February 14, 2011

फिर वही दिल(न) लाया हूँ

आज एक‍ रि-पीट करने का मन है।
ब्‍लॉगिंग की भाषा में जिसे रिठेल कहा जाता है। यदि ब्‍लॉगिंग में पहली बार पोस्‍ट प्रकाशित करने के कृत्‍य को पोस्‍ट पीटना कहा जाए तो दुबारा उसी पोस्‍ट को उसी ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने पर उसे रि-पीट कहा जा सकता है। इस तरह यह शब्‍द हिंदी और अँग्रेजी दोनों में समझने पर सही अर्थ प्रदान करता है।  उसी प्रकार ठेल और रिठेल शब्‍द का प्रयोग भी तदनुसार ब्‍लॉगर जन करते हुए पाए जाते हैं। ज्‍यादातर बलॉगर पोस्‍ट ठेलते हैं। जैसे किसी नदी में कुछ ठेल दो। ठेल दिए गंगा जी में। पहुँच गई पोस्‍ट इंटरनेट के महासागर में। अंतर बस इतना है कि इधर रिठेल भी कर सकते हैं। नदी में किसी चीज की सिर्फ ठेल हो सकती है, रिठेल नहीं।  यहॉं ठेल करने से रिठेल करने में सुविधा रहती है।



पिछले वर्ष हमने एक ब्‍लॉग पोस्‍ट वेलेंटाइन डे के अवसर पर लिखी थी। इस वर्ष हमें ख्‍याल आया कि तब से अर्थात पिछली पोस्‍ट पीटने से लेकर अब तक चीजों में क्‍या बदलाव आया है।  देखा जाए तो बाहरी परिवेश में तो कोई बदलाव नहीं आया है।  वेलेंटाइन-डे के समर्थक और विरोधी अपनी-अपनी जगह पर मुस्‍तैद हैं।  आज किसी चैनल पर बजरंग दल, शिवसेना इत्‍यादि विराधी दलों के कार्यकर्ताओं को लाठियों को तेल पिलाते ओर लाठियॉं भांजते दिखाया जा रहा था।  दूसरी तरफ, युवा जोडों द्वारा की जा रही तैयारियॉं भी दिखाई गईं।  प्रेम अपरिहार्य है, लेकिन इस पर बाजार हावी है। तो बाहर तो चीजें लगभग वैसी ही हैं। लेकिन पिछले साल से अब तक इंसानों के व्‍यक्तिगत संबंधों में जरूर बहुत से बदलाव आ गए होंगे।  कुछ रिश्‍ते प्रगाढ हुए होंगे तो कुछ ऊब के शिकार कुछ स्‍थगित तो कुछ उपेक्षित और कुछ भुला दिए गए होंगे कुछ मिल गए तो परम आनंद और न मिले तो फिक्र नहीं कुछ रिश्‍ते कन्‍फ्यूज भी हो सकते हैं।  लेकिन वेलेंटाइनी प्रेम स्‍त्री-पुरुष के बीच के विशुद्ध अ‍ादिम संबंधों के प्रदर्शन की कवायद (आधुनिक?) है।  जो सब समयों में होती रही है।  देशी-विदेशी संस्‍कृति का प्रश्‍न उठाने से इसे रोका नहीं जा सकता।  जाहिर है कि जब आप अपने देश में मोबाइल नहीं बना सकोगे तो लोग दूसरे देश के बनाए मोबाइल का प्रयोग करेंगे।

बहरहाल,  आप रिठेल पोस्‍ट का आनंद लीजिए: कृष्‍ण की धरती पर वेलेंटाइन आए 

 कृष्‍ण कन्‍हैया अपनी भारत भूमि पर प्रेम के इजहार के इस वेलेंटाइन दिन को देखकर मुस्‍कुरा रहे थे । कृष्‍ण की आदत है मुस्‍कुराने की मुस्‍कुराते ही रहते हैं । रुक्‍मणी ने सोचा कि लगता है इन्‍हें अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं । कुहनी मारते हुए बोलीं कि क्‍या बात है जी, बहुत मुस्‍कुरा रहे हो ? लगता है तुम्‍हें अपनी राधा और गोपियों के साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आ रहे हैं । ये बेचारे तो साल में एक दिन का इंतजार करते हैं । प्रेम का बाकायदा इजहार और अपनी हैसियत के अनुसार मैनेज करने के लिए । तुमने तो हद कर रखी थी रोज ही रास रचाते रहते थे और वो भी कोई एक नहीं पूरी गॉव की गोपियों के साथ । कुछ काम धाम तो था नहीं तुम्‍हारे पास । निठल्‍ले घूमते थे । यशोदा मैया ने खासा बिगाड रखा था तुम्‍हें । और मैंने सुन रखा है राधा नाम की तुम्‍हारी कोई खास थी ।

रुक्‍मणी की बात सुनकर कृष्‍ण इस बार ठहाका मारकर हँस पडे । बोले रुक्‍मे ! मैं चाहे वेलेंटाइन के रूप में आऊं या कृष्‍ण के रूप में या राधा या मीरा के रूप में मैं किसी भी रूप में आ सकता हूँ प्रेम की हवा फैलाने । आज जब साजिश करके मेरे प्रेम के संदेश को बिल्‍कुल हवाई और अलौकिक कर दिया था, इस देश में तो मैं वेलेंटाइन जी के बहाने घुस आया हूँ , अधिक सांसारिक होकर । वैसे भी इस भारत देश की आदत हो गई है सेकंड हैंड चीजें इस्‍तेमाल करने की । यहॉं लाख दहाड मारकर चिल्‍लाते रहो कोई सुनेगा नहीं एक बार विदेशी समर्थन कर दें तो समझ लो कि हो गया काम । विवेकानंद से लेकर गॉधी से होते हुए ओशो तक यह बात बार बार दोहरायी जाती रही ।

रुक्‍मणी ने कहा - "मुझे लगता है कि आप ठीक कह रहे हैं । क्‍योंकि इन आशिकों के रंग ढंग भी कुछ आप जैसे ही लगते हैं ।"

इस बार कृष्‍ण चौंक गए बोले कि मैं समझा नहीं तुम क्‍या कहना चाहती हो । रुक्‍मणी बोलीं कि "जैसे आपने प्रेम तो राधा से किया था ले‍किन उसे प्रेम तक ही रहने दिया । शादी तक आते आते आपके प्रेम का भूत उतर गया और यह नेक काम आप राधा जैसी ग्‍वालिन से न करके पूरी दुनियादारी का परिचय देते हुए हम जैसी राजे-महाराजे की लडकियों से किया । "

"मैं मजबूर था रुक्‍में ..." कृष्‍ण ने बेबसी जाहिर करते हुए कहा ।

"और आपकी यह बेबसी आज भी कायम है इस समाज में । हर वर्ष वेलेंटाइन डे चकाचौध की तरह आता है । महानगरों बडे शहरों और टीवी चैनलों मे कौंध की तरह छाता है । रात में पी हुई मदिरा की तरह सुबह हल्‍के सिरदर्द के साथ उतर जाता है । दूसरी तरफ प्रेम करने वालों युवाओं को पंचायतों द्वारा सरेआम फांसी , आगजनी या पीटपीटकर मौत के घाट उतार दिया जाता है।"

यह सुनकर कृष्‍ण को इस तरह की कई घटनाएँ याद आ गईं । मन में यह सोचकर उन्‍हें राहत महसूस हुई कि अच्‍छा हुआ कि मैं पहले ही यह सब करके फुर्सत हो लिया हूँ । नहीं तो आज के समय में ब्रज में वह सब करता तो पता नहीं क्‍या-क्‍या भुगतना पडता ।

रुक्‍मणी ने आगे कहा कि "फकीरचंद से लेकर अमीरचंद तक के घरों में शादियां बाकायदा प्रायोजित होती हैं । प्रेम अपनी जगह शादी अपनी जगह । प्रेम टाइम पास के लिए ठीक है । ज्‍यादा सेंटी होने का जमाना अब नहीं रहा ।
इस तरह हम पूरे व्‍यवहारिक लोग हैं । हमारे यहॉं शादियॉं कुंडलियॉं तय करती हैं । कुंडली पंडित तय करते हैं और मंगली लडकी की शादी के लिए मंगला लडका ढूँढना पडता है । लडके लडकी विदेश में पढते या नौकरी करते हैं और देश में आकर बाकायदा कुंडली मिलान करके शादी करते हैं ।"

"तब तो बडी मुश्किल हो जायेगी या तो प्रेम भी कुंडली मिलाकर करो नहीं तो प्रेम विवाह तो असंभव हो जायेगा क्‍योंकि प्रेम तो लोग बिना आगा पीछा देखे ही करने लगते हैं ।"

यही एक समानता है वेलेंटाइन डे मनाने वालों और इसका विराध करने वालों में कि शादी के मुद्दे पर दोनों एक हो जाते हैं ।

"गालिब के अंदाज में आप इसे ऐसा कह सकते हैं कि दिल के बहलाने को वेलेंटाइन मियॉं ये ख्‍याल अच्‍छा है
लेकिन जो वेलेंटाइन डे मना रहा है वह अभी बच्‍चा है । इसलिए चिंता नहीं है क्‍योंकि बच्‍चा है तो बडा होगा ही और बडा होगा तो जरुरी समझ भी आ ही जायेगी । फिर वह कुंडली मिलाकर शादी करेगा और वेलेंटाइन की जरूरत ही नहीं पडेगी ।"

"रुक्‍मणी ! एक मिनट ! अभी तुमने कहा कि कुछ लोग इसका विरोध भी करते हैं । वेरी इंट्रेस्टिंग ! वे कौन लोग हैं ? क्‍या वे शकुनी मामा या जरासंध की पार्टी के लोग हैं । जरा मुझे इसका खुलासा करके बताओ । तुम्‍हें इन सब चीजों के बारे में काफी अद्यतन जानकारी रहती है । मुझे तो आजकल राजकाज से ही फुर्सत नहीं मिलती ।" कृष्‍ण ने जम्‍हाई लेते हुए कहा ।

नहीं मधुसूदन ! वे आपकी जानकारी की किसी भी पार्टी के नहीं हैं बल्कि शिव जी और बजरंगबली जी के नाम
बनाए गए नए दल और भारतीय संस्‍कृति के पहरुए होने का दावा करने वाले वाले दलों के लोग हैं ।

"क्‍या इन लोगों को भोले शंकर और हनुमान जी का समर्थन प्राप्‍त है ?"

इस बात पर रुक्‍मणी को हँसी आ गई । समझाते हुए बोलीं कि यह तो सिर्फ उनके दलों के नाम है । आशीर्वाद या समर्थन प्राप्‍त होने से इसका कोई संबंध नहीं । जैसे कल कोई आपके नाम से या श्रीराम के नाम से दल बना सकता है । लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि इन सबके पीछे आपका हाथ है या समर्थन प्राप्‍त है ।

"अच्‍छा" तो इन लोगों का एजेंडा क्‍या है । कहीं ऐसा तो नहीं कि ये मेरे समर्थकों को शिव और हनुमान और उनके स्‍वामी राम के समर्थकों के खिलाफ भडका रहे हों ।

"प्रत्‍यक्षत: तो ऐसा नहीं लगता । लेकिन ऐसा है भी क्‍योंकि इन लोगों को शांतिप्रिय और प्रेम करने वाले लोग पसंद नहीं हैं । इन्‍हें ये कायर कहकर संबोधित करते हैं । इनका यह भी कहना है कि वेलेंटाइन डे मनाने वाले लडके-लडकियॉं कायर होते क्‍योंकि वे लोग अपना संगठन बनाकर इनके खिलाफ नहीं खडे होते । वेलेंटाइन डे मनाना भारतीय संस्‍कृति के खिलाफ है इसलिए ये लोग वेलेंटाइन डे के दिन प्रेमरत जोडों को बरामद करके उनकी आपस में राखी बँधवाकर , लगे हाथ उठक बैठक्‍ लगवाकर भारतीय संस्‍कृति की रक्षा का महत कार्य पूरा करते हैं । लोकतंत्र को ये पसंद नहीं करते क्‍योंकि लोकतंत्र में कोई भी ऐरा-गैरा कुछ भी अनाप-शनाप बकता रहता है । इस तरह ये अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को पसंद नहीं करते । इससे इन्‍हें अपने अस्त्तिव पर संकट नजर आने लगता है । क्‍योंकि इनके पास विकास की कोई योजना या दृष्टि नहीं होती ।"

"इनका अस्त्तित्‍व केवल नकार पर टिका हुआ होता है । शांति काल में ये अप्रासंगिक हो जाते हैं इसलिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कोई न कोई शिगूफा छोडते रहते हैं ।"

"दूसरे धर्मों के समान सोच रखने वाले भाई लोग इस काम में इनकी मदद करते रहते हैं । इस तरह भाईचारे से भाई बेचारों तक का धंधा चलता रहता है ।"

"तो क्‍या मेरे नाम से अभी तक कोई ऐसा काम नहीं किया गया । "
कृष्‍ण ने उत्‍सुकतावश पूछा ।

"नहीं मुरलीधर । आपके नाम से प्रेम का भाव इतना चिपका हुआ है कि लोगों को मारपीट के लिए उत्‍तेजित नहीं कर पाता इसलिए आपके नाम से अभी कोई दल नहीं बनाया गया है । आज की भाषा में कहूँ तो आपका नाम अपील नहीं करता ऐसे कामों के लिए । बल्कि ऐसे कार्यों को चौपट करने वाला है । यद्यपि आपने पार्थ को युद्ध करने के लिए उकसाया था । लेकिन आपका वह काम भी आपको लवर ब्‍वाय के इमेज से बाहर नहीं निकाल सका ।"

इस पर कृष्‍ण प्रसन्‍न होते हुए बोले कि "चलो अच्‍छा हुआ कि मेरा नाम लेकर कोई वेलेंटाइन जी का विरोध नहीं कर सकता नहीं तो मुझे काफी अफसोस होता क्‍योंकि किसी भी प्रेम का संदेश देने वाले में मैं ही मौजूद होता हूँ ।"

तत्‍पश्‍चात चर्चा का समापने करते हुए श्रीकृष्‍ण ने निम्‍नलिखित पंक्तियॉं कहीं :

ब्रजवासियों ने ऐसे ऐसे गुल खिलाए
कृष्‍ण की धरती पर वेलेंटाइन आए


यह कहकर विश्‍व-मोहन ने ऑंख मूंद ली और वर-वंशिका पर एक सम्‍मोहक राग छेड दिया जो कि रात के सन्‍नाटे में अखिल ब्रहमांड में गुंजायमान होता हुआ जड-चेतन को मदमस्‍त करने लगा । रुक्‍मणी भी राधारमण की गोद में सिर रखकर इस मधुर मुरली की तान से अवश होती हुई वेलेंटाइन डे का आनंद उठाने लगीं । अस्‍तु ।

10 comments:

  1. I still remember this post from last year. Enjoyed reading the two new paragraphs in the beginning.

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  2. इस दृश्‍य की तलाश में हैं ढेरों, जरा संभल के.

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  3. पूर्व कथायें, नव अवमूल्यन।

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  4. जाहिर है कि जब आप अपने देश में मोबाइल नहीं बना सकोगे तो लोग दूसरे देश के बनाए मोबाइल का प्रयोग करेंगे।

    achchha kahaa.

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  5. ha ha ha ha ha....mazedaar
    ye bhi khoob rahi

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  6. मजेदार है! रिठेल अच्छी है।

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नेकी कर दरिया में डाल