शिव और पार्वती : कुछ तो लोग कहेंगे

July 03, 2009


पूर्णिमा की रात थी । शुभ्र ज्योत्सना में सारी पॄथ्वी डूबी हुई थी । शंकर और पार्वती अपने प्यारे नन्दी पर सवार होकर भ्रमण को निकले थे । किन्तु वे जैसे ही थोडा आगे गये थे कि कुछ लोग उन्हें मार्ग में मिले ।

उन्हें नन्दी पर बैठे देखकर उन लोगों ने कहा :
"देखो बेशर्मों को । बैल की जान में जान नहीं है और दो-दो उस पर चढकर बैठे हैं ।"
उनकी यह बात सुनी तो पार्वती नीचे उतर गईं और पैदल चलने लगीं । किन्तु थोडे ही दूर जाने पर फ़िर कुछ लोग मिले ।

वे बोले : "अरे मजा तो देखो, सुकुमार अबला को पैदल चलाकर यह कौन बैल पर बैठा चला जा रहा है भाई! बेशर्मी की भी हद है!" यह सुनकर शंकर नीचे उतर आये और पार्वती को नन्दी पर बैठा दिया । लेकिन कुछ ही कदम गये होंगे कि फ़िर कुछ लोगों ने कहा :
"कैसी
बेहया औरत है, पति को पैदल चलाकर खुद बैल पर बैठी है । मित्रों, कलियुग आ गया है।"
ऐसी
स्थिति देख आखिर दोनों ही नन्दी के साथ चलने लगे।
किन्तु थोडी ही दूर न जा पाए होंगे कि कुछ लोगों ने कहा: "देखो, मूर्खो को । इतना तगडा बैल साथ में है और ये पैदल चल रहे है।" अब तो बडी कठिनाई हो गई ।


शंकर
और पार्वती को कुछ भी करने को शेष रहा नन्दी को एक वॄक्ष के नीचे रोक वे विचार करने लगे अब तक नन्दी चुप था अब वह हंसा और बोला :"एक रास्त मैं बताऊं ? अब आप दोनों मुझे सिर पर उठा लीजिये।" यह सुनते ही शंकर और पार्वती को होश आया और दोनों फ़िर से नन्दी पर सवार हो गए लोग फ़िर भी कुछ कुछ कहते निकलते रहे ।असल में लोग बिना कुछ कहे निकल भी कैसे सकते हैं ? अब शंकर और पार्वती चांदनी की सैर का आनन्द लूट रहे थे और भूल गये थे कि मार्ग पर कोई भी निकल रहा है

जीवन में यदि कहीं पहुंचना हो तो राह में मिलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति की बात पर ध्यान देना आत्मघातक है |
ओशो द्वारा कही गई बोध कथाओं का संकलन 'मिट्टी के दिए' से

7 comments:

महेन्द्र मिश्र July 3, 2009 7:19 PM  

बहुत ही बढ़िया कथा है . आभार.

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa July 3, 2009 7:59 PM  

बचपन में पढी कहानी में गधा या घोड़े का जिक्र था। जिस पर बाप-बेटा बैठते उतरते रहते हैं। देवी- देवता होते हैं कि नहीं पता नहीं पर यदि ऐसी शक्ति है तो वह इतनी बेवकूफ तो नहीं ही हो सकती। इस तरह उनको घसीटने से शायद कुछ देर के लिये लोग मुस्कुरायें या वह-वाही मिल जाय पर यह किसी भी हाल में लेखनी को शोभा नहीं देता।

वन्दना अवस्थी दुबे July 3, 2009 10:57 PM  

अच्छी प्रेरक कथा.बधाई
मैं शर्मा जी से सहमत नहीं हूं.एक तो यह लेखक द्वारा किया गया अशोभनीय प्रयास नहीं है, बल्कि ओशो की बोध कथाओं के संकलन से ली गई है. दूसरे, हमारी तमाम लोक कथाएं ईश्वर पर आधारित हैं, जिनमें ईश्वर का मानवीकरण किया गया है.इस कथा में भी ईश्वर के मानवी रूप का ही ज़िक्र है.और संदेश ये भी है, कि जब बातें बनाने वालों ने भगवान को नहीं छोडा तो इन्सान क्या चीज़ है?

Udan Tashtari July 3, 2009 11:31 PM  

आनन्द आ गया. यही जीवन का फलसफा होना चाहिये.

अर्कजेश *Arkjesh* July 6, 2009 1:37 PM  

@गगन शर्मा जी, बोध कथायें प्रतीकों के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं से हमें परिचित कराती हैं । और इस कहानी में न तो कोई अशोभनीय बात कही गई है और ना ही किसी का अपमान करने की कोशिश । केवल समझ समझ की बात है ।

anil July 6, 2009 4:21 PM  

बहुत बढ़िया कथा धन्यवाद .

Teja July 7, 2009 2:09 PM  

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