November 09, 2009

चीथडों के गठ्ठर फ़ेंको

पता नहीं
कैसे रहते हैं लोग

आज भी

लादे हुए
सतत

चीथडों का गठ्ठर

जिसे कभी खोल कर
नहीं देखा गया

कि क्या है उसके अन्दर
पता नहीं कितनी
सडी हुई चीजें हैं
उनमें जो
मारती रहती हैं
सडांध वक्त-बेवक्त
तब छिडक देते हैं
उनके ऊपर गुलाब जल
और इत्र
सुंदर शब्दों और
व्याख्याओं के द्वारा

फ़िर सडांध को
थोपा जाता है
दूसरों के गठ्ठरों पर
और चलता रहता है
यही क्रम
बिना सफ़ाई किए हुए
अपने-अपने गठ्ठरों की
बह जाता है खून,
पानी सा
एक-एक चीथडों
के लिए
वो भी
दूसरों के उतारन
सदियों के फ़ेंके हुए

कैसे रहते हैं
ऐसे घरों में लोग
चीथडों को
मनमर्जी से
लादे हुए
जिनसे बाहर जाने की
झांकने की
तो बात ही क्या
ऐसा सोचने की भी
इजाजत नहीं है

जहां संदेह
एक अपराधबोध है
अपने होने की घोषणा
महापातक

संदेह
जो वजह है
सृजन का
सारे ज्ञान-विज्ञान का
आदमियत का
डिसेबल कर दिया
जाता है
स्थाई रूप से
लाद दिया जाता है
ऊपर से
एक खोखला विश्वास
जिसे बचाने के लिए
तैनात होती हैं
बडी-बडी कंटीली बागुडें
भय और प्रलोभनों की

रहने वाले कह सकते हैं
इसे मर्जी से रहना
जैसे पैदाइश से ही
पिंजडे में रहने वाला पक्षी
रहता है
अपनी मर्जी से

पर फ़िर भी,
कैसे रहते हैं
लोग ऐसे घरों में
अब भी
जहां रहने का
मूल्य होता है
रहने वाला
वह खुद
और
ढोते हुए चलना
होता है सिर पर
एक भारी गठ्ठर
पूरे अतीत का
गर्व से
कहना होता है उसे अपना
बिना चुनाव की आजादी के
लडना पडता है
दूसरों के
उतारन चीथडों के
सम्मान के लिए

यह एक अपमानजनक
मूर्खता हो जाती है
जब एक आम
आदमी
लड जाता है
उन चीथडों के लिए
जो उसके हैं
ही उसके किसी काम के हैं
जो उसे रोटी दे सकते
ही प्रेम और खुशी
सिवाय बोझ और घुटन के
बेगारी मजदूरी की तरह
जबकि कुछ होशियार
लोग उतारने नहीं देते
गठ्ठर
आदमी के सिर से
अपनी मालकियत
कायम रखने के लिए
और करते रहते हैं
चीथडों का व्यापार

मित्रों !
तनिक रुको और सोचो
क्या वह सब तुम्हारे हैं
जिन्हें स्थापित करने के लिए
तुम अपनी सबसे ज्यादा
ऊर्जा नष्ट कर रहे हो
कब तक अतीत के
लाउड स्पीकर बने रहोगे
कब तक ?
कब तक दूसरे के चीथडों की
मार्केटिंग करते रहोगे
अपने गीत कब गाओगे ?
कब तुम अपनी पहचान
अपनी निजता से दोगे
अपने सिर और कान में
खोंसे हुए चीथडों से नहीं

पता नहीं कब ?

सोचोगे तो अवश्य ही
पाओगे की ये चीथडों
के गठ्ठर
इतने कीमती नहीं है कि
इनके लिए लडा जा सके
इनका उपयोग हो सके तो कर लो
पर खोपडी में
लादकर
इनके रक्षार्थ तलवार लेकर
मत घूमो
अतीत के चीथडों के लिए
वर्तमान को तार-तार मत करो !

कब चीथडों को तुम
इंसानियत से कम
तवज्जो देना शुरू करोगे
ताकि बचाया जा सके
इंसानियत को
चीथडे-चीथडे होने से !

और भी बातें हैं
ज्यादा जरूरी जो
की जा सकती हैं
बेहतरी के लिए
इंसान की ,
चीथडों के लिए
जांबाजी दिखाने के सिवा !

7 comments:

  1. अर्जकेशजी,
    बड़ी दूरी से, बड़ी दूर तक ले गए हैं आप हमें विचारों के एक समंदर में --अधुनातन और पुरातन का विवाद पुराना है; लेकिन यह कविता इस झमेले से हटकर खड़ी है, यह सडे-गले पर प्रहार करती हैं, उसे त्याज्य बताती है, मनुष्य को अपनी अस्मिता से चमकने को कहती है; इससे भी आगे बढ़कर वह इंसानियत को अपनी अंजुरी में रक्षित करने को प्रेरित करती है :
    'कब चीथडों को तुम
    इंसानियत से कम
    तवज्जो देना शुरू करोगे
    ताकि बचाया जा सके
    इंसानियत को
    चीथडे-चीथडे होने से !'
    एक विचारपूर्ण प्रेरक कविता ! बधाई !!
    सप्रीत--आ.

    ReplyDelete
  2. विचारोत्तेजक रचना. बहुत कुछ कहती, समझाती सी.कविता में कुछ पंक्तियों में भावों का दोहराव हुआ है, जिसके चलते इसकी लम्बाई अधिक हो गई. इतनी लम्बी कविता में कसाब रह पाना मुश्किल सा होता है, लेकिन आपकी रचना कसी हुई है. भावों का सम्प्रेषण भी भली प्रकार करती है. उम्मीद है, मेरी बात को अन्यथा न लेंगे. सुन्दर रचना के लिये बधाई.

    ReplyDelete
  3. अतीत के चीथड़ों के लिए
    वर्तमान को तार तार मत करो ...
    बहुत लम्बी उडान है आपकेर विचारों की ......... बंधी हुयी मान्यताओं को ढोते हुए लोगों को बाहर आने का आव्हान करती .... वर्मान में रह कर अपना गौरव खुद तलाश करने की लाजवाब सोच को उजागर करती ........... लाजवाब रचना है ...

    ReplyDelete
  4. चीथड़ों के बहाने जिंदगी के मर्म को बखूबी बयां किया है आपने।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    ReplyDelete
  5. bahut hi gahre bhaav ke saath ek bahut hi behtareen abhivyakti....

    ReplyDelete
  6. Deri se aane ke liye maafi chahta hoon..... tabiyat thodi kharaab chal rahi thi...

    ReplyDelete

नेकी कर दरिया में डाल