April 16, 2012

अवांछित पंक्तियां

प्रेम में प्रेम भी है
कविता में अब भी कुछ कविता बची हुई है
ऐसा लगता है
शब्‍दों का सम्‍मान हमारी दगाबाजी का
निहायत जरुरी हिस्‍सा है 
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निराशावादी होना मुझे पसंद नहीं है 
दिखना और भी ज्‍यादा नापसंद
इसलिए मस्‍कुरा देता हूँ, परिचित को देखकर
मुस्‍कुराहट में खुशी भी है या नहीं
इसकी परवाह न मुझे है न उन्‍हें
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लाइनों को तोड देता हूँ
बीच से
ताकि पढने में हो आसानी और
समझने में मुश्किल
पर शब्‍द खुद घुस जाते हैं
अपने-अपने हिस्‍से तक
अर्थ की परवाह किए बिना
शायद वे समझ गए हैं कि
हमारा अर्थ हमारे होने में ही है
किसी और के सलीके में नहीं
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मैं वह सब नहीं कहूँगा
जो देखता हूँ रोज रोज
और सवाल ही नहीं उठता
वह सब देखने का जिसे
मैं रोज करता हूँ
मनोरंजन ही है वह चीज जिसे
मैं पसंद करता हूँ
क्‍योंकि यही सबसे सुरक्षित काम है
जिसे रोजी रोटी के बाद मैं करना चाहता हूँ
  

February 14, 2012

डे फे से

मैं इतने जोर से हाथ घुमाऊँगा 
कि एक तमाचे के बराबर ऊर्जा मुक्‍त हो 
तमाचा किसी को लगे भी न और 
मुझे संतोष हो जाए कि मैंने 
जोरदार विरोध प्रकट कर दिया 
 

March 06, 2011

एक गैर जिम्‍मेदाराना कविता

मैं जिम्‍मेदार नहीं हूँ
महँगाई के बढने का
कचडे के ढेर की तरह रोज
घोटालों के निकलने का
मैं जिम्‍मेदार नहीं हूं देश में
किसी भी तरह की गडबडियों का
सचिवों मंत्रियों नौकरशाहों की नि‍युक्तियों का
मैं बिल्‍कुल जिम्‍मेदार नहीं हूँ
किसी के मरने का