July 31, 2009

प्रश्न और प्रश्न चिन्ह

प्रश्न,
दो तरह के होते हैं,
एक - सिर्फ़ प्रश्न होते हैं,

सामान्य पूछ-ताछ के,
जैसे सब्जी के भाव पूछना, हालचाल,

गणित के इबारती सवाल
या बच्चों की जिज्ञासा
जिन्हें हम टरका देते हैं
सच्ची-झूठी कहानियों से,
बहला देते हैं बचपन को,
उत्तर पाने के लिए जीवन से

दो - प्रश्न जो लिए हुए होते हैं,
एक प्रश्न चिन्ह अपने पीछे,
स्थाई भाव की तरह,
अटल होते हैं
दुर्भाग्य रेखाओं,
या ध्रुव तारे की तरह

जैसे किसी बेरोजगार से पूछना
'क्या कर रहे हो आजकल'
किसी लाइलाज रोगी से
हाल चाल पूछना 'कैसी तबियत है' ?
या शादी के तय करने के बाद
माता -पिता द्वारा
पूछना -'लड़का पसंद हैं ना' ?
ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं
जो निर्मित करते हैं,
प्रश्न चिन्ह इंसान के दामन पर
कभी-कभी इतने बेमानी होते हैं ये प्रश्न चिन्ह,
की भर देते हैं खीझ और उलझन दिलोदिमाग में
जैसे पैदा हो गए हों एकदम बेमानी,
सिर्फ़ अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए

प्रश्न चिन्ह,
अस्तित्व रखते हैं, प्रश्न के हट जाने पर भी
उपहास करते हुए
उत्तर देने वाले का


प्रश्न चिन्ह,
किसी प्रश्न के पीछे लगने वाला,
संकेतक मात्र नहीं है

एक अनुत्तरित प्रश्न,
देता है एक,
अवांछित प्रश्न चिन्ह,
जो
बना देता है एक प्रश्न,
अपने सामने पड़ने वाले
व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को,

जिसे न हटा पाने की सूरत में
वह रह जाता है,
सिर्फ़ एक प्रश्न चिन्ह ?

July 23, 2009

बाल गंगाधर तिलक एवं चंद्रशेखर आजाद


जी नही, मैं इन दो महान व्यक्तितों में कोई तुलना नहीं करने जा रहा | तुलना ना की जा सकती है, ना ही करनी उचित है, क्योंकि वह असंगत होगी | बल्कि बात सिर्फ़ इतनी है कि आज 23 जुलाई है, और बाल गंगाधर तिलक (23 जुलाई, 1856 - १ अगस्त १९२०) और चंद्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 - 27 फरवरी 1931) का जन्म दिवस भी । मेरा यह ब्लॉग पोस्ट इन महान सपूतों को याद करने का एक बहाना है ।

तिलक के बारे में वेलेंटाइन शिरोल ने कहा था कि "वे भारत में अशांति के जन्मदाता थे ।" यह कथन उन पर पूर्णतः सही उतरता है क्योंकि 'तिलक' भारतीय असन्तोष के वास्तविक जनक थे । तिलक कांग्रेस के ’गरम दल’ के नेताओं में से थे और उनका मानना थ कि आजादी हमें मांगने से नहीं मिलेगी बल्कि इसे हमें लडकर हासिल करना पडेगा ।
"स्वतन्त्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा ।"

वे राज्द्रोह के सबसे खतरनाक अग्रदूतों में से थे । 'गीता रहस्य' तथा 'आर्कटिक होम ऑफ़ वेदाज' इनकी प्रसिद्ध पुस्तके हैं, जो लोकमान्य तिलक ने जेल में लिखी थीं | वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे | और पुस्तकें उन्होंने अंग्रेज सरकार द्वारा अपने ऊपर लगाए गए जुर्माने की भरपाई के लिए लिखी थीं |

तिलक के बचपन का प्रसंग है कि जब उनके शिक्षक ने उनसे उन मूंगफली के छिलकों को बीनने का आदेश दिया जो कक्षा में अन्य छात्रों ने फैलाये थे तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया - "जब मैंने छिलके नहीं फैलाए तो मैं उन्हें क्यों बीनूं | " इस पर शिक्षक द्वारा दी गयी सजा भी उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर ली, लेकिन अपनी बात पर अडिग रहे | बाद में शिक्षक को असलियत का पता चला तो उन्हें अपने किए पर दुःख हुआ | इस तरह लोकमान्य तिलक में बचपन से ही अन्याय को किसी भी तरह बर्दाश्त न करने की अटल प्रवृत्ति थी |

नरमपंथी नेताओं के विपरीत तिलक का यह दृढ़ विश्वास था कि अंग्रज भारत को कभी भी अपनी स्वेच्छा से स्वतंत्र नहीं करेंगे | महाराष्ट में व्यापक स्तर पर मनाया जाने वाले गणेश उत्सव की शुरुआत तिलक ने ही जनता में राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लिए की थी |

चंद्रशेखर आजाद अपने क्रांतिकारी साथियों के बीच पंडित जी के संबोधन से लोकप्रिय थे | भगत सिंह हमेशा उन्हें पंडिंत जी कहकर संबोधित करते थे | क्रांतिकारियों को संगठित करने, योजनाओं को अंजाम देने में उनका महत्वपूर्ण योगदान होता था | हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपुब्लिकन आर्मी के लगभग सभी षडयंत्रों जैसे काकोरी काण्ड, सांडर्स की ह्त्या आदि में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी थी |

आजाद को बचपन से ही अपने देश की गुलामी का एहसास था और वे देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे | हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपुब्लिकन आर्मी में शामिल होने से पहले वे गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेते थे | लेकिन गांधी जी के द्वारा असहयोग आन्दोलन वापस लेने के बाद उनका अहिंसक आन्दोलन से मोहभंग हो गया और वे क्रांतिकारी तरीके से देश को आजाद कराने में जुट गए |

आजाद अपने नाम के अनुरूप हमेशा आजाद ही रहे और कभी उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका |

चंद्रशेखर आजाद का उपनाम आजाद कैसे पडा इसकी भी एक कहानी है | हुआ यूँ कि असहयोग आन्दोलन के प्रदर्शन कारियों पर निर्ममता से डंडे बरसाने वाले दरोगा पर तेरह साल के दुस्साहसी बालक चंद्रशेखर ने पत्थर बरसा कर उसका सिर फोड़ दिया | इस अपराध में उन्हें अदालत में जब न्यायाधीश के सामने पेश किया गया | नाम पूछे जाने पर उन्होंने अपना नाम "आजाद", पिता का नाम "स्वतंत्र" और घर का पता जेल खाना बताया | इस पर जज ने उन्हें नंगी पीठ पर बीस कोडे मारने की सख्त सजा सुनाई | यह सजा उन्होंने वीरता पूर्वक "भारत माता की जय" बोलते हुए सहन कर ली | तब से "चंद्रशेखर" आजाद के नाम से प्रसिद्ध हो गए |
चद्रशेखर आजाद वेश बदलने में बहुत निपुण थे | एक बार तो वे उसी दरोगा के यहाँ घर में वेश बदलकर नौकर बनाकर रह रहे थे, जो उन्हें खोज रहा था |

आजाद के क्रांतिकारी जीवन से सम्बंधित एक और प्रसंग मैंने बहुत पहले पढ़ा था | आजाद और उनके साथी किराए से एक छोटा सा कमरा लेकर रह रहे थे | उनके घर के बगल में ही एक आदमी रहता था जो रोज रात को शराब पीकर आता और बेवजह अपनी पत्नी को मोहल्ले में घसीट-घसीट कर पीटता | आस-पड़ोस का कोई भी आदमी उसे रोकने का साहस नहीं कर पाता था | आजाद और उनके साथी प्रायः बाहर रहते और कमरे में देर रात तक जागते थे, साथ ही अपनी गोपनीयत भंग होने के डर से उसे नजरअंदाज कर रहे थे |

एक दिन सबेरे सबेर आजाद कमरे से बाहर निकलकर कहीं जा रहे थे, तभी सामने उनका पड़ोसी मिल गया | उसने आजाद से कहा आप लोग क्या देर रात तक कमरे में कुछ ठोंका-पीटी करते रहते हैं | आजाद ने कहा कि हम तो किसी मशीन के साथ ठोंका पेटी कर रहे थे और तुम तो अपनी गउ जैसी पत्नी को बेरहमी से पीटते हो | तुम्हे शर्म आनी चाहिए | इतना सुनते ही वह तैश में आ गया और चिल्लाते हुए बोला - तू कौन होता है साले मेरे मामले में दखल देने वाला | आजाद ने उसे एक भारी झापड़ रसीद किया तो वह धूल-चाटने लगा | साथ ही उन्होंने उसे चेतावनी देते हुए कहा कि तुमने मुझे साला कहा है, इस तरह तेरे पत्नी मेरी बहन हुई | आज के बाद यदि तूने मेरी बहन पर हाथ उठाया तो तेरी हड्डी-पसली तोड़कर रख दूँगा | उस दिन के बाद आजाद उसे मजाक में जीजा कहने लगे और वह उस आदमी को भी अपनी गलती का एहसास हो गया | फ़िर कभी वह अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हुए नही देखा गया |
अपने ही एक साथी के विश्वासघात की वजह से वे इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस द्वारा घेर लिए गए और वीरता पूर्वक लड़ते हुए, अन्तिम गोली से ख़ुद को आजाद कर लिया | पुलिस में आजाद का खौफ इस कदर था की
उनके मृत शरीर पर भी उन्होंने गोलियाँ चलाईं कि कहीं वे जिंदा न हों | इस तरह थे चन्द्रशेखर आजाद |

स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का प्रभाव और महत्व उनके द्वारा प्रत्यक्षतः पायी गयी सफलताओं से बढ़कर है | यद्यपि सक्रिय क्रांतिकारी गतिविधियाँ "आजाद" के बाद लगभग समाप्त हो गयी थीं, किंतु इन क्रांतिकारियों ने भारतीय युवकों के मन-मानस में साहस का जो संचार किया, उसीने आगे चलकर भारतीय ह्रदय में स्वतंत्रता की तड़प पैदा की |
व्यक्ति का आकलन हमेशा उसकी परिस्थितियों के संदर्भ में करना चाहिए |
(कृपया ध्यान दें कि नाम के ऊपर दी गयी लिन्क विकिपीडिया से हैं और यहाँ पर इनके जीवन से सम्बंधित समस्त जानकारी उपलब्ध हैं |)

July 22, 2009

कट्टरता

कट्टरता एक बंद कमरे की तरह होती है, जिसमें कोई दरवाजा खिड़की या रोशनदान नहीं होता स्वाभाविक है कि ऐसे कमरे में सिर्फ़ घुटन होगी और सृजन का कोई भी बीज वहां अंकुरित नही हो सकता कट्टरता का मतलब होता है कि सिर्फ़ यही विचार सही है और बाकी सब ग़लत - "तुम मेरे शत्रु हो क्योंकि तुम मुझसे भिन्न मत रखते हो"
"मैं तुम्हे बर्दास्त नही कर सकता क्योंकि तुम्हारे ढंग मुझसे भिन्न हैं"
यह कट्टरता का मूल स्वर है इस तरह कट्टरता सोच विचार, संदेह और विमर्श के सभी रास्ते बंद कर देती है कट्टर दिमाग कभी सृजनात्मक नही हो सकता यह कहा जा सकता है कि कट्टर व्यक्ति कूप मंडूक के समान होता है

यह एक विरोधाभास है कि अपने सैद्धांतिक रूप में कट्टरता स्वयं की भी दुश्मन अर्थात आत्मघाती है, क्योंकि "यह दूसरे को बर्दास्त न कर सकने कि प्रवृत्ति है" |

कट्टरता के कई प्रमुख ठिकाने हैं, जिनमें धर्म सबसे महत्वपूर्ण है सबको पता है कि धार्मिक और जातीय कट्टरता के कारण मनुष्य को कितनी यातना सहनी पड़ी है वर्तमान कि घटनाओं को देखकर मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि हम आगे जा रहे हैं या पीछे जा रहें हैं |

कट्टरता एक आदिम प्रवृत्ति है आज विज्ञान के उत्तर आधुनिक काल में इसकी कोई आवश्यकता नही है |

आज के युवाओं और किशोरों का यह कर्त्तव्य है कि सहिष्णुता और भाईचारे के विचारों को अधिक से अधिक प्रचारित करें हम इस पृथ्वी पर अकेले जीवित नहीं रह सकते, हमें साथ साथ ही रहना होगा

हमें इतिहास से सबक लेना होगा और अपने तथाकथित बुद्धिमानो (जिनके प्रेम के सिद्धांत का परिणाम घृणा के अलावा और कुछ नही हुआ) के उपदेशों पर आँख खोलनी होगी
कट्टरता को रुढिवादिता भी कहते हैं, पोंगापंथ और कठमुल्लापन इससे मिलते जुलते शब्द हैं लेकिन यहाँ मैं एक विशेष बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ की कट्टरता पर किसी विशेष विचार का पेटेंट नहीं है मेरा मतलब धर्मं या भगवान को न मानने वाले अर्थात जो अपने को नास्तिक कहते हैं, जो अपने को अडवांस या अग्रिम मानते हैं, भी उतने ही कट्टर हो सकते हैं जितने की धर्मभीरु और पुरातनपंथी |

मेरे विचार से, किसी एक मत को सबके लिए स्थापित करने की सोच ऐसे ही है जैसे सबको एक ही नाप के कपडे या जूते पहनाने की कोशिश करना जो की हास्यास्पद और तकलीफदेह है विविधता को समस्या मानना और उसे ख़त्म करने की कोशिश करना, दुनिया को उबाऊ बनाने की कवायद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है |

लकीर के फकीर दो तरह के होते हैं - कुछ नए लोग जो सभी पुराने को कूड़ा मानते हैं, दूसरे वे पुराने जो कुछ नया (खासकर विचार) देखकर आक्रामक हो जाते हैं दोनों तरह की सोच खतरनाक है और समाज के लिए घातक है |

कट्टरता की सबसे बड़ी खराबी यह है कि इसमें समय के साथ अपडेट होते रहने की प्रवृत्ति और क्षमता का नितांत अभाव होता है | यदि युवा यह सीख सकें कि कोई भी विचार अन्तिम नहीं है, क्योंकि बेहतरी की गुंजाईश हमेशा रहती है तो हम समाज को अधिक समझदार और उदार बना सकते हैं एवं सतत विकासोन्मुख बने रह सकते हैं |