August 24, 2009

तुम मेरी कविता में हो !

तुम मेरी कविता में हो !
जैसे चाय में शक्कर,
आटे में नमक,
कंप्यूटर में इन्टरनेट,
इश्तिहारी पम्पलेट |

तुम मेरे जीवन में हो !
जैसे टायर में हवा,
कैप्सूल में दवा,
शेर एक सवा,
लफडा नित नवा,
इंजन में तेल
बातें बेमेल |

तुम मेरे एकांत में हो !
जैसे सीरिअल में विज्ञापन,
तूफ़ान का ज्ञापन,
सत्र का समापन |

तुम मेरे पर्स में हो !
जैसे गेहूं में घुन,
ख़राब सगुन,
खेत में इल्ली,
दूध में बिल्ली |

तुम मेरे विचारों में हो !
जैसे कमरे में महक,
अंगारे में दहक,
उगती हुई पत्ती,
सस्ती अगरबत्ती |

तुम मेरे लेखन में हो !
जैसे साहित्य में आलोचक,
पुस्तक का विमोचक,
परीक्षा में नक़ल,
पोती हुई शकल |

तुम मेरे जोश में हो !
जैसे खीसे में रूपया,
भाड़े का जपिया,
गाडी लकटकिया |
ब्लोगर नौसिखिया,

कहाँ-कहाँ बताएं !
तुम सब में हो,
जैसे कंप्युटर में वाइरस,
हवा में मच्छर,
बीमारी में डाक्टर,
विद्यालय में मास्टर
पानी में आक्सीजन,
परीक्षा में रिवीजन |

लेकिन तुम हो कौन ?
यह पता नहीं |आदि आदि इत्यादि | "और" बाद में जोड़ देंगे |

ब्लोगर साथियों का योगदान :
"समीर जी" :
तुम मेरे रोष में हो,
जैसे ईमेल में स्पैम
बाथरुम में स्पाई-कैम
टिप्पणी में अनाम
ब्लॉगर हो बदनाम..

तुम मेरी गज़ल में हो
जैसे शेर बे-बहर
श्रोताओं पर कहर
काफ़िया ने किया किनारा
जनता ने अंडा दे मारा..

कहाँ कहाँ हम तुम्हें बतायें
बेहतर हो,
आप खुद ही जान जायें.
____________________
वंदना जी :
तुम मेरी बात में हो,
तुम मेरी रात में हो,
तुम मेरे साथ में हो,
और मेरी औकात में हो.

तुम मेरे हालात में हो,
तुम मेरे दिन-रात में हो,
लगता है ऐसा जैसे-
तुम पूरी कायनात में हो.

तुम मेरी छांव में हो,
तुम चमकती धूप में हो,
बरस रहा हो पानी जब-
तो तुम मेरी बरसात में हो.

तुम्ही हो माता,
पिता तुम्हीं हो,
तुम्ही हो बन्धु......पता नहीं है!!

तुम मेरी अकल में हो,
तुम मेरी शकल में हो ,
आ रही दुर्गन्ध सी कुछ,
क्या तुम मेरी बगल में हो?
__________________

फौजिया रियाज़ जी:
तुम मेरी साँसों में हो ,
जैसे सड़कों पर गड्ढे
नित नए फंदे...

तुम मेरी आंखों में हो ,
जैसे चश्मे का पॉवर
अमिताभ के हाथ में डाबर
_________________
सूचना :
जो भी मित्र इसमें कुछ जोड़ना चाहें जोड़ सकते हैं, कमेंट के माध्यम से | उनके नाम और लिंक के साथ उनकी पंक्तियाँ दी जायेंगी |
सूचना समाप्त हुई |
धन्यवाद !

August 22, 2009

खासियत

मैं वह नहीं हो सकता
जो आप हैं, और आप
वह नहीं जो मैं हूँ |

आप चाहें जितना बखानें,
पर यही है, खासियत,
मेरी और आपकी |

इसे जानते हैं, तो
मानना भी चाहिए
सत्य को
पहचानना भी चाहिए |

यह खासियत है,
बड़ी से बड़ी खासियतों की
कि हम सब भिन्न हैं |
खूबियों और खामियों के साथ,
महानता और बीमारियों के साथ |

भिन्नता ही एकमात्र खासियत है,
अभिन्न अस्तित्व की |
इसका स्वीकार ही है
शान्ति का रहस्य !

August 20, 2009

जिन्ना को जाने दो !

बचपन से ही जिन्न जी के बारे में हम काफी कुछ जानते हैं, क्योंकि की हमने अलादीन की कहानी सुनी, पढी और देखी है | हम जिन्न का पूरा हुलिया और हुनर आपको समझा सकते हैं | इसकी अपेक्षा जिन्ना जी के बारे में हमें बहुत बाद में पता चला | और उनकी ताकत का असली अंदाजा तो हमें अब जाकर चला है | "जिन्ना" के अलावा उनके समकालीन कौन सा ऐसा नेता है जो मृत्यु के साठ साल बाद भी इतना संवेदनशील-दमदार हो की किसी व्यक्ति और पार्टी के अस्तित्व के लिए ही आफत बन जाए | अडवानी जी तो किसी तरह बच निकले थे, जिन्ना जी के "धर्मनिरपेक्ष" स्वरुप का उदघाटन करके | उन्होंने महज बयानबाजी की थी | इसलिए "ये मतलब" "वो मतलब" करके सिर्फ़ पार्टी प्रमुख पद का चढावा देकर लीपपोत दिए| लेकिन जसवंत जी ने तो पोथी ही छपवा दी | इतने वरिष्ठ नेता | कम से कम अडवाणी जी को एक बार दिखा देते को क्या घट जाता | लेकिन होनी को कौन टाल सकता है |

अब जिन्ना जी के बारे में आप लोग ग़लत-सलत लिखेंगे, बयान देंगे तो उनका जिन्न तो आपको सताएगा ही | इस भूल में मत रहिये की जिन्ना जीवित नहीं हैं तो मनमानी फेंके जाओ | अब सोचिये भला जिन्ना जी ने कितने तिकड़म-इकडं भिडाकर पाकिस्तान बनवाया | प्रत्यक्ष कार्रवाई में यकीन करने वाले नेता | अरे खून-खराबा तो बहादुरों का शगल है | अब आप किसी की बनी बनाई छवि को पूरा मिट्टी में मिलाने की कोशिश करेंगे तो कोई सहेगा जी |

कह दिए कि "जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे" | "देश को नेहरू और पटेल ने मिलकर बांटा"| हद्द हो गई नाइंसाफी की | मेहनत जिन्ना साहब ने की और आप मिठाई नेहरू-पटेल के नाम की बाँट रहे हैं | इतना स्वार्थी नहीं होना चाहिए कि अपने हित में मरहूमों को उनके हक़ से महरूम कर दिया जाए |

जिन्ना साहब अंग्रेजों के परम मित्र थे और आप कहते हैं हुकूमत ने उन्हें उपेक्षित किया | लेकिन अपना मकसद पूरा कराने के बाद | यह तो अंग्रेजों की आदि नीति थी |

जिन्ना नहीं तो क्या हुआ । जिन्ना को समझने वाले आपसे ज्यादा वरिष्ठबुद्धिमान लोग पार्टी और उसके बाहर बैठे हैं । जिन्ना को आप हीरो बना देंगे तो फ़िर आपकी जरूरत क्या रह जाएगी । आप कांटे से कांटा निकाल रहे थे । जिन्ना के कांटे से नेहरु-पटेल और कांग्रेस के कांटे को निकाल रहे थे । लेकिन एक तो निकला नहीं, दूसरा और धंस गया ।

लेकिन गौरतलब है कि मोहब्बत-ए-जिन्ना का दौरा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं पर ही वक्त बेवक्त क्यों पडता रहता है । क्योंकि इनका अस्तित्व निषेध पर टिका हुआ है । दोनों एक-दूसरे को परिभाषित करते हैं । एक की मृत्यु दूसरे की भी मृत्यु है । दोनों नफ़रत की बुनियाद पर खडे हुए अतीतजीवी हैं ।

स्पष्ट है कि इनकी मन्शा जिन्ना की महानता उजागर करना कम और नेहरु-पटेल-कांग्रेस को विभाजन का गुनाहगार साबित करना ज्यादा है । इस तरह स्थापना करके मुस्लिम समुदाय की सहानुभूति हासिल करना चाहते हैं । यह बात दीगर है की पांसा उलट पड़ गया |

अपनी किताब में जसवन्त सिंह ने यह भी कहा है "कि मुस्लिम समुदाय के प्रति विदेशियों जैसा व्यवहार किया गया ।"
अपनी किताब में जसवंत जी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी याद कर लेनी चाहिए थी जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम आधार पर पंजाब और बंगाल के विभाजन की मांग की थी | बांग्लादेश ने धर्म के आधार पर द्वि राष्ट्र सिद्धांत की हवा निकल दी है | सिंध और बलूचिस्तान भी उसी राह पर हैं | दो राष्ट्रों का सिद्धांत भी जिन्ना जी के पहले हिंदू राष्ट्रवादी सावरकर जी का दिया हुआ था |

अतीत को उखाकडकर उसका पोस्टमार्टम करना काफ़ी जोखिम भरा काम है, खास तौर पर एक राजनीतिज्ञ के लिये । इससे जनता का मनोरंजन हो यहां तक तो ठीक है । लेकिन यदि यही काम वर्तमान की चुनौतियों से जनता का ध्यान हटाकर एक और विनाशकारी विचार देने का है तो यह टुच्ची राजनीति है । वर्तमान की, रोजमर्रा की चुनौतियों को लेकर, विकास को लेकर किताब लिखिये । लेकिन उसके लिये तो एक पूरे विजन की जरूरत पडेगी । उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगायेगा, उसकी वजह से कोई हंगामा भी नहीं खडा होगा । इसलिए लिखने का मजा नहीं आएगा |

यह सही है कि देश का विभाजन शीर्ष नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भी जुडा हुआ है | गाँधी द्वारा अंत में जिन्ना को प्रधानमत्री बनाने के प्रस्ताव को नेहरू-पटेल कभी स्वीकार नहीं कर सकते थे | बहुमत भी उनके पक्ष में होता | गाँधी जी जैसे लोकप्रिय नेता की धर्म भीरुता और तुष्टीकरण भी इसकी एक बड़ी वजह थी | जब गाँधी को हिंदू होने पर गर्व था तो स्वाभाविक है कि जिन्ना असुरक्षित महसूस करेंगे ही |

मैं कहना यह चाहता हूँ कि विभाजन कि लिए किसी एक नेता को बढाचढाकर पेश करके अन्य नेताओं के साथ नाइंसाफी नहीं करनी चाहिए | इसमें सबका कम-ज्यादा हिस्सा है | वजह चाहे राजनैतिक हो या धार्मिक | इसलिए किसी एक को पकड़कर सर फोड़ने की जरूरत नहीं है |

जिन्ना को परेशान मत करिये । उन्हें पाकिस्तान बनाकर उसका शासक बनना था | वो सब उन्होने कर लिया । अब जिन्ना जी को आराम फ़रमाने दीजिये वरना वे आपके चैन की बन्शी छीन लेंगे ।

August 17, 2009

शाहरुख बनाम सुरक्षा

बालीवुड के प्यारे बड़बोले अभिनेता शाहरुख खान की अमेरिकी हवाई अड्डे पर जांच हो ली| वो भी पूरे 66 मिनट तक | भाई जान बुरा मान गए | छनछनाने लगे | अब सोचिये इतने बड़े अभिनेता का समय कितना कीमती होता है | 66 मिनट में लाखों का नुकसान हो गया, उसकी भरपाई कौन करेगा | पहले तो हमने दो घंटे सुना था, पर यह आंकडा हम बीबीसी के हवाले से दे रहे हैं | जब 'बादशाह' की ऐसी बेज्जती हुई तो अपने यहाँ की मीडिया यहाँ तक कि कुछ नेतागण भी गुस्से में भावुक हो गए |

क्रिकेट
खिलाड़ी और बोलीवुड खिलाड़ी हिन्दुस्तानी मीडिया के लिए विशेष 'ख़बर तत्व' हैं क्योंकि ये दोनों तत्व भारतीयों के लिए विशेष 'भावुकता तत्व' हैं | इन्हें जनता भगवान की तरह पूजने लगती है | चने के झाड़ की एकदम लास्ट वाली फुन्नी में चढाकर बैठाती है | जिससे झाड़ थोड़ा भी इधर-उधर हिले-डुले तो इनकी हरकतें नजर आयें | किंग खान को गुस्से में ध्यान नहीं रह गया होगा की वे अमेरिका में हैं | बहुत जल्दी में थे | कार्यक्रम के लिए देर हो रही थी | ऐसे में देश प्रेम की भावना तुंरत जागृत हो जाती है | जनता की भी और जनार्दन की भी | फलतः दोनों ही अपमान मोड में चले जाते हैं |

"ऐसा मेरे साथ भी हुआ है। अब तो जिस तरह वे हमारी जाँच करते हैं उसी तरह हमें भी अमरीकियों की जाँच करनी चाहिए."
- अम्बिका सोनी | (मतलब कई अभी तक इज्जत मर्यादा लिए चुप बैठे हैं )

तो आप जांच करवाइए , किसी भारतीय को कोई आपत्ति नहीं है | यही तो आपकी मजबूरी है कि आप इतनी कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकते | आप अक्षरधाम और संसद पर हमलों के बाद भी 26/11 झेलने के लिए तैयार रहते हैं | लेकिन धृष्ट अमेरिका दूध के जले की तरह छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है | क्योंकि उसके सामने दो ही विकल्प हैं या तो आतंकी हमले का खतरा ले या कड़ी जांच करे | वह भारत देश से कोई सबक नहीं लेना चाहता | वो कहता है कि हम 19/11 को दुहराना नहीं चाहते | कौन समझाए, समझता ही नहीं |

शाहरुख़ के बोलीवुड दोस्त (?) सल्लू मियां इसकी पुष्टि करते हैं |

"अमरीका में जाँच के कड़े प्रावधान हैं. तभी तो 9/11 के बाद कोई चरमपंथी घटना नहीं हुई. ये तो सबके साथ होता है. इसे तूल नहीं देना चाहिए|"
- सलमान ख़ान

भारत देश वर्तमान में वीआइपी संस्कृति का देश है | हम वीआईपी को जांच से मुक्त रखते हैं | वे (बड़े बड़े नौकरशाह , नेता तथा उनके साथ चलने वाले सेवक) विशेष हैं और प्रजा के लिए बनाये गए कानून से मजबूर नहीं हैं | वह नियम और कानून से ऊपर हैं | क़ानून तो बिना पहुँच वालों के लिए है | कोई सिक्योरिटी वाला उनके और उनके साथ चल रहे कुनबे को जांच की दृष्टि नहीं देख सकता, बस एक बार बताने की जरूरत है की हम 'फलां जी के ढिका' हैं | फ़िर किसकी हिम्मत है, की कोई कर्मचारी उन्हें नियम के दायरे में ला सके या लाइन में खड़ा कर सके | चाहे अस्पताल हो या स्कूल, ट्रेन हो या सड़क ट्रैफिक या हवाई अड्डा हर जगह उनके लिए कानून अप्रदत्त अलिखित सुविधाएं हैं | यदि किसी साहसी कर्मचारी ने उन्हें इस तरह के दुरुपयोग से वंचित करने की कोशिश की तो वह ख़ास ख़बर बनती है | जैसे कोई अजूबा हो गया हो | इस बात का सबसे ज्यादा फायदा अपराधी तत्व और आतंकवादी उठाते हैं |

यहाँ किरण बेदी को वरिष्ठता के बावजूद वह पद नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है, क्योंकि वह किसी को क़ानून
अप्रदत्त सुविधाएं देने के लिए बदनाम हैं | यह एक अव्यवहारिक आचरण है | सबको अपनी नौकरी और बाल-बच्चों से प्यार है | वे नियम और क़ानून से ऊपर हैं, इससे हमारे देश की जी हुजूरी संस्कृति का अपमान होता है | वीआईपी मतलब जांच प्रूफ़ | यदि जांच होती भी है तो घोटाले के बाद और घोटाला की जांच 'परिणाम प्रूफ़' होती है | सांसद लोग विदेश भ्रमण के बहने कबूतरबाजी ही कर डालें | यहाँ सब चलता है |

इन सब तुच्छ बातों पर महान देश के महान नागरिक ध्यान नहीं देते | इन मुद्दों की बात करना तक देशप्रेम में कमी के लक्षण हैं | हम अमेरिका और यूरोप से उनकी क़ानून के प्रति प्रतिबद्धता और सम्मान नहीं सीखते | केवल उन्हें गरियाकर खुश होते रहते हैं |

इसके पहले अमेरिका में पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा और अभी हाल ही में 'मिसाइल मैन' और पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम की (प्रोटोकाल का उल्लंघन करते हुए) भारत में ही जाँच हो गई, तो सिर्फ़ ख़बर बनी | कलाम साहब सीधे-सादे वैज्ञानिक तबियत के आदमी | इसे सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा मानकर नजरंदाज कर दिया |

शाहरूख जी ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कहा कि "खान" लगा होने की वजह से उन्हें परेशान किया गया | शिकागो जाते समय उन्हें नेवार्क हवाई अड्डे पर रोका गया और पूछताछ की गई। यह एक गैरजिम्मेदाराना बयान है | घटना को एक विशेष समुदाय से जोड़ने की कोशिश | सहानुभूति हासिल करने के लिए |


"स्टार क्रिकेटर रभजनसिंह का इस मामले में कुछ और ही मानना है। भज्जी ने कहा कि शाहरुख के साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ है। इस मामले को उन्होंने नियमित प्रक्रिया करार दिया। हरभजन ने कहा कि वे कई बार इन जांच प्रक्रिया से गुजरे हैं, इसमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता।"

"उन्होंने कहा कि वे प्रत्येक की जाँच करते हैं। यहाँ तक कई बार मुझे भी गहन जाँच प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह नियमित प्रक्रिया है। हालाँकि एसआरके नामी हस्ती हैं और उनका सम्मान होना चाहिए |"

"किंग खान ने कहा कि इस समय मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं कभी अमेरिकी धरती पर कदम नहीं रखूँ, लेकिन यहाँ मौजूद मेरे लाखों प्रशंसक मुझे यहाँ देखना चाहेंगे, इसलिए मैं यहाँ आता रहूँगा।"

बहुत बढ़िया ! बोलते रहिये |

कुछ नादान लोग कहते हैं कि शाहरुख़ एक फ़िल्म अभिनेता ही हैं | जांच हो भी गई तो इतनी हाय-हाय क्यों | वहां के अधिकारी तो केवल नियमित जांच ही कर रहे थे | दुःख की बात है कि ज्यादातर ब्लोगर भी शाहरुख़ और सरकार की भावना को नहीं समझ रहे हैं |

मेरे ऑनलाइन मित्र 'सुदाम पाणिग्राही' जो gramaar पर लिखते हैं, को यह समाचार याद दिलाने के लिए धन्यवाद् !

August 13, 2009

कृष्ण : जीवन की समग्रता के प्रतीक

"कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है, अनूठेपन की पहली बात तो यह है, की कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के | मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया की कृष्ण का समसामयिक बन सके | अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं | भविष्य में ही यह सम्भव हो पायेगा की कृष्ण को हम समझ पायें |

इसके कुछ कारण हैं |

सबसे बड़ा कारण तो यह है की कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं | साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है | जिंदगी से उदास, हरा हुआ, भागा हुआ | कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं | हंसते हुए गीत गाते हुए | अतीत का सारा धर्म दुखवादी था | कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास , आंसुओं से भरा हुआ था | हँसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने का धर्म अभी भी पैदा होने को है |

कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं | जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है | इसलिए इस देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है | और यह कहने का यह सोचने का ऐसा समझने कारण है | वह कारण यह है की कृष्ण ने सब कुछ आत्मसात कर लिया है |

कृष्ण अकेले हैं जो शरीर को उसकी समस्तता में स्वीकार कर लेते हैं, उसकी 'टोटैलिटी' में | यह एक आयाम में नहीं सभी आयाम में सच है |
पुराने मनुष्यजाति के इतिहास में कृष्ण अकेले हैं, जो दमनवादी नहीं हैं | वे जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिए हैं | वे प्रेम से भागते नहीं | वे पुरूष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते | वे परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते | वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं | अहिंसक चित्त है उनका फ़िर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं | अमृत की स्वीकृति है उन्हें, लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है |

ऐसी आत्मा भी क्या जो शरीर से भी डरती हो और बचती हो | कृष्ण द्वंद को एक साथ स्वीकार कर लेते हैं | इसलिए द्वंद के अतीत हो जाते हैं | भविष्य के लिए कृष्ण की बड़ी सार्थकता है और भविष्य में कृष्ण का मूल्य निरंतर बढ़ता ही जाता है |

कृष्ण को समझना बड़ा कठिन है | आसान है यह बात समझना की एक आदमी संसार छोड़कर चल जाए और शांत हो | कठिन है इस बात को समझना कि संसार के संघर्ष में बीच में खड़ा होकर और शांत हो | आसान है यह बात समझनी कि एक आदमी विरक्त हो जाए, आसक्ति से सम्बन्ध तोड़कर भाग जाए और उसमें पवित्रता का जन्म हो | कठिन है यह बात समझनी कि जीवन के सारे उपद्रव के बीच, जीवन के सारे उपद्रव में अलिप्त, जीवन के सारे धूल-धवास के कोहरे और आँधियों में खड़ा हुआ दीया हिलता न हो, उसकी लौ कांपती न हो - कठिन है यह समझना | इसलिए कृष्ण को समझना बहुत कठिन है | लेकिन पहली दफा आदमी ने अपना पूरा परीक्षण कृष्ण में किया है | ऐसा परीक्षण कि सम्बन्ध में रहते हुए असंग रहा जा सके और युद्ध के क्षण में भी करुणा न मिटे | और हिंसा की तलवार हाथ में हो तो भी प्रेम सूरदास दीया सकते सकते न
बुझे |

कृष्ण पूर्ण अवतार हैं । कृष्ण के बहुत रूप हैं । कृष्ण उतने रूपों में प्रकट हुए हैं, जितने रूप हो सकते हैं । गीता का कृष्ण तो सिर्फ़ एक ही रूप है कॄष्ण का । शंकराचार्य, अरविन्द, लोकमान्य तिलक उस रूप के प्रेम में हैं । कृष्ण इतने विराट हैं कि तुम अपने मनपसन्द का कृष्ण चुन सकते हो । मीरा ने कॄष्ण को ऐसे देखा जैसे राधा ने देखा होगा, सखियों ने देखा होगा । मीरा के कॄष्ण मीरा के पति हैं, प्रीतम हैं ।

सूरदास ने कोई तीसरा ही कृष्ण चुना है । वह है छोटा सा बालक कॄष्ण, पैर में गुनगुनिया बान्धे नंग-धडंग यशोदा को परेशान कर रहा है । सूरदास ने बालक कृष्ण को चुना है ।

कृष्ण तो एक सागर हैं । उनके बहुत घाट हैं । तुम जो घाट से चाहो उतर जाओ । गीता एक घाट है, फ़िर कृष्ण का बालपन दूसरा घाट है । फ़िर कृष्ण की युवावस्था तीसरा घाट है । बहुत घाट हैं, कृष्ण के साथ बडी स्वतंत्रता है । तुम्हारा जैसा भाव हो, कृष्ण की तुम वैसी मूर्ति गढ सकते हो ।

कृष्ण को तुम अपने ढंग से प्यार कर सकते हो, तुम्हे स्वतंत्रता है ।"

ओशो द्वारा दी गई प्रवचनमाला "कृष्ण-स्मृति" के चुने हुए अंश |

August 12, 2009

जॉनी....ब्लॉगिंग की भावना को समझो ! !

जब से हमें फुरसतिया अड्डे पर ब्लोगिंग की मूल भावना का हिन्ट मिला है, हमें लगने लगा कि कुछ दिनों से हम इस भावना से तनिक दूर हो चले थे | चेत होते ही यह भावना हमारे अन्दर गुब्बारे में हवा की तरह समा गयी | और हमारा दिमाग ट्रेन के जनरल डिब्बा के माफिक हो गया | जिसमें सवारी विचार जबरदस्ती ठंसने लगे | जगह बनाने की हील हुज्जत करने लगे | मय साजो सामान | इसके पहले की धक्का-मुक्का की नौबत आए, हमने चूहे से हरी झंडी दिलवाई और कुंजी पट्टरी पर उँगलियों को सरपट दौडाने लगे | तब जाकर सब लोग कहीं न कहीं टिकते नजर आए | उस पर तुर्रा यह कि हमें ख़राब लिखने के फायदे भी जनवा दिए गए | यह पढ़ते ही पहली बार हमें आपने ब्लोगर होने पर गर्व का एहसास हुआ और अपने सहज ही ख़राब लिख सकने की 'ब्लॉगर क्षमता' पर हर्ष | चलो कहीं तो जगह मिली |

अरे ! यह ' ब्लॉगर क्षमता' शब्द बीच में कहाँ से घुस रहा है | पहले हम 'मूल भावना' से तो निपट लें' |

परिणाम स्वरुप इस भावना से अधिकाधिक ब्लॉगर को संक्रमित करने, इसका प्रचार करने और साथ ही इसकी खोज करने के वास्ते हम यह ब्लॉग पोस्ट पीटने बैठ गए | वजह : ब्लॉगिंग की मूल भावना से परिचित होना ब्लॉगर के लिए गैर जरूरी ही नहीं अनावश्यक भी है | जिससे न रोज रोज, कभी-कभी ही सही ब्लॉगर जन इस भावना से जरूर पीड़ित हो जाएँ और बात-बेबात पर पोस्ट दे मारने की विशेष ब्लॉगर क्षमता उनमें जागृत हो सके, जो कि एक कुशल ब्लॉगर की सबसे बड़ी विशेषता है |

अनूप जी द्वारा अपने ब्लॉग पर दी गयी विनीत जी की लिंक से हमें भान हुआ कि ब्लॉगिंग की मूल भावना सहजता और सरलता है | ज्यादा सजाने-संवारने बोले तो मेककरने से इसमें बनावटीपन आ जाता है अर्थात् स्वाभाविकता जाती रहती है | लेकिन यह बात ब्लोगिंग के प्रारम्भिक स्वरुप को देखकर कही गई है | क्योंकि शुरुआत में ब्लोगिंग डायरीनुमा और भावुकतापूर्ण थी | अब यह व्यावसायिकता तक पहुँच गई है | यही सब विधाओं के विकास में होता है | कविता और कहानियों का विकास भी कल्पना से यथार्थ की ओर होता गया | बच्चा पहले अपनी मूल भावना में रहता है | फ़िर जैसे-जैसे बड़ा होता है, मस्ती खोकर सलीकेदार बन जाता है | नफ़ा-नुकसान, दुनियादारी | सर्वाइवल या उत्तरजीविता के लिए | यह सब ब्लोगिंग पर भी लागू |

लेकिन हमारा व्यक्तिगत मत है कि ब्लोगिंग की एक ही पहली और आख़िरी मूल भावना है कि इसकी कोई मूल भावना नहीं है | हम ब्लोगिंग करते समय हमेशा इसी भावना से प्रकाशित रहते हैं | स्वतंत्रता ही इसकी गरिमा है, अराजकता ही इसका सौदर्य है | अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग | किसी प्रवृत्ति को हिट करने की कोशिश करना ब्लोगिंग की मूल भावना के ख़िलाफ़ है | यहाँ हम 'नानी के आगे ननिऔरे (ननिहाल) का हाल भी सुना सकते हैं' | क्योंकि, हे पार्थ ! ऐसा नहीं है कि ब्लोगर जन इस विषय पर तुमसे पहले नहीं लिखे हैं या तुम्हारे बाद नहीं लिखेंगे | फ़िर भी इन सब बातों की परवाह न करते हुए तुम लिखते रहो | फल की परवाह न करना वैसे भी हम भारतवासियों की मूल भावना है | इसी भावना के चलते भारत देश कुछ वर्षों में चीन को पछाड़ने वाला है |

बिना किसी प्रतिभा के पोस्ट पर पोस्ट दनदनाते रहना एक निरे ब्लोगर की क्षमता है, जीवट है | चाहे पोस्ट दो-चार लोग ही पढ़ें, पोस्ट पर पोस्ट दागते रहेंगे | अब यह 'निरा-ब्लॉगर' ख़ुद को हाईलाईट करने की कोशिश कर रहा है | लेकिन आप अभी लुप्प से जलकर बुत जाइए | शायद कभी नंबर आ जाए | बिना किसी प्रतिभा के शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया क्योंकि ब्लोगिंग का प्रतिभा से कोई लेना-देना नहीं है, वरना अनूप जी (ख़ुद उनके अनुसार) ब्लोगिंग करने की बजाय किसी अखबार या पत्रिका में फ़ुरसतिया कॉलम लिख रहे होते | लिखने से पहले जो ज्यादा सोच विचार करेगा वह चाहे जो बन जाए 'निरा ब्लोगर' नहीं बन सकता | पहले हमें लगा कि दूसरे ब्लोगरों की भावनाओं को चोट ना पहुंचाने की भावना को ब्लोगिंग की एक प्रमुख भावना के रूप में पेश करें | लेकिन बाद में हमने अपना यह विचार निरस्त कर दिया | क्योंकि यह बात ख़ुद ब्लोगिंग की मूल भावना के खिलाफ हो जाती |

एक बार अभिनेता राजकुमार के यहाँ एक नेर्देशक महोदय विज्ञापन में काम करने का ऑफ़र लेकर गए | अपने "जानी" राजकुमार ने साफ़ इंकार कर दिया - "जॉनी हम राजकुमार हैं | तुम्हारी कंपनी के सेल्समैन नहीं" | लेकिन नेर्देशक अपनी जिद पर अडा रहा | कुछ देर तक तो राजकुमार जी ने उसे समझाने कि कोशिश की | लेकिन जब वह फ़िर भी नहीं माना तो राजकुमार ने उसे कुछ देर तक घूर कर देखा, फ़िर अपने अंदाज में बोले - "जॉनी ...हमारी बात समझो |" इतना सुनते ही वह चुपचाप अपना सा मुंह लेकर खिसक लिया |

ब्लॉगिंग के ब्लॉगर की जय हो ! भावों के सागर की जय हो ! ब्लोगिंग के लफडे की जय हो ! प्रेम सिक्त झगडे की जय हो !

"जॉनी....ब्लॉगिंग की भावना को समझो ! ! "

August 09, 2009

भारत छोडो आन्दोलन : अगस्त क्रांति

जब मैं भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आन्दोलन भारत छोडो आन्दोलन के विषय में विचार करता हूँ तो मुझे बडा आशचर्य होता है, क्योंकि जिस भारत छोडो आन्दोलन या अगस्त क्रांति को भारतीय स्वतन्त्रता की अन्तिम महान लड़ाई कहा जाता है, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव इस हद तक हिलाकर रख दी थी कि अंततः वह उखड गयी, उसके शुरुआत का विरोध उस समय के लगभग सभी प्रमुख संगठनों ने किया था | यहाँ तक कि कांग्रेस भी धर्म संकट में थी और उसे मजबूरन गांधी जी कि इच्छा शक्ति के आगे झुककर 7 अगस्त 1942 को मुंबई के 'ग्वालिया टैंक' मैदान में, 'अखिल भारतीय कांग्रेस आन्दोलन' के दौरान हुई बैठक में गांधीजी के ऐतिहासिक 'भारत छोडो' आन्दोलन के प्रस्ताव को थोड़े-बहुत संशोधनों के बाद 8 अगस्त 1942 को स्वीकार कर लिया |

गाँधी जी ने कांग्रेस को अपने प्रस्ताव को स्वीकार करने की स्थिति में चुनौती देते हुए कहा - "मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खडा कर दूँगा |"

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की वर्धा बैठक में गांधीजी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला कि भारत में संवैधानिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है, जब अंग्रेज भारत से चले जाएँ |

जवाहर लाल नेहरू ने कहा - " हम आग से खेलने जा रहे हैं | हम दुधारी तलवार का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टे हमारे ऊपर भी पड़ सकती है |"

स्पष्ट है कि अगस्त 1942 के भारत छोडो आन्दोलन के मास्टर माइंड महात्मा गांधी थे | वही एक व्यक्ति थे जिनके मन में आन्दोलन शुरू करने के प्रति कोई संदेह नहीं था | बेझिझक | निस्संकोच | उन्होंने ही अगस्त क्रान्ति की मशाल में आग जलाई थी |

भारती राजनैतिक-धार्मिक संगठन उस समय भी भयानक रूप से बँटे हुए थे | अपने निहित स्वार्थों की वजह से उनमें असुरक्शा की भावना घर की हुई थी | वे अंग्रेजों के जाने से पहले सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर लेना चाहते थे |

"अंग्रेज तो चले जायेंगे लेकिन हमें क्या मिलेगा" ठीक वही सोच विद्यमान थी जो १८५७ के विद्रोह और उससे पहले भारतीय सामंतों की थी | यहाँ मैं जानबूझकर सामंत शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ, क्योंकि सभी भारतीय राजे-राजवाडे अंग्रेजों के सामंत ही थे | 1857 से पहले कंपनी को और उसके बाद बितानिया हुकूमत को कर देकर प्रजा का शोषण करके अपनी विलासिता का साधन जुटाने वाले सामंत | भारतीय सामंत राजाओं की सोच वैसी ही थी जैसी वर्तमान राजनैतिक नेताओं की है - "हमारा राज (कुर्सी) बना रहे, बाकी सब चलता है | हमारा अस्तित्व सिर्फ़ कुर्सी में है|"

7 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक में हुए सम्मेंलन में गांधी जी ने लगभग 70 मिनट तक भाषण किया, उन्होंने कहा कि "मैं आपको एक मन्त्र देता हूँ - "करो या मरो" | बस इस बात का ध्यान रहे कि आन्दोलन गुप्त एवं हिंसात्मक न हो |

9 अगस्त को सुबह तड़के में ही कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिए गए | जनता ने स्वयं ही अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाले, सभाएँ कीं | स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आन्दोलन था जो नेतृत्व विहीनता के बाद भी उत्कर्ष पर पहुंचा | मुम्बई, अहमदाबाद एवं जमशेदपुर में मजदूरों ने संयुक्त रूप से विशाल हड़ताल की | संयुक्त प्रांत में बलिया एवं बस्ती, मुम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर एवं भार में कुछ भागों में भारत छोडो आन्दोलन के समय अस्थायी सरकार की स्थापना कर दी गईयूँ तो यह आन्दोलन सारे देश कमोबेश फ़ैल गया था लेकिन लेकिन सर्वाधिक प्रभावित क्शेत्र थे बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश , मद्रास एवं मुम्बई |

जय प्रकाश नारायण , राम मनोहर लोहिया एवं अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया | गांधीजी को पूना के आगा खान महल में तथा कांग्रेस कार्यकारिणी के एनी सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया | कांग्रेस को ब्रिटिश सरकार ने असंवैधानिक संस्था घोषित कर इसकी सम्पति जब्त कर ली और साथ में जुलूसों को प्रतिबंधित कर दिया | सरकार ने जब आन्दोलन को निर्ममता पूर्वक लाठी एवं बन्दूक से दमन किया तो आन्दोलन हिंसात्मक हो गया |

तत्कालीन भारतीय राजनीतिक दलों में साम्यवादी दल ने इस आन्दोलन की आलोचना की | मुस्लिम लीग ने भी भारत छोडो आन्दोलन की आलोचना करते हुए कहा कि "आन्दोलन का लक्ष्य भारतीय स्वतन्त्रता नहीं, वरण भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना है, इस कारण यह आन्दोलन मुसलमानों के लिए घातक है | इस तरह मुस्लिम लीग अंग्रेजों की स्वामिभक्त बनी रही और हर तरह से उनकी सहायता की |
यही रवैया कट्टर हिंदूवादी संगठन "हिन्दू महासभा" एवं अकाली आन्दोलन का भी था | इन्होने इस आन्दोलन की आलोचना की | कांग्रेस के उदारवादियों को भी यह आन्दोलन रास नहीं आया | सर तेजबहादुर सप्र ने इस प्रस्ताव को 'अविचारित तथा असामाजिक' बताया | अम्बेडकर ने इसे 'अनुत्तार्दायित्व्पूर्ण और पागलपन भरा कार्य' बताया |

यह आन्दोलन भारत को स्वतन्त्रता तो नहीं दिला पाया , किन्तु इसके दूरगामी परिणाम निर्णायक हुए | इसीलिये इसे "भारत की स्वाधीनता के लिए किया जाने वाला अन्तिम महान प्रयास" कहा गया | इस आन्दोलन ने विश्व के देशों को भारतीय जनमानस के साथ खड़ा कर दिया |

इस तरह गाँधी जी ने अपनी दूरदृष्टि का परिचय देते हुए तमाम आतंरिक गतिरोधों और विरोधों के बावजूद इस महान आन्दोलन को वास्तविक किया | क्योंकि महात्मा गाँधी को अंग्रेजों की मक्कारी और अपने देश के राजनैतिक धार्मिक संगठनों की पद लोलुपता का एहसास हो गया था | उन्हें डर था कि कहीं ये संगठन स्वार्थ लोलुपता के चलते, स्वतन्त्रता की मांग को विलंबित न कर दें या कौन जानता है कि लालच में आकर अंग्रेजों से अलग-अलग खतरनाक समझौते ही कर लें | उधर द्वितीय विश युद्ध भी अपने चरम पर था | जर्मनी और जापान पूरी दुनिया को अचंभित किए हुए थे | गाधी जी नहीं चाहते थे कि भारत एक गुलामी से मुक्त होकर दूसरी गुलामी की जंजीर पहन ले अर्थात देश नाजियों की हाथ पड़ जाए |

जो भी हो 'भारत छोडो आन्दोलन' या 'अगस्त क्रांति ' महात्मा गाँधी के द्वारा लाई हुई आंधी थी, जिसने सारे अवारोधों को उखाड़ फेंका था | एक ऐसी आंधी जिसके साथ सबको चलना ही पडा था खुशी से या मजबूरन और जो इसके साथ न उड़ पाये वे सुरक्षित पनाहगाहों में छिपे हुए थे |

अगस्त क्रांति के परवानों को कोटि - कोटि नमन |