April 21, 2012

इंट‍रमिशन के बाद : अन्‍ना-बाबा लाइव

कल अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव को टीवी पर लाइव पत्रकार वार्ता करते पाया। जिसका अंदेशा था वह हुआ। कहीं कुछ बिखरा।

यह एक ऐसा आंदोलन(?) था जिसमें हम टीवी और इंटरनेट के माध्‍यम से शामिल थे। हमने इंडिया अंगेन्‍स्‍ट करप्‍शन की साइट को लाइक‍ किया। हमने अन्‍ना की फोटो लगाई अपनी फेसबुक की वाल पर। हमने ट्वीट और रिट्वीट किया अन्‍ना के पक्ष में। उस समय आंदोलन और अन्‍ना एक दूसरे के पर्याय थे। हमने न्‍यूज चैनलों पर डटकर अन्‍ना के अनशन का लाइव देखकर उनकी टीआरपी बढाई। कुछ लोगों ने हमसे ज्‍यादा किया। मैदान में गए भाषण सुने। नारे लगाए। टोपी पहनी। बाइट दिया। अपनी हैसियत के अनुसार फुटेज खाई। कुछ लोगों का आरोप था कि इन लोगों ने आइसक्रीम,गोल गप्‍पे और चाट वगैरह भी खाई। 

हम अन्‍ना हजारे और लोकपाल को बस थोडा ही कम-ज्‍यादा जानते थे। किशन बाबूराव हजारे उर्फ अन्‍ना हजारे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं महाराष्‍ट्र के। बाद में पता चला कि गॉंधीवादी भी हैं। यह एक और अच्‍छी बात थी। लोकपाल बिल एक ऐसा बिल है जिससे भ्रष्‍टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। यह चुनाव आयोग या उच्‍चतम न्‍यायालय की तरह काम करेगा। इस पर सीधे किसी का दबाव नही होगा। अन्‍ना हजारे एक ऐसे शख्‍स थे जिसका समर्थन किया जा सकता था। समर्थन किया गया। टीवी देखी गई। लाइक किया गया। टिपिआया, फेसबुकियाया, ट्विटरिआया गया। वह सब कुछ किया गया जो हम बिना किसी असुविधा के कर सकते हैं। 

हम आंदोलनकारी थे। हमने अपना पक्ष चुना था। हम चुप नहीं थे। हम चाहते थे कि कुछ तो हो। हम रोज निकलते घोटालों और सरकारी एकालाप से ऊब चुके थे। इसे व्‍यंग में दूसरे तरफ से अतिरेक में बोलने वालों ने कहा कि हम लोकतंत्र से ऊब चुके हैं। बहरहाल हमें कोई चाहिए था जो बेदाग हो। जिसका घर सीसे का न हो। हम यह भी जानते थे कि सफलता या असफलता ही काम के दो पहलू नहीं होते। सबसे महत्‍वपूर्ण तीसरा पहलू होता है, जो दोनों के बीच होता है, वही चीजों को बदलता है, परिणाम लाता है। आंदोलन की विचारधारा का हमें पता नहीं था। यह बताया जा रहा था कि यह मुख्‍यत: भ्रष्‍टाचार के खिलाफ था। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जाने से कोई भी विचारधारा नहीं रोकती। यह किसी पार्टी के खिलाफ नहीं था। यह किसी समुदाय के खिलाफ नहीं था। यह गॉंधीजी की विचारधारा से प्रेरित था क्‍योंकि यह अनशन पर आधारित था। अनशन और महात्‍मा गॉंधी एक दूसरे के पर्याय है। अनशन भारत देश को गाँधीजी की अमूल्‍य भेंट है। यदि हम गाँधी का कुछ बचा सके हैं तो वह है अनशन। जो अनशन करेगा वह अहिंसक है। वह गॉंधी के आदर्श पर चल रहा है। 

इस आंदोलन से ठीक पहले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव हठयोगी आसनों की कुशलतापूर्वक मार्केटिंग   करने से मिली लोकप्रियता के नाम को ब्रांड बनाकर आयुर्वेदिक औषधियों/घरेलू मसालों के सफल व्‍यापारी बन चुके थे। इस काम में रामदेव जी इतना रुपया कमा चुके थे कि सामाजिक विषयों पर दखलंदाजी करते हुए राजनीति में घुसपैठ कर सकें। काला धन इनकी प्रमुख चिंता थी। इन्‍होंने अपनी कोई कोई पार्टी भी बना ली  हैं। यह चाहे संयोग ही हो या कुछ और की विपक्षी पार्टी भाजपा इसी मुद्दे को इससे पहले जोर शोर से उठा रही थी। दिल्‍ली में अपने भक्‍तों अनुयायिओं को लेकर किए गए आंदोलन में इन्‍हें सफलता नहीं मिली। सबसे शर्मनाक बात यह रही है कि पुलिस की कार्रवाई में इन्‍हें वहॉं से जान बचाकर भागने पर मजबूर होना पडा। वहॉं पर जनउभार या जनांदोलन जैसी कोई बात नहीं थी। 

एक बूढा कुछ लोगों को लेकर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जंतरमंतर पर आमरण अनशन पर बैठ गया है। यह था वह पहला प्रभाव जिसे अंग्रेजी में फर्स्‍ट इम्‍प्रेशन कहा जाता है। हॉं उस समय कुछ लोग ही थे। 

लेकिन जैसे जैसे आंदोलन आगे बढा पता चला कि इनके पीछे गैरसरकारी संगठनों और सेवानिवृत्‍त अधिका‍रियों की टीम थी। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं थी। किरण बेदी बाबा रामदेव के आंदोलन का प्रमुख हिस्‍सा रही थीं। अब अन्‍ना के साथ्‍ा भी आ खडी हुईं। कुछ फिल्‍मी सितारे भी आए। श्री श्री रविशंकर भी आए। सिविल सोसायटी के सभी मनोनीत सदस्‍य तो थे ही। अपने नाम और समय का सदुपयोग करने का इससे अच्‍छा मंच और क्‍या हो सकता था। बाबा रामदेव को अन्‍ना ने तब ज्‍यादा लिफ्ट नहीं दिया था। 

बाद में बहुत कछ हुआ पर कुछ नहीं हुआ। अब पीछे देखो तो लगता है जैसे नूरा कुश्‍ती हो रही थी। जनता का हाल उस बच्‍चे की तरह हो गया जो चॉंद की जिद तो कर रहा है लेकिन उसे यह नहीं पता कि वह चॉंद का करेगा क्‍या उसे रखेगा कहॉं। सारी बहस लोकपाल और लोकतंत्र पर केन्द्रित हो गई। एक पक्ष ने कहा कि लोकपाल का हाथी लोकतंत्र के अंकुश से बाहर चला जाएगा तो दूसरे ने इसे जोकपाल या ऐसा शेर कहा जिसके दांत ही नहीं हैं। यहीं से जनता के कनफुजियाने की शुरुआत हो गई। 

अगले दौर के आंदोलन से पहले अन्‍ना की टीम की ईमानदारी पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाया जा चुका था। अरविंद केसरीवाल को इन्‍कमटैक्‍स चुकाना पडा। किरन बेदी को विमान के किराए के मामले में सफाई देनी पडी। उनका कुछ बिगडा तो नहीं पर तेवर नरम पड गए। बाबा रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्‍ण भी जाँच के दायरे में आ गए। यह भी सबको मालूम था‍ कि यह सब इनके आंदोलन करने का परिणाम था। अन्‍ना पर भी सरकारी पक्ष ने खूब आरोप लगाए। लेकिन उन्‍हें बाद में माफी मॉंगनी पडी। 

कुछ प्रश्‍न थे जो आंदोलन पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा रहे थे। जैसे आंदोलन का दक्षिणपंथी झुकाव और अल्‍पसंख्‍यकों की अनुपस्थिति, केवल उच्‍च वर्ग के प्रतिनिधियों का होना अर्थात आरक्षण का मुद्दा सिरे से गायब था। लेकिन आंदोलन का सबसे कमजोर पक्ष था आंदोलनकारियों का खुद का चरित्र। यही वह बात थी जो नदारद थी। भीड वह सब कर रही थी जिसके खिलाफ वह खडी थी। यह आंदोलन था ही नहीं। एक बहुत ही सामान्‍यीकृत रुप में यह वैसा ही था जैसे गॉंव का प्रभावशाली व्‍यक्ति गलत काम करते हुए पकडा जाय अच्‍छी खासी भीड इकट्ठी हो जाए और एक साफ सुथरी छवि वाले बुजुर्ग के अगुआई में सब उसके खिलाफ बोलने लगें। लेकिन बाद में पोल खोलने वाली उसकी धमकियों से भीड छँट जाए और बाद मे वह सब मैनेज कर ले। वह सीन याद आता जिसमें क्राइस्‍ट कहते हैं कि वह पहला पत्‍थर मारे जिसने पाप न किया हो। 

या हम ये सोचते थे कि हमारा विरोध बडे घोटालों से है जिसमें करोडों अरबों रुपए जनता के बर्बाद होते हैं। व्‍यावहारिक जीवन में हम व्‍यावहारिक ही रहते हैं। अब यह भी जुमला चला है कि आप ईमानदार बनिए लेकिन उतना ही जितना कि आप मैनेज कर सकें। पता नहीं इसका सही मतलब क्‍या है। 

इस आंदोलन के समर्थन का एक और पहलू था। जो लोग इस आंदोलन का विरोध कर रहे थे। उनमें से कई लोग भी कई घोटालों में फंसे हुए थे। ठीक उसी समय सरकार के अंदर कई अभूतपूर्व घोटाले सामने आने के बाद भी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के पास जाने पर हो पाई। इसमें सभी पार्टियों के लोग शामिल थे। यह एक ऐसी दुविधा होती है जिसमें हमें उस परिस्थिति में बेहतर का चुनाव करना पडता है। 

लेकिन अंतत: लोकपाल एक मुहावरा बन गया। आंदोलनन का लोकपाल हो गया। अन्‍ना की तबियत खराब हो गई। मुंबई में भीड नहीं जुटी। 

लेकिन इंटरमिशन के बाद पिक्‍चर में बाबा रामदेव फिर दाखिल हो गए। इन्‍हें सह अभिनेता बनाकर अन्‍ना ने अपनी अदूर‍दर्शिता का परिचय दे दिया है। अब यह शो नेताओं के चुनाव में भीड इकट्ठा करने के लिए अभिनेताओं को लाने जैसा हो रहा है। 
अब देख रहा हूँ कि फेसबुक और इंटरनेट पर अन्‍य जगह जो मित्र काफी उत्‍साह से अन्‍ना के पक्ष में बोल लिख रहे थे खामोश हैं, यद्यपि विरोध नहीं कर रहे हैं। 

अंत में कुछ लाइनें जिनके लिए मुझे सही शब्‍द नहीं मिले : 
शायद अभी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि ऊंट किस करवट बैठता है या फिर हम ऐसी स्थिति में पहुँच रहे हैं जहॉं किसी भी पक्ष में खडे रहो  या कहीं न खडे रहो कोई फर्क नहीं पडता।  क्‍योंकि अंतत: हम गोलगोल घूम रहे हैं।

4 comments:

  1. आपके गोल गोल घूमने से हमें भी चक्कर आने लगे हैं :-)

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  2. धन्‍यवाद आपका। इसीलिए हम रुक गए जिससे चक्‍कर आने से पहले आप कमेंट कर लें :-)

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  3. सचमुच. एक समय का उग्र आंदोलन, जो हमें कुछ कुछ स्वाधीनता आन्दोलन जैसी झलक दिखा रहा था, अचानक ठंडा पड़ गया. खुद अन्ना की आवाज़ में वो दम नहीं रहा.

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  4. मुझे भी ऐसा ही लगता है।

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नेकी कर दरिया में डाल