November 12, 2009

बहुत हो गया अब देखिए तरह तरह की मोनालिसा

मोनालिसा मोरक्को में
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मोनालिसा लन्दन में
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मोनालिसा इराक में
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मोनालिसा मिस्र में
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मोनालिसा सऊदी अरब में
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मोनालिसा कुवैत में
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मोनालिसा लेबनान में
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मोनालिसा फिलिस्तीन में
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मोनालिसा अफगानिस्तान में
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दुबई में

November 11, 2009

तो इसमें कौन सी नई बात है भाई

खबर : हिन्‍दी में शपथ लेते हुए विधायक अबू आजिमी की मनसे विधायकों द्वारा पिटाई ।

तो इसमें कौन सी नई बात है भाई
हिन्‍दी की वजह से
तो होती ही रहती है पिटाई
अभी विधायक की हो गई
इसके पहले मजदूरों, कामवालों,
और छात्रों की हूई थी
ऐसी ही पिटाई
ये तो दो-चार हाथ ही पाये
लेकिन सब इतने ल‍की थे नाय
कुछ हाथ-पैर तुडवाकर निपटे
कुछ अपनी जान से हाथ धो बैठे
कुछ पक्‍को है कांय
के अपने दोस्‍त, बहन और भाय की
कब हिन्‍दी माई के नाम से
देश के कुछ जगहों में जान चली जाय
ये तो भई यारा स्‍थूल पिटाई
सूक्ष्‍म पिटाई तो हो ही रही है लगातार
हर जगह अपनों और गैरों से बार-बार
हर हिन्‍दी भाषी महसूस कर सकता है इसे
खुद हिन्‍दी का ब‍डा आदमी नहीं बोलता जिसे
हिन्‍दी माध्‍यम में पढे विद्यार्थी से पूछिए
गॉंव कस्‍बे के आदमी से पूछिये
कितनी पिटाई होती है उसकी
उच्‍च शिक्षा में , नौकरी में , नौकरी के निर्वहन में
औरों को तो छोडिये अपने फिल्‍मी सितारो को ही देखिये
हिन्दी के नाम से करोडों का वारा-न्‍यारा करते हैं
पर कभी फिल्‍मों से बाहर उनके मुखारबिन्‍द से
हिन्‍दी नहीं निकसते हैं
सबके दुलारे है , बडे प्‍यारे हैं, पर
जिसका खाते हैं , उसी में पलीता लगारिये हैं
आप ही बताइये अपने लोगां को ही देख लीजिये
अपने नौकरशाहों और खिला‍डियों को ही देख लीजिए
हिन्‍दी बुलवाकर इनकी तौहीन मत कीजिए
भारत देश में हिन्‍दी भी जीती है
गरीब आदमी भी जीता है
दोनों से नाता रखना पडता है
पैसे, वोट और व्‍यवसाय के लिए
सितारों , नेताओं और व्‍यापारियों को

हिन्‍दी नही बोलना है तो मत बोलो
लेकिन जो बोलता है उसका मुँह तो मत तोडो
क्‍योंक‍ि हिन्‍दी गॉंधी है तो सुभाष भी है
तिलक है और आजाद भी है
यह सबमें घुल जाती है
हर भाषा में मिल जाती है
यह समन्‍वय की कृति है
बिल्‍कुल भारतीय प्रकृति है
इसका किसी भाषा से विराध नाय है
कांय के सब भारतीय भाषा तो
बूढी दादी संस्‍कृत से ही आयं हैं

लोगां तो बिला वजह हो हल्‍ला मचायं हैं

हिन्‍दी नहीं है किसी की मोहताज
वह हमेशा रही है बादशाह बेताज
लोकतंत्र है हल्‍ला मचाते रहो
अंतिम आजादी का लुत्‍फ उठाते रहो
गीत एक फिल्‍मी गुनगुनाते रहो
गम को धूऍं में उडाते रहो
वायु प्रदूषण फैलाते रहो
वरना गम तुम्‍हें उडा देगा
बिना डोर के पतंग की तरह

सच कडवा है कुरुप है तो हम क्‍या करें
तुझे मिर्ची लगी तो हम क्‍या करें
हमें मिर्ची लगी तो तुम क्‍या करे

भाई से चारा छुडाते रहो
भाईचारा निभाते रहो

"यहाँ बात सिर्फ़ हिन्दी की नहीं है असल बात ये भी है की आप कैसे किसी को उसकी भाषा में बात करने से रोक सकते हैं , आपको ये हक़ किसने दिया है ?"

November 09, 2009

चीथडों के गठ्ठर फ़ेंको

पता नहीं
कैसे रहते हैं लोग

आज भी

लादे हुए
सतत

चीथडों का गठ्ठर

जिसे कभी खोल कर
नहीं देखा गया

कि क्या है उसके अन्दर
पता नहीं कितनी
सडी हुई चीजें हैं
उनमें जो
मारती रहती हैं
सडांध वक्त-बेवक्त
तब छिडक देते हैं
उनके ऊपर गुलाब जल
और इत्र
सुंदर शब्दों और
व्याख्याओं के द्वारा

फ़िर सडांध को
थोपा जाता है
दूसरों के गठ्ठरों पर
और चलता रहता है
यही क्रम
बिना सफ़ाई किए हुए
अपने-अपने गठ्ठरों की
बह जाता है खून,
पानी सा
एक-एक चीथडों
के लिए
वो भी
दूसरों के उतारन
सदियों के फ़ेंके हुए

कैसे रहते हैं
ऐसे घरों में लोग
चीथडों को
मनमर्जी से
लादे हुए
जिनसे बाहर जाने की
झांकने की
तो बात ही क्या
ऐसा सोचने की भी
इजाजत नहीं है

जहां संदेह
एक अपराधबोध है
अपने होने की घोषणा
महापातक

संदेह
जो वजह है
सृजन का
सारे ज्ञान-विज्ञान का
आदमियत का
डिसेबल कर दिया
जाता है
स्थाई रूप से
लाद दिया जाता है
ऊपर से
एक खोखला विश्वास
जिसे बचाने के लिए
तैनात होती हैं
बडी-बडी कंटीली बागुडें
भय और प्रलोभनों की

रहने वाले कह सकते हैं
इसे मर्जी से रहना
जैसे पैदाइश से ही
पिंजडे में रहने वाला पक्षी
रहता है
अपनी मर्जी से

पर फ़िर भी,
कैसे रहते हैं
लोग ऐसे घरों में
अब भी
जहां रहने का
मूल्य होता है
रहने वाला
वह खुद
और
ढोते हुए चलना
होता है सिर पर
एक भारी गठ्ठर
पूरे अतीत का
गर्व से
कहना होता है उसे अपना
बिना चुनाव की आजादी के
लडना पडता है
दूसरों के
उतारन चीथडों के
सम्मान के लिए

यह एक अपमानजनक
मूर्खता हो जाती है
जब एक आम
आदमी
लड जाता है
उन चीथडों के लिए
जो न उसके हैं
न ही उसके किसी काम के हैं
जो न उसे रोटी दे सकते
न ही प्रेम और खुशी
सिवाय बोझ और घुटन के
बेगारी मजदूरी की तरह
जबकि कुछ होशियार
लोग उतारने नहीं देते
गठ्ठर
आदमी के सिर से
अपनी मालकियत
कायम रखने के लिए
और करते रहते हैं
चीथडों का व्यापार

मित्रों !
तनिक रुको और सोचो
क्या वह सब तुम्हारे हैं
जिन्हें स्थापित करने के लिए
तुम अपनी सबसे ज्यादा
ऊर्जा नष्ट कर रहे हो
कब तक अतीत के
लाउड स्पीकर बने रहोगे
कब तक ?
कब तक दूसरे के चीथडों की
मार्केटिंग करते रहोगे
अपने गीत कब गाओगे ?
कब तुम अपनी पहचान
अपनी निजता से दोगे
अपने सिर और कान में
खोंसे हुए चीथडों से नहीं

पता नहीं कब ?

सोचोगे तो अवश्य ही
पाओगे की ये चीथडों
के गठ्ठर
इतने कीमती नहीं है कि
इनके लिए लडा जा सके
इनका उपयोग हो सके तो कर लो
पर खोपडी में
लादकर
इनके रक्षार्थ तलवार लेकर
मत घूमो
अतीत के चीथडों के लिए
वर्तमान को तार-तार मत करो !

कब चीथडों को तुम
इंसानियत से कम
तवज्जो देना शुरू करोगे
ताकि बचाया जा सके
इंसानियत को
चीथडे-चीथडे होने से !

और भी बातें हैं
ज्यादा जरूरी जो
की जा सकती हैं
बेहतरी के लिए
इंसान की ,
चीथडों के लिए
जांबाजी दिखाने के सिवा !