March 23, 2015

भगत सिंह के संस्‍करण

यह सब मैं भगत सिंह और उनके साथियों के संबंध में कह रहा हूँ। उन्‍हे मारने का केवल एक ही तरीका था, उनकी मूर्तियॉं बनवा दो, उनकी पूजा करनी शुरु कर दो।  हमारे देश में  मानवतावादियों समतावादियों को खत्‍म करने का एक बहुत ही नायाब तरीका बहुत प्राचीन समय से निकाला हुआ है। जिसके विचारों से इत्‍तफाक न रखते हुए भी आप उससे लड़ न सको उसकी पूजा शुरु कर दो।  उसे महान घोषित करो। लेकिन कभी भी उसके विचारों की बात मत करो। उसने क्‍या कहा था इससे कोई मतलब ही नहीं बल्कि अपनी बात उसके मुँह से कहलवाओ। उसके श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अपना एजेंडा पेश करो। जब साध्‍वी प्राची महात्‍मा  गांधी के विरोध में और  भगत सिंह के पक्ष में बोलती हैं तब उन्‍हें पता नहीं होता कि वह क्‍या कह रही हैं। वह कभी नहीं कहतीं कि भगत सिंह ने मैं नास्तिक क्‍यों हूँ नामक लेख लिखा था। साध्‍वी प्राची जैसे लोगों को लगता है कि भगत सिंह उन्‍हीं की तरह  एक राष्‍ट्रवादी थे।

February 14, 2015

वेलेंटाइन डे - कृष्‍ण के बहाने

कृष्‍ण कन्‍हैया भारत भूमि पर प्रेम के इजहार के इस वेलेंटाइन दिन को देखकर मुस्‍कुरा रहे थे। रुक्‍मणी ने सोचा कि लगता है इन्‍हें अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं। कुहनी मारते हुए बोलीं, "क्‍या बात है जी बहुत मुस्‍कुरा रहे हो?" लगता है तुम्‍हें अपनी राधा और गोपियों के साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आ रहे हैं। ये बेचारे तो साल में एक दिन का इंतजार करते हैं। प्रेम का बाकायदा इजहार और अपनी हैसियत के अनुसार मैनेज करने के लिए। तुमने तो हद कर रखी थी रोज ही रास रचाते रहते थे और वो भी कोई एक नहीं पूरी गॉव की गोपियों के साथ। मैंने सुन रखा है राधा नाम की तुम्‍हारी कोई खास थी। 

रुक्‍मणी की बात सुनकर कृष्‍ण हँस पडे। बोले रुक्‍मे ! मैं चाहे वेलेंटाइन के रूप में आऊं या कृष्‍ण के रूप में या राधा या मीरा के रूप में मैं किसी भी रूप में आ सकता हूँ प्रेम की हवा फैलाने। आज जब साजिश करके मेरे प्रेम के संदेश को बिल्‍कुल हवाई और अलौकिक कर दिया था, इस देश में तो मैं वेलेंटाइन जी के बहाने घुस आया हूँ, अधिक सांसारिक होकर। वैसे भी इस भारत देश की आदत हो गई है सेकंड हैंड चीजें इस्‍तेमाल करने की। यहॉं लाख दहाड मारकर चिल्‍लाते रहो कोई सुनेगा नहीं एक बार विदेशी समर्थन कर दें तो समझ लो कि हो गया काम ।

December 31, 2014

वर्ष 2014

यह साल 2014 भारतवर्ष के लिए एक ऐतिहासिक महत्‍व का साल रहा है। मैं मानता हूँ कि भारत की आजादी  के बाद कुछ ऐसी घटनाऍं हुई हैं जिसने भारत को जैसा आज हम देख रहे हैं वैसा बनाने में निर्णायक भूमिका अदा की हैं। उनमें से पहली घटना नेहरु का प्रधानमंत्री बनना थी,  दूसरा अम्‍बेडकर का कानून मंत्री बनना, तीसरी  विश्‍वनाथ प्रताप सिंह का मंडल कमीशन लागू करना, चौथी बाबरी मस्जिद का गिराया जाना और पांचवी 2014 में भारतीय जनता पार्टी का पूर्ण बहुमत से आकर मोदी का प्रधानमंत्री बनना थी। इन घटनाओं के महत्‍व पर मैं यहॉं विस्‍तार में नहीं जाना चाहता। सुधीजन इनके प्रभावों का आसानी से अनुमान लगा सकते हैं। 

pk पीके

(पीके की समीक्षा से अलग)
ओह माई गॉड और पीके

उमेश शुक्‍ला निर्देशित अक्षय कुमार की फिल्‍म ओह माई गॉड की रोशनी में राजकुमार हिरानी और आमिर खान की फिल्‍म पीके प्रकरण को देखा जाए तो पता चलता है कि हिन्‍दू को मुसलमान और मुसलमान को हिन्‍दू की नसीहत पसंद नहीं आती। जैसे एक दल के नेता का दूसरे दल के नेता द्वारा आइना दिखाना पसंद नहीं आता। ओह माइ गॉड में हंगामा नहीं हुआ क्‍योंकि हीरो हिंदू था। इधर पीके बनाते ही आमिर मुसलमान हो गए हालांकि मंगल पांडे बनाकर हिंदू नहीं हुए। उनको भी फिल्‍म में काम करते समय ख्‍याल नहीं रहा होगा कि वे मुसलमान हैं और हज कर आए हैं। उन्‍हें शायद अंदाजा नहीं था कि अब हिंदू जागरुक हो गए हैं और अपनी असहिष्‍णुता को किसी भी अन्‍य से कमतर नहीं होने देना चाहते। यदि दूसरे की बुराइयों पर हमारे चोट करने से आग लग जाएगी तो हमारी बुराइयों पर दूसरे के चोट करने से आग न लगना शर्म की बात है। इसी तरह की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी तारतम्‍य में दोनों समुदायों के तथाकथि‍‍त प्रतिनिधि पीके का विरोध करने लगे हैं। 

मुझे सबसे हैरानी इस बात से है कि जागरुक लोग इतनी देर से क्‍यों जागे। फिल्‍म चल भी गई सबने देख भी ली और अच्‍छी खासी कमाई भी कर गई। इसलिए कि यह विरोध स्‍वत: स्‍फूर्त नहीं है। पहले तय नहीं कर पाए कि इससे अपमान हुआ या नहीं तय करने में थोड़ा टाइम लग गया। बात देर से समझ में आई। समझते और फिर दूसरों को समझाते इतनी देर हो गई।

(पिछले इतवार मैं भी गया था। सभी स्‍क्रीनों पर हाउस फुल चल रहा था और सब मजे ले रहे थे क्‍योंकि फिल्‍म बहुत फनी है एक भी दर्शक उठकर विरोध नहीं किया कि यह गलत दिखाया जा रहा है।)

ओह माई गॉड के संवादों से इसकी तुलना की जाए तो उस फिल्‍म का यह दूसरा संस्‍करण लगती है। क्‍योंकि उबाऊ दोहराव है। खासकर जहां उपदेशात्‍मक है। लेकिन पिक्‍चराइजेशन और हास्‍य का पुट आमिर के अभिनय के साथ इसे अत्‍यंत मनोरंजक बनाता है। यही इस फिल्‍म की जान है।

यदि राजू हिरानी ओह माई गॉड के कांसेप्‍ट का इतना स्‍थूल दोहराव न करके इसे किसी और कांसेप्‍ट पर रखते तो यह फिल्‍म एक क्‍लासिक हो सकती थी। राजू इस फिल्‍म में मनोरंजन को एक नए स्‍तर पर ले गए लेकिन इस उम्‍दा हास्‍य को ओह माइ गॉड की फिलॉसफिकल दोहराव का भार उठाना पड़ा जबकि वे इसके सारतत्‍व को ओह माई गॉड से आगे ले जा सकते थे।

February 25, 2013

बिटिया की बातों के कुछ पल

जाह्न्‍वी बिस्‍तर पर सोने के लिए जा रही है. मैंने तकिया रजाई वगैरह व्‍यवस्थित कर दी है. मैं अपने टेबल पर. लैपटॉप ऑन किया है. टेबल पर नाइट लैम्‍प का जीरो वाट का पीला प्रकाश फैला है. जेनी के बिस्‍तर पर लेटने के बाद मैं लैपटॉप पर कुछ गाना लगा देता हूँ जिसे सुनते-सुनते वह सो  जाती है. यह रोज का क्रम है. आज उसका कुछ बात करने का मूड था.

तरह तरह की बातें करने लगी. बातों का विषय कुछ इस तरह बदलती रहती है कि उन्‍हें याद करके सिलसिलेवार लिखना मुश्किल होता है. भूल जाता है कि उसने किस बात के बाद कौन सी बात कही थी.

जैसे आज कहने लगी कि पापा आप हिन्‍दी में बात क्‍यों नहीं करते हो. मैंने कहा कि मैं हिन्‍दी में ही तो बात करता हूँ. जो मैं बोलता हूँ वह हिन्‍दी ही तो है. तब उसने कहा कि तो फिर आप दादी से इस तरह क्‍यों बोलते हो (उसने गांव की बघेली बोली का एक टोन बोलकर बताया) मैंने कहा वो तो गाँव की बोली है.

उसने कि कहा कि "आप गांव के हैं?"
मैंने कहा "हां"
"और मैं?"
"तुम भी गांव की हो"
"क्‍योंकि मैं गांव में पैदा हुई थी? "
"नहीं तुम शहर की हो"
"क्‍योंकि मैं हॉस्पिटल में पैदा हुई थी?"
फिर उसने बात बदल दी,
"पापा, आपको स्‍कूल में हिन्‍दी सिखाते थे?"
"हां"
"और गुजराती?"
"नहीं"
"और मराठी?"
"नहीं"
"और कविता कौन सी सिखाते थेये वाली एक दो दस ऊपर से आई बस?"
मैं हां हूं कर रहा था.
उसने फिर बात बदली.

‘"पापा आप कॉफी क्‍यूं नहीं पीते हो"
"क्‍योंकि मैं चाय पीता हूँ"
"क्‍योंकि कॉफी मूँछों वाले लोग पीते हैं?"
"तुमसे यह किसने कहा कि कॉफी मूँछों वाले लोग पीते हैं"
"क्‍योंकि कॉफी नत्‍तू वाले बब्‍बा पीते हैं मूँछे निकालकर गॉंव में"
उसे कहना चाहिए था मूँछे डुबोकर तो कह रही थी मूँछे निकालकर. मेरे पापा बड़ी मूँछे रखते हैं और चाय नहीं कॉफी पीते हैं. इसलिए कह रही थी कि कॉफी मूँछों वाले लोग पीते हैं. 
"पापा आपके भी मूँछें निकल रही है इसलिए आपको भी कॉफी पीनी चाहिए. आपको कॉफी नहीं अच्‍छी लगती?"
मैंने यूं ही कह दिया, नहीं.
"मैं भी काफी पिऊंगी"
मैंने कहा, "बच्‍चों को कॉफी नहीं पीनी चाहिए"
"तो चाय पीनी चाहिए?"
"नहीं चाय भी नहीं पीनी चाहिए. बच्‍चों को दूध पीना चाहिए. बोर्नविटा और हार्लिक्‍स वगैरह डालकर. कॉफी बड़े लोग पीते हैं."
"बच्‍चों को कॉफी नहीं पीनी चाहिए क्‍योंकि कॉफी पीने से खांसी आ जाती है?"
मुझे हँसी आई मैंने कहा, "हॉं"
"अब सो जाओ मैं गाना लगा देता हूँ. तुम्‍हे जुकाम है और तुम्‍हारा गला पड़ रहा है बोलते-बोलते"
"पापा आपको चक धूम-धूम वाला गाना पसंद है ना. सुनाऊँ उसको?" यह कहकर वह स्‍कूल में सीखा हुआ गाना गाने को हुई. 

मैंने कहा, जब मैं सुनाने को कहूँ तब सुनाया करो. तभी मुझे पसंद आता है.
"लेकिन पहले तो ये गाना आपको पसंद था."
मैंने कहा कि इसके अलावा मुझे और भी गाने पसंद हैं. यह तो तुम दो साल से गा रही हो। मैं कहना चाहता था कि अभी जो तुमने दो-तीन दिन पहले सीखा है, 

"हाउस रे हाउस, नाइस नाइस हाउस. 
हाउस माने केटला जना रहिए छे? 
ऑफिस जाता पापा छे. रोटली बनाती मम्‍मा छे. 
नखरा नु बहन छे, झगड़ा नु भाई छे. 
पेपर पढ़ता दादा छे. पूजा करती बा छे."

वह गाना मुझे अच्‍छा लगा है. लेकिन यह सोचकर नहीं कहा कि सुनाने लगेगी. उसे नींद आ गई थी. वह चुप हो गई और धीरे-धीरे नींद के आगोश में चली गई.


February 20, 2013

अपना मोर्चा में अप्रकाशित पत्र


 (यह पत्र दि.14 दिस. 2012 को जीमेल के माध्‍यम से editorhans@gmail.com को लिखा था)

पिछले कई अंकों से हंस में डॉ भीमराव अम्‍बेडकर के बौद्ध धर्म संबंधी विचारों पर बहस देख रहा हूँ।

हंस के नवंबर अंक में डॉ धर्मवीर के लेख का समापन कबीर की कविता से हुआ देखकर लगा कि यदि आप अम्‍बेडकर को उनके बौद्ध धर्म संबंधी व्‍याख्‍याओं में अवैज्ञानिकता निकालकर उसे खारिज कर रहे हैं, तो आप कबीर को उनके रहस्‍यवादी उलटबांसियों, निर्गुण भक्ति के आध्‍यात्मिक इशारों वाली उक्तियों के होते हुए किस तरह स्‍वीकार कर सकते हैं। यदि आपके दृष्टिकोण से धार्मिक संदर्भ में अम्‍बेडकर क्रांतिकारी नहीं हैं तो आप कबीर को कम से कम अम्‍बेडकर की तुलना में किस तरह क्रांतिकारी मान सकते हैं। कबीर निर्गुण भक्ति शाखा के संत थे। ब्राह्मण रामानंद के शिष्‍य थे। कबीर ने लिखा भी है "भक्ति द्राविड ऊपजी, लाए रामानंद" कबीर के दोहे धर्म संबंधी पाखंडों और आडंबरों पर चोट करते हैं। लेकिन कबीर एक भक्‍त हैं, निर्गुण राम के ही सही लेकिन उन्‍होंने धर्म की मूलभूत सत्‍व को तो स्‍वीकार किया ही है। उनके विचारों में भी एकरुपता नहीं है। शायद समय के साथ परिपक्‍वता आयी होगी।दूसरे नारी के विषय में कबीर की सोच तुलसी के समान ही रुढि़वादी है। कबीर ने नारी को नरक की खान और विषधर नागिन की भांति खतरनाक बताया है। इस तरह अम्‍बेडकर के बौद्ध धर्म संबंधी विचारों पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगाकर कबीर के दोहे उद्धृत करना हास्‍यास्‍पद है।

अम्‍बेडकर के समक्ष मुख्‍य चुनौती या समस्‍या छुआछूत और जातीय भेदभाव था। हिन्‍दू धर्म की अवैज्ञानिकता नहीं। उनके बौद्ध धर्म स्‍वीकार करने की वजह क्‍या हो सकती है। एक विशाल समुदाय को ऐसी छत के नीचे लाना जिसमें जातीय आधार पर भेदभाव न हो। जिसके ईश्‍वर और संसार संबधी विचार वैज्ञानिक हों और सबसे बडी बात वे विचार उस विशाल समुदाय के मानसिक बुनावट को ग्राह्य हों। इसके लिए किसी ऐसे विचारधारा के साथ जाया जा सकता था जो इसी मिट्टी और अतीत काल में इन्‍हीं कुरीतियों समस्‍याओं की वजह से उपजी रही हो। जाहिर है द्वन्‍द्वात्‍मक भौतिकवाद एक तर्कपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत होते हुए भी ऐसे लोगों की समझ में आने से रहा जिनका पुस्‍तकों से कोई नाता न हो। अम्‍बेडकर को यह भी पता था कि यदि मार्कस इनके समझ में आ भी गए तो भी मार्क्सवादी सवर्ण इन्‍हें अपने बराबरी का दर्जा देने से रहे। भारत में वर्ग अभी पैदा नहीं हुआ था। यहॉं केवल जाति थी, अभी भी है, मृत्‍यु से भी बडी अकाट्य सत्‍य। अम्‍बेडकर अपने साथियों के साथ कम्‍युनिज्‍म में दीक्षा नहीं ले सकते थे। क्‍योंकि वहॉं उन्‍हीं लोगों का आधिपत्‍य था जिनसे अम्‍बेडकर ताउम्र लड़ रहे थे और इंतजार करने का उनके पास समय नहीं था। 

इन परिस्थितियों में बौद्ध धर्म ही सर्वोत्‍तम था। अब रही बौद्ध धर्म की तत्‍वमीमांसा और इहलोक परलोक संबंधी विचारों की तो इसमें शास्‍त्रों के आधार पर अनंत समय तक तर्क किए जा सकते हैं। लिखित रूप में बौद्ध धर्म बुद्ध के पांच सौ वर्ष बाद अस्तित्‍व में आया। लिपिबद्ध करने वाले भी ब्राह्मण थे। स्‍वाभाविक है उसमें उन्‍होंने अपने संस्‍कारों के हिसाब से पूर्वजन्‍म की कथाऍं वगैरह डाल दी हों। इसी आधार पर अम्‍बेडकर की सोच को अवैज्ञानिक बताना तो एक बार विचारणीय हो सकता था। लेकिन उसके साथ ही  मक्खलि गोशाल जो कि नियतिवाद को मानते थे, उनका समर्थन करना, संदेह खडा करता है और पूर्वाग्रहग्रस्‍त मानसिकता को दर्शाता है। यदि अम्‍बेडकर किन्‍हीं बिंदुओं पर अवैज्ञानिक हैं तो मक्खलि गोशाल के विचार वैज्ञानिक कैसे हो गए। आप गड्ढे से बचकर दूसरे गड्ढे में क्‍यों गिरना चाहते हैं।


बौद्ध धर्म को इसलिए अस्‍वीकार किया जा रहा है कि बुद्ध क्षत्रिय थे। इसतर्क को आगे ले जाने पर  भविष्‍य में प्रेमचंद, हंस और राजेंद्र यादव के दलितस्‍त्री विमर्श को खारिज कर दिया जाएगा क्‍योंकि वे न तो दलित हैं, न ही स्‍त्री।

February 08, 2013

दिल्‍ली यात्रा व संजय ग्रोवर से एक मुलाकात


पिछले महीने की अंतिम तारीख को एक शादी में दिल्‍ली पधारना हुआ. कुछ और भी मित्र साथ थे. बाद में वापस आकर सोचे कि अच्‍छा हुआ फरवरी की बाढ़ आने से पहले कार्यक्रम निपट गया. वरना वहॉं स्‍वच्‍छंद विचरण न कर पाते. दिल्‍ली जाने का फायदा उठाते हुए साथी पार्टी को चकमा देकर हम, तब तक एक वर्चुअल शख्सियत संजय ग्रोवर से मुलाकात करने चले गए. अब सोचते हैं कि इंटरनेट से पहले लोग बिना भौतिक रुप से मिले पत्रादि के द्वारा संपर्क में रहते थे. वह भी तो वर्चुअल ही था, कि नहीं था ?

January 30, 2013

जनवरी गमन

नए साल के पहले महीने का अंत करीब आ चुका है. बस अंतिम सांसे गिन रहा है. साल 2013 का एक महीना खर्चा हो गया. समय एक ऐसी पूँजी है जो अपने आप खर्च होती रहती है. हम उसके खर्च करने में कंजूसी नहीं कर सकते न ही ज्‍यादा खर्च कर सकते. इसे किस तरह खर्च करना है यह काफी कुछ हमारे ऊपर निर्भर करता है. लेकिन ठीक मुद्रा की तरह ही हम इसे पूरी स्‍वतंत्रता से इस्‍तेमाल नहीं कर सकते.

सर्दी भी अपना पूरा जोर दिखाकर हॉंफने सी लगी है. धीरे-धीरे थम रही है. अभी एक-दो बार अचानक ब्रेक लगाकर फिर थोड़ी दूर चलेगी फिर धम्‍म से थम जाएगी.

December 31, 2012

काला दिन 30.12.12

वह लडकी जो एक प्रतीक बन चुकी है। समाज और प्रशासन की असंवेदनशीलता का। साथी ही हमारे तंत्र की असफलता का जिसकी वजह से उसकी मृत्‍यु हुई। 

कल न्‍यूज चैनल दिल्‍ली की चलती बस में हुए बलात्‍कार पीडित की मृत्‍यु पर शोक और आक्रोश व्‍यक्‍त करने गए प्रदर्शनकारियों को कम ही दिखा पाई। वह लडकी जिसे दामिनी अमानत और भी कई छद्म नाम दिए गए, देश भर में महिलाओं के खिलाफ हो रहे यौन अत्‍याचार पीडितों की एक प्रतीक बन गई है।  

December 18, 2012

रेप कैपिटल

दिल्‍ली क्राइम कैपिटल से और विशेषीकृत होकर रेप कैपिटल बन गई है। इस शहर में महिलाओं से होने वाले दुर्व्‍यवहार के ऑंकडे देश के अन्‍य शहरों से बहुत ऊपर हैं।

रेप एक घिनौना शब्‍द है। यह शब्‍द हमें शर्मसार करता है। एक सभ्‍य समाज में इस शब्‍द के प्रयोग करने की आवश्‍यकता नहीं पडनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्‍यवश इस घटना से संबंधित छोभ और आक्रोश व्‍यक्‍त करने के लिए भी शब्‍द का प्रयोग करना पडता है। हर घटना के बाद टीवी चैनलों पर वही-वही बातें, तर्क, दलींलें देखकर घिन होने लगती है। 

December 14, 2012

फूट डालो जमे रहो

कई दिनों से कॉलोनी में ऑटोरिक्‍शा में कांग्रेस-भाजपा के प्रचार वाले भोंपू बजाते आते रहते हैं। उनमें कभी रिकार्डेड गाने लगे होतें हैं, कभी कोई माइक थामे बैठा रहता है। कभी-कभी तो मिडिल क्‍लास वाले स्‍कूली लडके भोंपू पर चिल्‍लाते बैठे रहते हैं।  लेकिन इन भोंपुओं की आवाज इतनी भोंडी होती है कि कुछ समझ में नहीं आता कि चिल्‍ला क्‍या रहे हैं।

June 30, 2012

आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड दिया


इस मानसून में सुदर्शन फाकिर   की  यह लाइन बहुत मौजूं हैं। बरसात में शराब तो बरसने से रही पानी भी नहीं बरस रहा। सुदर्शन फाकिर के जीवन के बारे में मुझे रवीन्‍द्र कालिया के उपन्‍यास गालिब छूटी शराब से पहली बार जानकारी मिली। उन्‍होंने एक से एक बढिया गजल लिखी हैं। उनमें से कुछ गजलों को आपने सुना जरुर होगा क्‍योंकि बहुप्रसिद्ध गजलें हैं। लेकिन कम लोग जानते होंगे कि उन्‍हें सुदर्शन फाकिर ने लिखा है। जैसे कि वो कागज की कश्‍ती वो बारिश का पानी, आदमी आदमी को क्‍या देगा, शेख जी थोडा पीकर आइए, ढल गया आफताब ऐ साकी ..... हर गजल बेमिसाल है।  सारी गजलें कविता कोश में पढी जा सकती हैं। उनकी लिखी हुई और बेगम अख्‍तर की गाई ठुमरी हमरी अटरिया पे आओ संवरिया,  देखा देखी बलम होइ जाए आओ सजन हमरे द्वारे, सारा झगड़ा खतम होइ जाए भी बहुत प्रसिद्ध है। 

May 28, 2012

सडक-रेल छाप नोट्स

सडक किनारे पंजाबी, चाइनीज, दक्षिण भारतीय खाने की दुकानों, आइसक्रीम, सोडा के ठेलों के ठीक बगल में, पडे रहते हैं तम्‍बू ताने लोग, अपनी रोटी खाते भात पकाते, इतने करीब की हमारी कुर्सी और उनकी टूटी खटिया में दो-चार हाथ की ही दूरी रहती है। जमीन में उनके बच्‍चे, महिलाऍं सोते रहते हैं। कभी-कभी हाथ में रोटी लेकर खाते बच्‍चे। पता नहीं किस चीज से खाते रहते हैं रोटी। गंदे-गंदे से दीखते उनके बूढे-बूढियां बाल उलझाए। अपनी हड्डियां दिखाते, बीडी फूंकते बैठे रहते हैं। गर्मी से बेहाल। रात बढने, रात के साथ मौसम ठंडा होने के इंतजार में।


ऐसे दृश्‍य हमेशा ध्‍यान खींचते हैं। गरीबी और बीमारी निराश करती हैं। इसलिए हम इनसे बचकर निकलना चाहते हैं। नोटिस सब करते हैं। निराश इसलिए करती हैं कि मन में कहीं न कहीं यह बात होती है कि किसी भी इंसान की स्थिति वैसी हो सकती है। किसी भी इंसान में हम खुद भी शामिल हैं।

April 30, 2012

नया खिलौना

नया खिलौना मैंने पाया
मेरे मन को है यह भाया

खेलूं मैं इससे सारा दिन
रहूं नहीं पल भर इसके बिन

बच्‍चों को जब इसे दिखाया
सबके मन में लालच आया 

April 16, 2012

अवांछित पंक्तियां

प्रेम में प्रेम भी है
कविता में अब भी कुछ कविता बची हुई है
ऐसा लगता है
शब्‍दों का सम्‍मान हमारी दगाबाजी का
निहायत जरुरी हिस्‍सा है 
^^^^

निराशावादी होना मुझे पसंद नहीं है 
दिखना और भी ज्‍यादा नापसंद
इसलिए मस्‍कुरा देता हूँ, परिचित को देखकर
मुस्‍कुराहट में खुशी भी है या नहीं
इसकी परवाह न मुझे है न उन्‍हें
^^^

लाइनों को तोड देता हूँ
बीच से
ताकि पढने में हो आसानी और
समझने में मुश्किल
पर शब्‍द खुद घुस जाते हैं
अपने-अपने हिस्‍से तक
अर्थ की परवाह किए बिना
शायद वे समझ गए हैं कि
हमारा अर्थ हमारे होने में ही है
किसी और के सलीके में नहीं
^^^^^

मैं वह सब नहीं कहूँगा
जो देखता हूँ रोज रोज
और सवाल ही नहीं उठता
वह सब देखने का जिसे
मैं रोज करता हूँ
मनोरंजन ही है वह चीज जिसे
मैं पसंद करता हूँ
क्‍योंकि यही सबसे सुरक्षित काम है
जिसे रोजी रोटी के बाद मैं करना चाहता हूँ