December 09, 2009

आदमी एक संवेदनशील प्राणी है .... खुद के लिए

कुछ लिखना चाहा कुछ लिख नहीं पाया । कुछ अधूरा सा लिखा कुछ पूरा नही हुआ । कोई टिप्पणी नहीं की किसी ब्लॉग पर । ब्लाग पढे बस ।
‍नई पोस्ट का आना जरूरी है । कुछ नहीं तो पुरानी पोस्ट हटाने के लिए ही । नई पोस्ट के लिए मुददा चाहिए , कोई बहाना चाहिए । हो सकता है नई पोस्ट किसी संवेदना या दिमाग में किसी का कौंध का परिणाम हो । या किसी घटना का या कोई प्रतिक्रिया या फिर आवेशित बैटरी के धन ऋण से जोडने पर धारा प्रवाह जैसा । दिमाग चार्ज है और दोनों हाथ की बोर्ड से जुड गए करेंट बहने लगी और एक ब्लाग पोस्ट रूपी बल्ब जल गया । दिमाग एक घर है तो कोई आयेगा कभी बुलाने पर और कभी अनायास । कोई नहीं तो चूहे, बिल्ली, ‍‍‍‍‍‍‍ ‍मकडी, पक्षी, चींटी, डाकिया, अखबारवाला या दूधवाला ही । जैसे भी आए स्वागत तो करना ही पडेगा और आनेवाला भी अपना प्रयोजन पूरा करने की कोशिश करेगा । नहीं है तो ढूंढ लें बना लें । खबरों की कमी क्या है । किसीभी खबर को पकड के खींचा जा सकता है । या मन में कोई दुख या विषाद हो तो उसका भी उपयोग किया जा सकताहै । कविता की जा सकती है । अच्छा रसोइया कम सामग्री में भी खाने वालों को उंगली चटवा देता है ।
हिंदी ब्लॉगिंग की संवेदनशीलता बढ गई है और नीलिमा जी के अनुसार "सेंस ऑफ ह्यूमर गडबडा गया है ।" जब कुछ करने का मन ही है तो कोई भी वजह बनाई जा सकती है । हम (मैं)
‍ ‍कोई उद्देश्यपूर्ण ब्लॉगिंग तो कर नहीं रहे बस लिखे जा रहे हैं । कुछ भी कभी भी । जब तक बिना किसी उददेश्य के जीना गैरकानूनी नहीं है, तब कोई चिंता की बात नहीं । तो आज बिना मुददे के लिखने का मन है तो लिखेंगे रोकता कौन है । शायद यह डर कि टिप्पणियॉं नहीं ‍‍मिलेंगी । मित्रों को पसंद नहीं आएँगी । पाठक बिना मन के वाह-वाह करेंगे या आकर चले जायेंगे या आयेंगे ही नहीं । अच्छा ही है कम से कम अपेक्षाऍं नहीं होंगी तो कल यह सुनने का डर नहीं रहेगा कि हमें आपसे ‍ऐसी उम्मीद नहीं थी । पर लिखना तो जरूरी है । कुछ करेंगे नहीं तो पता नहीं चलेगा कि हम भी हैं । ब्लॉगर बन गए हैं हम । बताते हैं कि हम ब्लॉगर हैं । ब्लॉग पोस्ट लिखते हैं । सोचते हैं कि यदि ब्लागिंग न होती तो इतना सब जो लिखा जा रहा है किस रुप में निकलता । यह छपास कहॉं निकलती । शायद कुछ अखबार और पत्रिकाओं में छपतीं और ज्यादातर कहीं नहीं। या फिर डायरियों में । स्वांत: सुखाय लिख रहे हैं । लेकिन सुख कहॉ है । यह स्वांत: सुखाय धीरे धीरे परान्त: सुखाय बन जाता है । शुरुआत ज्यादातर चीजों की स्वांत: सुखाय ही होती है । खेलते खेलते आदमी गंभीर हो जाता है । जीवन मरण का प्रश्न बन जाता है जो कभी स्वांत: सुखाय होता था । कविता भी शुरू शुरू में स्वांत: सुखाय होती है । फिर हम अपनी संवेदनाओं का उपयोग करने लगते हैं । अपनी कुंठाओं और विषाद को ‍‍ गिनागिनाकर ‍‍‍ चपोटे रहते हैं । फिर वह सब बाहर निकलता है, किसी न किसी रूप में । अलंकृत सजा धजा, कभी कुरूप । पढ़कर राहत मिलती है । फिर उसे रचना वगैरह कहा जाता है । अपना ही लिखा हुआ लगता है कि यह सब मेरे दिमाग में कैसे आ गया या इतना अच्छा मैंने कैसे लिखा । एक मन:स्थिति होती है ।
इस तरह लिखने का नुकसान यह है कि कभी किसी बात पर मेरे खिलाफ मेरे ही बात को उद्धृत किया जा सकता ।

‍खैर जो भी हो, यह जरूर है कि आदमी एक संवेदनशील प्राणी है .............खुद के लिए ।

December 06, 2009

याद करते नहीं फिर भी चीखने लगती हैं कुछ तारीखें जैस 6 दिसंबर

समय के साथ त्रासदी दिवस बढते जा रहे हैं, देश में । अभी 26/11, 3/12, और आज 6 दिसबंर । वैसे तो रोज ही त्रा‍सदियॉं होती हैं, रोजमर्रा के जीवन में दुर्घटनाऍं , आपराधिक गतिविधियाँ, आतंकवादी घटनाएँ । लेकिन जब समाज के सफोदपोश लोग , देश के नेतृत्‍वकर्ता अपने ही लोगों को नफरत के नरक में झोंकने के लिए जिम्‍मेदार होते हैं तो तकलीफ के साथ निराशा का भाव भी गहरा हो जाता हैं । यह ऐसे घाव हैं मानवता के सीने में जो याद आते ही, टीसने लगते हैं । इनका परिणाम होता है । नफरत की एक लम्‍बी श्रृंखला के रूप में । षडयंत्र , बदला , हत्‍या , जघन्‍य हत्‍याकांड ।

ये घाव आदमी खुद बनाता है, अपने घिनौने स्‍वार्थों को पूरा करने के लिए । जो परिस्थितियॉ पैदा की गईं थी 6 दिसंबर को उसके लिये प्रत्‍यक्षत: भाजपा के साथ उस समय सत्‍ता में रही कांग्रेस पार्टी समान रूप से जिम्‍मेदार थी । अपने लचर नेतृत्‍व की वजह से । उस समय हम स्‍कूल में पढते थे । गाँव कस्‍बों में इस घटना की वीडियो रिकार्डिग दिखाई जा रही थी । मस्जिद पर चढते हुए , भागते हुए , डंडे और गोलियॉं खाते हुए लोग । मरते हुए लोगों को देखकर मुझे बहुत बुरा लगा । मुझे नफरत हो गई धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों से । एक तरफ ढांचा गिर रहा था एक तरफ लोग गोलियों और लाठियों से लथपथ हो रहे थे । कहीं किसी मंच से भाषणबाजी भी हो रही थी ।

लोग वर्तमान की जगह अतीत को सुधारना चाहते हैं । वह भी सडे हुए अतीत को । एक ऐसे अतीत को जो हाथ लगाते ही भुरभुरा कर गिरने लगता है । हम कविता लिखते हैं । बहस करते हैं । पक्ष विपक्ष में दलीले देते हैं । और किया भी क्‍या जा सकता है । समय आने पर फिर से वही सब कुछ दोहराया जाता है । यदि जनता को इतना जागरुक किया जा सके कि वह धर्म जाति के नाम पर मरने-मारने को उकसाने वालों के बहकावे में न आवे तभी यह सब रुक सकता है । यह काम जनता के स्‍तर पर ही हो सकता है । क्‍योंकि जिन ठेकेदारों का अस्त्त्वि ही नफरत की जमीन पर टिका हो वह तो ऐसी आत्‍मघाती पहल करने से रहे ।

सवाल उठता है कि क्‍या ऐसी घटनाओं को याद किया जाना चाहिए । लेकिन याद नहीं करते फिर भी चीखने लगती हैं, कुछ तारीखें । इन घटनाओं को किस तरह याद किया जाता है । मातम पुरसी के रूप में या अपने - अपने हित में प्रयोग करने के‍ लिए । जो भी हो कम से कम अफसोस तो जाहिर कर ही दें आज । हालॉंकि अब तो अफसोस जाहिर करते हुए भी रस्‍मअदायगी का पाखंड सा मालूम होता है ।

कौन देगा हिसाब उन बच्‍चों को
जिनका बचपन अनाथ हो गया
जो मरहूम हो गए बाप के प्‍यार से
उन औरतों को जिनके लिए
बदल गए मायने जिंदगी के
एक नफरत के मिशन में
क्‍या इतिहास उनकी कुछ मदद करेगा
इंसान और भगवान
दोनों दब गए मलबे के ढेर में
और उस पर उग आए
कुछ और विष वृक्ष
जो बना रहे हैं
फिर फिर मलबों का ढेर
पूर देश में ।
या वे लोग जो इस्‍तेमाल करते हैं
आदमी को इंसानियत के खिलाफ
घिनौना बना डालते हैं धर्म के नाम को
अपने निहित स्‍वार्थों के लिए
मारा जाता हैं बेकसूर आदमी हर बार
और बच निकलते हैं विष वृक्ष
लहराते हरियाते रहते हैं शान से
छिपाए हुए विषों के बीज
अपने ठूँठ में ,
फिर से रोपने के लिए , किसी मानसून में |
नफरत की फसल काटने के लिए ।

इस विषय से कुछ और संबंधित पोस्‍ट जो मैंने देखे :

इसके लिये भी भूमिका लिखूँ.....? शरद कोकास जी की एक मर्मस्‍पर्शी कविता ।
चौराहा अयोध्‍या का दर्द खुद अयोध्‍या नगरी की जुबानी ।
6 दिसंबर काल या द्रोहकाल
6 दिसंबर
देहाती


December 02, 2009

एड्स : एक नई सुबह की ओर !

रात्रि का अंतिम पहर बीत रहा था । रात और पूरे कमरे में अंधकार का एकछत्र राज्‍य कायम था । जीरो वाट का छोटा सा लाल बल्‍ब अपनी पूरी ताकत से कमरे को रोशन करने का प्रयास कर रहा था । छत पर लगे हुए पंखे की पंखियॉं अपनी परिधि में लगातार अनगिनत चक्‍कर लगाती हुई, अपने नीचे सोते हुए एना और उसके पति को इस निविड अंधकार में ख़ामोशी से देख रही थीं । गहन निद्रा के इस क्षण में एना के कानों में एक फुसफुसाहट की आवाज सुनाई पडी । एना को बहुत आश्‍चर्य हुआ और उसने इस आवाज के स्रोत को जानने की कोशिश की । लेकिन यह एक रहस्‍य था ।

"मम्‍मी... मम्‍मी क्‍या हुआ, चौंक गईं ? मैं तुम्‍हार साथ और तुम्‍हारे पास हूँ मम्‍मी । वास्‍तव में मैं तुम्‍हारे शरीर का ही एक हिस्‍सा हूँ ।"

एना के आसपास कहीं एक बच्‍ची की आवाज गूँजी । एना आश्‍चर्यचकित थी , उसने अपने चारों ओर किसी की मौजूदगी को देखने की कोशिश की । लेकिन उसका संदेह और चिंता और बढ गई क्‍योंकि यह आवाज उसकी जानी पहचानी आवाजों में किसी से मेल नहीं खाती थी । कौतुक को बढाते हुए वह आवाज एक बार फिर से एनी के कानों में तरंगित हुई ।

"हेलो मम्‍मी, मैं एमिली हूँ ।"

"मैं एमिली नाम से किसी को भी नहीं जानती और फिर तुम मुझे मम्‍मी कैसे कह रही हो ।" एना ने हकलाते हुए पूछा ।

"हॉं, मैं तुम्‍हारी बेटी हूँ ।"।

"बेटी?"

"हॉं, मैं तुम्‍हारे गर्भ में पल रही भ्रूण हूँ ।" एमिला ने बहुत ही कोमल आवाज में बताया ।

"अच्‍छा, अच्‍छा हॉं" एना की बढी हुई धडकनें सामान्‍य हो गईं और वह अपने आप पर लौटती हुई सी लगी ।
"आखिर तुम मुझे संसार में क्‍यों नहीं लाना चाहती हो और मुझे सूरज के उज्‍जवल प्रकाश को देखने से क्‍यों वंचित करना चाहती हो ?"

"यह एक राज है मेरी प्रिय एमिली और यह एक बहुत ही तकलीफदेह निर्णय.....।" एनी ने सिसकते हुए कहा ।

"मम्‍मी, मत रोइये । आप सिर्फ मुझसे बात कीजिए और मेरे सवालों का जवाब दीजिए । मुझे यकीन है कि इससे आपको काफी राहत मिलेगी ।" एमिली ने अपनी मॉं को सांत्‍वना देने का प्रयास किया ।


"हॉं, एमिली..., मैं नहीं चाहती कि इस कलंक के जाहिर होने के बाद दुनिया तुम्‍हारा उपहास करे और तुम्‍हे घृणा की दृष्टि से देखे ।"

"कैसा कलंक?"

"ओह एमिली तुम सवाल करना बंद नहीं कर सकती हो ?" एनी ने खीजते हुए कहा ।

"मम्‍मी, तुम मुझे सवाल पूछने से मना कर रही हो । ठीक है । लेकिन मम्‍मी, जरा मेरे बारे में भी सोचिए । यह मेरे लिए जीवन और मृत्‍यु का प्रश्‍न है और आप मुझे चुप रहने के लिए बोल रही हो । इस दुनिया में आने से पहले ही तुम मुझे मेरे प्रश्‍न पूछने के मूलभूत अधिकार से वंचित कर देना चाहती हो । तुम्‍ही बताओ क्‍या यह उचित है, मम्‍मी ?" एमिली ने पूछा ।

"ओह, एमिली कभी-कभी चुप रहना ही बेहतर होता है"

"लेकिन क्‍या ऐसे समय में जब मैं तुम्‍हारे गर्भपात करवाने के फैसले की वजह से हमेशा के लिए मिट जाने वाली हूँ , चुप रह सकती हूँ ? बोलो मम्‍मी...., क्‍या मैं चुप रह सकती हूँ ?" एनी ने परेशानी और उत्‍तेजना से कहा ।

"मेरी प्रिय एमिली सुनो। मैं तुम्‍हे तुम्‍हारे जीवन के बारे में कुछ बताने जा रही हूँ । अपने जीवन को बचाने के लिए केवल तुम ही यह लडाई नहीं लड रही हो , बल्कि हम (मैं और तुम्‍हारे पिता) भी अपने जीवन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । क्‍योंकि मृत्‍यु का डरावना काला साया हमारे ऊपर '‍डेमोक्‍लीज की तलवार ' की तरह लटक रहा है ।

"तुम भी मम्‍मी ? क्‍यों , क्‍या हुआ ?

"एमिली, ओह, एमिली मैं यह सब तुम्‍हारे साथ कैसे साझा करुँ । लेकिन जब मौत सामने है तो मैं चुप भी तो नहीं रह सकती । मैं तुम्‍हे वह सब बाते बताऊँगी जो हमारे साथ जुडी हुए इस क्रूर जाल और सामाजिक कलंक से संबंधित हैं । "

"आपको क्‍या हुआ मॉं ?" मैं आपकी बातें समझ नहीं पा रही हूँ । आप मौत से क्‍यों जूझ रही हैं । "

"देखो, एमिली । मैं और तुम्‍हारे पापा दोनों ही इस आसन्‍न मृत्‍यु के लिए जिम्‍मेदार हैं । मैं तुम्‍हारे पापा से छह महीने पहले एक डिस्‍कोथेक में मिली । धीरे-धीरे हमारे बीच नजदीकियॉं बढती गईं । हम दोनों एक-दूसरे से मिलते रहे और मिलने का यह सिलसिला आगे बढता गया । वक्‍त गुजरने के साथ हमने शारीरिक संबंध भी बनाए ।"

"हुँ ... , तो क्‍या हुआ ?"

"बाद में हमने शादी कर ली , इस तरह हमने जीवन में एक नई शुरुआत की । हमें एक दूसरे पर विश्‍वास था और हम एक-दूसरे की खुशियों और गम के साझीदार बने । जीवन दाम्‍पत्‍य के प्‍यार और हँसी-खुशी के हल्‍के फुल्‍के क्षणों के साथ सहजता से बीत रहा था । हम खूब आनंदपूर्वक साथ साथ रहे और हमारे प्‍यार के परिणाम स्‍वरूप जब तुम मेरे गर्भ में आयीं तो हमें पता भी नहीं चला । लेकिन गर्भ के भीतर इस तरह के क्रियाकलाप ज्‍यादा दिन छिपे नहीं रह सकते । तुम्‍हारे आने का पता मुझे चला और फिर तुम्‍हारे पापा को यह बात मालूम हुई । हमने तुम्‍हारी उपस्थिति को सुन‍िश्चित करने के लिए परीक्षण करवाया ।"

"दिलचस्‍प"

"लेकिन यह ठीक ही कहा गया है कि खुशियॉं स्‍थाई नहीं होतीं "सुख पल दो चार, फिर हाहाकार" और ईश्‍वर खुशियॉं छीनने की ताक में हमेशा रहता है । हमारी खुशियों का महल शायद बहुत ही कमजोर नींव पर रखा गया था जो कि नाइनपिन के खेल की तरह बिखर गया"

"इस बीच क्‍या हुआ ?"

"एक बार तुम्‍हारे पापा के ऑफिस के एक कर्मचारी की दुर्घटना हो गई । उस व्‍यक्ति को दुर्घटना में गंभीर चोटें आयीं और उसके शरीर से काफी खून बह गया । उसे तुरंत खून देने की जरूरत थी और ऑफिस के किसी भी व्‍यक्ति का रक्‍त समूह दुर्घनाग्रस्‍त व्‍यक्ति के रक्‍त समूह से मेल नहीं खा रहा था । यहॉं तक कि रक्‍त बैंक में भी उस रक्‍त समूह का रक्‍त नहीं था, क्‍योंकि उस व्‍यक्ति का रक्‍त समूह बहुत ही दुर्लभ प्रकार का था । लेकिन जब तुम्‍हारे पापा को खून की जरूरत के बारे में पता चला तो वह खून देने के लिए राजी हो गए । पीडित व्‍यक्ति को रक्‍त देने से पहले उनके रक्‍त के कई अनिवार्य परीक्षण किए गए । यह एक खेद और कलंक का विषय था कि उनका रक्‍त एलिसा टेस्‍ट में असफल रहा । इस खुलासे को सुनकर वह बिखर गए और साथ ही हमारे जीवन की नई शुरुआत भी ।

"कैसे मम्‍मी ?"

"उनका रक्‍त परीक्षण पाजिटिव होने का मतलब था कि वह एक घातक वायरस के वाहक बन चुके हैं । इस बात का डर था कि मुझे और तुम्‍हे भी इस वायरस का संक्रमण हो गया हो । मेरा परीक्षण भी पॉजिटिव निकला और प्रिय एनी तुम भी इस वाइरस से संक्रमित हो चुकी थी । हे भगवान ! काश हमने तुम्‍हारे बारे में न सोचा होता । और इस तरह एड्स के खिलाफ एक असफल लडाई की शुरुआत हुई । हमें पता था कि हम इस विपत्ति से सफलतापूर्वक बाहर नहीं आ सकते हैं लेकिन फिर भी हमें इसके खिलाफ युद्ध जारी रखने के अलावा कोई चारा नहीं था "

"अच्‍छा" एमिली ने कहा ।

"और अब जब हम खुद ही मृत्‍यु के साथ जीवन जी रहे हैं और उसी के साथ शयन कर रहे है तो यह हमारे लिए उचित नहीं था कि हम तुम्‍हे इस दुनिया में लाकर एक भयावह मौत मरने के लिए छोड दें । "

"आप क्‍या सोचती हैं कि वाइरस का संक्रमण आपको पापा से हुआ या यह पहले से आपके शरीर में निष्क्रिय रूप में मौजूद था ।"।

"मतलब"

"हॉं, मम्‍मी" जब आप मुझे सारी बाते बता रही हैं तो आपको अपने डिस्‍काथेक के जीवन के बारे में भी मुझसे कुछ नहीं छुपाना चाहिए । मुझे पता है कि लोग डिस्‍कोथेक में अपना समय बिताने के लिए जाते हैं और ड्रग्‍स के जहरीले प्रभाव में नाचते और डोलते हैं ।" एमिली न‍े कहा ।

"हॉं मैं एक ड्रग्‍स लेने वाले समूह की सदस्‍य थी । हम अकसर डिस्‍काथेक के बंद हो जाने पर इकट्ठे होते थे और ड्रग्‍स के इंजेक्‍शन लिया करते थे । कभी कभी हम झूमा भी करते थे क्‍योंकि ड्रग्‍स का प्रभाव ही ऐसा होता है जो सबको सिर से पॉंव तक झूमने पर मजबूर कर देता है । "

"अच्‍छा, मैं समझी ।"

"हॉं एम्‍मी, मैं तुम्‍हारे पिता के प्‍यार की बारिश की बौछारों से पूरी तरह भीग चुकी थी । मैंने ड्रग्‍स से अरुचि दिखाना शुरु कर दिया । लेकिन यदि एक बार तुम ड्रग्‍स के कीचड में गिर गई तो और और ड्रग्‍स लेने की चाह हमेशा इंसान को इस कीचड में धंसते रहने पर मजबूर करती रहती है । इसलिए मैं एक पुनर्वास केन्‍द्र में शामिल हुई और बहुत सी कठिनाइयों के बाद मैं ड्रग्‍स की कालकोठरी से मुक्ति पा सकी ।" एना ने बताया ।

"बहुत अच्‍छा मम्‍मी, लेकिन ...." एमिली कहते कहते रुक गई ।

"क्‍या बात है एमिली .... क्‍या तुम कुछ और पूछना चाहती हो ?"

"हॉं... मम्‍मी । तुमने बताया था कि पापा को एड्स था , लेकिन क्‍या तुमने उनसे पूछा कि वह इस घातक सिंड्रोम से की गिरफत में कैसे आए?"

"तुम कहना क्‍या चाहती हो, एमिली?"

"मुझे काफी हद तक यकीन है कि पापा को एड्स का यह वाइरस तुमसे मिला है क्‍योंकि तुम आईवीडीयू (Intra-veinous Drug Users.) थीं”

"नहीं, मैं एडस के विषाणु की वाहक नहीं थी बल्कि मुझे यह बीमारी तुम्‍हारे पिता से मिली है" एना ने विश्‍वास पूर्वक कहा ।

"क्‍या शादी के पहले आपने जॉंच करवायी थी ?" एमिली ने पूछा ।

"नहीं मुझे इसकी कोई आवश्‍यकता नहीं थी ।"

"अच्‍छा, मैं समझी" एमिली ने एक गहरी सॉंस ली और कहना जारी रखा । "लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं कि यह बीमारी आपको पापा से ही मिली?"

"क्‍योंकि मेरे आने से पहले तुम्‍हारे पापा की जीवन शैली बहुत ही लापरवाह किस्‍म की थी । वह अपनी कामवासना की आग बुझाने के लिए अकसर चकला घरों में जाया करते थे । वह असुरक्षित यौन संबंधों का स्‍वतंत्रतापूर्वक आनंद ले रहे थे । और यह आदत तुम्‍हारे पिता के दैनिक जीवन का हिस्‍सा बन चुकी थी"

"मतलब मिलने के बाद आप दोनो ने अपनी पिछली जिंदगी से वापस लौटने की कोशिश की? लेकिन दुर्भाग्‍य से संबंध इतनी गहरी जडें जमा चुका था कि कहा जा सकता है कि उस वक्‍त तक अमेजन से बहुत सा पानी बह चुका था , है न ?

"हॉं प्रिय, तब तक बहुत देर हो चुकी थी । लेकिन यह समय अब एक दूसरे को दोष देने का नहीं है, बल्‍क‍ि साथ-साथ प्रकाश की दिशा में बढने का है । दुर्भाग्‍य से आगे सिर्फ अँधेरी सुरंग का वृहद विस्‍तार दिखाई पडता है, जिसमें मृत्‍यु का शैतान हमारी ओर बढता चला आ रहा है । दुख की बात यह है कि उस अंधेरी सुरंग के दूसरे छोर पर कोई भी प्रकाश पुंज नहीं दिखता ।" एना ने सिसकते हुए कहा ।

अब वहॉं पर एक खामाशी छाई हुई थी क्‍योंकि एमिला ने इस बार बातचीत को आगे बढाने के लिए कोई भी प्रश्‍न नहीं किया ।

"एमिला.... एमिला सो गई क्‍या मेरी बच्‍ची ?"

"नहीं नहीं मम्‍मी , मैं गहरी सोच में डूब गई थी" उसने उत्‍तर दिया ।

"हमारी मृत्‍यु तक तो बात ठीक थी लेकिन हम तुमसे प्‍यार करने की वजह से ही तुम्‍हे दिन के प्रकाश में लाकर मौत के मुँह में नहीं डाल सकते । यही वजह है कि हम तुम्‍हारा गर्भपात करवाने जा रहे हैं ।"

"दया ... मेरी मॉं, दया ! मैं जानती हूँ कि अँधेरे ने तुम्‍हारे जीवन का सारा प्रकाश ग्रस लिया है । लेकिन मैं तुमसे अनुरोध करती हूँ कि तुम मेरे जीवन को गर्भ में समाप्‍त करने का अपराध मत करो । मेरा पालन-पोषण करों, मुझे प्‍यार करो, मुझे दुलार करो , लेकिन भगवान के लिए मुझे मृत्‍यु का आशीर्वाद मत दो" एमिली ने सिसकते हुए कहा ।

"मत रो मेरी बच्‍ची, मत रो । लेकिन अंतत: यदि तुम्‍हारे शरीर में घातक विषाणु की पहचान हो जाती है , जो कि अभी हमें नहीं मालूम है तो तुम्‍हे एक डरावनी कलंकित जिंदगी जीनी पडेगी, यह हमें पसंद नहीं है । इसीलिए हमने तुम्‍हे जन्‍म से पहले समाप्‍त करने का कठोर निर्णय किया है । "

"फिर से विचार करो मॉं यह निर्णय लेने से पहले दो बार और सोचो । मैं तुमसे फिर से अनुरोध करती हूँ कि तुम मुझे इस बीमारी और मृत्‍यु के संसार में आने दो । एक टिमटिमाता हुआ प्रकाश पूरे कमरे के अंधकार को भगा देता है । जन्‍म के बाद मैं इस बीमारी के प्रति जागरुकता फैलाने का काम करुंगी । मैं लोगों को इस बीमारी और मृत्‍यु के साथ जीवन जीने वालों की कहानी सुनाऊंगी । मैं इस बीमारी से लडने के लिए एक आंदोलन शुरू करूंगी । चिकित्‍सा विज्ञान इस बीमारी को समाप्‍त करने के लिए दिन रात काम कर रहा है । कौन जानता है कल मेरे और मेरे जैसे अनगिनत लागों के लिए कोई उपचार और जीवन हो । सफलता की चिंता किए बिना मैं इस क्षेत्र में कार्य कर रहे संगठनों के साथ काम करुंगी । "

"बहुत खूब, एमिली । तुमने मेरी ऑंखें खोल दीं । जो होगा देख जाएगा , अब मैं यह सुनिश्चित करुंगी कि तुम इस दुनिया में आओ और अपना जीवन एड्स के क्षेत्र में एक मिशनरी बनकर सेवा करते हुए व्‍यतीत करो । "

"कृपया मुझे माफ कर दो मेरी बच्‍ची , मुझे माफ कर दो । तुमने मुझे एक घृणित अपराध करने से बचाया है ।"

"zzzz...मुझे नींद आ रही है मॉं , क्‍योंकि तुम भी ऊंघ रही हो । इसलिए शुभरात्रि मम्‍मी , सोने के लिए अभी भी काफी रात बाकी है ।"

"मेरा आशीर्वाद तुम्‍हारे साथ है , मेरी प्रिय एमिली । ईश्‍वर तुम्‍हे अपने स्‍वार्थी लोगों की सेवा करने का साहस और सहनशीलता दे ।"

"आज हम एक शुरुआत कर सकते हैं और ब्‍लागरों की एकता ने इस शुरुआत को गति दी है । वेब की दुनिया में जाओ मम्‍मी और एडस के बारे में और बहुत सी जानकारी प्राप्‍त करो । "

"कैसे मेरी बच्‍ची ?"

"कोई भी सर्च इंजिन खोलो और AIDS टाइप करो अथवा http://unite.blogcatalog.com पर जाओ। आपको वहॉं बहुत सारी संबंधित लिंक मिलेंगी । "

"अच्‍छा ! तुम तो हमसे अधिक जागरुक जान पडती हो । बहुत खूब मेरी बच्‍ची"

"अच्‍छा तो अब मैं अगली रात को इसी जगह पर इसी समय मिलूँगी । अगली मुलाकात तक के लिए बाय बाय । अपने स्‍वास्‍थ्‍य का ख्‍याल रखो और अपनी कामेच्‍छाओं को नियंत्रण में रखो । ड्रग्‍स को 'ना' बोलो । खुशियों का सुरक्षित होकर आनंद लो । रक्‍त का परीक्षण कराओ और रक्‍त के किसी भी आदान-प्रदान में नई सुई का प्रयोग करो । आओ आज हम साथ-साथ एक नई शुरुआत करें , हॉं एक नई शुरुआत । एक ऐसी शुरुआत जिसका एक अंत भी है , एक अंत ! मुस्‍कुराहट और दिन के बहुत से उजाले के साथ ।

आमीन ! !

यह कहानी मेरे एक ऑनलाइन मित्र सुदाम पाणिग्रही, जो कि अंग्रेजी में अपने ब्‍लॉग Share and smile पर लिखते हैं, के द्वारा एड्स दिवस पर अँग्रेजी में लिखी गई कहानी AIDS: Towards A New Morning का हिन्‍दी अनुवाद है । अनुवाद और अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने की इजाजत देने के लिए सुदाम को धन्‍यवाद ।

नैनोरिमो द्वारा नवंबर में आयोजित राष्‍ट्रीय उपन्‍यास लेखन माह (नेशनल नॉवेल राइटिंग मंथ ) प्रतियोगिता में सुदाम पाणिग्रही अपने उपन्‍यास ड्राई ओएसिस (Dry Oasis) में तीस दिनों में 61,431 शब्‍द लिखकर विजेता का खिताब हासिल किया । उनके इस उपन्‍यास का एक अध्‍याय आप यहॉं पढ सकते हैं ।

इस उपलब्धि के लिए उन्‍हें बधाई और शुभकामनाऍं ।