज के समय में ब्रज में वह सब करता तो पता नहीं क्या-क्या भुगतना पडता ।
रुक्मणी ने आगे कहा कि "फकीरचंद से लेकर अमीरचंद तक के घरों में शादियां बाकायदा प्रायोजित होती हैं । प्रेम अपनी जगह शादी अपनी जगह । प्रेम टाइम पास के लिए ठीक है । ज्यादा सेंटी होने का जमाना अब नहीं रहा ।
इस तरह हम पूरे व्यवहारिक लोग हैं । हमारे यहॉं शादियॉं कुंडलियॉं तय करती हैं । कुंडली पंडित तय करते हैं और मंगली लडकी की शादी के लिए मंगला लडका ढूँढना पडता है । लडके लडकी विदेश में पढते या नौकरी करते हैं और देश में आकर बाकायदा कुंडली मिलान करके शादी करते हैं ।"
इस तरह हम पूरे व्यवहारिक लोग हैं । हमारे यहॉं शादियॉं कुंडलियॉं तय करती हैं । कुंडली पंडित तय करते हैं और मंगली लडकी की शादी के लिए मंगला लडका ढूँढना पडता है । लडके लडकी विदेश में पढते या नौकरी करते हैं और देश में आकर बाकायदा कुंडली मिलान करके शादी करते हैं ।"
"तब तो बडी मुश्किल हो जायेगी या तो प्रेम भी कुंडली मिलाकर करो नहीं तो प्रेम विवाह तो असंभव हो जायेगा ।
क्योंकि प्रेम तो लोग बिना आगा पीछा देखे ही करने लगते हैं ।"
यही एक समानता है वेलेंटाइन डे मनाने वालों और इसका विराध करने वालों में कि शादी के मुद्दे पर दोनों एक हो जाते हैं ।
"गालिब के अंदाज में आप इसे ऐसा कह सकते हैं कि दिल के बहलाने को वेलेंटाइन मियॉं ये ख्याल अच्छा है ।
लेकिन जो वेलेंटाइन डे मना रहा है वह अभी बच्चा है । इसलिए चिंता नहीं है क्योंकि बच्चा है तो बडा होगा ही और
बडा होगा तो जरुरी समझ भी आ ही जायेगी । फिर वह कुंडली मिलाकर शादी करेगा और वेलेंटाइन की जरूरत ही नहीं पडेगी ।"
"रुक्मणी ! एक मिनट ! अभी तुमने कहा कि कुछ लोग इसका विरोध भी करते हैं । वेरी इंट्रेस्टिंग ! वे कौन लोग हैं ? क्या वे शकुनी मामा या जरासंध की पार्टी के लोग हैं । जरा मुझे इसका खुलासा करके बताओ । तुम्हें इन सब चीजों के बारे में काफी अद्यतन जानकारी रहती है । मुझे तो आजकल राजकाज से ही फुर्सत नहीं मिलती ।" कृष्ण ने जम्हाई लेते हुए कहा ।
नहीं मधुसूदन ! वे आपकी जानकारी की किसी भी पार्टी के नहीं हैं बल्कि शिव जी और बजरंगबली जी के नाम
बनाए गए नए दल और भारतीय संस्कृति के पहरुए होने का दावा करने वाले वाले दलों के लोग हैं ।
बनाए गए नए दल और भारतीय संस्कृति के पहरुए होने का दावा करने वाले वाले दलों के लोग हैं ।
"क्या इन लोगों को भोले शंकर और हनुमान जी का समर्थन प्राप्त है ?"
इस बात पर रुक्मणी को हँसी आ गई । समझाते हुए बोलीं कि यह तो सिर्फ उनके दलों के नाम है । आशीर्वाद या समर्थन प्राप्त होने से इसका कोई संबंध नहीं । जैसे कल कोई आपके नाम से या श्रीराम के नाम से दल बना सकता है । लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि इन सबके पीछे आपका हाथ है या समर्थन प्राप्त है ।
"अच्छा" तो इन लोगों का एजेंडा क्या है । कहीं ऐसा तो नहीं कि ये मेरे समर्थकों को शिव और हनुमान और उनके स्वामी राम के समर्थकों के खिलाफ भडका रहे हों ।
"प्रत्यक्षत: तो ऐसा नहीं लगता । लेकिन ऐसा है भी क्योंकि इन लोगों को शांतिप्रिय और प्रेम करने वाले लोग पसंद नहीं हैं । इन्हें ये कायर कहकर संबोधित करते हैं । इनका यह भी कहना है कि वेलेंटाइन डे मनाने वाले लडके-लडकियॉं कायर होते क्योंकि वे लोग अपना संगठन बनाकर इनके खिलाफ नहीं खडे होते । वेलेंटाइन डे मनाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है इसलिए ये लोग वेलेंटाइन डे के दिन प्रेमरत जोडों को बरामद करके उनकी आपस में राखी बँधवाकर , लगे हाथ उठक बैठक् लगवाकर भारतीय संस्कृति की रक्षा का महत कार्य पूरा करते हैं । लोकतंत्र को ये पसंद नहीं करते क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी ऐरा-गैरा कुछ भी अनाप-शनाप बकता रहता है । इस तरह ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते । इससे इन्हें अपने अस्त्तिव पर संकट नजर आने लगता है । क्योंकि इनके पास विकास की कोई योजना या दृष्टि नहीं होती ।"
"इनका अस्त्तित्व केवल नकार पर टिका हुआ होता है । शांति काल में ये अप्रासंगिक हो जाते हैं इसलिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कोई न कोई शिगूफा छोडते रहते हैं ।"
"दूसरे धर्मों के समान सोच रखने वाले भाई लोग इस काम में इनकी मदद करते रहते हैं । इस तरह भाईचारे से भाई बेचारों तक का धंधा चलता रहता है ।"
"तो क्या मेरे नाम से अभी तक कोई ऐसा काम नहीं किया गया । "
कृष्ण ने उत्सुकतावश पूछा ।

"नहीं मुरलीधर । आपके नाम से प्रेम का भाव इतना चिपका हुआ है कि लोगों को मारपीट के लिए उत्तेजित नहीं कर पाता इसलिए आपके नाम से अभी कोई दल नहीं बनाया गया है । आज की भाषा में कहूँ तो आपका नाम अपील नहीं करता ऐसे कामों के लिए । बल्कि ऐसे कार्यों को चौपट करने वाला है । यद्यपि आपने पार्थ को युद्ध करने के लिए उकसाया था । लेकिन आपका वह काम भी आपको लवर ब्वाय के इमेज से बाहर नहीं निकाल सका ।"
इस पर कृष्ण प्रसन्न होते हुए बोले कि "चलो अच्छा हुआ कि मेरा नाम लेकर कोई वेलेंटाइन जी का विरोध नहीं कर सकता नहीं तो मुझे काफी अफसोस होता क्योंकि किसी भी प्रेम का संदेश देने वाले में मैं ही मौजूद होता हूँ ।"
तत्पश्चात चर्चा का समापने करते हुए श्रीकृष्ण ने निम्नलिखित पंक्तियॉं कहीं :
ब्रजवासियों ने ऐसे ऐसे गुल खिलाए
कृष्ण की धरती पर वेलेंटाइन आए
यह कहकर विश्व-मोहन ने ऑंख मूंद ली और वर-वंशिका पर एक सम्मोहक राग छेड दिया जो कि रात के सन्नाटे में अखिल ब्रहमांड में गुंजायमान होता हुआ जड-चेतन को मदमस्त करने लगा । रुक्मणी भी राधारमण की गोद में सिर रखकर इस मधुर मुरली की तान से अवश होती हुई वेलेंटाइन डे का आनंद उठाने लगीं । अस्तु ।
सुनिए और देखिए यह गीत । " नीरज" ने यदि सिर्फ गीत भी लिखा हो तो भी वे ..........
शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब
उसमें फिर मिलाए जाए थोडी सी शराब
हो नशा जो तैयार, वो प्यार है .....
December 25, 2009
क्रिसमस की बधाई - Merry Christmas
पहले क्रिसमस की बधाई दे दें, इसके बाद अपनी ब्लॉगिंग के एक साल पूरा होने की गप्पालॉजी शुरु करें । ईशु का जन्म हमारे समय के हिसाब वर्ष, दिन और तारीखों की गिनती से जुडा हुआ है । आज ईसवी संवत ही अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग में है ।

तो लीजिए आप सभी को क्रिसमस अर्थात क्राइस्ट अर्थात एक एक ऐसे व्यक्ति के जन्म दिन की बधाई जिसने कहा था कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड मारे तो अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो (दूसरे गाल पर भी पडने के बाद क्या करना है इसका जिक्र नहीं है क्योंकि तीसरा गाल तो होता नहीं । इसलिए दूसरा झापड खाने के बाद स्वविवेक से काम लिया जाय) ।
कोई यदि तुम्हारी कमीज माँगे तो उसे अपनी कोट भी उतारकर दे दो क्योंकि हो सकता है कि वह संकोचवश कोट न मांग रहा हो और यदि कोई तुम्हे एक कोस तक सिर पर वजन रखकर पहुंचाने के लिए कहे तो तुम उसे दो कोस तक छोडकर आओ (यदि वह दो कोस तक जाने चाहे तो) ! यह बात दीगर है कि ऐसे व्यक्ति के अनुयायी लोग दो विश्व युद्ध लड चुके हैं । और एक क्रूसेड (धर्म युद्ध) इस्लाम वालों के साथ जिनके धर्म का मतलब ही है शांति |
मनुष्य कितना पाखंडी है न ! क्राइस्ट, मोहम्मद, बुद्ध, नानक, महावीर, राम , जरथुस्त्र एक तरफ और इंसान का अंधापन एक तरफ |
ईसामसीह ने कहा था कि अपने पडोसी को प्यार करो । जो बात कहने को रह गई थी वह यह कि अपने पडोसी को प्यार करो चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का अमीर या गरीब हो । प्यार करने से उनका मतलब यह था कि हम जिसे प्यार करते हैं उसे दुक्ख नहीं देना चाहते । जब दुक्ख देना नहीं चाहेंगे तो दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे और जब दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे तो दुक्ख का मार्केट मंदा पड के ठंडा पड जायेगा । यही मूल संदेश सभी बुद्ध पुरुषों का था । धर्म और विज्ञान दोनों अलग-अलग तरीके से तकलीफ कम करने की कोशिश करते हैं । बाकी हानि लाभ क्या हुआ यह भी एक मुददे का विषय है ।
अब ऐसा लग रहा है कि हमारी ब्लोगिंग के एक साल पूरा होने संबंधित चर्चा करने पर यह पोस्ट कॉफी दीर्घकाय हो जायेगी । और हम नहीं चाहते कि ब्लॉगर मित्र हमारी पोस्ट को बीच में ही छोडकर प्रस्थान कर जायें या आधा ऊपर आधा नीचे तीव्र वाचन करके निकल लें । क्योंकि इंटरनेट पर समय की सबसे कमी यदि किसी को है तो वह हिंदी ब्लॉगर को है । इसलिए ब्लॉंगिंग का साल पूरा होने की चर्चा को अगली पोस्ट में रखते हैं ।
मनुष्य कितना पाखंडी है न ! क्राइस्ट, मोहम्मद, बुद्ध, नानक, महावीर, राम , जरथुस्त्र एक तरफ और इंसान का अंधापन एक तरफ |
ईसामसीह ने कहा था कि अपने पडोसी को प्यार करो । जो बात कहने को रह गई थी वह यह कि अपने पडोसी को प्यार करो चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का अमीर या गरीब हो । प्यार करने से उनका मतलब यह था कि हम जिसे प्यार करते हैं उसे दुक्ख नहीं देना चाहते । जब दुक्ख देना नहीं चाहेंगे तो दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे और जब दुःख देने वाले काम नहीं करेंगे तो दुक्ख का मार्केट मंदा पड के ठंडा पड जायेगा । यही मूल संदेश सभी बुद्ध पुरुषों का था । धर्म और विज्ञान दोनों अलग-अलग तरीके से तकलीफ कम करने की कोशिश करते हैं । बाकी हानि लाभ क्या हुआ यह भी एक मुददे का विषय है ।
अब ऐसा लग रहा है कि हमारी ब्लोगिंग के एक साल पूरा होने संबंधित चर्चा करने पर यह पोस्ट कॉफी दीर्घकाय हो जायेगी । और हम नहीं चाहते कि ब्लॉगर मित्र हमारी पोस्ट को बीच में ही छोडकर प्रस्थान कर जायें या आधा ऊपर आधा नीचे तीव्र वाचन करके निकल लें । क्योंकि इंटरनेट पर समय की सबसे कमी यदि किसी को है तो वह हिंदी ब्लॉगर को है । इसलिए ब्लॉंगिंग का साल पूरा होने की चर्चा को अगली पोस्ट में रखते हैं ।
December 06, 2009
याद करते नहीं फिर भी चीखने लगती हैं कुछ तारीखें जैस 6 दिसंबर
समय के साथ त्रासदी दिवस बढते जा रहे हैं, देश में । अभी 26/11, 3/12, और आज 6 दिसबंर । वैसे तो रोज ही त्रासदियॉं होती हैं, रोजमर्रा के जीवन में दुर्घटनाऍं , आपराधिक गतिविधियाँ, आतंकवादी घटनाएँ । लेकिन जब समाज के सफोदपोश लोग , देश के नेतृत्वकर्ता अपने ही लोगों को नफरत के नरक में झोंकने के लिए जिम्मेदार होते हैं तो तकलीफ के साथ निराशा का भाव भी गहरा हो जाता हैं । यह ऐसे घाव हैं मानवता के सीने में जो याद आते ही, टीसने लगते हैं । इनका परिणाम होता है । नफरत की एक लम्बी श्रृंखला के रूप में । षडयंत्र , बदला , हत्या , जघन्य हत्याकांड ।ये घाव आदमी खुद बनाता है, अपने घिनौने स्वार्थों को पूरा करने के लिए । जो परिस्थितियॉ पैदा की गईं थी 6 दिसंबर को उसके लिये प्रत्यक्षत: भाजपा के साथ उस समय सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी समान रूप से जिम्मेदार थी । अपने लचर नेतृत्व की वजह से । उस समय हम स्कूल में पढते थे । गाँव कस्बों में इस घटना की वीडियो रिकार्डिग दिखाई जा रही थी । मस्जिद पर चढते हुए , भागते हुए , डंडे और गोलियॉं खाते हुए लोग । मरते हुए लोगों को देखकर मुझे बहुत बुरा लगा । मुझे नफरत हो गई धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों से । एक तरफ ढांचा गिर रहा था एक तरफ लोग गोलियों और लाठियों से लथपथ हो रहे थे । कहीं किसी मंच से भाषणबाजी भी हो रही थी ।
लोग वर्तमान की जगह अतीत को सुधारना चाहते हैं । वह भी सडे हुए अतीत को । एक ऐसे अतीत को जो हाथ लगाते ही भुरभुरा कर गिरने लगता है । हम कविता लिखते हैं । बहस करते हैं । पक्ष विपक्ष में दलीले देते हैं । और किया भी क्या जा सकता है । समय आने पर फिर से वही सब कुछ दोहराया जाता है । यदि जनता को इतना जागरुक किया जा सके कि वह धर्म जाति के नाम पर मरने-मारने को उकसाने वालों के बहकावे में न आवे तभी यह सब रुक सकता है । यह काम जनता के स्तर पर ही हो सकता है । क्योंकि जिन ठेकेदारों का अस्त्त्वि ही नफरत की जमीन पर टिका हो वह तो ऐसी आत्मघाती पहल करने से रहे ।
सवाल उठता है कि क्या ऐसी घटनाओं को याद किया जाना चाहिए । लेकिन याद नहीं करते फिर भी चीखने लगती हैं, कुछ तारीखें । इन घटनाओं को किस तरह याद किया जाता है । मातम पुरसी के रूप में या अपने - अपने हित में प्रयोग करने के लिए । जो भी हो कम से कम अफसोस तो जाहिर कर ही दें आज । हालॉंकि अब तो अफसोस जाहिर करते हुए भी रस्मअदायगी का पाखंड सा मालूम होता है ।

कौन देगा हिसाब उन बच्चों को
जिनका बचपन अनाथ हो गया
जो मरहूम हो गए बाप के प्यार से
उन औरतों को जिनके लिए
बदल गए मायने जिंदगी के
एक नफरत के मिशन में
क्या इतिहास उनकी कुछ मदद करेगा
इंसान और भगवान
दोनों दब गए मलबे के ढेर में
और उस पर उग आए
कुछ और विष वृक्ष
जो बना रहे हैं
फिर फिर मलबों का ढेर
पूर देश में ।
या वे लोग जो इस्तेमाल करते हैं
आदमी को इंसानियत के खिलाफ
घिनौना बना डालते हैं धर्म के नाम को
अपने निहित स्वार्थों के लिए
मारा जाता हैं बेकसूर आदमी हर बार
और बच निकलते हैं विष वृक्ष
लहराते हरियाते रहते हैं शान से
छिपाए हुए विषों के बीज
अपने ठूँठ में ,
फिर से रोपने के लिए , किसी मानसून में |
नफरत की फसल काटने के लिए ।
इस विषय से कुछ और संबंधित पोस्ट जो मैंने देखे :
इसके लिये भी भूमिका लिखूँ.....? शरद कोकास जी की एक मर्मस्पर्शी कविता ।
चौराहा अयोध्या का दर्द खुद अयोध्या नगरी की जुबानी ।
6 दिसंबर काल या द्रोहकाल
6 दिसंबर
देहाती
July 02, 2009
जुलाई : में क्या याद आता है
क्या आपको मालूम है कि जुलाई का महीना उसी दिन से शुरू होता है जिस दिन से अप्रैल का महीना या लीप वर्ष की 1 जनवरी | देख लीजिये ऐसा ही है | ग्रेगोरियन कैलेन्डर में जुलाई महीने का नामकरण रोमन सम्राट जूलिअस सीजर के नाम सेहुआ है | जूलिअस सीजर के लिए इस महीने का पुनर्नामकरण किया गया था क्योंकि जूलिअस सीजर का जन्म इसी महीने हुआ था और तब यह महीना लैटिन में नाम Quintilis नाम से जाना जाता था | इस तरह जुलाई प्राचीन रोमन कैलेंडर में वर्ष का 5 वाँ महीना था | उस समय तक वर्ष का प्रारम्भ जनवरी से नहीं होता था । ईसा से 450 वर्ष पूर्व ।
इतिहास से बाहर आयें तो जुलाई मतलब बारिश, गरमी से राहत । खेती का नया सत्र, जिसका आधार जुलाईमहीने में होने वाली बारिश तय करती है । यह महीना किसानों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील होता है |अति वृष्टि होने पर कुछ क्षेत्रों में बाढ और उससे होने वाली तबाही भी, महीने के उत्तरार्द्ध तक शुरु हो जाती है ।

जुलाई महीने में जो दो सबसे मत्वपूर्ण घटनायें होती हैं वह है शिक्षा सत्र की शुरुआत और संसद का मानसून अधिवेशन । 1 जुलाई को डाक्टर्स डे भी मनाया जाता है, बिल्कुल उसी तरह जैसे वर्ष के सारे ’डे’ मनाये जाते हैं।(हम इस पर ब्लॉग पोस्ट लिखते इसके पहले ही २ जुलाई हो गई)। वैसे मैनें सुना है की इस महीने से डाक्टरों का भी सीजन शुरु हो जाता है । वजह है पीने के पानी का दूषित हो जाना । ’एनोफ़िलीज’ मैडमों की संख्या बढ जाती है |
वहीं व्यापारियों के लिए यह मंदा सीजन होता है |
लेकिन जुलाई महीने कि जो सबसे गहरी छाप हमारे मन पर होती है वह हमारे बचपन की होती है । पहली बार शिशु घर से बाहर निकलता है, घर की दुनियासे, थोडी देर के लिये । पहले जब पहली कक्षा में प्रवेशार्थी महोदय काजन्म दिन उनके पिताजी को याद नहीं रहता था तो गुरूजी लोग जन्म-तिथि 1 जुलाई लिख लेते थे | शायद यहीवजह है कि ऐसे कई छात्र बचपन में हमारे साथ थे जिनकी जन्म तिथि 1 जुलाई थी |
घुमक्कड साधुओं के लिये यह चौमासे के माह की शुरुआत और ययावर जातियां के लिये भी यह समय अपने ठिकाने पर लौटने का होता है ।

झमाझम गिरती हुई बारिश ’रोमान्टिक’ एहसास पैदा करती है, तो दहाडते बादल और बिजली की चमक रोमांचकारी है ।
सबसे बुरा हाल होता है उनका जिनके छत या छप्पर से पानी टपकता है और उ़ससे भी ज्यादा उनका जिनके सर पर छत नहीं होती । शायद बारिश रोमान्टिक तभी लगती है जब हम आराम से अपने घर में सुरक्षित बैठे होते हैं या फ़िर बाहर भीगने के बाद घर में आकर सूखने कि सुविधा रहती है ।
हम अपनी कहें तो सबसे ज्यादा हम मिस करते हैं गीले घास के मैदान में फुटबाल के खेल को |

रिमझिम बारिश में फुटबाल खेलना, फिसलना और गिरना | बरसात में हम लोग मैराथन फुटबाल खेलते थे | उसमें कोई भी शामिल हो सकता था, बस दौड़ना आता हो | फ़िर चाहे एक हाथ से अपना पैंट पकड़कर ही क्यों न दौड़ता हो | कुछ खिलाड़ी तो सिर्फ़ दौड़ते भर थे, फुटबाल उनको तभी मिलाती थे जब वह मैदान से बाहर चली जाती थी |
आपकों भी कुछ याद आ रहा है क्या ? खैर जो भी हो ये तो मानना ही पडेगा की जुलाई का महीना हर तरह से रोमांचकारी होता है ।
सभी चित्र - गूगल से
March 08, 2009
महिला दिवस पर : सब धर्मों की तरफ़ से भविष्य से क्षमा
आज ८ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जो मैं आपके साथ यह बांटने जा रहा हूँ, वह ओशो के उद्गार हैं | जब मैंने इसे पढ़ा तो मुझे लगा की इसे शेयर करना चाहिए क्योंकि धर्म, स्त्री नैतिकता को शासित कराने वाला और स्त्री को दमित कराने वाला एक प्रमुख तत्व रहा है | यह काम भले ही धर्म की आड़ में इसे विकृत करके ही किया गया हो फ़िर भी नुकसान तो हुआ ही | और विडम्बना यह की धर्म को पोषित करने और उसमें श्रद्धा रखने में स्त्रियाँ ही आगे रहीं हैं |लीजिये पेश हैं, सदी के सबसे विद्रोही विचार -
"मैं अपनी पहली संन्यास दीक्षा किसी स्त्री को ही देना चाहता था - संतुलन के लिए |
स्त्री को संन्यास देने में बुद्ध तक हिचकिचाए ..... बुद्ध तक ! उनके जीवन की सिर्फ़ यही एक बात मुझे कांटे कीतरह खटकती है, और कुछ नहीं | बुद्ध झिझके ....क्यों ? उन्हें डर था की स्त्री संयासिनियाँ उनके भिक्षुओं कोडावांडोल कर देंगी | क्या बकवास है ! एक बुद्ध और डरे ! अगर उन मूर्ख भिक्षुओं का ध्यान भंग होता था तो होनेदेते | महावीर ने कहा की स्त्री शरीर रहने से किसी को निर्वाण, परम मुक्ति नहीं हो सकती | मुझे इन सब पुरुषोंके लिए प्रायश्चित करना है | मोहम्मद ने कभी किसी स्त्री को मस्जिद में आने की अनुमति नहीं दी | सिनागोगमें भी स्त्रीयां गैलरी में अलग बैठती हैं, पुरुषों के साथ नहीं बैठतीं |
इंदिरा गाँधी मुझे बता रही थीं की जब वे इजराइल की यात्रा पर थीं और येरुसलम गईं, तो उन्हें भरोसा ही नहींहुआ की इजराइल की प्रधानमंत्री और वे स्वयं, दोनों बालकनी में बैठी हुई थीं और सारे पुरूष नीचे मुख्य हाल मेंबैठे हुए थे | उन्हें ख्याल नहीं आया की इजरायल की प्रधामंत्री भी, स्त्री होने के कारण मुख्य सिनागोग में प्रवेशनहीं कर सकती थीं | वे केवल बालकनी से देख सकती थीं |
यह आदरपूर्ण नहीं है, यह अपमानजनक है | मुझे मोहम्मद, मोज़ेज़, महावीर, बुद्ध के लिए माफी मांगनी है | और जीसुस के लिए भी, क्योंकि उन्होंने अपने ख़ास बारह शिष्यों में एक भी स्त्री नहीं चुनी| और जब उनकीसूली लगी तो वे बारह मूर्ख वहां नहीं थे | केवल तीन स्त्रियाँ उनके पास थीं - मेग्दालिन, मेरी और मेग्दालिन कीबहन | पर इन तीन स्त्रियों को भी जीसस ने नहीं चुना, वे चुने हुए ख़ास शिष्यों में नहीं थीं | चुने हुए ख़ास शिष्यतो भाग गए थे | वे अपनी जान बचाने की कोशिश में थे | खतरे के समय केवल स्त्रियाँ ही आईं |
इन सब लोगों के लिए मुझे भविष्य से क्षमा मांगनी है | और मेरी पहली माफ़ी थी कि सबसे पहले स्त्री को हीसंन्यास दिया |"
- ओशो
यह पैराग्राफ "हिन्दुस्तान", नई दिल्ली और "हंस" पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है | स्त्री मनोविज्ञान से सम्बंधित ओशो के विचार "कृष्ण स्मृति" प्रवचन माला एवं पुस्तक में उपलब्ध हैं |
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