July 07, 2009

हिन्दी ब्लॉग्गिंग में टिप्पणी का महत्व

ब्लॉगिंग की विधा आ जाने के बाद कमेंट या टिप्पणी शब्द अचानक बहुत हिट हो गया है । और इन्टरनेट पर, खासकर हिन्दी ब्लॉगिंग में इसका महत्व बहुत अधिक बढ गया है । कमेन्ट के विविध रूपों को देखते हुए यदि किसी के मन में यह दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न हो जाए कि हिन्दी ब्लॉगिंग के में टिप्पणी की क्या भूमिका है तो मैं कहना चाहता हूं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में टिप्पणी का महत्व बहुआयामी है | कृपया गौर करें :

टिप्पणी राम-राम है, नमस्कार है
कभी पैलगी तो कभी प्रणाम है
नये चिट्ठों से शिष्टाचार है
कभी परिचय और सत्कार है
'हम भी हैं' की गुहार है
कभी हेलो हाय तो कभी, बाय-बाय है
आदाब है, सत्श्री अकाल है
जिसको मिले वो बिना रुपये के मालामाल है
वरना चिट्ठा कंगाल है
यह बातों का प्रपन्च बनाती है
हिन्दी ब्लॉगिंग को टंच बनाती है
महंतों को सन्त बनाती है
माहौल को जीवंत बनाती है
यह ब्लॉगर का दर्पण भी है
टिप्पक(टिप्प्णीकार)का प्रेमार्पण भी है
कभी-कभी यह तर्पण भी है
पूरी तरह समर्पण भी है |
कभी यह गंभीर विमर्श है
कभी विनोदी परामर्श है
कभी यह नकाबपोश है
तब फैलाती आक्रोश है
यह ब्लोगर को मुद्दे देती है
कभी इक्के-दुक्के
कभी चौके-छक्के देती है
कौन नहीं इस पर फ़िदा है
यह एक लिमिटेड विधा है
इससे ज्यादा क्या कहें कि
यह ब्लोगिंग की जान है
क्योंकि बिना इसके
कोई हिन्दी चिट्ठा नहीं बन सका
महान है |
-जय चिट्ठाकर्म (हैप्पी ब्लॉग्गिंग)

कुछ लोग टिप्पणी को कमतर नजरों से देखते हैं और वे इसे सिर्फ़ ब्लॉगर की खुशामद या 'लाइन मारने' की वस्तु समझते हैं । इसमें 'जड चेतन गुण दोषमय’ की तरह सच्चाई है भी और नहीं भी क्योंकि 'लाइन मारना' निहायत ही शाकाहारी कर्म है | जब तक कि वह 'लाइन काटने' में न बदल जाए । इसका सीधा सा अर्थ होता है "प्रभावित करने की कोशिश करना" और यह मनुष्य की एक कुदरती कमजोरी है।

यदि कोई ब्लॉग्गिंग को खुशामद कहने वालों के ब्लॉग पर इस तरह की कमेन्ट करे - "एकदम बकवास", "ये सब पहले कहीं पढा हुआ लगता है", "यदि आप लिखना बन्द कर दें तो हिन्दी भाषा पर एहसान होगा" तो इसे कोई भी पसन्द नहीं करेगा और यह एक तरह से ब्लॉगर से सम्बंध बिगाडने जैसा होगा । लेकिन रास्ता भारत के आम बजट की तरह दो अतियों के बीच होता है ।
कमेन्ट ब्लॉगिंग को गति देते हैं । यह ब्लॉगर और पाठक के बीच एक संवाद है । साझा ब्लॉगों में यह एक तरह से परिचर्चा की तरह फ़ैलता है । इस मुद्दे पर अलग से एक ब्लॉग पोस्ट लिखा जाएगा |

यद्यपि ऐसे ब्लॉगरों का अस्तित्व काल्पनिक ही होगा जो टिप्पणी ना चाहते हों । बहरहाल हमारा प्रमुख उद्देश्य सिर्फ़ ब्लॉगिंग में टिप्पणी के महत्व को उभारकर सामने लाना है और कुछ नहीं । इसीलिये कोई कुछ का कुछ ना समझे | यदि कोई ऐसा समझना चाहता है तो इसके लिये वह स्वयं जिम्मेवार होगा । हमारी यह बात पूर्णतः काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वस्तु या घटना से कोई पास-पास का नाता भी नहीं है । यह बात अलग है कि ज्यादा टिप्पणी पाने वाले ब्लॉगर उस दुकानदार की तरह हो जाते हैं जिसकी दुकान पर भीड ज्यादा रहने के कारण वह टुटपुन्जिये ग्राहकों की तरफ़ देखकर मुस्कुराना जरूरी नहीं समझता, यह उसकी मजबूरी भी है, क्योंकि ऐसा करने पर एक परमानेंट स्माइली मुद्रा अख्तियार करनी पड़ेगी | चाहे कोई ब्लॉग पोस्ट पर सिर्फ़ 'बढिया' या 'बहुत अच्छा' या 'लगे रहो' जैसे कमेन्ट भी कर रहा है तो भी वह वहां पर अपना समय और श्रम लगा रहा है । आपको लिखने की वजह दे रहा है । यदि आप सोचते हैं कि उसकी नीयत अपना लिंक देने की थी तो भी कुछ गलत नहीं है । मैं हिन्दी के कई महत्व्पूर्ण चिट्ठों से कमेन्ट की वजह से परिचित हुआ । बडका ब्लोग्गरों के द्वारा की गई टिप्पणी से बेनामी (अनामी) ब्लोग्गर उसी तरह प्रसन्न होते हैं जैसे अप्रसिद्ध लेखक किसी बड़े साहित्यकार की प्रशंसा से गदगद होते हैं |

इन सब दलीलों से प्रतीत होता है कि हिन्दी ब्लोगिंग में टिप्पणी एक पुन्न-कम-समझदारी का काम है | कहने की जरूरत नहीं की नेक काम करने से नेकनीयती बढ़ती है |

और अंत में :
बापू बोले अगर कोई टिप्पणी न करे तो टेंशन मत लो, उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करते रहो | बोले तो फुल विनम्रता के साथ | एक दिन उसका ह्रदय परिवर्तित होगा फ़िर वो सिर्फ़ तुम्हारा ब्लॉग ही नहीं पढेगा, बल्कि उस पर टिप्पणी भी करेगा |

July 03, 2009

शिव और पार्वती : कुछ तो लोग कहेंगे


पूर्णिमा की रात थी । शुभ्र ज्योत्सना में सारी पॄथ्वी डूबी हुई थी । शंकर और पार्वती अपने प्यारे नन्दी पर सवार होकर भ्रमण को निकले थे । किन्तु वे जैसे ही थोडा आगे गये थे कि कुछ लोग उन्हें मार्ग में मिले ।

उन्हें नन्दी पर बैठे देखकर उन लोगों ने कहा :
"देखो बेशर्मों को । बैल की जान में जान नहीं है और दो-दो उस पर चढकर बैठे हैं ।"
उनकी यह बात सुनी तो पार्वती नीचे उतर गईं और पैदल चलने लगीं । किन्तु थोडे ही दूर जाने पर फ़िर कुछ लोग मिले ।

वे बोले : "अरे मजा तो देखो, सुकुमार अबला को पैदल चलाकर यह कौन बैल पर बैठा चला जा रहा है भाई! बेशर्मी की भी हद है!" यह सुनकर शंकर नीचे उतर आये और पार्वती को नन्दी पर बैठा दिया । लेकिन कुछ ही कदम गये होंगे कि फ़िर कुछ लोगों ने कहा :
"कैसी
बेहया औरत है, पति को पैदल चलाकर खुद बैल पर बैठी है । मित्रों, कलियुग आ गया है।"
ऐसी
स्थिति देख आखिर दोनों ही नन्दी के साथ चलने लगे।
किन्तु थोडी ही दूर न जा पाए होंगे कि कुछ लोगों ने कहा: "देखो, मूर्खो को । इतना तगडा बैल साथ में है और ये पैदल चल रहे है।" अब तो बडी कठिनाई हो गई ।


शंकर
और पार्वती को कुछ भी करने को शेष न रहा । नन्दी को एक वॄक्ष के नीचे रोक वे विचार करने लगे । अब तक नन्दी चुप था । अब वह हंसा और बोला :"एक रास्त मैं बताऊं ? अब आप दोनों मुझे सिर पर उठा लीजिये।" यह सुनते ही शंकर और पार्वती को होश आया और दोनों फ़िर से नन्दी पर सवार हो गए । लोग फ़िर भी कुछ न कुछ कहते निकलते रहे ।असल में लोग बिना कुछ कहे निकल भी कैसे सकते हैं ? अब शंकर और पार्वती चांदनी की सैर का आनन्द लूट रहे थे और भूल गये थे कि मार्ग पर कोई भी निकल रहा है ।

जीवन में यदि कहीं पहुंचना हो तो राह में मिलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति की बात पर ध्यान देना आत्मघातक है |
ओशो द्वारा कही गई बोध कथाओं का संकलन 'मिट्टी के दिए' से

July 02, 2009

जुलाई : में क्या याद आता है

क्या आपको मालूम है कि जुलाई का महीना उसी दिन से शुरू होता है जिस दिन से अप्रैल का महीना या लीप वर्ष की 1 जनवरी | देख लीजिये ऐसा ही है |

ग्रेगोरियन कैलेन्डर में जुलाई महीने का नामकरण रोमन सम्राट जूलिअस सीजर के नाम सेहुआ है | जूलिअस सीजर के लिए इस महीने का पुनर्नामकरण किया गया था क्योंकि जूलिअस सीजर का जन्म इसी महीने हुआ था और तब यह महीना लैटिन में नाम Quintilis नाम से जाना जाता था | इस तरह जुलाई प्राचीन रोमन कैलेंडर में वर्ष का 5 वाँ महीना था | उस समय तक वर्ष का प्रारम्भ जनवरी से नहीं होता था । ईसा से 450 वर्ष पूर्व ।

इतिहास से बाहर आयें तो जुलाई मतलब बारिश, गरमी से राहत । खेती का नया सत्र, जिसका आधार जुलाईमहीने में होने वाली बारिश तय करती है ।
यह महीना किसानों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील होता है |अति वृष्टि होने पर कुछ क्षेत्रों में बाढ और उससे होने वाली तबाही भी, महीने के उत्तरार्द्ध तक शुरु हो जाती है ।

जुलाई महीने में जो दो सबसे मत्वपूर्ण घटनायें होती हैं वह है शिक्षा सत्र की शुरुआत और संसद का मानसून अधिवेशन । 1 जुलाई को डाक्टर्स डे भी मनाया जाता है, बिल्कुल उसी तरह जैसे वर्ष के सारे ’डे’ मनाये जाते हैं।(हम इस पर ब्लॉग पोस्ट लिखते इसके पहले ही २ जुलाई हो गई)। वैसे मैनें सुना है की इस महीने से डाक्टरों का भी सीजन शुरु हो जाता है । वजह है पीने के पानी का दूषित हो जाना । ’एनोफ़िलीज’ मैडमों की
संख्या बढ जाती है |
वहीं व्यापारियों के लिए यह मंदा सीजन होता है |

लेकिन जुलाई महीने कि जो सबसे गहरी छाप हमारे मन पर होती है वह हमारे बचपन की होती है । पहली बार शिशु घर से बाहर निकलता है, घर की दुनियासे, थोडी देर के लिये । पहले जब पहली कक्षा में प्रवेशार्थी महोदय काजन्म दिन उनके पिताजी को याद नहीं रहता था तो गुरूजी लोग जन्म-तिथि 1 जुलाई लिख लेते थे | शायद यहीवजह है कि ऐसे कई छात्र बचपन में हमारे साथ थे जिनकी जन्म तिथि 1 जुलाई थी |

घुमक्कड साधुओं के लिये यह
चौमासे के माह की शुरुआत और ययावर जातियां के लिये भी यह समय अपने ठिकाने पर लौटने का होता है ।

झमाझम गिरती हुई बारिश ’रोमान्टिक’ एहसास पैदा करती है, तो दहाडते बादल और बिजली की चमक रोमांचकारी है ।


सबसे बुरा हाल होता है उनका जिनके छत या छप्पर से पानी टपकता है और उ़ससे भी ज्यादा उनका जिनके सर पर छत नहीं होती । शायद बारिश रोमान्टिक तभी लगती है जब हम आराम से अपने घर में सुरक्षित बैठे होते हैं या फ़िर बाहर भीगने के बाद घर में आकर सूखने कि सुविधा रहती है ।


हम अपनी कहें तो सबसे ज्यादा हम मिस करते हैं गीले घास के मैदान में फुटबाल के खेल को |

रिमझिम बारिश में फुटबाल खेलना, फिसलना और गिरना | बरसात में हम लोग मैराथन फुटबाल खेलते थे | उसमें कोई भी शामिल हो सकता था, बस दौड़ना आता हो | फ़िर चाहे एक हाथ से अपना पैंट पकड़कर ही क्यों न दौड़ता हो | कुछ खिलाड़ी तो सिर्फ़ दौड़ते भर थे, फुटबाल उनको तभी मिलाती थे जब वह मैदान से बाहर चली जाती थी |

आपकों भी कुछ याद आ रहा है क्या ? खैर जो भी हो ये तो मानना ही पडेगा की जुलाई का महीना हर तरह से रोमांचकारी होता है ।

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