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March 06, 2011

एक गैर जिम्‍मेदाराना कविता

मैं जिम्‍मेदार नहीं हूँ
महँगाई के बढने का
कचडे के ढेर की तरह रोज
घोटालों के निकलने का
मैं जिम्‍मेदार नहीं हूं देश में
किसी भी तरह की गडबडियों का
सचिवों मंत्रियों नौकरशाहों की नि‍युक्तियों का
मैं बिल्‍कुल जिम्‍मेदार नहीं हूँ
किसी के मरने का

January 29, 2011

नए साल में नया क्‍या है

 संवादघर पर की गई मेरी कविता रूपी टिप्‍पणी या टिप्‍प्‍णी रूपी कविता।  आज बहुत दिन बाद गूगल डाक्यूमेंट्स में सेव  एक पुराने नोट में मिल गई।   

नए साल में नया क्‍या है
अपने खुश होने का बहाना क्‍या है
हकीकत को रुबरू कैसे करें
इस जिंदगी में नया क्‍या है
मेरे होने में नया क्‍या है
मेरे मिटने में नया क्‍या है

कुछ भी लिखने में नया क्‍या है
हर नये में नया क्‍या है

सुबहो शाम में नया क्‍या है
सोने जगने में नया क्‍या है

हुस्‍न -ए-उल्‍फत में नया क्‍या है
एक चमडी की हकीकत क्‍या है
अपने इल्‍म का फायदा क्‍या है
काम यह कहीं आता क्‍या है

मत पूछो नया साल लाता क्‍या है
कहिए इंसा नया करता क्‍या है

सच नए साल में नया क्‍या है
नई नजर में कुछ नया क्‍या है ?

किसी ने पूछा जिंदगी क्‍या है
हमने पूछा जीने का बहाना क्‍या है

नई नजर हो तो सब कुछ नया है
नया साल भी नया है
पुराना यार भी नया है
करोडों साल का बूढा सूरज
रोज सबेरे नया नया है
रात में करते झिलमिल तारे
खरबों साल से नए नए हैं
इक बूढे की बूढी प्रियतम
प्रेम नयन से नई नई है

बच्‍चे की निश्‍छल ऑंखों में
बूढी दुनिया नई नई है

नई ऑंखें हों हर दिन नया है
नया साल को भी इंसा ही बनाता नया है
जीने के लिए कुछ झूठ भी चाहिए
इस काम में चहिए सिर्फ हकीकत कहॉ है

कविता अधूरी जैसी है । साल भी अभी बहुत बाकी है।

February 03, 2010

चलो, चुप हो जाऍं

चलो,
चुप हो जाऍं, कुछ दिनों के लिए

जैसे,
चुप हो जाते हैं दो अनन्‍य मित्र
सहनशीलता की आखिरी सीमा
आने से पहले ,
बिना एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए
करते रहते हैं, अपना काम
साझे मिशन के लिए
सदाशयता से ,
कभी मिल जाने के लिए

जैसे,
मॉं-बाप पूरे करते रहते हैं अपना कर्त्‍तव्‍य
औलादों को झगडते हुए या
बहकते हुए, देखकर भी
लगे रहते हैं घर की भलाई में
क्‍योंकि , शक्तिप्रदर्शन में तबाही घर की ही है
चाहे जीते कोई भी

जैसे,
चुप रह जाती है समझदार जनता
नेताओं के, मरने मारने के उकसावे पर भी
जलाये रखती है इंसानियत का चिराग
अपने दिलों में

जैसे,
असली देशप्रेमी कोशिश करता है
कि उसका गौरव उसके दूसरे भाई/बहन को
शर्मसार न कर सके

जैसे,
माली सींचता रहता है अपने पौधों को
खिलाता है नये-नये फूल
खूबसूरत बनाने के लिए बाग को,
बगैर दूसरे का बाग उजाडे

चलो,
मनोरंजन और काबिलियत दिखाने के,
कुछ और तरीके खोजें
स्‍थगित करें, तलवारबाजी , मुर्गेबाजी और मुक्‍केबाजी से
अपने ही दोस्‍तों को लहूलुहान करके
विजेता बनने की हिंसक चमक को

चलो,
ऐसी बातें न शुरू करें
जिसका अंत न कर सकें
और जो अगले संवाद की
संभावना को समाप्‍त कर दे

चलो,
थोडा कम होशियार बनना
स्‍वीकार कर लें
क्‍योंकि अगला भी
बुद्धिमान ही है, हमेशा !

चलो,
कुछ नेताओं की कुश्‍ती को
राष्‍ट्रीय टूर्नामेंट और
कुछ बाहुबलियों के झगडे को
गृहयु्द्ध मानने से इंकार कर दें

चलो,
फसादियों को निराश कर दें
और 'मनुष्‍य' के आगे-पीछे बिना कोई
शब्‍द लगाये उसे बचाये रखें

चलो,
जब कुछ नहीं कर सकते तो
तमाशबीनी बंद करें !
और अपना-अपना काम करें

हाँ ! मजे लेने वाले उतने ही
भागीदार हैं,
जितने की मजमा लगानेवाले

कम से कम इतने से मजे का
त्‍याग तो कर ही सकते हो मेरे दोस्‍त ।

यदि नहीं , तो फिर चुप रहने का कोई मूल्‍य नहीं ।

January 13, 2010

पंक्तियों के समूह को कह देता हूँ, कविता

मुझे,
पता नहीं है
कैसे, लिख देता हूँ
चंद पंक्तियां, कभी
अचानक ही,
उन पंक्तियों के समूह को
कह देता हूँ, कविता
ब्‍लॉग पोस्‍ट के लेबल पर
चिप्पियॉं या टैग में

जबकि,
मुझे पता है,
मैं नहीं लिख सकता
कोशिश करके भी,
वह सब
जो मैंने लिखी हैं,
अनायास ही किसी पल में,
किसी भाव दशा में

शायद,
इसीलिए, कह देता हूँ उसे
कविता,
क्‍योंकि वह,
आती है अपनी मर्जी से
मेरी कोशिशों से मुक्‍त, सर्वदा


जैसे,
प्रेम आता है किन्‍ही पलों में
अपनी स्‍वतंत्रता में,
मेरी गैर मौजूदगी में
फिर भी मैं श्रेय देता हूँ ,
खुद को
उस चीज के लिए ,
सिर्फ प्रतीकात्‍मक है यह .

यद्यपि,
मैं जानता हूँ, हर बार
कुछ पंक्तियॉं लिखने के संतोष
और
प्रेम के आनंदपूर्ण क्षणों के
पश्‍चात भी, कि मैं
नहीं पहुंच सका हूँ
अब भी ,
कविता और प्रेम तक

December 27, 2009

बीतता हुआ वर्ष !

समय की एक इकाई 'वर्ष' !
महसूस होता है
सशरीर पूरी पूर्णता में
जब, बीतना शुरू होता है उसका
आखिरी महीना
और महीने का आखिरी दिन |
अनायास ही मन
लगाता है
हिसाब पूरे साल का
साल के आखिरी दिन
साल में हैं महीने
और वह भी पूरे बारह
महीने भी दिखाई पड़ते हैं
विदा के समय
महीने के आख़िरी दिन
पूरी प्रगाढ़ता से अपनी
उपस्थिति दर्ज कराते हुए
कुछ कुछ जीवन के आखिरी
दिनों की तरह
बीतते है थोड़ा धीरे
गुड बाई कहते हुए
समय के तीन स्पस्ट विभाजन
हमारी सुविधा के लिए
दिन महीने वर्ष और पूरा जीवन
प्रारम्भ, उत्कर्ष और अंत
इनकी लघुतम इकाई क्षण , पल या निमिष,
जो महसू करते ही
खो जाती हैं
और
रखती हैं अस्तित्व
लगभग नहीं होने की तरह
हम बनाते हैं एक
काल्पनिक जोड़
और कहते हैं उसे
समय
अपनी सुविधा के लिए

समय की एक ईकाई 'दिन'
सुबह का सूरज
प्रवेश करता है
छितिज से
असीम उर्जा लिए हुए
अनंत प्राणों में उडेलने को
बीतता हुआ समय बीत जाता है, ऐसे
जैसे भर जाते हैं
बही खातों के पन्ने ,
जैसे चुक जाती हैं
कैलेंडर की तारीखें
फ़िर से लिखने के लिए नए पन्नो पर
पुराने हिसाब
थोड़े फेर बदल के साथ
साल भर पुराने दोस्त से पल भर में
जुदाई है
बीतता हुआ वर्ष !

December 10, 2009

ब्‍लॉगिंग माहात्‍म्‍य - कुंडलियां , भाग- 1

पहली बार कुण्डलियाँ लिखे हैं ! यह काका 'हाथरसी' को समर्पित है ! काका हाथरसी को स्कूली दिनों में पढ़े थे ! पता नहीं कैसे अचानक याद आ गए !

रस्‍ते में कल मिल गए, ब्‍लॉगर बगलूचंद
नमस्‍कार तो कर लिए, और बोलती बंद
और बोलती बंद, तुम अपना हाल सुनाओ
ब्‍लागिंग में क्‍या नया, लिखे हो यह बतलाओ
बगलू ब्लॉगर बिफरे, मेरा सिर मत खाओ
ब्‍लागिंग ब्‍लागिंग करों नहीं, कुछ और सुनाओ

नखरे ज्‍यादा मत करो, करो ना टाइम नष्‍ट
जल्‍दी जल्‍दी बक डालो , तुमको जो हो कष्‍ट
तुमको जो हो कष्‍ट, कि कुछ तो बोलो यारा
ब्‍लागिंग का जो भी दुख हो, कह डालो सारा
कह चालू कविराय, कि अपनी राय बनाओ
बुद्धिमान ब्‍लॉगर के, कुछ लक्षण दिखलाओ

इतना सुनकर आ गया, बगलू जी को ताव
कहने लगे जि ब्‍लागिंग का, बडा बुरा है चाव
बडा बुरा है चाव, कि मेहनत लगती जितनी
इतना पढते तो, खुल जाती किस्‍मत अपनी
कह चालू कविराय, कि तुम मारो शेखी मत
असली कारण बको, तुरंतै जल्‍दी झटपट

असली कारण कुछ नहीं, तुम भी हो घनघोर
हम तो बस सुस्‍ताय रहे, करो न एतना शोर
करो न एतना शोर, कि तुम तो अपनी देखो
ब्‍लाग पोस्‍ट लिख सके नहीं, टिपणी ही चेंपो
फिर भी तुम उकसाय रहे हो, तो कहते हैं
ब्‍लागिंग के चक्‍कर में, हम क्‍या क्‍या सहते हैं

थाली खाने की लगी, पत्‍नी जी चिल्‍लायँ
बगलू जी हां हूं करें, पर उठ के न जायँ
पर उठ के ना जायँ, मिली अब तगडी घुडकी
बगलू तुम जो उठे नहीं, हो जाए कुडकी
कह चालू कविराय, कि ऐसे भी हैं ब्‍लॉगर
लिखते हैं जो चार बजे तक, पोस्‍ट जागकर

'महिला' ब्‍लॉगिंग भी करे, रखे भी घर का ख्‍याल
दिनचर्या में बढ गया, यह अतिरिक्‍त‍ कमाल
यह अतिरिक्‍त कमाल, चाय चहिए बगलू को
कपडा, खाना, होमवर्क, भी है डबलू को
बैठक में डबलू औ डबली चहक रहे हैं
मैडम के वाणी बम, बगलू पर टपक रहे हैं

इतनी मेहनत से लिखे, जूझ जाझकर पोस्‍ट
अब हैं देखन में लगे, कै ठो आए पढने दोस्‍त
आए पढने दोस्‍त, कि सब पोस्‍टन पर जाओ
एक टिप्‍पणी दे अपनी, आमद दर्शाओ
कह चालू ब्‍लॉगर को, ब्‍लॉगर ही जानेगा
नई पोस्‍ट लिख दी, बंदे ने पहचानेगा

नए नए मुददे गुरू, कहॉं पाऍं हम रोज
दिन भर यही दिमाग में, करते रहते खोज
करते रहते खोज, लिखें ऐसे मसले पर
पढवैया भी मिलें , मिलें टिपणियॉं बम्‍पर
कह चालू कविराय, कि एक मुददा है कौंधा
बगलू बैठा है पीसी पर, मुँह को औंधा

ब्‍लॉगिंग अब करने लगे, काफी स्‍टूडेंट
मुश्‍िकल होता है उन्‍हें, टाइम मैनेजमेंट
टाइम मैनेजमेंट, पडो न इसमें ज्‍यादा
पहले अपनी पोथी तुम, पलटाओ भ्राता
कह चालू कविराय, कि टाइम बहुत मिलेगा
इस टाइम को चूका, तो फिर दिल दहलेगा

ब्‍लॉगिंग में हम क्‍या लिखें, असमंजस है आज
टिपियाना भी बंद किए, लगता है इल्‍जाम
लगता है इल्‍जाम, करें हम कैसी ब्‍लॉगिंग
कुछ भी लिखना हुआ, कि होती है गुटबाजिंग
आ गई अब टिप्‍‍पनियां भी, जैसे फेक करेंसी
लफडा हो जायेगा, हो गर चूक जरा सी

ब्‍लॉगिंग को समझो नहीं, टाइम पास मकाम
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग है बडी, जीवटता का काम
जीवटता का काम, कि मतलब को समझोगे
अभी नए बंदे हो, बातों में उलझोगे
कह चालू कविराय, हुए जो ज्‍यादा भाबुक
सह न सकोगे यहॉं पडे, शब्‍दों के चाबुक

अब तो ब्‍लॉगिंग का भया, बहुत बडा आकार
लेख, कहानी, कविता, रूपक, तकनीकी संसार
तकनीकी संसार, लिखो व्‍यंग औ' नाटक
पढते रहो नियम से, खुले अकल के फाटक
टिप्‍पणियों से तुमको हां, एक नजर मिलेगी
कैसा लिखते हो यह भी, कुछ खबर मिलेगी

हिंदी ब्‍लॉगर हो गए, हुआ न टंकी ज्ञान
ब्‍लागिंग करना आपका, व्‍यर्थ हुआ श्रीमान
व्‍यर्थ हुआ श्रीमान, कि टंकी नहीं दिखेगी
फिर भी टंकी पर चढने की, धमक मिलेगी
देखो चालू उधर कई, बलॉगर भागे हैं
बगलू टंकी से उतरो, मिन्‍नत मॉंगे हैं

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में अब मित्रों, करिए स्‍वस्‍थ विमर्श
राजनीति, विज्ञान , नारी , साहित्यिक स्‍पर्श
साहित्यिक स्‍पर्श की करिए बहस खींचकर
टीवी, मीडिया , कृषि, न्‍याय है बहुत लाभकर
कह चालू कविराय कि, एक ठो बहस छिडी है
नारी मुक्ति किधर से आए, उलझ पड़ी है

ब्‍ला‍गिंग टिपणी करते करते, हो जाए मिस्‍टेक
माफीनामा पेश करो, खोलो दिल का गेट
खोलो दिल का गेट, कि टाइम नहीं गंवाओ
दरियादिल हैं ब्‍लॉगर मित्रो, लाभ उठाओ
बगलू चालू , ब्‍लॉगिंग ब्‍लॉगिंग खेल रहे हैं
ब्‍लाग पोस्‍ट नित रोज भयंकर ठेल रहे हैं

दिल गार्डेन गार्डेन जो भया, सुनकर यह अख्‍यान
एक टिप्‍पणी छोडकर, फिर करिए प्रस्‍थान
फिर करिए प्रस्‍थान, रहें पुलकित च किलकित
एक स्‍वस्‍थ संवाद बने, ब्‍लागों में उत इत
कह चालू कविराय, कि फिर से फरमायेंगे
जब ब्‍लागिंग माहात्‍म्‍य, भाग- दो लाएंगे


धन्‍यवाद ।

November 22, 2009

भाषा में छिपे हुए भाव

बडा कौतूहल होता है
देखकर
जब प्‍यार और नफरत
उपेक्षा और अपनत्‍व
अस्‍वीकार और सहानभूति की भाषा
बेजुबान पशु पक्षी और अबोध नवजात
भी समझ जाते हैं ,
तत्‍क्षण |
वे भी,
जिनका भाषा और सभ्‍यता से
कोई सरोकार नहीं होता |
वे भी,
जिन्‍हें इनकी आदत पड गई है
सदियों से या कुछ ही वर्षों से,
अपमान और अस्‍वीकार सहन करने की |
जिन्‍हें लोग समझते हैं,
वे स्‍वीकार कर चुके हैं
अपने अस्तित्‍व पर थोपा हुआ ओछापन ,
नहीं !
वे सब जानते हैं
समझते हैं , शब्‍दों में
सवारी करते हुए
भावों के दर्प को
और अचेतन ढूँढता रहता है
एक इंसान
जो देख सके उन्‍हें
अतीत की हीनताओं से मुक्‍त |
करते हुए आज के पुरुषार्थ का सम्‍मान
माई बाप की रट लगाने वाला
गॉंव का पुसुआ भी और
साब साब कहने वाला शहर का
चाय वाला भी |

एक प्रेमी-प्रेमिका के बीच
शब्‍द वही रहते हैं फिर भी
समय के साथ उनके मायने बदल जाते हैं
ये सब
पता नहीं कैसे
पढ लेते हैं
भाषाओं के चेहरे
बिना अक्षर ज्ञान के !
यांत्रिकता और आत्‍मीयता को
पहचानते हैं
दुधमुँहे बच्‍चे , पालतू पशु भी
शब्‍द तो जैसे शरीर होते हैं और
भाव उनकी चेतना |
कैसे संप्रेषित हो जाते हैं
तरह तरह के भाव एक ही शब्‍द से
प्रत्‍येक 'हाय' या नमस्‍कार
अलग अर्थ देता है
यहँ तक की
लिखे हुए शब्‍द भी
बता देत हैं अपना मूड
कितने गुस्‍से या प्‍यार से
ईमानदारी या बेईमानी से
लिखा गया है उन्‍हें
क्‍योंकि निकलने वाले शब्‍द
मात्र शब्‍द नहीं होते
बल्कि
पूरा ब्‍लूप्रिंट लिए होते हैं
वक्‍ता की भावनाओं का
वरना क्यों, एक ही गाली
कभी तिरस्कार की तरह और कभी
आत्‍मीयता के प्रमाण पत्र की तरह लगती |

November 17, 2009

बात सच है, पर चलन में है नहीं

बात सच है, पर चलन में है नहीं
आपकी बातें सहन में हैं नहीं

बात कैसे बोल दी तुमने यहॉं
बात जो अपने जेहन में है नहीं

बात करते ही रहो हर बात पर
आपात तो अपने वतन में है नहीं

बात हमसे ऑंकडों की न करो
एक भी संख्‍या फलन में है नहीं

बात पूछेगी तुम्‍ही से जान लो
ऐसे कैसे तन, वतन में है नही

बात करने के लिए ही बोलते हैं
ज्ञान की इच्‍छा जतन में है नहीं

अब कहॉं ले जाओगे बरसात में
एक भी गागर तपन में है नहीं

बात उनकी जब सुने ऐसा लगा
बात ऐसी सब मुखन में है नहीं

बोलते हैं सभी खुल जाने पर
नाम सबका बतकहन में है नहीं

मिल गए हो आज खुलकर बात कर लो
है बात में जीवन, मरण में है नहीं

गड्ढे खोदोगे तुम्ही पहले गिरोगे
कोई नागा इस नियम में है नहीं


दिल में अपने एक सागर
तुम बसा लो
फासला धरती गगन में है नहीं


November 11, 2009

तो इसमें कौन सी नई बात है भाई

खबर : हिन्‍दी में शपथ लेते हुए विधायक अबू आजिमी की मनसे विधायकों द्वारा पिटाई

तो इसमें कौन सी नई बात है भाई
हिन्‍दी की वजह से
तो होती ही रहती है पिटाई
अभी विधायक की हो गई
इसके पहले मजदूरों, कामवालों,
और छात्रों की हूई थी
ऐसी ही पिटाई
ये तो दो-चार हाथ ही पाये
लेकिन सब इतने ल‍की थे नाय
कुछ हाथ-पैर तुडवाकर निपटे
कुछ अपनी जान से हाथ धो बैठे
कुछ पक्‍को है कांय
के अपने दोस्‍त, बहन और भाय की
कब हिन्‍दी माई के नाम से
देश के कुछ जगहों में जान चली जाय
ये तो भई यारा स्‍थूल पिटाई
सूक्ष्‍म पिटाई तो हो ही रही है लगातार
हर जगह अपनों और गैरों से बार-बार
हर हिन्‍दी भाषी महसूस कर सकता है इसे
खुद हिन्‍दी का ब‍डा आदमी नहीं बोलता जिसे
हिन्‍दी माध्‍यम में पढे विद्यार्थी से पूछिए
गॉंव कस्‍बे के आदमी से पूछिये
कितनी पिटाई होती है उसकी
उच्‍च शिक्षा में , नौकरी में , नौकरी के निर्वहन में
औरों को तो छोडिये अपने फिल्‍मी सितारो को ही देखिये
हिन्दी के नाम से करोडों का वारा-न्‍यारा करते हैं
पर कभी फिल्‍मों से बाहर उनके मुखारबिन्‍द से
हिन्‍दी नहीं निकसते हैं
सबके दुलारे है , बडे प्‍यारे हैं, पर
जिसका खाते हैं , उसी में पलीता लगारिये हैं
आप ही बताइये अपने लोगां को ही देख लीजिये
अपने नौकरशाहों और खिला‍डियों को ही देख लीजिए
हिन्‍दी बुलवाकर इनकी तौहीन मत कीजिए
भारत देश में हिन्‍दी भी जीती है
गरीब आदमी भी जीता है
दोनों से नाता रखना पडता है
पैसे, वोट और व्‍यवसाय के लिए
सितारों , नेताओं और व्‍यापारियों को

हिन्‍दी नही बोलना है तो मत बोलो
लेकिन जो बोलता है उसका मुँह तो मत तोडो
क्‍योंक‍ि हिन्‍दी गॉंधी है तो सुभाष भी है
तिलक है और आजाद भी है
यह सबमें घुल जाती है
हर भाषा में मिल जाती है
यह समन्‍वय की कृति है
बिल्‍कुल भारतीय प्रकृति है
इसका किसी भाषा से विराध नाय है
कांय के सब भारतीय भाषा तो
बूढी दादी संस्‍कृत से ही आयं हैं

लोगां तो बिला वजह हो हल्‍ला मचायं हैं

हिन्‍दी नहीं है किसी की मोहताज
वह हमेशा रही है बादशाह बेताज
लोकतंत्र है हल्‍ला मचाते रहो
अंतिम आजादी का लुत्‍फ उठाते रहो
गीत एक फिल्‍मी गुनगुनाते रहो
गम को धूऍं में उडाते रहो
वायु प्रदूषण फैलाते रहो
वरना गम तुम्‍हें उडा देगा
बिना डोर के पतंग की तरह

सच कडवा है कुरुप है तो हम क्‍या करें
तुझे मिर्ची लगी तो हम क्‍या करें
हमें मिर्ची लगी तो तुम क्‍या करे

भाई से चारा छुडाते रहो
भाईचारा निभाते रहो

"यहाँ बात सिर्फ़ हिन्दी की नहीं है असल बात ये भी है की आप कैसे किसी को उसकी भाषा में बात करने से रोक सकते हैं , आपको ये हक़ किसने दिया है ?"

November 09, 2009

चीथडों के गठ्ठर फ़ेंको

पता नहीं
कैसे रहते हैं लोग

आज भी

लादे हुए
सतत

चीथडों का गठ्ठर

जिसे कभी खोल कर
नहीं देखा गया

कि क्या है उसके अन्दर
पता नहीं कितनी
सडी हुई चीजें हैं
उनमें जो
मारती रहती हैं
सडांध वक्त-बेवक्त
तब छिडक देते हैं
उनके ऊपर गुलाब जल
और इत्र
सुंदर शब्दों और
व्याख्याओं के द्वारा

फ़िर सडांध को
थोपा जाता है
दूसरों के गठ्ठरों पर
और चलता रहता है
यही क्रम
बिना सफ़ाई किए हुए
अपने-अपने गठ्ठरों की
बह जाता है खून,
पानी सा
एक-एक चीथडों
के लिए
वो भी
दूसरों के उतारन
सदियों के फ़ेंके हुए

कैसे रहते हैं
ऐसे घरों में लोग
चीथडों को
मनमर्जी से
लादे हुए
जिनसे बाहर जाने की
झांकने की
तो बात ही क्या
ऐसा सोचने की भी
इजाजत नहीं है

जहां संदेह
एक अपराधबोध है
अपने होने की घोषणा
महापातक

संदेह
जो वजह है
सृजन का
सारे ज्ञान-विज्ञान का
आदमियत का
डिसेबल कर दिया
जाता है
स्थाई रूप से
लाद दिया जाता है
ऊपर से
एक खोखला विश्वास
जिसे बचाने के लिए
तैनात होती हैं
बडी-बडी कंटीली बागुडें
भय और प्रलोभनों की

रहने वाले कह सकते हैं
इसे मर्जी से रहना
जैसे पैदाइश से ही
पिंजडे में रहने वाला पक्षी
रहता है
अपनी मर्जी से

पर फ़िर भी,
कैसे रहते हैं
लोग ऐसे घरों में
अब भी
जहां रहने का
मूल्य होता है
रहने वाला
वह खुद
और
ढोते हुए चलना
होता है सिर पर
एक भारी गठ्ठर
पूरे अतीत का
गर्व से
कहना होता है उसे अपना
बिना चुनाव की आजादी के
लडना पडता है
दूसरों के
उतारन चीथडों के
सम्मान के लिए

यह एक अपमानजनक
मूर्खता हो जाती है
जब एक आम
आदमी
लड जाता है
उन चीथडों के लिए
जो उसके हैं
ही उसके किसी काम के हैं
जो उसे रोटी दे सकते
ही प्रेम और खुशी
सिवाय बोझ और घुटन के
बेगारी मजदूरी की तरह
जबकि कुछ होशियार
लोग उतारने नहीं देते
गठ्ठर
आदमी के सिर से
अपनी मालकियत
कायम रखने के लिए
और करते रहते हैं
चीथडों का व्यापार

मित्रों !
तनिक रुको और सोचो
क्या वह सब तुम्हारे हैं
जिन्हें स्थापित करने के लिए
तुम अपनी सबसे ज्यादा
ऊर्जा नष्ट कर रहे हो
कब तक अतीत के
लाउड स्पीकर बने रहोगे
कब तक ?
कब तक दूसरे के चीथडों की
मार्केटिंग करते रहोगे
अपने गीत कब गाओगे ?
कब तुम अपनी पहचान
अपनी निजता से दोगे
अपने सिर और कान में
खोंसे हुए चीथडों से नहीं

पता नहीं कब ?

सोचोगे तो अवश्य ही
पाओगे की ये चीथडों
के गठ्ठर
इतने कीमती नहीं है कि
इनके लिए लडा जा सके
इनका उपयोग हो सके तो कर लो
पर खोपडी में
लादकर
इनके रक्षार्थ तलवार लेकर
मत घूमो
अतीत के चीथडों के लिए
वर्तमान को तार-तार मत करो !

कब चीथडों को तुम
इंसानियत से कम
तवज्जो देना शुरू करोगे
ताकि बचाया जा सके
इंसानियत को
चीथडे-चीथडे होने से !

और भी बातें हैं
ज्यादा जरूरी जो
की जा सकती हैं
बेहतरी के लिए
इंसान की ,
चीथडों के लिए
जांबाजी दिखाने के सिवा !

November 04, 2009

फ़ूल में भी मगरूरी रही होगी


फूलों में मगरूरी रही होगी
पत्थर की भी मजबूरी रही होगी

पछता सके
लडकर भी जब
रिश्तों में बहुत दूरी रही होगी

बात की है अब तक तो क्या
दिमागी कुछ कमजोरी रही होगी

पूछा नहीं हम कहां थे अब तक
फ़िक्र ये गैर-जरूरी रही होगी

समझ आई तो क्या आई उनको
ये किस्मत ही छिछोरी रही होगी

ताके बैठे थे जिसे चातक की तरह
और चन्दा की वो चकोरी रही होगी

भूल जा मीठी बातें हकीकत में
सब उनकी दुनियादारी रही होगी

बुरा मानें हम क्यों किसी बात का
उनकी भी कुछ मजबूरी रही होगी

October 24, 2009

आदमी की फ़ितरतें बदली नहीं हैं देखिए


कौन है जो कह सके कर ली तरक्की देखिए
आदमी की फ़ितरतें बदली नहीं हैं देखिए

राम रहमान दोनों हैं बहुत अमनो पसन्द
जिक्र-ए-मजहब हो कहीं, उनकी शराफ़त देखिए

स्वर्ण कंगूरे कलश तो देखिए ही, साथ में

नंगे
पुजारी और अधनंगे भिखारी देखिए


उम्रभर लडते रहे जिसकी रिहाइश के लिये
वह पलायन कर गया है देखिए ना देखिए

हमने जादू खूब देखे हैं महल में राह में
फ़िर भी पापी पेट ही मुद्दा रहा था देखिए

तुमने राखें और ताबीजें निकाली हैं बहुत
होरीअब भी मर रहा है कर्ज से ही देखिए

चल रहा है आज ही रफ़्ता-रफ़्ता नौनिहाल
पास ही रखिए अभी अपनी सिखावन देखिए

क्या हुआ आती नहीं बारह खडी भी बहरफ़
एक बच्चा मिल गया मेरी लियाकत देखिए

दोष मत देना उसे जो तुझसे आगे है बहुत
देखना है कुछ अगर अपनी जहालत देखिये

कारवां है अम्न का तू हमको कायर न समझ
कोई चालें न चलेंगी विघटनों की देखिए

ढूंढते हो क्यों यहां शेरे बब्बर नस्ल तुम
अब जमीं पे रह गये खालिस बगीचे देखिए

चौंकिये न देखकर खेल उनका राह में
काम पहले कर चुके हैं सर्कसों में देखिये

बुलबुले की जात हैं इनसे बच न पाओगे
फ़ट पडॆ हैं आज इधर कल उधर देखिये

ओट करके देखिये या सामने से देखिये
देखिये तो देखिये जी प्यार ही से देखिए

खैर मकदम कीजिए या गालियां ही दीजिए
दिल से मेरे सिर्फ़ निकलेंगी दुआएं देखिए

हों सुबह की बहर में या दोपहर में बेबहर
हम तो अपनी बात ऐसे ही कहेंगे देखिए


October 08, 2009

तेरा होना सदा है कविता सा....

फिर तुम्हारा ख़याल आने लगा
दिल कोई गीत गुनगुनाने लगा

एक बहुत खूब शायरी पढकर
क्यों मैं शायर से मिलने जाने लगा

कितने नाजुक हैं ये नये रिश्ते
देखकर फूल भी लजाने लगा

अब तो बातों में भी है खामोशी
शायद अपना पडाव आने लगा

तेरा होना सदा है कविता सा
मैं तो अपनी गजल छिपाने लगा

जो मुझे एक पल में कहना था
उनको कहने में भी ज़माना लगा

जिक्र की राह अब हुई आसां
खौफ बन्दा खुदा से खाने लगा

या तो उलझो ही आज, या हंस दो
नाप-तौल अब तो मन उबाने लगा

उनकी बातों का कैसा शिकवा अब
उनका गुस्सा ही जब रिझाने लगा

September 27, 2009

जैसे देह नारी हो !

देह
वर्षों से सहती हुई
सभ्यता के थपेडॊं को
होती रही है शिकार
धर्म और नैतिकता की
बनती रही खिलौना
अमानवीय ताकतों की
स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर
निन्दित होती रही
धर्मगुरुओं के द्वारा
उद्दात्तता के नाम पर
समेटती रही अपने अन्दर विष
सभ्यताओं का
देह
बनती रही प्रयोगशाला
अहंकार के सारे पाखंडों की

देह
जो है सबसे प्रामाणिक
इनकार की गई है
सदियों से खुद देह के ही खिलाफ़

देह
जो कहीं ताकतवर है मन से
नैतिकता और सभ्यता से
करती है विद्रोह
हर निषेधों से और
लेती है बदला अपने
दुरुपयोगों का
बिना पक्षपात के
और दिखा देती है उनकी औकात
उस पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों को

देह,
जो स्वीकरती और जानती है
जीवन के सत्य को
बदलती है प्रतिपल
मिट जाती है
बिना शिकायत किये हुए
अमरत्व की
चली जाती है
बनाकर अपनी ही तरह की
कोई अन्य देह
देह
नहीं करती भेद
स्त्री और पुरुष में
पालती है समान रूप से
सब देहों को

देह
एक है प्रकृति के साथ
या
देह प्रकृति ही है
जो निर्दोष है
एक शिशु की भांति

देह
जो है सम्पूर्ण अस्तित्व
देह
जिस पर प्रश्नचिन्ह नहीं
लगाया जा सकता
क्योंकि देह ही है
प्रश्नकर्ता का आदि कारण

देह
है निर्भय और
प्रश्नकर्ता डरा हुआ
खुद की मौजूदगी
साबित करने को बेचैन
कमजोर होने की कुन्ठा को
छिपाने के लिये
बन जाता है तानाशाह
और साबित करता है खुद को
ताकतवर

देह
समझती है भाषा
प्रेम, वासना, क्रोध और घृणा की
देह
नहीं बनना चाहती
राजनीति का हिस्सा
देह को बनाया गया है
बाज़ार और
विमर्शों का शिकार


ऐसे जैसे देह नारी हो !


रचना अधूरी है

September 04, 2009

नन्ही चित्रकार

इतनी छोटी है,
चित्रकार
!
एकदम
नन्हीं सी,
जैसे

ख़ुद
कोई विचरता हुआ चित्र |
कोई तितली
आ गई हो
डोलती हुई

प्रकृति
के कैनवास से,
पेन लेकर |



अपने होने के
एहसास से भी
अनभिज्ञ
अहंशून्य !


समग्रता से
मौजूद अपनी चंचलता में |
जितना कोई

महान चित्रकार भी,
मौजूद नहीं
रहा होगा
अपने मास्टर पीस में |


पूरी तरह डूबी हुई,
बेतरतीब रेखायें, धब्बे,
छोटॆ-छोटे जाले बनाने में |

चिडिया, कीडे-मकोडॆ और
जलेबियाँ
बनाने में,
व्यस्त |

लेकिन सब बेबूझ,
आधुनिक
चित्रकार है नन्ही :)
लेकर हाथ में पेन
अपने पापा
का
घूम रही है कमरे में
और
उकेर रही है
चित्र |
किताबों पर, कापियों पर
दीवार पर,
अपने हाथ-पैर और
खिलौनों पर |
अपने पहुंच की एक-एक जगह को

भर देना चाहती है

अपने
अर्थहीन चिन्हों से |

चिन्ह

जो बने हैं डायरियों और
किताबों में |
बदल जाते हैं

नन्हें
चित्रकार में, रंगीन तितलियों में,
पन्नों के खुलते ही |


संजीदगी से घुमाकर

रबर से कोमल नन्हें हाथ,
किलकती है,
हर्षातिरेक से,
खींचती हुई अपना फ़्रॉक |

और अंकित हो जाते हैं

कुछ
कालजयी चित्र
एक पिता के मन पर |

August 24, 2009

तुम मेरी कविता में हो !

तुम मेरी कविता में हो !
जैसे चाय में शक्कर,
आटे में नमक,
कंप्यूटर में इन्टरनेट,
इश्तिहारी पम्पलेट |

तुम मेरे जीवन में हो !
जैसे टायर में हवा,
कैप्सूल में दवा,
शेर एक सवा,
लफडा नित नवा,
इंजन में तेल
बातें बेमेल |

तुम मेरे एकांत में हो !
जैसे सीरिअल में विज्ञापन,
तूफ़ान का ज्ञापन,
सत्र का समापन |

तुम मेरे पर्स में हो !
जैसे गेहूं में घुन,
ख़राब सगुन,
खेत में इल्ली,
दूध में बिल्ली |

तुम मेरे विचारों में हो !
जैसे कमरे में महक,
अंगारे में दहक,
उगती हुई पत्ती,
सस्ती अगरबत्ती |

तुम मेरे लेखन में हो !
जैसे साहित्य में आलोचक,
पुस्तक का विमोचक,
परीक्षा में नक़ल,
पोती हुई शकल |

तुम मेरे जोश में हो !
जैसे खीसे में रूपया,
भाड़े का जपिया,
गाडी लकटकिया |
ब्लोगर नौसिखिया,

कहाँ-कहाँ बताएं !
तुम सब में हो,
जैसे कंप्युटर में वाइरस,
हवा में मच्छर,
बीमारी में डाक्टर,
विद्यालय में मास्टर
पानी में आक्सीजन,
परीक्षा में रिवीजन |

लेकिन तुम हो कौन ?
यह पता नहीं |आदि आदि इत्यादि | "और" बाद में जोड़ देंगे |

ब्लोगर साथियों का योगदान :
"समीर जी" :
तुम मेरे रोष में हो,
जैसे ईमेल में स्पैम
बाथरुम में स्पाई-कैम
टिप्पणी में अनाम
ब्लॉगर हो बदनाम..

तुम मेरी गज़ल में हो
जैसे शेर बे-बहर
श्रोताओं पर कहर
काफ़िया ने किया किनारा
जनता ने अंडा दे मारा..

कहाँ कहाँ हम तुम्हें बतायें
बेहतर हो,
आप खुद ही जान जायें.
____________________
वंदना जी :
तुम मेरी बात में हो,
तुम मेरी रात में हो,
तुम मेरे साथ में हो,
और मेरी औकात में हो.

तुम मेरे हालात में हो,
तुम मेरे दिन-रात में हो,
लगता है ऐसा जैसे-
तुम पूरी कायनात में हो.

तुम मेरी छांव में हो,
तुम चमकती धूप में हो,
बरस रहा हो पानी जब-
तो तुम मेरी बरसात में हो.

तुम्ही हो माता,
पिता तुम्हीं हो,
तुम्ही हो बन्धु......पता नहीं है!!

तुम मेरी अकल में हो,
तुम मेरी शकल में हो ,
आ रही दुर्गन्ध सी कुछ,
क्या तुम मेरी बगल में हो?
__________________

फौजिया रियाज़ जी:
तुम मेरी साँसों में हो ,
जैसे सड़कों पर गड्ढे
नित नए फंदे...

तुम मेरी आंखों में हो ,
जैसे चश्मे का पॉवर
अमिताभ के हाथ में डाबर
_________________
सूचना :
जो भी मित्र इसमें कुछ जोड़ना चाहें जोड़ सकते हैं, कमेंट के माध्यम से | उनके नाम और लिंक के साथ उनकी पंक्तियाँ दी जायेंगी |
सूचना समाप्त हुई |
धन्यवाद !