February 14, 2011

फिर वही दिल(न) लाया हूँ

आज एक‍ रि-पीट करने का मन है।
ब्‍लॉगिंग की भाषा में जिसे रिठेल कहा जाता है। यदि ब्‍लॉगिंग में पहली बार पोस्‍ट प्रकाशित करने के कृत्‍य को पोस्‍ट पीटना कहा जाए तो दुबारा उसी पोस्‍ट को उसी ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने पर उसे रि-पीट कहा जा सकता है। इस तरह यह शब्‍द हिंदी और अँग्रेजी दोनों में समझने पर सही अर्थ प्रदान करता है।  उसी प्रकार ठेल और रिठेल शब्‍द का प्रयोग भी तदनुसार ब्‍लॉगर जन करते हुए पाए जाते हैं। ज्‍यादातर बलॉगर पोस्‍ट ठेलते हैं। जैसे किसी नदी में कुछ ठेल दो। ठेल दिए गंगा जी में। पहुँच गई पोस्‍ट इंटरनेट के महासागर में। अंतर बस इतना है कि इधर रिठेल भी कर सकते हैं। नदी में किसी चीज की सिर्फ ठेल हो सकती है, रिठेल नहीं।  यहॉं ठेल करने से रिठेल करने में सुविधा रहती है।

February 04, 2011

तर्क

आठवीं कक्षा में पढने वाले अपने पोते नीशू को बल्‍ला लेकर जाते हुए देखकर दादाजी ने मजाक में पूछा -

"कहाँ  चल दिए यह गदा लेकर शहजादे?"

"क्रिकेट खेलने"  नीशू ने जवाब दिया ।

January 29, 2011

नए साल में नया क्‍या है

 संवादघर पर की गई मेरी कविता रूपी टिप्‍पणी या टिप्‍प्‍णी रूपी कविता।  आज बहुत दिन बाद गूगल डाक्यूमेंट्स में सेव  एक पुराने नोट में मिल गई।   

नए साल में नया क्‍या है
अपने खुश होने का बहाना क्‍या है
हकीकत को रुबरू कैसे करें
इस जिंदगी में नया क्‍या है
मेरे होने में नया क्‍या है
मेरे मिटने में नया क्‍या है

कुछ भी लिखने में नया क्‍या है
हर नये में नया क्‍या है

सुबहो शाम में नया क्‍या है
सोने जगने में नया क्‍या है

हुस्‍न -ए-उल्‍फत में नया क्‍या है
एक चमडी की हकीकत क्‍या है
अपने इल्‍म का फायदा क्‍या है
काम यह कहीं आता क्‍या है

मत पूछो नया साल लाता क्‍या है
कहिए इंसा नया करता क्‍या है

सच नए साल में नया क्‍या है
नई नजर में कुछ नया क्‍या है ?

किसी ने पूछा जिंदगी क्‍या है
हमने पूछा जीने का बहाना क्‍या है

नई नजर हो तो सब कुछ नया है
नया साल भी नया है
पुराना यार भी नया है
करोडों साल का बूढा सूरज
रोज सबेरे नया नया है
रात में करते झिलमिल तारे
खरबों साल से नए नए हैं
इक बूढे की बूढी प्रियतम
प्रेम नयन से नई नई है

बच्‍चे की निश्‍छल ऑंखों में
बूढी दुनिया नई नई है

नई ऑंखें हों हर दिन नया है
नया साल को भी इंसा ही बनाता नया है
जीने के लिए कुछ झूठ भी चाहिए
इस काम में चहिए सिर्फ हकीकत कहॉ है

कविता अधूरी जैसी है । साल भी अभी बहुत बाकी है।